स्विस बैंक बोलते नेता, सिसियती जनता !

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

सच मानिये चुनावी पारे ने प्राकृतिक पारे की गर्मी को मत दे दी है। पता नही क्यूँ भारतीय राजनीती की गर्माहट को गर्मियों में ही गर्म हंडी पर रखा जाता है। यानि चुनाव की तारीखें तपती दुपहरिया में क्यों पड़ती हैं। खैर ये कोई राष्ट्रीय मुद्दे जैसा प्रश्न नही है, इसलिए इसे यही छोड़ता हूँ। लेकिन इधर गर्मी कुछ ज्यादा ही सताने लगी है। एक तो वोट की गर्मी और दूजे नोट की गर्मी! हालाँकि वोट की गर्मी तो छनिक है छन्भन्गुर है, जो कुछ ही समय के बाद अपने-आप उतर जायेगी और फिर सब कुछ पहले जैसा ठंडा-ठंडा कूल कूल ......लेकिन गुरु नोट की गर्मी बड़ी भयानक! इस गर्मी को कोई पंखा, कूलर और ऐरकोन्दिशन नही शांत कर पाता है। तो भला इसका क्या उपाय? उपाय है बरखुरदार! और उपाय भी इतना कारगर व् सटीक है की आपके दुश्मन भी ठंडे पड़ जायेंगे। नोट की गर्मी उतारनी हो तो नोट को को देश से बाहर स्विस बैंक ले जाओ और हमेशा-हमेशा के लिए अपनी गर्मी से निजात पाओ। न जाने कितने नेता, मंत्री, संतरी, नौकरशाह और व्यापारी महोदय ने इस सुविधा का लाभ उठाया और गर्मी को ठंडे देश के बैंक में भिजवाया। लगे हाथ जनता की गाढी खून-पसीने की कमाई चुना लगाया सो अलग बेनिफिट। उस्ताद अबकी तो गजब हो गया वोट की गर्मी में नोट की नरमी का मुद्दा भी गर्म हो गया। अब भैय्या ये तो हो गई मधुमक्खी के छत्ते पर धेला फेकने जैसी बात! लेकिन ये क्या हुआ? मधुमक्खियाँ कटाने की बजाय गुडुप-चुप! अरे यहाँ तक की भिनभिनाना भी छोड़ दिया । ऐसा ह्रदय परिवर्तन! हे भगवान, इस देश का भला अब भी तुम्हारे ही हाथ में है। किसी ने सच ही कहा है की उपरवाले के घर में देर है , लेकिन अंधेर बिल्कुल नही। अब खुदा न खास्ते छत्ते पर धेला पड़ ही गया है तो इसका अंजाम भी जरुर ही आएगा ऐसा विश्वास सबको होना चाहिए। स्विस बैंक वालों को भी भारतीय नोटों की गर्मी बर्दाश्त नही हुई। तभी तो दुनिया के ठंडे देशों में शुमार यह देश भी भारतीय गर्मी से हलकान हो गया। आनन-फानन में उसने चार साल पहले ही दुनिया भर से गुहार लगा डाली की भैय्या अपनी-अपनी गर्मी वापस ले जाओ। हालाँकि कुछ ठंडे हो चुके देशों ने इस मौके को हाथ से नही जाने दिया और अपनी गर्मी वापस ले ली। पाता नही क्यो भारत ऐसा करने में हिचक रहा है! शायद भारत के लोग ज्यादा गरम हैं इसलिए और गर्मी नही लेना चाहते..अब यहाँ दाल में कुछ काला है या पुरी दाल ही काली है ये भी जल्द ही पता लग जाएगा। लेकिन आप तो जनाब बिल्कुल भी गरम मत होइए । आप तो जनता जनार्दन हैं आप बस ठंडी से सीसियते रहिये और चुनावी गर्मी में गोते लगाते रहिये और हा समय- समय पर अपनी बत्तीसी जरुर दिखाते रहिये। ये गर्मी- वर्मी आपको थोड़े ही पिघला सकती है....लेकिन मैं क्यूँ पिघलता जा रहा हूँ, माफ़ कीजियेगा शायद गर्मी ज्यादा होने लगी है....अरे कौनो बेनवा तो डोलाव रे..... । इस मौके पर धूमिल साहब की एक कविता जरुर याद आ रही है।
एक आदमी जो रोटी बेलता है,
दूसरा आदमी जो रोटी पकाता है,
तीसरा भी है, जो न तो रोटी
बेलता है और न ही पकाता है
बस खाता है !
ये तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है!

4 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

ये तीसरा आदमी कौन है?
मुझे भी उसके बारे में जानने की हमेशा चाह रही है संसद का मौन तो तब भी भंग न होगा जब कोई पिछवाड़े डंडा डाल कर हलकोर दे,खनखनाती हुई पोस्ट है भाई...
जय जय भड़ास

milanmedia ने कहा…

manoj ki yahi hamare desh ki loktamtrik byawashtah hai..
aap likhte raho...
kaam aayega.. yani aap ki kalam aur vichar paini hoti jayegi!!!

mark rai ने कहा…

एक आदमी जो रोटी बेलता है,
दूसरा आदमी जो रोटी पकाता है,
तीसरा भी है, जो न तो रोटी
बेलता है और न ही पकाता है
बस खाता है !
ये तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है!.....
ye lines hi sabkuchh kah deti hai..mai kya kahu bas itna hi kah sakata hoon ki kaas wah paisa garib logo me distribute ho jaata to ....

गुफरान सिद्दीकी ने कहा…

मनोज भाई स्विस बैंक तो बहाना है असल में अपने खानदान में फैले घोटालेबाजों से धयान हटाना है,एक सड़क छाप नेता बनने के बाद नोट छाप हो जाता है कैसे आडवानी खुद बताएं.
आपके प्रयास की सराहना करता हूँ अच्छा लिखते हैं .

आपका हमवतन भाई..गुफरान....अवध पीपुल्स फोरम..फैजाबाद.

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