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दुनिया की पहली नस्तालिक महिला एवं पहली हिंदी लैंगिक विकलांग ब्लागरों के संग चले हम

मंगलवार, 5 जनवरी 2010


सम्मान वगैरह तो वैसे भी भड़ासियों के हिस्से में कभी आता ही नहीं है और आता भी है तो हमें हज़म नहीं होता है। अभी हाल ही में एक स्वयंभू हास्य कलाकार ने वर्ष २००९ के सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का सम्मान करने का टोटका करा और शर्त थी कि पहले रजिस्टर कराओ। अब अपने भाई अविनाश वाचस्पति भोले-भाले आदमी ठहरे, पहुंच गये भलमनसाहत के चलते मना न कर पाने की मनोस्थिति में पशोपेश में उलझ कर। दिमाग में भाई के उठापटक चलती रही और फिर आखिर दिल की आवाज़ जीत गई। भाई ने प्रतियोगिता से अपना नाम ही वापिस ले लिया और अपने ब्लाग पर एक लम्बी-चौड़ी-उत्तम स्वास्थ्य वाली पोस्ट भी लिख मारी। तमाम लोग आकर चींऊ-चींऊ करे उस पोस्ट पर। भला सम्मान किसे नहीं चाहिये, प्रसिद्धि की भूख किसे नहीं है? लेकिन कुछ लोग भाईसाहब की तरह से अपवाद होते हैं जो कि अपना काम करते हैं और उनके करने से काम सम्मानित होता है। अबे! ये मत सोचना कि हम तेल लगा रहे हैं , हमें आदत नहीं है लेकिन जो है सो बक दिया करते हैं। भड़ासियों को भी आयोजित सम्मान वगैरह के पीछे दौड़ कर आभासी प्रसिद्धि की लालसा नहीं है। यारों! व्यक्ति का काम बोलता है। अविनाश भाई का काम ही चमचमा रहा है अब क्या प्रशस्ति पत्र और क्या मेडल....... सब उनके आगे बौने हो चुके हैं। भड़ास परिवार की दो वरिष्ठ संरक्षिकाएं मुनव्वर(सुल्ताना) आपा दुनिया की पहली नस्तालिक(उर्दू) महिला ब्लागर हैं और वहीं मनीषा(नारायण) दीदी दुनिया की पहली हिंदी लैंगिक विकलांग ब्लागर हैं हो सकता है कि ये भी रिकार्ड-सिकार्ड में दर्ज़ करने जैसी बात हो लेकिन भड़ास पर इसकी चर्चा तक नहीं करी जाती कि इनकी उपलब्धि को सम्मान का विषय बना कर तोते उड़ाए जाएं। जिसे इनकी उपलब्धियों की सराहना करनी हो वो खुद भाई अविनाश के ब्लागों या मनीषा दीदी और मुनव्वर आपा के ब्लाग पर जाकर पुच्च पुच्च कर आए।
जय जय भड़ास

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LGBT बनाम किन्नर बनाम लैंगिक विकलांग

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

जिसे देखिये वही शुभकामनाएं दे रहा है कि दीदी मुबारक हो वोट का अधिकार मिल गया। अच्छा शगुन है अच्छी उपलब्धि है। क्या कोई जानता है कि ये शुभेच्छाएं कथित किन्नरों के हिस्से में ही क्यों आ रही हैं? जबकि बात LGBT समुदाय की है। LGBT यानि कि लेस्बियन, गे, बाइसेक्ज़ुअल, ट्रांसजेण्डर्स का समुदाय; यह शब्द लैंगिक विकलांगता को व्याख्यायित नहीं कर पाता है। लैंगिक विकलांगता शारीरिक अपस्थिति है जबकि लेस्बियन होना, गे होना अथवा बाइसेक्ज़ुअल होना एक मानसिक विकार की स्थिति है। ट्रांसजेण्डर्स में इस स्थिति को स्वीकारा जा सकता है लेकिन उस स्थिति में जबकि उसका मेडिकल परीक्षण हो अन्यथा हरगिज़ नहीं। लैंगिक परिचय के स्थान पर स्त्री अथवा पुरुष के अतिरिक्त "अन्य" लिखा होना कितनी बड़ी उपलब्धि है ये विचारणीय बात है। यदि भाई रजनीश झा, वकील साहब सुमन जी, गुफ़रान भाईसाहब, मुनव्वर आपा और आदरणीय डा.रूपेश श्रीवास्तव भी चाहें तो इसमें खुद को नामांकित कर सकते हैं कोई रोक नहीं है लेकिन इससे हम जैसे शारीरिक (लैंगिक) तौर पर अपंग लोगों का क्या हित होगा जरा सोचिये।
दर असल हो ये रहा है कि LGBT की आड़ में हमारी लड़ाई को एक अलग ही दिशा में न चाहते हुए भी धनबल से मोड़ा जा रहा है और हम इस षड़यंत्र को समझ नहीं पा रहे हैं कि वस्तुतः ये हमारी भारतीय सभ्यता और धार्मिक परंपराओं की जड़ों में मट्ठा डाला जा रहा है। पहले कानूनी तौर पर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से मुक्त कराना और अब ये नया शॊशा। लोगों को लग रहा है कि सामाजिक बदलाव हो रहा है, कुछ नहीं हो रहा है ये सब कागजी कूदफांद है जो कुछ विशेष लोगों के स्वार्थ साधने के काम आने वाला है। आप के हमारे जैसे बच्चे अभी भी उसी हाल में हैं बाबूजी ने कहा है सामाजिक बदलावों की गति अत्यंत धीमी होती है तो उस गति के बढ़ने का इंतजार है। मनीषा नारायण,हिजड़ा,लैंगिक विकलांग,LGBT,लेस्बियन,गे,बाइसेक्ज़ुअल,ट्रांसजेण्डर्स
जय जय भड़ास

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