LGBT बनाम किन्नर बनाम लैंगिक विकलांग

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

जिसे देखिये वही शुभकामनाएं दे रहा है कि दीदी मुबारक हो वोट का अधिकार मिल गया। अच्छा शगुन है अच्छी उपलब्धि है। क्या कोई जानता है कि ये शुभेच्छाएं कथित किन्नरों के हिस्से में ही क्यों आ रही हैं? जबकि बात LGBT समुदाय की है। LGBT यानि कि लेस्बियन, गे, बाइसेक्ज़ुअल, ट्रांसजेण्डर्स का समुदाय; यह शब्द लैंगिक विकलांगता को व्याख्यायित नहीं कर पाता है। लैंगिक विकलांगता शारीरिक अपस्थिति है जबकि लेस्बियन होना, गे होना अथवा बाइसेक्ज़ुअल होना एक मानसिक विकार की स्थिति है। ट्रांसजेण्डर्स में इस स्थिति को स्वीकारा जा सकता है लेकिन उस स्थिति में जबकि उसका मेडिकल परीक्षण हो अन्यथा हरगिज़ नहीं। लैंगिक परिचय के स्थान पर स्त्री अथवा पुरुष के अतिरिक्त "अन्य" लिखा होना कितनी बड़ी उपलब्धि है ये विचारणीय बात है। यदि भाई रजनीश झा, वकील साहब सुमन जी, गुफ़रान भाईसाहब, मुनव्वर आपा और आदरणीय डा.रूपेश श्रीवास्तव भी चाहें तो इसमें खुद को नामांकित कर सकते हैं कोई रोक नहीं है लेकिन इससे हम जैसे शारीरिक (लैंगिक) तौर पर अपंग लोगों का क्या हित होगा जरा सोचिये।
दर असल हो ये रहा है कि LGBT की आड़ में हमारी लड़ाई को एक अलग ही दिशा में न चाहते हुए भी धनबल से मोड़ा जा रहा है और हम इस षड़यंत्र को समझ नहीं पा रहे हैं कि वस्तुतः ये हमारी भारतीय सभ्यता और धार्मिक परंपराओं की जड़ों में मट्ठा डाला जा रहा है। पहले कानूनी तौर पर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से मुक्त कराना और अब ये नया शॊशा। लोगों को लग रहा है कि सामाजिक बदलाव हो रहा है, कुछ नहीं हो रहा है ये सब कागजी कूदफांद है जो कुछ विशेष लोगों के स्वार्थ साधने के काम आने वाला है। आप के हमारे जैसे बच्चे अभी भी उसी हाल में हैं बाबूजी ने कहा है सामाजिक बदलावों की गति अत्यंत धीमी होती है तो उस गति के बढ़ने का इंतजार है। मनीषा नारायण,हिजड़ा,लैंगिक विकलांग,LGBT,लेस्बियन,गे,बाइसेक्ज़ुअल,ट्रांसजेण्डर्स
जय जय भड़ास

3 टिप्पणियाँ:

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

दीदी,
आपने तो सच में हमारी समझ पर परे परदे को हटाया है, नि:संदेह ये चिंतनीय है, हमें तो दोहरी लडाई लड़नी होगी.
हम साथ हैं और अपनी लडाई को जोर शोर से जारी रखेंगे.
जय जय भड़ास

vibhatailang ने कहा…

Aadarniya!

Aap thik kahti hain ki sabhi kanoon ka durupyog hota raha hai aur bhavishya mein bhi hoga yeh bhi nishchit hai....jiss tarah Rajasthan mein reservation quota ke ander quota chahiye...isske liye itna bawal hua hai to swabhavik hai anekon fharzi medical cerificate ke sath LGBT ban kar iss samusay mein shamil ho saktein hain....vaise bhi samaj, aur filmon mein ye mazak ya darr ke patr hain...iss liye mera sujhav yeh hai ki samajik sarokaon ko samjhate hue isska tihra illaj zaruri hai...Inke SAMPURNA VIKAS mein paroksh ya pratyaksh madad taki yeh kabhi aapne ko mainstream se bahar na mahsoos karen....mughal kal mein to ye rajgharanon ke hissa the per Didi aap ander ki batein aatmaavlokan ker sacchayi se swikaren ki kya Gay or Eunuch/transgenders ke sharirik banavton, haav-bhavv ki vajah se log unhein pahchaan ker durian nahin baratte hain...jahan aabh tak mahila, pichhadon ko barabri ka samajik and vyavaharik darja samaj nahin de paya hai vahan...aap sabko pareshani udhani padhti hai ya nahin...aap shayad kucch ginne chune logon mein se ek hon.... 3 ilaj ya nidan meri samajh mein yeh hai...for example(1) Pyschological help taki kucch haromonal badlao mein disbalance ko control ker sakein(aagar sambhav hai to---Yoga bhi faydemand hai)
...aur thik rahein...(2)Physical ilaj to sambhavt surgery hi hai...iske liye aapne desh mein aaspatalon mein ilaj uplabdh ho aur kucch loan va arthik mada ki vyavastha ho saath he counselling bhi chunki suna hai yeh illaj bahut safal nahin hai(3) Professionally independence-inhein alag bastinyon mein rahne ko majboor na hona pade aur apne bhai bahan ma pita...parivaar ke saath mainstream mein rahein...school zaroor jayein...education health ka khayal rakhein aur logon ka bartao unke saath vaisa hi ho jaisa baki saab ke saath hota hai...iske liye inka swablambi hona...aur sabke saman sabhi adhikar pana zaruri hai.... janab samaj mein tamam tabka hai...aamir -garib hain stri-purush hain hindu-muslim sikh issai...vagairah hain...bhedbhav aur dohra mapdund hur jagah hai...kanoon sahuliyat ke liye ek kadam bhar hai....kafi soch-vichhar ke baad banna chhahiye per zaruri to aasal hei samajik sooch mein brabari ka darja, aapne adhikaron ke saath kartavyon ka vastavikta mein nirvan ka bhi bodh hona aur her nirnaye ke vaqt aapne swarth ke saath desh ka ya manavta ka kya bhala hoga thoda sochna aur phir kadam uddana sarvopari ho to sahi hai aur sabke liye swikarya hai.

ab vyakti khudd hi tai ker sakta hai...usse kitne aadhikaar milen hain aur vah kite kartavyon ka nishtahpurn nirvahan ker raha hai...LGBT...ko bhi yahi tai kerna hai.

Baki to jaaisi praja,vaise raja!!!

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

आदरणीय विभा तैलंग जी ने बहुत गहराई से लिखा है। आशा है कि अत्यंत धीमी गति से होने वाले सामाजिक बदलाव इन जैसे लोगों के कारण गति पकड़ेंगे। हम अपने स्तर पर प्रयास जारी रखे ही हैं। एक और उम्मीद है कि विभा जी अपनी बात को सीधे भड़ास के मंच पर एक पोस्ट के रूप में लिखें तो अधिक लोग पढेंगे। भड़ास पर सीधे पोस्ट आप हमें ई मेल के द्वारा bharhaas.bhadas@blogger.com
इस पते पर भेज कर प्रकाशित करवा सकती हैं।
जय जय भड़ास

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