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बुधवार, 3 जून 2009

यह शोर है जीवन का , यह मातम है मौत का
यह नफरत हे इंसानों की , यह दौर है गोलियों का
यह सिसकियाँ हे इंसानियत की , जिस पर बरस रही तांडव की गूंज हे
जहाँ देखो फैली हे दहशत , ना जाने किस युग का यह रूप हे !!

यह ज़ंग हे मज्हबो की , ना जाने क्या इनकी भूख है
दोलत के नशें मैं इनकी इंसानियत चकनाचूर हे
हर कोई अपने स्वार्थ मैं , हर कोई अपने आप में
बदलें हे हालात , बदला हुआ हर किसी का नया रूप है !!

कोन पुकारे किसको यहाँ , यकीं अब किस पर कोई करें
बिछी हुई लाशो की चोरो , जीती लाशो को कैसे जीए
बदहवासी का आलम , उस पर जनम लेता यह इव ऐडम
सोच रहा हु , कैसे पुकारू , कैसे कहू – शुभ सवागतम !!

1 टिप्पणियाँ:

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

जोक्पीडिया का ये संजीदगी भरा लेखनी दिल को छू गया,
अमित भाई बधाई

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