लो क सं घ र्ष !: ‘‘आस्तीन के सांप और दूध पिलाने वाले’’

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

अब हैं हमारे जनप्रतिनिधि महान
जो करते हैं राजनीति जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की।
पर लागू नहीं होता कोई कानून,
न लगता है NSA, न लगता है मकोका।
आखिर जनता और रियाया है इन्ही के खिलवाड़ की चीज।
क्यूं नही लगवाते रोक, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की राजनीति पर?
न्हीं लगवायेंगे! क्योंकि हमाम में सब हैं नंगे।
क्या राष्ट्रीय! क्या क्षेत्रीय!
इन्होंने ही तो पाला था भस्मासुर पंजाब का,
जिसने मरवाये, बच्चे, बूढ़े, महिलाएं अनेक,
जिनकी तादात हजारों में नहीं लाखों में थी।
यही हाल कश्मीर, आसाम, मणिपुर का अभी भी है।
मरे जा रहे हैं रोज अनेक, कभी गोलियों से, कभी बारूद के धमाकों से,
उड़ते हैं चीथड़े, खून के लोथड़े, इंसानी अंगों के और इंसानियत के भी।
मरते हैं रोज वर्दी वाले या बिना वर्दी के,
हैं तो सब ही भारत मां के सपूत।
फिर ऐसा क्यूं होता है?
वर्दी वाला मरा तो इंसान मरा, बिना वर्दी के मरा तो कुत्ता मरा।
आखिर क्यूं चलवाते हैं,
प्रदर्शनकारी भीड़ पर गोली?
आखिर क्यों करवाते हैं,
फर्जी एन्काउन्टरों में सतत् हत्यायें?
आखिर क्यूं छीनते हैं,
जीवित रहने का नैसर्गिक संवैधानिक अधिकार?
कानून व्यवस्था के बहाने, फर्जी क्राइम रिकार्ड के नाम
सिर्फ और सिर्फ फर्जी आंकड़ेबाजी के लिए,
जनता को ही बेवकूफ बना झूठी वाहवाही के लिए।
जनता का ध्यान मूल मुद्दों से हटाने के लिए,
छोड़ते रहते हैं शिगूफों पर शिगूफे, ताकि आये ही न ध्यान,
रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और महंगाई का।
हमारे ही प्रतिनिधि, मुखिया सरकार के,
चलवाते हैं बाकायदा अभियान,
भरते हैं जेलें गरीब गुरबा जनता से,
फर्जी मुकदमें तो है बपौती, पुलिस और प्रशासन की।
क्या इस अमानवीयता के बिना कानून व्यवस्था रह जाएगी अधूरी।
खड़ा है इस भ्रष्टाचार की नींव पर,
घूस के रूपयों का बहुत बड़ा साम्राज्य।
दबी जा रही है अदालतें ढाई करोड़ मुकदमों के बोझ से,
बेगुनाह साबित होने में लग जाते हैं चार-छः साल।
फिर भी छीना ही जाता रहता है जनता का,
सामान्य जीवन जीने का संवैधानिक अधिकार
होती रहेंगी सतत् हत्यायें मानवता की फर्जी एन्काउन्टरों में।
क्यूं बढ़ावा देते रहते हैं झूठी बहादुरी को?
तमगे और आउट आॅफ टर्न प्रमोशन देकर।
आखिर क्यूं करवाते रहते हैं सतत्,
संविधान की हत्या?
जबकि संविधान से ही पाते हैं,
ताकत और शासन का अधिकार।
फिर क्यूं रख देते हैं संविधान को,
सजाकर सिर्फ अलमारी में?
जहन से निकाल ही क्यूं देते हैं,
संविधान और जनता को?
फिर भी देते फिरते हैं संविधान की दुहाई।
जनता को सिर्फ बेवकूफ बनाने की खातिर।
जबकि खुद ही नहीं करते संविधान का पालन,
करते हैं राजनीति - जाति, धर्म, क्षेत्रवाद और हत्या की।
आखिर ऐसा क्यूं है?
वर्दी वाला मरा तो इंसान मरा, बिना वर्दी के मरा तो कुत्ता मरा।
बागी भी तो हैं इंसान और भारत मां के ही सपूत।
पर उनके मन में है एक आग,
उस आग को ही क्यूं ठंडा नहीं करते?
पानी क्यूं नहीं डालते उस पर?
इंसान क्यूं मारते हैं?
क्यूं बनाते हैं, नीति दमनकारी?
आखिर जानबूझकर क्यूं करते हैं नीतिगत गलती?
वह आग पैदा तो आप ही करते हैं,
आकण्ठ व्याप्त भ्रष्टाचार की विष बेल पर।
आखिर क्यूं पिला रहे हैं दूध आस्तीन के सांपों को?
क्या राज्य की कुर्सी राष्ट्र से ज्यादा जरूरी है?
एक राज्य में कुर्सी न मिले तो क्या कम रह जाता रूतबा राष्ट्र में?
इंदिरा का बलिदान क्या कम है समझने के लिए?
क्यूं नहीं करते स्वच्छ पारदर्शी राजनीति?
क्या तब पेट न भरेगा या रोटी पड़ जाएगी कम?
जिन्ना ने मरवाया था बीस लाख, ठाकरे और राज मरवायेंगे करोड़ों।
जिन्ना ने करवाया था देश के दो टुकड़े, प्रान्त में छिपे जिन्ना करवायेंगे अनेक।
फिर क्यूं नहीं लगवाते रोक, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की राजनीति पर?
नजर बन्द करें इन भस्मासुरों को या डालें काल कोठरियों में।
इन्हें पूरी तरह काट दें समाज और देश दुनिया से।
संेसर काटें इनकी जहरीली वाणी का,
नहीं घुलेगा जहर समाज में नहीं लगेगी आग।
अभियान7 चलाना है तो चलाएं इनके ही खिलाफ,
और शासन तन्त्र में आकण्ठ व्याप्त भ्रष्टाचार के ही खिलाफ।
जो है राष्ट्रद्रोह से भी बढ़कर राष्ट्र के जन-जन के प्रति अपराध,
यही है असली अपराधी समाज के।
ताज में कसाब से निपटाया ब्लैक कैट
बार्डर के दुश्मनों से तो निपट सकते हैं तोप और बुलेट से पर,
आस्तीन के सापों से निपटेंगे कैसे?
माहिर पुलिस रोज करती है फर्जी मुठभेड़ मरते हैं अनेक
क्या है कोई व्यवस्था देश में?
जो इन भस्मासुरों से करे वास्तविक मुठभेड़।
क्यूं बढ़ने और पकने ही दें ऐसे फोड़ों को?
जो बन जाएं नासूर रिसने लगे मवाद और खून।
शुरू में ही क्यूं नहीं नश्तर से देते चीर,
ऐसे गम्भीरतम मामलों में?
कहां खो गयी है विशेषता राष्ट्र की?
कुछ बताएंगे विधि-विशेषज्ञ,
कुछ करेंगे, हमारे विद्वान न्यायाधीश।
इतने बड़े देश में एक अरब की आबादी में।
जूझ रहा है निहत्था सिर्फ एक खिलाड़ी महान।
क्या है कोई ‘‘जांबाज मानुस’’ जो करे मुठभेड़,
अन्त करे इन भस्मासुरों का आस्तीन के सांपों का।।

- महेन्द्र द्विवेदी

6 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

भाईसाहब यकीन मानिये कि आस्तीन से लेकर पौंहचे में रहने वाले सांपों, बिच्छुओं और अन्य जहरीले कीड़ों से करोड़ गुना अच्छॆ हैं भड़ासी जो कि कुछ-कुछ मधुमक्खियों जैसे स्वभाव के हैं। मुझे पूरा यकीन है कि जिस परित्राता,मसीहा,जांबाज़ मानुस का इंतजार है वह इसी परंपरा मे पैदा होगा।
जय जय भड़ास

अजय मोहन ने कहा…

पेलो...पेलो....
जमकर पेलो....
कविताएं लिख लिख कर पेलो...
जय जय भड़ास

मुनेन्द्र सोनी ने कहा…

बेहतरीन रचना है। अंगारों से भरी हुई भट्ठी की तरह तपिश है। एक एक शब्द सुलग रहा है
जय जय भड़ास

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

आज की तारीख में यह आलेख तीसरी जगह पढने को मिल रहा है। आपका संघर्ष जारी रहे।
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छोटी सी गल्ती, जो बड़े-बड़े ब्लॉगर करते हैं।
धरती का हर बाशिंदा महफ़ूज़ रहे, खुशहाल रहे।

दीनबन्धु ने कहा…

@ज़ाकिर अली
क्या बात है भड़ास पर कैसे आ गये प्रभु आप तो अच्छे भले किस्म के आदमी हैं लेकिन शायद हाइपर लिंक लगी हुई टिप्पणियां पेलना आपका व्यवहार है। जब कभी मुद्दों के विमर्श पर आप से संबोधित हुए तो आप कन्नी काट कर निकल भागे हैं याद रखिए कि भड़ासी बुरे लोगों में गिने जाते हैं आप जैसे स्वयंभू भले लोगों की जमात की तरफ़ से....
अपनी इन महान पोस्ट्स पर भड़ासी की टिप्पणी पढ़ कर पेट नहीं भरा?
जय जय भड़ास

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

शानदार है बड़े भाई,
बस ऐसे ही पेले रहिये.
जय जय भड़ास

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