डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी को पत्र से पहले गुफ़रान सिद्दकी जी को जवाब देना आवश्यक है

रविवार, 20 जून 2010

निःसंदेह डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी की शैली  इतनी प्रभावशाली है कि मैं उसे जीना चाहता हूँ, लीजिये आपकी बातों का शब्दशः उत्तर दे रहा हूं जो कि प्रश्न अधिक लगते हैं :)
गुफ़रान:- यहाँ कुछ भी परदे के पीछे नहीं है संजय भाई ये भड़ास का मंच है यहाँ जो जैसा लिखता है वैसा दिखता भी है जहाँ तक रणधीर सिंह सुमन जी की वकालत की बात है तो अगर आप को ऐसा लगता है की मैंने उनकी वकालत की तो आप भड़ास के मंच के लायक नहीं आप तो साहब चापलूसों के किसी ब्लॉग पर जा कर अपने ज्ञान की उलटी कीजिये यहाँ कोई किसी का वकील नहीं सब अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं और किसी का रटाया हुवा नहीं लिखते
मैं:- जो जैसा लिखता है वैसा दिखता भी है ये बड़ी प्रसन्नता की बात है क्योंकि यही वह मंच है जिस पर मैं आपको उत्तर दे पा रहा हूं और उसे हटाया नहीं जाएगा, रणधीर सिंह सुमन की बात तो आपने देखी कि दो कदम पीछे हट कर मुझे नायक-नायक कह कर बचना चाह रहे हैं। वे देश को अखंड भी रखना चाहते हैं और पाखंड भी कर रहे है। आप ही बता दीजिये कि क्या मार्क्सवादी साम्यवाद ही एक उपाय है जो देश को अखंड रखेगा?क्या साम्यवादी होने का दम भरने वाले पूंजी और श्रम के बीच संसाधनों के वितरण का सर्वमान्य सूत्र तय कर चुके हैं जो कि हमारे देश की बहुधर्मी संस्कृति में सहज स्वीकार्य हो? अब आप बताएं कि आप इन महाशय से सहमति जताते मैदान में आते हैं तो क्या ये वकालत नही है? जिस जगह पर मैं जिस मुद्दे पर लिख रहा था उसमें आप आये पूरी तैयारी से दिशा मोड़ने के लिये तो इसे क्या कहा जाएगा?मैं ज्ञानी तो हरगिज नहीं हूं न ही मेरे उल्टी करने से ज्ञान निकलता है और मैं भड़ास के मंच के लायक हूं या नहीं ये निर्णय आपने कैसे ले लिया??


 महोदय अब बात होती है आपने मुझे कितना पढ़ा है क्या आप जानते हैं धार्मिक कट्टरता क्या आप जो जानते हैं उसमे मुझे कटाई संदेह नहीं
आपकी धार्मिक कट्टरता का सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि आप खुद एक बार डॉ.रूपेश से एक प्रसंग में लिख चुके हैं कि आपके मजहब में तो........ आपको याद है न क्या लिखा था या याद दिलाउं???
 आपका ज्ञान भी समाचार माध्यमो तक सीमित है संसार में कितने धर्म मार काट आतंक के लिए प्रेरित करते हैं 'मैंने हमेशा कहा जो अपने धर्म को लेकर कट्टर है वो समाज के लिए कहीं से किसी के लिए बुरा नहीं कर सकता'
समाचार माध्यम किसी दूसरे लोक से संचालित नहीं होते और आप कितनी आसानी से मेरी बात का ठीकरा भी समाचार माध्यमों के सिर फोड़ ले रहे हैं जैसे मैं सिर्फ़ अखबार पढ़ कर और टीवी देख कर ही निर्णय लेता हु कि जीवन में क्या सही है और क्या गलत??जितनी मानव हत्याएं धर्म की कट्टरता के चलते मानव इतिहास में हुई हैं और किसी कारण से नहीं क्योंकि जिसे धर्म का लिबास पहना दिया जाता है वह चंद महत्त्वाकांक्षी प्रभुता संपन्न लोगों के दिमागों की उपज है(मार्क्सवाद धर्म के बारे में क्या विचार रखता है आप बेहतर जानते होंगे न जानते हों तो रणधीर सिंह सुमन से पूछ लीजियेगा)
 लेकिन यहाँ तो कूप-मंदूपों की कमी नहीं है. और जनाब मै यहाँ नेता बनने नहीं आया और न ही मुझे आपसे प्रमाड-पत्र लेने की ज़रुरत है जिनको मेरी ज़रूरत है वो हिन्दू मुसलमान नहीं ज़रूरतमंद होते हैं और मै हमेशा उनके साथ रहता हूँ ..जहाँ तक इस्लाम छोड़ने की बात है जो एक बार इस दीन में दाखिल हो गया उसके लिए इस्लाम को छोड़ना ऐसा है जैसे आत्मा शरीर त्याग दे.
निःसंदेह आप जैसा कुंआ चाहते हैं उसमें मेढक भरपूर होने चाहिए और आप किनारे बैठ कर बगुला बने रहना चाहते हैं, हिन्दू मंडूक, मुस्लिम मंडूक, ब्राह्मण मंडूक, मेहतर मंडूक आदि सभी तो आपके लिये एक वोट हैं। इस्लाम छोड़ने की तो बात चाहो तो भी नहीं छॊड़ सकते वरना आपकी ही किताब कुरान के सूरतुल बकरः की २१७ वीं आयत जिससे संबंधित हदीस(हदीस ३०१७, सहीह बुखारी किताबुल जिहाद) के मानने वाले आपको जान से मार देंगे। आप मजबूर हैं कि कुछ अलग सोच ही नहीं सकते मजबूरन मुझे आपकी आस्था पर टिप्पणी करनी पड़ रही है। आपकी आत्मा शरीर त्यागे न त्यागे अन्य कुरान के मानने वाले जरूर आपकी आत्मा को शरीर से निकाल लेंगे वो भी जबरन।
और भा.जा.प.,शिवसेना,मनसे की बात है देख रहा हूँ आपको मिर्ची ज़रूर लग रही है भाई लगे भी क्यूँ न आखिर यही तो रोज़ी रोटी का सबसे आसान माध्यम जो ठहरा
भा.जा.प.,शिवसेना,मनसे की बात करके आपने ये महसूस भी कर लिया कि मुझे मिर्ची लगी क्योंकि ये मेरी रोजी रोटी का माध्यम है। आप यदि ऐसा विचार करते हैं तो आप बिना शक एक लकीर के फ़कीर हैं कि खुद ही मान लेते हैं कि जिसने आपका विरोध करा वह इन्हीं हरामियों की जमात का होगा। ये जिनका आप जिक्र करके मेरे ऊपर तोहमत लगा रहे हैं उतने ही नीच और कमीने हैं जितने कि कथित कम्युनिस्ट जिन्होंने भारत पर चीन के आक्रमण पर प्रसन्नता व्यक्त करी थी कि ये वैचारिक प्रसार है और कम्युनिज्म का विस्तार की दिशा में कदम है कम्युनिज्म देशों की सीमाएं नहीं मानता। भा.जा.प.,शिवसेना,मनसे के बारे में सोच सोच कर खुद ही खुश हो रहे हैं कि आपने तो निश्चित कर हमारे ऊपर ठप्पा मार दिया कि मैं इन हरामियों की तरह हिंदू हिंदू कह कर लोगों का खून पीने की सोच रखता हूं।
यहाँ मुसलमानों की बात कोई न करे लेकिन दलित आरक्षण, गरीब स्वर्ण आरक्षण, पिछड़ों को आरक्षण की वकालत करने वाले हमें बताएँगे की हमारी विचारधारा क्या है
आरक्षण कब तक और क्यों या किस आधार पर ये तो जरा स्पष्ट कर लीजिये। क्या सचमुच आपको लगा कि मैंने मुसलमानों का विरोध करा, क्यों लगा? मैंने रणधीर सिंह सुमन से ये बात कही है कि वे यदि राष्ट्र की बात करते हैं तो नागरिक की बात करें न कि हिंदू मुस्लमान की क्योंकि उन्हें जेलों में बंद फ़र्जी मामलॊं में फ़ंसाए सिर्फ़ मुस्लिम युवक ही दिखे हैं। आप सब की अक्ल पर कितने बड़े पत्थर पड़ गये है कि जस्टिस आनंद सिंह के प्रकरण को भूल गए, क्या वे मुसलमान हैं या ये कोई कंडीशन है कि यदि आप सिस्टम के अत्याचार के शिकार हो रहे हैं तो आपका मुसलमान होना जरूरी है???
 क्षेत्रवाद के समर्थक दिखावे का विरोध नहीं हिम्मत हो तो बाल ठाकरे और उसके सपोले राज ठाकरे के खिलाफ महाराष्ट्र में ही देश द्रोह का मुकदमा दर्ज कराओ फिर हमारी विचारधारा समझने की कोशिश करना.
बाल ठाकरे और राज ठाकरे के साथ में खड़े रहने वाले कौन हैं किस देश से आए हैं? क्यों सहमत हैं खुद की खोपड़ी में भुस भरा है क्या कि किसी राजठाकरे ने कहा कि लगे हिंदी वालों को मारने या किसी बाल ठाकरे ने कहा कि लगे दक्षिण भारतीयों को मारने लूटने?मुकदमा तो कसाब से लेकर वारेन एंडरसन को लेकर चल रहे हैं क्या चाहते हो कि एक औपचारिकता पूरी कर दी जाए कि मुकदमा चल रहा है ताकि रणधीर सिंह सुमन जैसे किसी  वकील को रोटी का ठिकाना हो जाए और दो सौ साल तक ये बात लोअर कोर्ट में चले फिर हाईकोर्ट और फिर.......। बस हो गयी मेरी नागरी जिम्मेदारी पूरी क्योंकि मुकदमा तो कर दिया है अब चलने दो। नशे में हो क्या हमवतन भाई???तुम जैसे लोग इन हरामजादे लोगों के साथ खड़े हो जाते हैं भीड़ बन कर और ये सुअर बन जात हैं उन कमीनों की भीड़ के नेता। जब तक यानि मै दो तीन सौ साल तक चलने वाली अदालती कार्यवाही की बात में न उलझूं तब तक आपकी विचार धारा आप न बताएंगे?
गुफरान सिद्दकी की विचारधारा खुद उसकी कलम से निकलती है, कृपया अपनी विचारधारा स्पष्ट करें और हाँ किसी की शैली चुरा कर नहीं अपनी शैली में लेख लिखें मेरा इशारा समझ रहे होंगे आप भड़ास पर काफी दिनों से आपकी नज़र है ये आपने अपने लेख में बताया तो क्या जनाब किसी व्यक्ति विशेष की शैली कॉपी कर रहे थे....
आप महान विचारक हैं जो कलम से विचार उगल रहे हैं, मैं तो भड़ास पर हूं तो आप सोच लीजिए कि मैं कैसा हूं क्योंकि भड़ास पर मौजूद लोग तो स्वघोषित बुरे और गंवार लोग हैं, जहालत पर कोई कमी महसूस तक नही करता हूं मैं भी। डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी की शैली से प्रभावित होकर लिखना वैसा ही है जैसे कि पिता की उंगली पकड़ कर चलने वाला बच्चा अपने बाप की शैली का चोर कहलाए, ये तो बड़े गर्व की बात है कि आपको मेरे लेखन में डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी की शैली का हजारवां अंश भी दिखता है। मेरी शैली यही है कि मैं आपके अनुसार एक बड़े आदमी का शैलीचोर हूं।

आपका हमवतन भाई....गुफरान सिद्दीकी
(अवध पीपुल्स फोरम फैजाबाद अयोध्या)
हमवतन भाई जरा सूरतु आले-इमरान की आयत २८ वीं आयत के संदर्भ में जान लीजिये जिसमें साफ़ हुक्म उन मुसलमानों के लिये है जो किसी काफ़िर मुल्क में रहते हों और उनसे दोस्ती किये बिना..............।
बस इतना काफ़ी है या  खुलासा चाहिये इस आयत का मेरे हमवतन भाई??

मेरा इरादा आपको इस तरह से रगेदना नहीं था लेकिन आप भी हिंदू-मुसलमान करके सामने आए मजबूरन मुझे अपनी बात को इस तरह रखना पड़ा लेकिन इस बात के लिये कोई क्षमा प्रार्थना नहीं।
जय जय भड़ास
संजय कटारनवरे
मुंबई

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

संजय तुम्हाला मान्य असेल किंवा नसेल पन एक गोष्ट तर अगदी स्पष्ट आहे कि विषय परिवर्तित झाला आणि तुम्ही पण विषय सोडुन गुफ़रान बरोबर गुतले। तुम्ही तुमची वार्ता वर ठाम रहा.....
जय जय भड़ास

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