लो क सं घ र्ष !: धन्य हैं हमारी खुफिया एजेंसियां

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

हमारी खुफिया एजेंसियां 26 जनवरी , 15 अगस्त, 6 दिसम्बर जैसे मौकों पर व आतंकी मामलों में मीडिया के माध्यम से मालूम होता है की वो काफ़ी सक्रिय हैं और देश चलाने का सारा भार उन्ही के ऊपर हैखुफिया एजेंसियों की बातें और उनकी खुफिया सूचनाएं बराबर अखबार में पढने इलेक्ट्रोनिक माध्यम से सुनने को मिलती हैंछुटभैया नेता रोज प्रेस विज्ञप्ति जारी करता है और छपने पर अखबार खरीद कर जगह-जगह किसी किसी बहाने लोगो को पढवाता रहता है और उसी तरह खुफिया एजेंसियां मीडिया में अपने समाचार प्रकाशित करवाती रहती हैं। खुफिया सूचनाओं का अखबारों में प्रकाशित होना क्या इस बात का धोतक नही है कि जान बूझ कर वह प्रकाशित करवाई जाती हैं और उन सूचनाओ में कोई गोपनीयता नही हैअक्सर विशिष्ट अवसरों से पहले तमाम तरह की कार्यवाहियां मीडिया के माध्यम से मालूम होती हैं जो समाज में सनसनी भय फैलाने का कार्य करती हैं अंत में वो सारी की सारी सूचनाएं ग़लत साबित होती हैंनागरिक उस विशिष्ट अवसर से पहले इन सूचनाओ से भयभीत रहते हैं जबकि खुफिया जानकारियों का गोपनीय रहना आवश्यक होता है और किसी घटना होने के पूर्व उन अपराधियों को पकड़ कर घटना को रोकने का कार्य होना चाहिए लेकिन हमारी खुफिया तंत्र का कार्य घटना हो जाने के पश्चात् शुरू होता हैभारतीय कानूनों के तहत सबूतों को बयानों को अंतर्गत धारा 161 सी आर पी सी के तहत केस ड़ायरी में दर्ज किया जाता हैउस केस ड़ायरी को विपक्षी अधिवक्ता देख सकता है पढ़ सकता हैछोटी से लेकर बड़ी घटनाओं तक सारे सबूतों बयानों को प्रिंट इलेक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से जनता को बताया जाता हैइस तरह का कृत्य भी अपराध है जिसको हमारा खुफिया तंत्र पुलिस तंत्र रोज करता हैखुफिया सूचनाओ का कोई महत्त्व नही रह जाता हैइन दोनों विभागों की समीक्षा ईमानदारी से करने की जरूरत है अन्यथा इन दोनों विभागों का कोई मतलब नही रह जाएगाअगर खुफिया तंत्र इतनी छोटी सी बात को समझ पाने में असमर्थ है तो धन्य है हमारे देश की खुफिया एजेंसियां

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

3 टिप्पणियाँ:

फ़रहीन नाज़ ने कहा…

तो क्या हम बस इसी तरह इस तमाशे को तमाशबीनों की तरह देखते रहेंगे? उपाय भी सुझाइये ताकि हमें एक अच्छा समाज और देश मिल सके। हम सिर्फ़ समस्याओं की तरफ़ उंगली नहीं दिखाते बल्कि उसके संभावित हल भी सुझाते हैं।
हर शाख पर उल्लू बैठा है
अंजामें गुलिस्तां क्या होगा....

ये शायरी है लेकिन भड़ासी पत्थर उठा कर उल्लुओं को भगा सकते हैं दम है और निशाना भी अच्छा है ये नहीं कि बगीचे में बैठ कर शेर लिख रहे हैं...
जय जय भड़ास

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

सही कहा फरहीन तुमने,
हम तो उल्लू को भगाने के लिए ही हैं.
वैसे खुफिया एजेंसी के बारे में सिर्फ इतना काफी ना होगा कि ये सभी सरकारों के निजी हित के लिए ही रही है.
जय जय भड़ास

मनोज द्विवेदी ने कहा…

ABHI MEDIA ME 'HEDELY DRAMA' CHAL RAHA HAI. ROZ NAYE-NAYE KHULASE KABHI INDIAN INTELEGENCE BUREU TO KABHI F.B.I KE HAWALE SE KHABAR....JABAKI INDIAN KHUPIYA VIBHAG KE KUCHH ADHIKARI HEADLY KI GIRFTARI KE BAD AMERICA GAYE THE PUCHH TACHH KARNE. UNHONE MANA KAR DIYA TO SHOPING VAGAIRAH KAKE WAPIS AA GAYE..AB YAHAN AKAR ROJ KHABAREN 'PLANT' KI JA RAHI HAIN. JAB TAK KOI PRASHAN NAHI PUCHHEGA TAB TAK YE 'SAB CHALTA HAI' KI TARJ PAR CHALTA HI RAHEGA. YE VAHI SYSTEM HAI JAHAN KA CYBER CRIME INCHARGE KO COMPUTER OPERATE KARNA NAHI JANTA AUR POLICE KA 'DAROG BABU' 200 SAL PURANI HANAK NAK PAR LIYE BAITHTA HAI. JAB TAK SYSTEM KI GULAMI NAHI KHATM HOGI TAB TAK HAM CHILLATE RAHENGE..KYONKI YE DEMOCRACY HAI CHILLANE KA BINDAS!!!!!!

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