"पा" फिल्म में बतायी गयी बीमारी लाइलाज नहीं है

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

हिन्दी फिल्में जिंदगी के सच को अपने चश्मे से दिखाती हैं। स्पष्ट सी बात है कि वो चश्मा दर्शकों की आंखों पर जबरन लगाया जाता है। यदि मैं कहूं कि पश्चिम के सामाजिक प्रभाव और एलोपैथी से प्रेरित इस फिल्म के लेखक ने बड़ी ही भावुक विषय पर फिल्म लिखी है जैसा कि इससे पहले आमिर खान भी "तारे जमीन पर" में एक बच्चों की बीमारी पर सफल फिल्म बना चुके हैं। अब जब इस तरह की लाइलाज सी प्रतीत होने वाली बीमारियां दर्शकों की भावनाओं को उलझा कर मजबूर कर देती हैं कि वे फिल्म देख लें। कुछ हो न हो लेकिन निर्माता की जेबें भर जाती हैं। फिल्म "पा" में बतायी गयी बीमारी "प्रोगेरिया" को कैश करने का यत्न करा गया है। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को बीमार बच्चे के रोल में देखना एक अच्छा अनुभव होगा। मेरे नज़रिये से फिल्म देखेंगे तो आयुर्वेद का ही चश्मा होगा आंखों पर जिस कारण मुझे न तो अमिताभ दिखेंगे, न अभिषेक और न ही विद्या बालन; मुझे दिखेगा बस एक बीमार बच्चा जिसे लाइलाज बीमारी से ग्रस्त बता कर दर्शकों की भावनाओं से खेला जा रहा है।
आयुर्वेद में देह के धारक दोषों में कफ-पित्त-वात बताए गये हैं। वात के विकार के कारण अस्सी रोग बताए गये हैं। इनमें से एक है "वार्धक्य"। वार्धक्य नामक बीमारी की अवस्था में आयु बढ़ने की गति बढ़ जाती है जिस कारण बच्चा कम उम्र में ही बूढ़ा सा दिखने लगता है और देह का क्षरण होने लगता है तथा युवा अवस्था में ही मौत हो जाती है क्योंकि देह की ऊर्जा चुक गयी होती है। इस बीमारी का निदान यदि आयुर्वेद के अनुसार करके उपचार भी आयुर्वेद से ही करा जाए तो शायद ऐसी हताशा न दिखे कि यह बीमारी लाइलाज है। यदि समय रहते निदान कर लिया जाए तो उपचार सरलता से हो जाएगा। इस निदान के लिये परंपरागत तरीकों से आगे आकर यदि डा.देशबंधु बाजपेयी द्वारा अविष्कार करे गए यंत्र "इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम" का प्रयोग करा जाए तो वात दोष को आसानी से समझ कर जाना जा सकता है कि कितने परिमाण में है। लेकिन मजबूरी है कि यदि बीमारियों का इलाज हो जाएगा तो इस तरह की फिल्में तो कम से कम बनना बंद हो जाएंगी।
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