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प्रवीण शाह जी के जवाब भाग- एक पर विमर्श

बुधवार, 15 जून 2011

@ ट)मैंने आपको आजतक कोई गाली नहीं दी है जबकि मैं देख रहा हूं कि आप इस बात का आग्रह रखे हैं कि मैं भी अनावश्यक गाली देता हूं। क्या जब कोई आपकी बहन बेटी के बारे में अपशब्द लिखे तो आपकी सोच की क्या अभिव्यक्ति रहती है?????????

मैं ऐसा कोई आग्रह नहीं रखे हूँ फिर भी यदि आपको ऐसा कहीं लगा तो मेरी ओर से हार्दिक खेद है व मैं क्षमाप्रार्थी भी हूँ... जब कोई मेरे किसी प्रिय या खुद मेरे ही खिलाफ अनर्गल लिखे, जैसा कि कुछ भड़ासी लिख भी रहे हैं और आपने उसे ब्लॉग पर बने रहने दिया है तो मुझे दुख होता है पर मैं ऐसे तत्वों को उनकी औकात से ज्यादा भाव देने के पक्ष में नहीं।
@ट)क्या आपको नहीं लगता है कि अंतर्विरोधों के चलते ब्लाग की सदस्यता से बेदखल कर देना अलोकतान्त्रिक है?आप अब तक भड़ास के दर्शन को आत्मसात नहीं कर पाए वरना ये बात ही न करते। भड़ास किसी अन्य कम्युनिटी ब्लाग की तरह नहीं है कि संचालक की लल्लो-चप्पो नहीं करी तो सदस्यता रद्द कर दी जाए। लोकतंत्र में किसी की औकात या भाव एक वोट से ज्यादा कहां है भाई...
@ झ) आप भड़ास पर ई-मेल द्वारा लिखने के पक्षधर हैं या विरोध में? अमित जैन से जब कई बार आग्रह करा गया कि वो अपना माफ़ीनामा ई-मेल से प्रस्तुत करें तो आपने इस बात पर अपनी सहमति क्यों नहीं जताई जबकि आप जानते हैं कि अपने एकाउंट से भेजी हुई पोस्ट में कभी भी लेखक या संचालक कुछ भी संपादन/डिलीट कर सकता है जबकि ई-मेल से आयी पोस्ट में संचालक को पता तक नहीं चलता कि वह पोस्ट किसने भेजी है जब तक आई.पी.पता न ट्रेस करा जाए, लेखक उस पोस्ट में संपादन/डिलीट नहीं कर सकता।
आप नहीं चाहते कि आपका ई-मेल पता सार्वजनिक करा जाए या आपकी पहचान जाहिर हो तो बकौल अमित जैन आप भी मेरे द्वारा बनाए एक फ़र्जी आई.डी.ही हो सकते हैं क्या कहना चाहेंगे आप इस बारे में?????
जब सदस्य नहीं था तब मैंने इ-मेल के जरिये लिखा भी था, अब सदस्य होने के बाद मैं ब्लॉगर ड्राफ्ट के जरिये लिखने को ही बेहतर मानता हूँ। अमित जैन ने तुरंत खेद व्यक्त किया था और मेरी समझ से बात वहीं समाप्त हो जानी चाहिये थी, आखिर सभी सदस्यों ने देखा कि उन्होंने खेद व्यक्त किया, ई-मेल से माफी लेने से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? अमित जैन यदि यह समझते हैं कि मैं भी एक फर्जी आई.डी. हूँ तो वह गलत हैं!

@झ)आप जानते हैं कि ई-मेल से भेजी गयी पोस्ट को लेखक बाद में संपादित नहीं कर सकता न ही डिलीट कर सकता है,यदि जैसे ही मुख्य पन्ने से पोस्ट पीछे जाने पर उन्होंने कुछ भी कलाकारी(जैसा कि आपने भी खूब जीभर के करने की कोशिश करी है चाहे वो कमेंट से संबंधित हो या पोस्ट के गायब होने की बातें)करी तो क्या प्रमाण रहेगा इस विषय पर आपने नहीं सोचा या अमित जैन के प्रति मुलायम कोना होने के चलते आप ऐसा सोच ही नहीं रहे। जरा अमित से पूछ लेते एक बार कि उन्हें ई-मेल से माफ़ीनामा भेजने में क्या कष्ट था क्या आपने ई-मेल से पोस्ट्स नहीं भेजी हैं तो फिर ऐसा दुराग्रह किस वजह से था ये आपने समझना नहीं चाहा?आप प्रयोजन समझ गए होंगे।
@ ज)आपने मुनेन्द्र सोनी को अनूप मंडल का भाविक बना दिया क्या और उन्होंने आपको जैन इस विषय पर आपकी सोच की अभिव्यक्ति क्या है?????
भाविकों के साथ यह आम समस्या है कि यदि कोई भी उनकी धर्मविशेष से द्वेष रखती बातों का विरोध करता है तो वह उसे जैन कहने लगते हैं... खैर मित्र मुनेन्द्र ' भाविक ' द्वारा जैन कहलाने पर मुझे तो कोई समस्या नहीं है... :)
@ज)और क्या आप स्वयं आत्मविश्लेषण करें तो ये नहीं पाते कि यदि कोई इस विषय पर चर्चा करे तो आपको कथित तौर पर भाविक लगने लगता है मुनेन्द्र भाविक द्वारा आपको दिया नया नाम प्रवीण जैन अच्छा लगा या सिर्फ़ धर्म की बात है नाम पर आपत्ति है?
@ छ)अमित जैन की पत्नी के साथ उनका जो चित्र उन्होंने प्रकाशित करा था क्या आपने उसे देखा है जो आप अनूप मंडल के ये लिखने पर कि अमित गलबहियों में व्यस्त हैं आपको आपत्तिजनक लगा जबकि इस बात का संदर्भ संजय कटारनवरे की माता जी के संबंध में अमित जैन द्वारा करी गयी अनर्गल बात के संदर्भ में था????? यदि नहीं देखा है तो आप संचालक पर पक्षपात का आरोप कैसे लगा कर लिख रहे हैं क्या यही आपकी सोच है?????
जी नहीं मैंने चित्र नहीं देखा कभी भी और न ही देखना चाहता हूँ पर यह बताइये कि यदि कोई सदस्य अपने किसी अंतरंग क्षण के दौरान लिये चित्र को प्रकाशित कर देता है तो क्या भड़ास के दर्शन के अनुसार अनूप मंडल या कोई अन्य आपत्तिजनक शब्द प्रयोग कर सकता है व किसी को एतराज नहीं करना चाहिये ? मेरे विचार से सभी के लिये एक से मानक लागू होने चाहिये... उदाहरण के लिये दीनबंधु जी की मेरे प्रति की गई टिप्पणी " आयशा वाली सारी गालियां इसे एक बार दोबारा... फनीका है ये ही जो भड़ास में मुखौटा लगा कर घुसा है।" क्या आपको जायज लगती है ?
@छ)भड़ास के दर्शन के अनुसार यदि अमित जैन अपनी पत्नी के साथ संभोग करते हुए चित्र को प्रकाशित करते तो उसे हटा दिया जाता लेकिन चूंकि उन्होंने अपनी पत्नी के गले में बांहें डाल कर तस्वीर प्रकाशित करी थी वो भी भड़ास पर नहीं बल्कि वो उनकी प्रोफ़ाइल तस्वीर थी जिस पर यदि अनूप मंडल ने लिखा कि गलबहियां तो ये बात आपको संजय कटारनवरे की माताजी का इंटरव्यू लेने के लिये कि संजय किस की पैदाइश हैं ये आपको उसके समकक्ष जान पड़ता है तो आप तुरंत लिख पड़ते हैं सही जगह सही समय सही चोट...? आपका तर्कशास्त्र किस प्रकार का है कि आप बिना तस्वीर देखे ही किसी के पक्ष या विपक्ष में खडे होने का निर्णय ले लेते हैं अमित जैन से एक बार तस्वीर पुनः प्रकाशित करने की बात लिख देते तो शायद वे आपकी बात मान भी जाते और इस तरह आप भी देख लेते कि वो तस्वीर कितनी सामान्य सी थी? दीनबन्धु ने सिर्फ़ उसी तरह अपने विचार व्यक्त करे हैं जिस तरह आप करते हैं अनूप मंडल की बातों को अदालत में न ले जा कर बल्कि समाज में एक विचार की तरह चलते रहने देना चाहिये, मेरी सहमति या असहमति अथवा जायज़-नाजायज़ ठहराने के प्रभाव का आंकलन आप किस प्रकार करेंगे?
जय जय भड़ास

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काले जादू के विमर्श को तुम सोच रहे हो कि भटका लिया तो तुम्हारी गलतफ़हमी है

गुरुवार, 19 मई 2011

प्रवीण शाह तुम्हें लगता है कि तुम अपना मुंह छिपा कर अपनी धूर्तता भी छिपा लोगे तो तुम अव्वल दर्जे के जड़बुद्धि हो। तुम्हारे कपट का रोज ही भड़ास पर खुलासा होता है लेकिन तुम इतने निर्लज्ज हो कि हर संभव कोशिश में लगे हो कि अपना मायावी पाप छिपा सको।
आदरणीया बहन मुनव्वर सुल्ताना जी ने मुलाकात का जो स्नेह पूर्ण समय दिया उसके लिये हम सभी अनूप मंडल के भाविक उनके आभार को व्यक्त करने के लिये शब्द नहीं जुटा पा रहे हैं।
काले जादू के विमर्श को तुम सोच रहे हो कि भटका लिया तो तुम्हारी गलतफ़हमी है विमर्श समयानुसार जारी रहेगा। भड़ास ही वो वैश्विक माध्यम है जिस पर हम बिना किसी दबाव के अपनी बात रख सकते है जिधर तुम्हारा कपटजाल कामयाब नहीं है। अंग्रेज के समय जो गुहार तुम्हारे मायाजाल से छुटकारा दिलाने की लगाई गयी थी वह अब कहीं जाकर रंग ला रही है, अवतार स्वरूप संचालक आदरणीय़ डा.रूपेश श्रीवास्तव जी ने हमें अपनी बात रखने का एक विश्वस्त मंच प्रदान करा है जिस पर हम दानवीय सोच का पर्दाफ़ाश कर रहे है और लोगों में इस बात की चेतना लाने का जो मिशन लगभग सवा सौ साल पहले शुरू हुआ था अब धीरे-धीरे रंग पकड़ रहा है। तुम्हारी बौखलाहट दिख रही है राक्षसी चेहरे से मुखौटा हट रहा है, तुम्हारी झूठी और मक्कारी से भरे अहिंसा के दिखावे की चमड़ी उधड़ रही है। तुम कितने हिंसक और भयानक हो ये सत्य तथ्यात्मक रूप में दुनिया के सामने लाए जाने के लिये हम भड़ास के मंच को बारंबार नमन करते हैं। हम प्राणप्रण से से तुम्हारे दानवीय स्वप्न "जयति जिन शासनम" को पूरा होने से रोकने में अवश्य सफल होंगे। धरती माता कभी भी जिनों,रक्तपिपासु नंगे पिशाचों, दानवों, असुरों, राक्षसों के कब्जे में नहीं आने देंगे।
जय जय भड़ास
जय नकलंक देव

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प्रवीण शाह जी सचमुच अब चिरकुटई का खेल खत्म ही हो रहा है लेकिन आप और अमित जैन उसे जारी रखे हैं

बुधवार, 18 मई 2011

प्रवीण शाह जी सचमुच अब चिरकुटई का खेल खत्म ही हो रहा है लेकिन आप और अमित जैन उसे जारी रखे हैं। आपने जो एक टुच्ची सी ट्रिक करके भड़ास के संचालकों का संबंधित ज्ञान परखना चाहा था तो Rudrakshanath नाम से टिप्पणी करके उसी की मटकी फोड़ी है। अब आप शैतान बनें या पिशाच ये आपके ऊपर है। सचमुच आप जान रहे हैं न कि खेल खत्म हो रहा है मेरे साथ साथ आप भी जान पाए या नहीं??
१) ये
तो बड़ी चिरकुट बात है आप शैतान ही क्या बल्कि यदि ब्लॉगर की सेटिंग में जाकर अपना प्रदर्शित नाम डा.रूपेश श्रीवास्तव लिख दें तो मेरा नाम दिखने लगेगा और अपनी मुंह छिपाए हुए तस्वीर हटा कर मेरी तस्वीर लगा दीजिये बस अब आप लोगों को भ्रमित कर सकते हैं कि ये प्रवीण शाह नहीं डा.रूपेश श्रीवास्तव ने लिखा है, कैसे लगा ये टुच्चा सा रहस्योद्घाटन??


२) किसी भी सामुदायिक ब्लाग के संचालक ही क्या अगर उनके पुरखे भी उतर आएं अनूप मंडल की बिसात ही क्या कि किसी भी लेखक सदस्य के प्रोफ़ाइल पर जाकर उनका नाम बदल दें तो मैं चुनौती दे सकता हूं कि आपका दूसरा वाला स्क्रीन शाट ट्रिक से तैयार करा हुआ है ये बहुत आसानी से चित्र को फोटोशाप या पेन्ट में खोल कर बदलाव करके लगाए जा सकते हैं।
३) पिछली एक पोस्ट में आपने लिखा था कि मैंने अपने कमेंट(जिसकी आपने लिंक दी थी स्क्रीन शाट नहीं) में माना है कि आपकी दो पोस्ट संचालकों ने हटाई हैं उसके बारे में जब खुलासा हुआ तो आप चुप्पी क्यों साध गये??
एक बात साफ़ है कि यदि आप भड़ास का दर्शन समझते हैं और आपको भड़ास ज्वाइन करके खुशी है तो कम से कम मुझे तो इस बात में सच्चाई दिख रही है बस अभी उस दर्शन को जीवन में अमल में लाना बाकी है।पाठक तो बेचारे गाफ़िल हो सकते हैं लेकिन ध्यान रखियेगा कि संचालक भूलते नहीं हैं न ही भ्रमित होते हैं ईमानदारी भड़ास को चला पाने की शक्ति है हमें किसी मुखौटे की जरूरत नहीं।

हम तो ये कबड्डी जमाने से सामना कर रहे हैं पहले ही बता चुका हूं कि ब्लॉगिंग के सबसे बड़े मुखौटाधारी यशवंत सिंह से लड़ते हुए उसके ही दाँवपेंच सीखे हैं।
जय जय भड़ास

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प्रकाश गोविन्द जी केश लुंचन(ऊपर और नीचे का) कराने से पोस्ट करने तक का वीडियो बनवा लीजियेगा

शनिवार, 19 मार्च 2011

साइंस के फ़रोग़ के लिये तंत्र-मंत्र जैसे गूढ और रहस्यमय विषय पर सहकार्य करने के लिये आर्थिक और शारीरिक तौर पर आदरणीय प्रकाश गोविन्द जी व प्रवीण शाह जी प्रस्तुत हुए हैं ये बेहद खुशी की बात है। एक समय था जब कि दूरश्रवण और दूरदर्शन पर चर्चा करना भी कुछ ऐसा ही विषय रहा होगा लेकिन जब ये बातें सिद्धांतों से गुजर कर तर्क और तथ्य की कसौटी पर होकर अनुभव में दर्ज हो गयी तो साइंस में शुमार होने लगीं। अब भले ही किसी को टीवी बनाना न आता हो लेकिन चलाना आता है क्योंकि वह साइंस है ठीक वैसे ही एक समय तक वनस्पतियों आदि की जानकारी खास वर्ग तक ही सीमित थी जिसके आधार पर वे बीमारियों को दूर कर चमत्कारिक प्रभाव सा पैदा करके पूजे जाते थे। काल क्रम में जैसे जैसे डा।रूपेश श्रीवास्तव जैसे लोग ईश्वर की कृपा से आते गए वे परिस्थितियों से जूझ कर तमाम रहस्यों को खोल कर साइंस में दर्ज करा कर आम आदमी के लिये जीवन आसान करते गए।
अब जबकि तंत्र-मंत्र की बात चल रही है तो कुछ लोग जिसे अंधविश्वास या बकवास कह कर दरकिनार कर रहे हैं असल में शोध की किसी भी संभावना को सिरे से नकार रहे हैं इसी संदर्भ में मुनव्वर आपा ने होम्योपैथी का जिक्र करा था जो कि भाई प्रवीण शाह जी को गवारा नहीं हुआ वे पपीता पकड़ कर बैठे हैं जबकि बात पपीते की नहीं एक पूरे प्रकरण में ये एक घटना है जिसे किसी शोध के लिये शुरूआत बनाया जा सकता है।
प्रकाश गोविन्द जी ने अपने दिल के बड़प्पन का परिचय देते हुए जो रकम देने की बात कही है वो मानवता के ऊपर उपकार रहेगा। एक निवेदन कि जब वे ऊपर(और नीचे) के बाल इस बात से संबंधित शोध के लिये भेजें तो कृपया डा।रूपेश श्रीवास्तव की तरह ही इस बात का "अनकट" वीडियो बना कर डाकखाने में पोस्ट करने तक लिफ़ाफ़ाबंद करने आदि को चित्रित करें ताकि यह एक वीडियो प्रमाण रहे वरना बात आयी गयी हो जाएगी कि कौन सा बाल ऊपर का था और कौन सा बगल या नीचे का था या प्रकाश गोविन्द जी का है भी या किसी और का........ कृपया इस बात का ध्यान रखें प्रकाश जी साइंटिफ़िक अंदाज में तर्क और तथ्य को पुष्ट करते हुए हम इस विषय पर आगे बढ़ेंगे तो बेहतर रहेगा। शीघ्रता करें और वीडियो स्पष्ट हो ये ध्यान रखें धन संबंधी बात आगे के चरण में ले जाते हैं।
जय जय भड़ास

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अमित भाई जिस विषय पर बात चल रही है उस समय चूंकि मैं भी वहां मौजूद थी और पूरे होशोहवास में थी

गुरुवार, 17 मार्च 2011

अमित भाई जिस विषय पर बात चल रही है उस समय चूंकि मैं भी वहां मौजूद थी और पूरे होशोहवास में थी। डा.साहब के मूवी कैमरे से लगभग पौने घंटे का एक "अनकट" वीडियो है जो कि mpeg format में बना है और फिर इसके बाद जब एक और वीडियो है जिसमें कि कैमरा मेरे हाथ में है और डा.साहब ने उस पूरी सामग्री को दोबारा निकाल कर दिखाया गया है और यह वीडियो भी तकरीबन बीस मिनट का है। चूंकि नंगी आंखों से धोखा हो सकता है इस लिये इस वीडियो को स्टिल फोटोज़ में jpeg format में तोड़ लिया गया जिसमें कि कई लाख तस्वीरें हैं यदि इन तस्वीरों को भड़ास पर चढ़ाना संभव हो पाता तो अब तक तो मैं ही कर चुकी होती। ये जरूर कहा गया था कि यदि कोई चाहे तो उसे इस वीडियोज़ की प्रति भेज दी जाएगी।
एक बात तो साफ़ है कि विषय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं अपितु विचार-विमर्श का है। सभी भड़ासी भाई-बहन किसी से कमतर नहीं हैं लेकिन इस सार्थक नोकझोंक भरी शैली से अक्सर सही हल मिल जाता है यही भड़ास की खासियत है। हम सभी जानते हैं कि खुद डा.रूपेश श्रीवास्तव क्या किसी भी गूढ़ विषय को इतनी आसानी से छोड़ देने वालों में से नहीं हैं। वे साइंस की तरक्की के लिये एक लाख रुपए तक सहर्ष देने को तैयार हैं ताकि इस विषय पर कुछ आगे शोध हो सके एक सिरे से नकार देने से तो शोध का भी मार्ग बंद हो जाएगा। एक जमाना था कि होम्योपैथी को डा.हैनीमैन के समय शंका से देखा गया फिर ये ऊंचाइयों तक गयी और अब फिर साइंस की एक खास विचारधारा का कुटिल तबका इसे सिरे से नकार रहा है आप इस विषय में कौन सा साइंटिफ़िक तरीका अपनाने वाले हैं कृपया स्पष्ट करें क्योंकि हमने जो तर्कपूर्ण तरीका अपनाया था वह युवा भड़ासिन कु.फ़रहीन मोमिन द्वारा सुझाया था जो कि स्वयं साइबर फ़ोरेन्सिक साइंस की छात्रा हैं साथ ही थे डा.दीपांशु ठाकुर जो कि स्वयं होम्योपैथ होने के साथ अंधश्रद्धा निर्मूलन कार्यक्रमों के संचालक रहे हैं। अपनी प्राचीन विद्याओं को यदि हम किसी भी प्रकार से पुनर्ज्जीवित कर सकें तो इससे मानवता का ही भला होगा जो उपाय हानि पहुंचा सकते हैं उनमें लाभ की भी गुंजाइश होती है बशर्ते आपको प्रयोग का सही तरीका पता हो। एक समय में डा.जगदीश चंद्र बसु से लेकर डा.बंधु साहनी सभी तो इस तरह की निंदा का शिकार होते रहे हैं इसमें डा.रूपेश श्रीवास्तव जी के लिये नया क्या है। वे तो बस इतना चाहते हैं कि घटना की साइंटिफ़िक तरीके से विवेचना हो सके न कि वे अंधविश्वास फैला रहे हैं जैसा कि जताया जा रहा है।प्रवीण शाह ही भी कृपया बात को इसी संदर्भ में लें तो लोकहित होगा।
जय जय भड़ास

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प्रवीण शाह जी विमर्श आगे बढाइये और पिछली बातों पर गौर करें

बुधवार, 16 मार्च 2011

प्रवीण जी निवेदन करना चाहता हूं कि मैं स्वयं एम.डी., पी.एच.डी. हूं और अंधश्रद्धा निर्मूलन के तमाम कार्यक्रमों में डेमोन्सट्रेटर रह चुका हूं अपने कालेज के दौरान और इन कार्यक्रमों में हम सबके संरक्षक जिले के कलेक्टर हुआ करते थे। हाथ की सफ़ाई या इस तरह की ट्रिक्स में तो हमारे सारे ग्रुप को महारत हासिल थी। ये बात अलग है कि अब सब अपने अपने रोजी रोजगार परिवार में उलझ गए हैं।
एक विनती और है कि यदि अनूप मंडल ने एक भी बात असत्य लिखी होती तो मैं स्वयं उसका तत्काल खंडन कर देता। मैं संभावनाओं पर नहीं ठोस परिणामों के आधार पर जीवन को देखता हूं। मेरी निजी प्रयोगशाला रही है। यदि मुझे इस पूरे प्रकरण में तनिक भी श्रद्धा रही होती तो मैं हाथ जोड़ कर पूजा में बैठा होता न कि मूवी कैमरा लेकर वीडियो बना रहा होता।
अंतिम बात कि आप स्वयं पपीते पर ऐसा प्रयोग करके देख लीजिये या आपकी नजरों में कोई illusion artist हो जो कि मेरे ग्रुप के सामने ऐसा कर सके तो मैं इस वैश्विक मंच से उसे या आपको एक लाख रुपए का नगद प्रोत्साहन पुरस्कार देने की घोषणा करता हूं बस सारी परिस्थितियां पूर्ववत रहेंगी ये बात दीगर होगी कि इस बार कोई मरेगा नहीं, है न? मेरा ये पुरस्कार साइंस की तरक्की के लिये होगा न कि अंधश्रद्धा के पोषण के लिये।
जब तक कोई रहस्य नहीं खुलता वह जादू है जब खुल गया तो तर्कबद्ध तरीके से साइंस मे दर्ज़ हो जाता है। मैं प्रयोगवादी प्रकृति का हूं और इसके लिये साइंस के मौजूदा तरीकों को आजमाता हूं आपके पास यदि कुछ अधिक उन्नत तरीका हो तो अवश्य सूचित करें।
श्मशान में कौन क्या कर रहा है ये विमर्श का विषय होगा लेकिन फिलहाल नहीं। आशा है कि आप विषय को परिहास में न उड़ाएंगे।
सादर
जय जय भड़ास

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क्या सचमुच भड़ास के संचालक भाई रजनीश झा का भड़ास से उच्चाटन हो गया है??

बुधवार, 15 दिसंबर 2010



कुछ दिन पहले मैं भाई रजनीश झा के संबंध में लिखा था कि वे भड़ास से काफ़ी समय से गायब हैं आखिर हुआ क्या जबकि उनके निजी ब्लागों अनकही और आर्यावर्त आदि पर बराबर वे लिख रहे हैं। इस पर भी उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी यानि कि शायद वे भड़ास पर विजिट भी नहीं कर रहे हैं। यदि विजिट कर रहे भी हैं तो उनका मन अब इस तरफ से हट चुका है। अनूप मंडल के अनुसार ये तंत्र-मंत्र के अनुसार उच्चाटन का प्रयोग का असर है जिसके कारण भाई रजनीश झा जैसा तेज-तर्रार भड़ासी भड़ास के मंच से हट गया हो। डा।रूपेश श्रीवास्तव जी की माता जी की रहस्यमय हत्या के बाद अनूप मंडल के लोगों ने जो लिखा और अब भाई रजनीश झा जी का भड़ास से इस तरह विमुख हो जाना घोर आश्चर्य का विषय है। ये तो एक जादू ही है कि भड़ास की बुनियाद से जुड़ा व्यक्ति ही भड़ास से विमुख हो जाए। लेकिन इस सब के लिये जो भी जिम्मेदार है वो सावधान हो जाए क्योंकि अब तो भड़ासियों का उगालदान उस पर खाली होने वाला है। ईश्वर भाई रजनीश झा जी को स्वस्थ व प्रसन्न रखे और मायाजाल से तत्काल बाहर निकाले ऐसी प्रार्थना है।
जय जय भड़ास

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आप लोगो के मानने या ना मानने से काले जादू के वजूद पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

भड़ास पर इस विषय की चर्चा करना जबकि जिसे देखिये वही मुद्दों की जुगाली में जुट कर ब्ला-ब्लाग-ब्लागिंग कर रहा है थोड़ा अजीब लगता है। लेकिन यही एक मंच है जहां हम ऐसे विषय पर विमर्श कर सकते हैं। अनूप मंडल की ओर से जो लिखा गया है वह पूरी तरह से सही है क्योंकि डा.रूपेश की माताजी के अंतिम तीन महीनों में तो मैंने काफ़ी समय बिताया है कितनी रातें मैं उनके साथ उनके ही पलंग पर साथ में लेटी, पेशाब आने या पानी पीने की अत्यंत धीमी आवाज़ में मां का वो कहना अभी भी कानों में गूंज और दिमाग में घुमड़ता है। मैं देखती थी कि तीनो भाई-बहन बारह - पंद्रह दिनों से लगातार जाग रहे हैं तो उन पर दया आती थी और साथ ही अपनी स्वर्गीय मां की याद आती थी जो कि अत्यंत अल्पायु में ही कैंसर से ईश्वर के पास चली गयी लेकिन मैं अकेली संतान थी तो मां की शायद ऐसी खिदमत और तीमारदारी कर ही न सकी ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। मैं डा.साहब की माताजी के पास रहकर अपनी मां का प्रतिबिम्ब उनमें देख पा रही थी जो कि बीच बीच में पूछ लेती थी कि अगर तुम स्कूल चली जाओगी तो मेरे पास कौन रहेगा...... मैं इन बातों पर अब भी रो लेती हूं जबकि मुझे पता है कि मां रूहानी तौर पर हम सबके साथ ही है। उन्हें कोई दवा असर ही नहीं करती थी बस बुखार बुखार और बुखार। खाना-पीना धीरे धीरे कम होता जा रहा था।
इस्लामिक किताबों में लिखा है कि पैगम्बर साहब पर भी जादू करा गया था जिससे उनकी मृत्यु हुई थी। हमारे देश ही नहीं पूरी दुनिया में काले जादू को स्वीकारा जाता है लेकिन क्या वजह है कि जैसे ही लोग खुल कर इस विषय पर चर्चा करना चाहते हैं उन्हें जाहिल और अंधविश्वासी मान लिया जाता है? यदि साहस है तो इस विषय पर चर्चा करिये मैं तो कम से कम अनूप मंडल के लोगों से इस विषय पर सहमति रखती हूं। स्वयं डा.साहब से चर्चा में हिंदी के तमाम ब्लागरों ने इन बातों को माना और स्वीकारा है लेकिन उनमें भी साहस न होगा कि वे खुल कर इस पर लिख सकें वरना उन्हें अंधविश्वासी मान लिया जाएगा। यहां तक कि मैं खुद अपने निजी उर्दू ब्लाग लंतरानी पर इस विषय पर नहीं लिख सकी।
जय जय भड़ास

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डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी

अब तक हम सभी लोगों ने ये पाया कि जब भी अनूप मंडल की तरफ से कोई बात लिखी जाती रही तो वह ये कह कर मजाक बना दी जाती कि हम सब तो व्यर्थ में ही इस आधुनिक युग में राक्षस,यंत्र-मंत्र-तंत्र और जादू-टोने आदि की बातें करके भोले-भाले जैनों को प्रताड़ित करते हैं। आज हम जो कह रहे हैं वह जैनों से सीधे संबद्ध नहीं है लेकिन जादू टोने से जुड़ी अवश्य है। इस बातचीत में आने से पहले हम कुछ मित्र आदरणीय डा.रूपेश जी के घर गए थे और सारी परिस्थितियों का जायजा लिया। अब तक हमने जितने भी स्वयंभू विद्वान बुद्धिमान देखे हैं वे भले ही समाज में खुल कर जादूटोने को बकवास कहकर नकार देते हों लेकिन अकेले में दबी जुबान में जरूर स्वीकारते हैं। हम हमेशा से ये कहते आ रहे हैं कि जिसे ब्लैक मैजिक या काला जादू कहा जाता है उसे हमारे संविधान में क्यों प्रतिबंधित करा गया है क्या संविधान बनाने वाले मूर्ख थे कि जो अस्तित्व में ही नहीं है उसे कानून बना कर प्रतिबंधित करें? हम अक्सर ही मुंबई जैसे आधुनिक शहर में चौराहों पर नींबू, अंडे,सिंदूर आदि जैसी वस्तुएं देखा करते हैं तो ये कौन लोग हैं जो इन सब को मान कर अमल में ला रहे हैं?
डा.रूपेश जी की माताजी के मामले में हमने पाया कि उनको बुखार रहता था ध्यान दीजिये कि मात्र बुखार। जब स्वयं डा.साहब जैसा आयुर्वेद का धुरंधर विद्वान इससे एक माह लगातार जूझ कर कुछ हासिल न कर पाया तो मुंबई के लगभग सभी चिकित्सक विद्वानों से सलाह ले डाली जिसने जो कहा कर लिया। यहां तक कि जिसने उपवास करने या हनुमान चालीसा पढ़ने को कहा तो वो तक करना शुरू कर दिया लेकिन इसे क्या कहेंगे कि जितना उपाय करा गया हर कदम पर माताजी के स्वास्थ्य में गिरावट आती गयी सारी रिपोर्ट्स हर बार ओ.के. आकर चिकित्सा का उपहास कर देतीं और डाक्टर नए टैस्ट्स कराते जाते। अंतिम एक माह में जब हताशा सी होने लगी तो तंत्र-मंत्र का भी सहारा लिया गया लेकिन क्या आश्चर्य कि दरवाजे पर लटकाया नींबू-मिर्ची तक गायब हो गया। डा.रूपेश, उनकी बड़ी बहन और बड़े भाई तीनो माताजी के पास सारे काम छोड़ कर चौबीस घंटे मौजूद रहते थर्मामीटर था कि यदि पंद्रह मिनट में दस बार लगाया जाता तो हर बार अलग-अलग तापमान बताया। शक होता कि शायद थर्मामीटर खराब है लेकिन कम से कम कई सौ बार बहन जी और भाई साहब ने अपने शरीर पर उसी थर्मामीटर को लगा कर उसे सही पाया। पानी की पट्टियां लगातार दो-चार-छह यहां तक कि दस-पंद्रह घंटों तक रख कर भी एक डिग्री तक तापमान कम न होता। दिमाग क्या करता है ऐसे में?तांत्रिक परिचित ने कहा कि भाई अब भी मान जाइये कि ये बीमारी नहीं है बल्कि वज्रमूठ का मारण प्रयोग है। दुनिया भर में बुखार के लिये प्रसिद्ध दवाएं देकर भी चाहे वह ऐलोपैथी की हों या आयुर्वेद की बुखार निन्यानबे डिग्री रहने पर दवा देते ही दस पंद्रह मिनट में एक सौ चार डिग्री तक चला जाता फिर पानी की पट्टियां आदि रखने का उपक्रम करने पर भी परिणाम ढाक के तीन पात रहता। चौबीस छब्बीस घंटों बाद बुखार खुद ही कम हो जाता जब ये तीनों भाई बहन हताश हो कर हनुमान चालीसा आदि पढ़ने लगते। एक बारगी लगता कि हनुमान चालीसा से बुखार उतर रहा है तो तीनो तीमारदारी में लगे माताजी का मलमूत्र साफ़ करते हुए भी जपते रहते लेकिन बुखार तो मुंह चिढ़ाता बना ही रहता। तांत्रिक ने कह दिया कि भाई ये एक निश्चित मुद्दत के हिसाब से करा मारण प्रयोग है और समय पूरा हो चुका है लेकिन फिर भी यदि आप दबाव देते हैं तो मैं उपाय करता हूं, डाक्टर साहब का कहना भी सही था कि मरना तो सबको है तो क्या इस बात से निराश होकर हम प्राण रक्षा के उपाय करना बंद कर देते हैं। आप अपना जो कुछ भी जंतर-मंतर करना चाहें करिये आपको इजाज़त है। डा.साहब स्वभाववश तांत्रिक की हर हरकत और अपने घर में होने वाली हर अजीब बात की तस्वीरें लेते चल रहे थे...................................
क्रमशः
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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मीडिया बनाम माताजी (यशवंत सिंह की बलिहारी जाऊं ऐसे होते हैं सुपुत्र....)

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

यशवंत सिंह और रणधीर सिंह सुमन मिल कर जल्द ही शायद "भड़ास" की ताकत को इस्तेमाल करने के लिए कई एक नयी वेबसाइट्स लान्च करेंगे जिनके नाम होंगे भड़ास 4 यू.पी.पुलिस, भड़ास 4 हिंदू,भड़ास4 कांग्रेस,भड़ास 4 भाजपा,भड़ास 4 पी.डब्ल्यू.डी.,भड़ास 4 आफ़िसर्स,भड़ास 4 लीडर्स,भड़ास 4 डा.रूपेश श्रीवास्तव,भड़ास 4 संजय कटारनवरे,भड़ास 4 एक्स,भड़ास 4 वाई,भड़ास 4 ज़ैड......। इस तरह ये दोनों बिना पूंछ वाले शहरों के सिंह वेब वर्ल्ड के बड़े नाम बन जाएंगे। इन वेबसाइट्स में कंटेंट क्या होगा इसका इनके नाम से कोई सरोकार नहीं रहेगा जब भी यदि किसी ने तीन-पांच करा तो उसकी पूरी तरह से पत्रकारिता/वकालत का प्रयोग करते हुए इन वेबसाइट्स पर ऐसी तैसी कर दी जाएगी। इसका लाभ ये होगा कि इनके इलाके की सड़कें,बिजली,पानी,पुलिस,अधिकारी,जनता सब इनसे भयभीत रहेंगे कि कहीं यदि कुछ गलती से ऊंचनीच हो गया तो यशवंत सिंह अपनी मीडिया वेबसाइट पर माताजी के पुत्तरजी होने का फ़र्ज निभा रहे हैं वैसा ही कुछ न कर डालें।
ताज़ा अफ़वाह है कि कुछ और वेबसाइट लान्च करी जा रही हैं भड़ास 4 माताजी,भड़ास 4 चाचाजी,भड़ास 4 चचेरा भाई,भड़ास 4 चाचीजी,भड़ास 4 पत्नी,भड़ास 4 बच्चे।
देख लीजिये भड़ास की ताकत को अगर आप भी अपने इलाके में हो रहे अन्याय, अत्याचार,कुत्ताचार आदि के खिलाफ़ कुछ साइबर करना चाहें तो इनसे मिलिये ये लोग आपके लिये एक वेबसाइट बना कर संबंधित मामले को हल कर देंगे।
जय जय भड़ास

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बीमारी तिवारी की कहानी देखिए

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

आदरणीय रजनीश सर एवं डॉ.रूपेश जी,अपनी पहचान छिपाकर रखने के लिये क्षमा चाहता हूँ के आम आदमी हूँ सच में तो डॉ.साहब के शब्दों में "चूतिया"। दर असल ये आदमी प्रदीप तिवारी है लेकिन मैं इसे ललित तिवारी


Tuesday, August 3, 2010

मुखौटाधारियों की सूची लंबी होती जा रही है रणधीर सिंह सुमन,गुफ़रान सिद्दकी,सलीम खान,प्रदीप तिवारी........

लिख रहा हूँ क्योंकि ये मुझे प्रदीप की जगह ललित ज्यादा जान पड़ा कारण है कि ये बड़े रंग लिये हुए है गिरगिट की तरह। इन लोगों के अंदाज में बड़ा लालित्य है जिससे ये लोगों को अपनी बातों से लुभाकर चूसते रहते हैं। मैं इसका नाम बदल रहा हूँ ये मैं हक से कर रहा हूँ ये जब मुझे जानवर,पेड़-पौधा,कीड़ा मकोड़ा कह सकता है तो मैं भी इसका नाम बदल सकता हूँ। इसकी करी गयी टिप्पणी का चित्र प्रेषित कर रहा हूँ देखिये ये क्या है किसकदर बौखलाया है एक आम चूतिया आदमी द्वारा पहचान लिये जाने पर।
मुझे आप लोगों ने जो मंच प्रदान करा है उसके लिये हृदय से आभार व्यक्त करना चाहता हूँ पर शब्दों में नहीं लिख सकता। ठीक मेरे जैसे ही लोग हैं अनूप मंडल के जिन्हें आपने मंच दिया है। आपने जो कार्य करा है वह साधुवाद के योग्य है। ई-मेल के जरिये हम अपनी बात जब सामने रखते हैं तो आपको भी नहीं पता रहता कि ये मत और विचार किसके हैं, मैने अब तक ऐसा अंदाज़ कहीं नहीं देखा इसलिये कह सकता हूँ कि मैं संजय कटारनवरे नाम का एक आम भारतीय कोई और नहीं डॉ.रूपेश श्रीवास्तव हूँ। मुझे याद है कि कुछ समय पहले कई लोगों ने इसी भड़ास के मंच पर स्वीकारोक्ति लिखी थी कि वे हैं डा.रूपेश श्रीवास्तव, सच है कि डा.रूपेश श्रीवास्तव व्यक्ति नहीं विचार हैं और आज मैं भी साहस कर के इस विचार का नाम ले रहा हूँ और सबके सामने कह रहा हूँ कि मैं हूं डा.रूपेश श्रीवास्तव जो कि इन धूर्तों को बेनकाब कर रहा है लेकिन खुद एक बहुत बड़े विचार के अंदर दुबक रहा है इसका कारण है कि मैं एक आम चूतिया भारतीय हूँ।

धूर्तों की जमात के खिलाफ़ जो विचार लिखा था उसके साथ में इसने जो कमेंट करा था उसे चित्र रूप में भेज रहा हूं। यदि आप चाहें तो इस लेख को भी देखें कि क्या गलत है जो मैंने लिखा था।
जय भड़ास
संजय कटारनवरे
मुंबई

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तारकेश्वर गिरि जी सलीम खान,रणधीर सिंह सुमन या गुफ़रान सिद्दकी से भड़ास का निजी विवाद नहीं है

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

भड़ास की हालिया पोस्ट जो हमारे डा.रूपेश श्रीवास्तव जी ने लिखी है उस पर तारकेश्वर गिरि जो कि ब्लाग संसद नाम का एक सामुदायिक ब्लाग से जुड़े हैं टिप्पणी करते हैं कि "आपस का मसला है" तो उन्हें बस इतना बताना है कि ये मसला आपस का ही है हम सब भारतीयों का आपसी मसला। आप इससे अलग नहीं है। छद्मनेतृत्व की समस्या को लेकर भड़ास में जनाब वकील साहिब रणधीर सिंह सुमन जी के ’लोकसंघर्ष’ हो या फिर भाई गुफ़रान सिद्दकी के ’अवध पीपुल फ़ोरम’ की बात हो या उनके मजहबी कट्टरपन के बयान की या इसी संदर्भ में रणधीर सिंह जी के कम्युनिस्ट होने की बात.......। कुल मिला कर इस विमर्श में ये निचोड़ने की कोशिश करी जा रही है कि जो लोग अगुआकार बने हैं वे दर असल क्या सोच रखते हैं।
यदि आप सचमुच मिथ्या लोकनिंदा से नहीं भयभीत होते जैसे कि भड़ासी हैं तो आप भी अपनी ब्लाग संसद में इन सवालों को उठा कर देख लीजिये कि कितने लोग वैचारिक पारदर्शिता रखते हैं। लोगों को हमेशा राजनैतिक तौर पर सही बने रहने की बीमारी होती है इसलिये कड़े मुद्दे न उठा कर गुलगुली बातें करके कभी रामप्यारी कभी रामकटोरी छाप लेखन करते हैं और चटुए टिप्पणी करने वालों के दल के दल पहुंच जाते हैं लेकिन सही मुद्दे उठाने पर आप भी आपस का मसला कह कर निकल लेना चाहते हैं।
हमारी बात को साहस करके अपनी ब्लाग संसद में उठाइये यदि हो सके तो हमें भी उस संसद में आवाज उठाने का मौका दीजिये क्योंकि जो शराफ़त का मुखौटा लगाए सफ़ेद कालर लोग जुटे हैं वो चार दिन में ही संसद भंग करके भाग जाएंगे।
जय जय भड़ास

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राह का रोड़ा,अक़्ल पर पत्थर और किडनी में पथरी..... हाय दइया

गुरुवार, 24 जून 2010

हमारे एक परिचित हैं दुबई में रहते हैं जाहिर है कि खूब कमाए पड़े हैं लेकिन पता नहीं क्या हुआ है कि उनकी अक़्ल पर पत्थर पड़ते दिख रहे हैं। इनकी किडनी में स्टोन हो गया है तो फिर क्या बात है पूरा दुबई छोड़ कर इंडिया की ओर भागने को तैयार हो गये लेकिन राह में रोड़े हैं जो इंडिया आने से रोक देते हैं। इन्हें इतना बताना है कि राह के रोड़े किडनी स्टोन से ज्यादा बड़े तो नहीं है लेकिन क्या पूरे दुबई में किडनी स्टोन का इलाज नहीं है। भाई, अक़्ल पर पड़े पत्थर हटाइये और राह के रोड़े हटा लीजिये ताकि किडनियां सही काम कर सकें और आपको पेशाब करने में दिक्कत न हो। पच्चीसों हजार रुपये खर्च करके इलाज कराने इंडिया आने से अच्छा है कि उस पैसे को बच्चों के लिये रखो और जब स्वस्थ हो जाओ तो उनके लिये कुछ सामान वगैरह लेकर आओ।
किडनी स्टोन के लिये आपको इलाज आपको मेरे दूसरे पत्रा "आयुषवेद" पर इस जगह मिल जाएगा बाकी आपकी मरज़ी है वैसे अगर आप चाहे तो आयुषवेद पर जाकर उसके सर्च में यदि पथरी टाइप करके तलाशें तो आपको बेहतरीन इलाज मिल जाएगा। हिन्दी में टाइप न कर सकें तो इन कड़ियों को चूहे से कटवाइये यानि माउस क्लिक करिये और पहुंच जाइये
पहली कड़ी
दूसरी कड़ी
तीसरी कड़ी
चौथी कड़ी
जय जय भड़ास

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पत्रकारिता बनाम पत्राकारिता

बुधवार, 20 जनवरी 2010

ब्लागिंग के लिये हिंदी में क्या शब्द स्वीकार्य हो जो कि पूर्णरूपेण इसकी चारित्रिक विशेषताओं और क्षमताओं को बता सके ये आपस में भाषा के स्वयंभू कई विद्वानों ने सिरफोड़ी करने के बाद भी स्पष्ट नहीं हो सका है। फिलहाल काम चलाने और हिंदी की नाक बचाए रखने के लिये लोगों ने "चिट्ठाकारी" शब्द अपना रखा है। मैं चूंकि भड़ास पर हिन्दी में लिखने के साथ ही लंतरानी नाम के उर्दू ब्लाग पर भी लिखती हूं जिसके कारण मुझे विश्व की पहली महिला उर्दू(नस्तालिक) ब्लागर होने का मान प्राप्त है। एक कड़वा सच ये है कि उर्दू और कम्प्यूटर का रिश्ता अभी भी कुछ खास अच्छा नहीं है। उर्दू के क्षेत्र के बड़े-बड़े विद्वान कम्प्यूटर के बारे में चर्चा करने में भी सकपकाए रहते हैं। उन्हें एक भ्रम निरन्तर है कि कम्प्यूटर सिर्फ़ अंग्रेजी जानने वाले ही प्रयोग कर सकते हैं लेकिन लंतरानी के मंच पर ये भ्रम तोड़ने का प्रयत्न जारी है।
उर्दू महफ़िल में एक सज्जन ने कहा कि ब्लागिंग के लिए हिंदी में क्या शब्द है क्योंकि चिट्ठाकारी तो हिंदी का शब्द नहीं है। इसपर हमारे आदरणीय गुरुवर्य भड़ास के संचालक द्वय में से एक डा.रूपेश श्रीवास्तव जी ने तत्काल उनका मुंह एक नया(मेरे लिये तो एकदम नया है) शब्द देकर बंद कर दिया कि महाशय ! ब्लागिंग के लिये उर्दू में चिट्ठाकारी और हिंदी में पत्राकारिता शब्द सही है। डा.रूपेश जी के अनुसार पत्राकारिता परंपरागत पत्रकारिता की आगे की पीढ़ी है और तकनीकी तौर पर विकसित रूप है। तब से अभी तक मैं इस बात पर विचार कर रही हूं। शब्दकोश में "पत्रा" शब्द को भी देखा, अब तक ये शब्द परंपरा से मात्र ज्योतिष के संदर्भ में प्रयुक्त संचायी-पोथी(ARCHIEVE) के लिये ही प्रयुक्त होता रहा है किन्तु अत्यंत सूक्ष्मता से मनन करने पर ये शब्द सटीक व उचित प्रतीत हुआ। आपको याद होगा कि हमारे डा.रूपेश जी ने अपनी इसी विशिष्ट प्रज्ञा के चलते मनीषा(नारायण) दीदी जैसे लोगों के लिए एक शब्द प्रस्तुत करा था जिन्हें कि सामान्य भाषा में लोग कठोरता पूर्वक हिजड़ा कहते हैं और न जाने किसकी विद्वता के परिणाम स्वरूप "किन्नर" कहने लगे, वह नया शब्द रहा "लैंगिक विकलांग" जोकि अब धीरे से भाषा में स्वीकार लिया गया है और लेखन में प्रयोग होने लगा है। ठीक वैसा ही एक नया शब्द इन्होंने प्रस्तुत करा है "पत्राकारिता", इससे पत्रकारिता यानि जर्नलिज़्म का विकास ही होगा और भाषा का शब्दकोष भी सम्पन्न होगा। पत्रकार के ही समानान्तर नया शब्द उभरेगा "पत्राकार" और कदाचित इसी तरह के अनेक शब्द विकसित होंगे जो कि सटीक व क्षमतावान होंगे कि पद की व्याख्या कर सकें।
जय जय भड़ास

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मेरी नातिन का नाम "दुर्गा" रखे जाने पर कुछ लोगों को एतराज़ है

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

नानाजी की दुर्गा भड़ासियों की परंपरा में शामिल होने की बात करते हुए
मेरी बेटी हुमा को उसके क्रूर और अत्याचारी पति ने पांच माह के गर्भ की स्थिति में यह कह कर घर से आधी रात को निकाल दिया कि तुमने मेरे माता-पिता की मर्ज़ी के खिलाफ़ गर्भ धारण क्यों करा। पांच माह का गर्भ हो जाने पर गर्भपात कराने का प्रयास करना भयंकर मूर्खता है जो कि जानलेवा हो सकती है। हुमा सुबह होने तक दरवाजे पर पड़ी गिड़गिड़ाती रही कि रात को कहां जाएगी लेकिन उन राक्षसों को बच्ची पर रहम नहीं आया फिर सुबह होने पर भी जब बात न बनी तो पड़ोसियों के सामने अधिक तमाशा न हो इस लोकलाज के भय से बेचारी बच्ची अपनी माताजी यानि हमारी बहन आयशा आपा के पास आ गयी। तब से अब तक इस मामले को सुलझाने के सैकड़ों प्रयास करे गये लेकिन कुछ कारगर नहीं रहा क्योंकि वो सारे प्रयास बातचीत के द्वारा करे गये थे। यही प्रयास अगर जूते से कर दिये जाते तो शायद कुछ परिणाम निकलता। शादी हुए तीन साल होने को आए लेकिन ससुराल पक्ष का व्यवहार जस का तस है। मेरी बेटी मायके में हम लोगों के साथ रही और गर्भकाल पूरा होने पर ईश्वर की दया से हुमा ने एक सुंदर स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। आजकल के दुष्ट व्यवसायी किस्म के डाक्टरों के लालच के चलते उन्होनें हुमा का प्रसव सिजेरियन आपरेशन से कराया जिसमें कि करीब चालीस हजार रुपये का खर्च आया। खैर पैसा बच्चों से अधिक मूल्य नहीं रखता। बच्ची के होने की सूचना भी ससुराल पक्ष को दी लेकिन कोई प्रतिक्रिया न आयी न ही कोई मिलने देखने आया। बच्ची का नाम रखने की बारी आयी तो हुमा ने मुझसे कहा कि आप ही नाम रखें अपनी नातिन का। सामने एक उत्सव चल रहा था और हिंदुओं की शक्तिरूपा देवी दुर्गा का बहुत बड़ा सा पोस्टर देख कर उस अष्टभुजी शक्तिरूपिणी नारी के ध्यान में मेरे मुंह से निकला.... "दुर्गा" । बच्ची का नाम सभी लोगों ने प्रसन्न मन से आह्लादित होकर जोर से पुकारा , "दुर्गा"......। कोई शंका न करे कि उस चार घंटे की बच्ची के चेहरे पर एक मुस्कान थी उस समय जिसे कि मैं कैमरा लिये होने के कारण सौभाग्यवश कैद कर पाया।
आज चार दाढ़ी वाले मौलाना टाइप लोग मुझसे आकर कहते हैं कि मैं परेशानी में फंसे मुस्लिमों की सहायता का ढोंग करके उनका धर्म परिवर्तन करने का कुत्सित प्रयास कर हुमा को उमा और नवजात बच्ची को दुर्गा बना रहा हूं। मैं किसी प्रचलित धर्म की मान्यताओं पर विश्वास नहीं करता हूं, मैं तो टार्ज़न की तरह हूं। आप लोग सोचिये कि मुझे उन उल्लू के पट्ठों को क्या उत्तर देना चाहिए था। मैंने वही करा जो आप सोच रहे हैं उन सालों को गरियाते हुए लट्ठ उठा कर बाहर का रास्ता ये कह कर दिखा दिया कि अगर दोबारा बकवास करने आए और मेरे बच्चों को सताया तो एक पिता क्या कर सकता है तुरंत दिखा दूंगा, सारा धर्म और मज़हब पिछवाड़े घुसा दूंगा; तब कहां थे ये लोग जब मेरी बच्ची आधी रात को घर से निकाल दी गयी, रात भर दरवाजे पर पड़ी मासूम गर्भवती गिड़गिड़ाती रही, चार माह मेरे साथ रही, बच्ची होने पर हजारों रुपए खर्च हुए??????? और अब नाम को लेकर नौटंकी कर रहे हैं। मेरी नातिन है, हमारे घर के बच्चों के नाम भी अब क्या इन चिरकुटों से पूछ कर रखने पड़ेंगे?
जय जय भड़ास

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कितनी स्त्रियां स्वेच्छा से पति को दूसरी शादी की अनुमति देती हैं?

मेरी बिटिया हुमा नाज़ मेरी नातिन दुर्गा के साथ बतियाते हुए
आज मेरी बिटिया हुमा नाज़ ने मुझसे ये सवाल खाने की टेबल पर एक सहज बातचीत में करा। मैं उस समय से लेकर अब तक यही सोच रहा हूं कि बच्ची ने जो प्रश्न करा है उसका उत्तर कम से कम मैं तो शायद न दे सकूं पर किसी अन्य के पास हो इसलिये पिता-पुत्री की आपस की बात को आप सब के साथ बांट रहा हूं। क्या परिस्थितियां होती होंगी जब किसी पुरुष को दूसरी शादी की जरूरत पड़ती होगी, इस सामाजिक प्रश्न का एक उत्तर यही है कि जब पत्नी संतान उत्पंन करने में अक्षम हो तो शायद अपनी कमी को महसूस करके मन न होते हुए भी सामाजिक परंपराओं के दबाव में वंश चलाने आदि जैसे बातों से सहमति रख कर ऐसा कह सकती है। किन्तु पत्नी पूर्णतया शारीरिक मानसिक तौर पर स्वस्थ है और आचरण में भी कोई विकार नहीं है तो फिर क्या कारण हो सकता है कि कोई पत्नी अपने पति को दूसरी शादी के लिये सहमति दे? यदि पत्नी को ऐसा लगता है कि उसका पति बहुत धनवान है और वह कई स्त्रियों का भरण-पोषण कर सकता है तब भी क्या एक पत्नी इस विवाह के लिए स्वेच्छा से अनुमति देगी यह प्रश्न मेरी बेटी का है क्योंकि उसका कहना है कि वह आज के हिंदुस्तान में रह रही है और खुद इतनी पढ़ी-लिखी है कि परिवार के अलावा भी कई लोगों का भरण-पोषण बड़ी आसानी से कर सकती है यदि पति न भी कमाए तो फिर क्या कोई पति ऐसी स्त्री को एक पति के रहते स्वेच्छा से दूसरा विवाह कर लेने की अनुमति दे पाएगा? यदि नहीं दे सकता है तो वो कौन से सामाजिक और नैतिक घटक हैं जो कि सिर्फ़ स्त्री पर ही बाध्यकारी हैं। जिस विद्वान के पास उत्तर हो अवश्य दे। लेकिन मुझे एक बात की आशंका है कि इस विवादास्पद विषय पर लोग मानव समाज के धार्मिक पहलुओं के चलते बचना ही चाहेंगे।
जय जय भड़ास

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हरकीरत "हक़ीर" कब से "हीर" बन गयी हैं हमें पता ही न चला

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

आजकल हरकीरत जी "हीर" बन गयी हैं

देखिये मात्र कुछ महीनों पहले ये "हक़ीर" हुआ करती थीं

चमत्कार हो गया हरकीरत "हक़ीर" कब से "हीर" बन गयी हैं हमें पता ही न चला कि कल तक जो हक़ीर हुआ करती थीं आज वे किसी रांझे की हीर बन चुकी हैं। ये ब्लागिंग भी कमाल की चीज है मुझ ज़ैनब को लैला बना दे क्या भरोसा या बड़े भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव को रोमियो बना दे क्या ऐसी भी तासीर है इसमें?? इतने दिनों से कुछ लिख न पायी थी आज मन करा कि पुराना कबाड़ टटोलूं क्योंकि मुंबई की हालिया ब्लागर मीट में मैं भी न जा सकी थी, शहर से बाहर थी। हरकीरत जी को मुबारक हो ये रूमानी बदलाव लेकिन पता नहीं क्यों बड़े भाई डा.साहब पर दया आ रही है कि जब इन जैसी दर्द दर्द चिल्लाने वाली किसी की हीर बन सकती है तो आप इतने समय से लोगों के दुःख दर्द बांट रहे हो, इसी रास्ते चुपके से मजनूं, रोमियो जैसे कुछ क्यों न बन पाए?
जय जय भड़ास

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राक्षसों ने ब्लागरों को लपेटा अपने मायाजाल में, मुंबई ब्लागर मीट

अनेक लोग सहमत रहे हमारी बातों से और अनेक बार हमने इस बात के सबूत भी दिये कि जैन राक्षस किस तरह से लोगों को मीठा बोल कर और घुलमिल कर अपने जाल में फंसाए रहते हैं ताकि कोई इनकी हकीकत न जान पाए। इसका ताजा उदाहरण रहा मुंबई में हाल ही में हुई ब्लागर मीट जिसे कि सारी मुंबई छोड़ कर एक जैन मंदिर में करा लिया गया। ये है महावीर सेमलानी के भोलेपन का जादू। अब भला कोई हमारी बात पर क्यों यकीन करेगा आसानी से कि ये शख्स कितना कुटिल है।
एक बात ये राक्षस भी समझ गये होंगे कि हमारे अवतार स्वरूप डा.रूपेश श्रीवास्तव पर कोई जादू नहीं चलता है । ये बात तुम लोगों के लिये एक चेतावनी भी है कि अब तुम डा.रूपेश श्रीवास्तव जी के तेज से स्वयं ही नष्ट हो जाओगे।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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सचमुच डा.रूपेश श्रीवास्तव आतंकवादी ही तो हैं

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

अभी दो दिन पहले की बात है कि भाई राममिलन जी का फोन आता है ये बताने के लिये कि उनके कार्यालय में संपादक जी को किसी ने मुंबई से फोन करा था कि डा.रूपेश श्रीवास्तव और मुनव्वर सुल्ताना के संबंध आतंकवादियों से हैं। भाई राममिलन ने ये सब बताया और कहा कि वो शख्स बता रहा था कि जनवरी में आप लोगों पर मुकदमा चलने वाला है। राममिलन और संपादक अग्रवाल जी शुभचिंतक होने के नाते परेशान होना सहज स्वाभाविक है। अग्रवाल जी तो डा.रूपेश श्रीवास्तव को निजी तौर पर जानते नहीं है तो मैं अपने कोश से इनके कुछ फोटोग्राफ़्स आप लोगों के सामने ला रही हूं जिनसे सिद्ध हो जाएगा कि ये इंसान आज के दौर का कितना बड़ा आतंकवादी है
भाई हरभूषण सिंह अंधेरी(मुंबई का एक उपनगर) में अपने घर में अकेले बुखार से तप रहे थे तो ये हज़रत जाकर उन्हें अपने घर उठा लाते हैं और एक सप्ताह उनकी सेवा करते हैं, ये आतंकवाद नहीं तो क्या है?
पूर्व जीवन में अपराधी रहे "एक्स मैन" के नाम से जाने वाले सज्जन जब गम्भीर जख्मी हुए तो जनाब जुट गये खिदमत में और टूटी पसलियों से लेकर घुटने तक को मात्र ढाई माह में सही कर दिया। ये है आतंकवाद।
घुटनों से लेकर पैर के पंजे तक का परीक्षण करते हुए डा.रूपेश श्रीवास्तव
पसलियों के दर्द और कंधे के डिसलोकेशन को समझते एहसास करते हुए डा.रूपेश श्रीवास्तव
दूसरे के दर्द को अपना मान लेना तो बस ये ही कर सकते हैं आतंकवादी डा.रूपेश श्रीवास्तव
जल्द ही पट्टी और प्लास्टर हटा दूंगा ये आश्वासन देते हमारे आतंकवादी गुरू डा.रूपेश श्रीवास्तव
ये रही इंसान की बात..... अब देखिये इस आतंकवादी का पशु-पक्षियो के प्रति प्रेम का नमूना। चित्र में डा.रूपेश श्रीवास्तव एक जख्मी उल्लू के बच्चे को ड्रापर से लिक्विड फूड दे रहे हैं
बासित मेरा छोटा भाई और मेरी माताजी मुनव्वर आपा के नाम से प्रसिद्ध इस चित्र में आपको दिख रहे हैं। बादशाह बासित डर रहे थे उस पक्षी को छूने में तो डा.रूपेश श्रीवास्तव ने उस डर को दूर कराअब हमारा "व्हिसिल" नाम का प्यारा उल्लू का बच्चा बादशाह बासित के हाथ में है जो कि उसके उपचार में डा.रूपेश श्रीवास्तव की सहायता कर रहे हैं।
डा.रूपेश श्रीवास्तव के प्रेम और बादशाह बासित के मदद करने के जज़्बे को आप सब इस चित्र में देख सकते हैं
इस पूरे काम में पूर्ण मनोयोग से जुटे डा.रूपेश श्रीवास्तव और बादशाह बासित के साथ में हैं मुनव्वर आपा (मेरी माताजी)जो कि इस आतंकवादी की अजीब शख्सियत को प्रशंसा भरी निगाहों से निहार रही हैं।
लीजिये टूटे हुए डैने और पैर पर पट्टी-प्लास्टर हो गया।
आप देख रहे हैं चित्रों की जुबानी मैंने इस व्यक्ति के बारे में आपको जो बताना चाहा। बारिश में नाले में गिरे कुत्ते के बच्चे से लेकर कौव्वे द्वारा जख्मी करे कछुए के बच्चे को जो आदमी घर ले आता है उसके बारे में शब्दों में कैसे लिखा जाए।
ये शख्स आतंकवादी है और इसका आतंक है उन लोगों में जो मजलूमों को सताते हैं, जो गलत धंधे करते हैं उनके लिये ये शख्स आतंक है। इसकी सच्चाई और ईमानदारी का आतंक है आसपास के बुरे लोगों में। कई बार मैंने खुद देखा है कि किसी बेगाने के हक़ की लड़ाई में जिस कदर ये इन्वाल्व हो जाते हैं वह तो एक "आतंकवादी" और एक्स्ट्रीमिस्ट ही कर सकता है। हिंदी ब्लाग जगत के लोग भी अब कुछ कुछ इनके स्वभाव से परिचित हो चले हैं।
सचमुच आज की दुनिया में ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है। इन पर बिना कोई मुकदमा चलाए सरेआम फांसी दे देनी चाहिये क्योंकि ये तो अजमल कसाब से भी ज्यादा खतरनाक हैं।
जय जय भड़ास

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भड़ास बनाम भड़ास blog -तीसरा भाग

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

यशवंत सिंह शराब के शौकीन, चरित्र के लिबलिबे, मुखौटे के मजबूत और दूसरी तरफ उन्हें उनकी सारी खा़मियों के साथ स्वीकार कर चुके डा.रूपेश श्रीवास्तव; अब तक यशवंत सिंह ने अपने अनुभवों से जो सीखा था वो ये था कि जो मिले उसे इस्तेमाल कर लो उससे जितना फायदा हो सके उठा लो क्योंकि पता नहीं कब साथ छूट जाए। डा.रूपेश श्रीवास्तव और यशवंत सिंह के व्यक्तित्त्व आपस में घर्षण कर रहे थे एक दूसरे को खुद जैसा बना पाने के लिये। इसी बीच भड़ास पर गूगल की तरफ से एडसेंस लगाया गया यानि कि आय का एक बहुत छोटा सा स्रोत भड़ास पर जोड़ा गया। डा.रूपेश श्रीवास्तव व सभी भड़ासियों ने सहर्ष इस बात का स्वागत करा। डा.रूपेश श्रीवास्तव जो कि यशवंत सिंह की तरफ से अब तक दुनिया को भड़ास के दूसरे माडरेटर बताए जा रहे थे, उन्होंने अपने स्वाभाव के अनुसार एक सुझाव दिया कि भड़ास से जुड़े भड़ासी हिंदी की गांव-देहात की पट्टी पर रहने वाले लोग हैं जो कि पचास-साठ रुपए प्रति घंटे खर्च करके भड़ास पर पोस्ट लिखा करते हैं इसलिये भड़ास पर होने वाली आय को इन भड़ासियों में उनकी सक्रियता के आधार पर वितरित कर दिया जाए; भड़ास किसी एक का न रह कर इन सभी का समेकित प्रयास है। बस यहां से यशवंत सिंह के कान खड़े हो गये कि ये आदमी पैसे का लोभी नहीं है इसके रहते वो अपने बाजारी सपने पूरे नहीं कर सकते। आप सबको बताती चलूं कि यशवंत सिंह ने डा.रूपेश श्रीवास्तव को कभी भड़ास का माडरेटर बनाया ही नहीं था वो बस उनका नाम इस्तेमाल कर रहे थे।
इसी कशमकश के बीच यशवंत सिंह ने अपने बाजारू लालागिरी के स्वभाव के चलते भड़ास की दिन दूनी रात चौगुनी होती प्रसिद्धि के टके कराने के लिए "भड़ास4मीडिया" नाम का एक पोर्टल शुरू करा।
आगे जारी........
इस भड़ास का प्रथम भाग पढ़िये
दूसरा भाग पढ़िये
जय जय भड़ास

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