हर एक को प्रश्नों से गुजरना होता है

शनिवार, 10 जुलाई 2010

संजय कटारनवरे,

जी हाँ ! मार्क्सवादी नास्तिक होते हैं लेकिन किसी को अपना धर्म मानने से मना भी नहीं करते हैंहर व्यक्ति को एक बेहतर समाज में अपने तरीके से जीने का अधिकार हैबेहतर समाज से यह तात्पर्य नहीं है कि वह दूसरे के व्यक्तिगत मामलों में हस्ताक्षेप करेगाश्री गुफरान सिद्दकी मजहब से इस्लाम को मानने वाले हैंअगर वह किसी मामले में हमारे साथ खड़े होते हैं तो अच्छी बात है और हम उनके साथ खड़े होते हैं यह भी अच्छी बात हैसाम्राज्यवादियो का पूर्व सोवियत यूनियन के समय यह दुष्प्रचार था कि सोवियत संघ में धार्मिक लोगो का विनाश कर दिया जाता है किन्तु सोवियत संघ के विघटन के बाद 11 मुस्लिम राष्ट्र सृजित हुए थे । यहाँ तक कि वर्ग शत्रु जार के भवनों को उससे सम्बंधित कलाकृतियों को सोवियत समाज में अच्छे तरीके से रखा गया था। पूर्व सोवियत संघ में बौद्ध धर्म का भी विकास हुआ था । बंगाल और केरल में जो भी धर्म हैं वो फल-फूल रहे हैं। हाँ धर्म के आधार पर लड़ने की छूट नहीं है और न होनी चाहिए । बंगाल में वाम मोर्चा के शासन के पूर्व बंगाल दंगो के नाम से जाना जाता था। वाम मोर्चा की सरकार ने उस स्तिथि को बदला था यह उसकी उपलब्धि थी। साम्राज्यवादी मीडिया उसके तनखैया लेखक शुरू से समाजवाद के खिलाफ दुष्प्रचार करते रहे हैं। क्या वर्तमान शासन व्यवस्था से आप संतुष्ट हैं ? अगर नहीं ! तो परिवर्तन होगा ही कोई जरूरी नहीं है की समाजवादी व्यवस्था कम्युनिस्ट नाम से ही आये लेकिन यह अपरिहार्य है कि पूंजीपतियों साम्राज्यवादियो की शोषण पर आधारित व्यवस्था क्या चलती रहेगी।

विचार-विमर्श के लिय प्रश्न आवश्यक हैं और उनका उत्तर भी इसीलिए कहा जाता है कि हर एक को प्रश्नों से गुजरना होता हैमेरे लिए नई बात नहीं है

संजय कटारनवरे जब से आप गोंडा से बम्बई चले गए तब से आपकी भाषा शैली सब कुछ बदल गयी लेकिन आपके अंदाज-ए-बयाँ ने आपको पहचनवा दिया। समय-समय पर आपकी सभी जिज्ञासाओं का समाधान किया जायेगा। अगर इस बीच में मैं अगर गोंडा गया तो तुम्हारे परिवार वालों को बम्बई में होने की सूचना दे दूंगा। आप स्वस्थ्य एवं प्रसन्न रहो।

सुमन

2 टिप्पणियाँ:

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

सुमनी जी भाई,
बस प्रश् और उसके उत्तर आते रहने चाहिए,
स्वस्थ्य बहस के ये शानदार एकमात्र तरीका ही तो है, बाकी मुद्दों के लिए हम भड़ासी हमेशा एकजुट हो जाते हैं.
जय जय भड़ास

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

मैं पूरी तरह से सहमत हूं कि विचार विमर्श के लिये सवाल और उनके जवाब आते रहें ताकि स्थितियों को बेहतरी की ओर ले जाया जा सके।
सुमन जी संजय कटारनवरे महाशय को आप पहचान गए हैं तो जरा सभी भड़ासियों से इनका परिचय तो करवाइये, ये जनाब तो लोकतंत्र में गोपनीयम-गोपनीयम करते हुए अब तक मेरे तक संपर्क में नहीं आए पता नहीं किस बात से फ़िक्रमंद हैं।
भाई(?)संजय कटारनवरे कम से कम एक पी.सी.ओ. से ही फोन कर लो मैं फोन पर काटता नहीं हूं क्या आप मुझे इतना कटखना समझ रहे हैं आप तो मेरी शैली और मेरे व्यक्तित्त्व से प्रभावित बताते हैं खुद को और खुद ही मुझसे पर्दा है पर्दा....खेल रहे हैं :)
हम भी गाते बैठे हैं.. जरा सामने तो आओ छलिये...
जय जय भड़ास

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