डॉ.अनवर जमाल जी ! संभोग मात्र एक सहज प्राकृतिक कर्म है जो कि हार्मोन्स के प्रभाव में आकर होता है बाद में उसके पवित्र या अपवित्र उद्देश्य होते है

सोमवार, 19 जुलाई 2010

डॉ.अनवर जमाल जी आपने खुद को निशाने पर स्वीकार कर प्रसन्नता जताई ये देख कर अद्भुत अनुभव हो रहा है शब्द नहीं मिल रहे हैं कि विनम्रता इस हद तक हो सकती है या विनम्रता का शीर्षासन करता रूप है। आप एहसान जता जता कर परेशान न हो जाइयेगा दर असल भड़ासियों को कुछ कामधाम तो है नहीं तो आप जैसे महान जनों पर ही कुछ लिख दिया करते हैं। सेक्स सिर्फ़ सेक्स है जैसे कि टट्टी करना या पेशाब करना उसमें पवित्रता या अपवित्रता हम अपने स्वार्थ से लगाते हैं समस्या तो तब होती है जब आप जिसे मालिक का आदेश मानते हैं दूसरा व्यक्ति उसे मनगढंत कहानी बता दे फिर चाहे वो वेद हों या कुरान। संभोग मात्र एक सहज प्राकृतिक कर्म है जो कि हार्मोन्स के प्रभाव में आकर होता है बाद में उसके पवित्र या अपवित्र उद्देश्य निर्धारित होते हैं जैसे वंशवृद्धि या सस्ता सुलभ मनोरंजन जिसे करने के लिये मानवों के समाज में शादी या निकाह की व्यवस्था है। बात तो अधिक गहरी तब हो जाती है जब विवाह और निकाह में भी लोगों ने अपने अपने चश्मे से देखकर मौके के अनुसार किस्में बना दी और जायज नाजायज कहना शुरू करा है। पोस्ट में दिये गए लेबल पोस्ट से संबंधित होते हैं लेकिन यदि आप शैव लोगॊं की तरह हर बात को लिंग-योनि और सेक्स से ही प्रारंभ मानते हैं तो आपकी ब्लॉगिंग इससे परे कैसे रह सकती है। सेक्स के साथ अन्य ऐसे शब्द हैं जिन्हें देशी भाषा में लिंग, योनि, गुदा के लिये प्रयोग करा जाता है। बुरे तो ये अंग भी नहीं है हमारे शरीर के ही पुर्जे हैं,आप चाहें तो पोस्ट से संबंधित न होने पर भी इन्हें अगर लेबल्स में लिखते हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। शम्स भइया ने जो लिखा है मैं उससे सहमति नहीं रखता क्योंकि आप जो चाहें लेबल लगाएं कोई निर्धारित आचार संहिता तो है नहीं कि पोस्ट में चू** , लं** या गां** जैसे शब्द लेबल में नहीं लिखे जाएंगे हम तो कहते हैं कि लेबल में नोकिया,सैमसंग,N-73 वगैरह भी लिख दें तो क्या होगा। भाई जब जानवरों की चर्बी शुद्ध घी का लेबल लगा कर बिक रही है, घोड़े की लीद पर धनिया का लेबल लगा कर बेच दिया जाता है, ये लेबलिंग बड़े विद्वान लोगों की खोज है। अरे भाई ! सर्च इंजन ऑप्टिमाईजेशन इसी लिये तो काम आता है। अनवर बाबू आपके जमाल गोटा देने से हमे कोई परेशानी नहीं है आप जिन्हें कब्ज़ न भी हो उन्हें भी दस्तावर दवा देते रहिये हम आपके साथ हैं। लेकिन माओवादी समस्या का हल बता दीजियेगा साथ ही जो फ़ाल्स इम्प्लीकेशन की लीगल प्रॉब्लम है उसे भी सुलझाने का तरीका हो तो बताएं यदि किसी वेद में लिखा हो।
जय जय भड़ास

6 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

लेबल वाली बात से सहमति है कि लेबल लगा कर कुछ भी बेचा जा सकता है बिकने के बाद भले ही ग्राहक को पता चले कि ये घी नहीं चर्बी है :)
डॉ.अनवर जमाल साहब के साथ गोटा लगा कर उनके नाम को और अधिक दस्तावर मत बनाइये वैसे भी उनके नाम से कई लोगों को जुलाब होने लगता है। वेद के छेद से लेकर कुरान-पुरान सब चाटे बैठे हैं बड़े जबर आदमी हैं| माओवादी समस्या का हल सुझा दें तो भ्रष्टाचार और बेरोजगारी की समस्या का हल भी मांग लीजियेगा :)
जय जय भड़ास

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

जनाब मोहतरम शम्स साहब ने मेरे ब्लाग पर आकर कमेंट करना मुनासिब न समझा।
ये साहब मुझे सुझा रहे हैं कि मैं माओवाद पर कुछ लिखूं और फिर खुद ही कह रहे हैं कि मैं उन्हें भी इस्लाम कुबूल करने का निमंत्रण दूंगा।
मैं दूंगा नहीं बल्कि दे भी चुका हूं। नक्सलवाद की समस्या पर मेरे कई लेख हैं। आपको उन्हें पढ़ लेना चाहिये था।
दुनिया में जंग किस बात की है ?
आमतौर पर जो ताक़तवर है वह साधनों पर इस तरह क़ाबिज़ हो गया है कि वह कमज़ोरों को उनका उचित हक़ भी नहीं देना चाहता।
जो कमज़ोर हैं वे अपना हक़ मांगते हैं । जब मांगने से उन्हें अपना हक़ नहीं मिलता तो वे छीनने पर आमादा हो जाते हैं।
दोनों ग्रुप्स में टकराव होता है जो ज़्यादा संगठित और योजनाबद्ध होता है वह जीत जाता है जैसे कि रूस में जनता जीत गई और चीन में जनता हार रही है।
कभी ऐसा भी होता है कि शासक वर्ग की नीतियों से कुछ गुट संतुष्ट नहीं होते, वह और ज़्यादा मांगते हैं। शासक वर्ग उन्हें और देता है तो मांगने वाले अपनी मांग और भी ज़्यादा बढ़ा देते हैं।
इसी तरह इतिहास में टकराव हुआ और आज भी हो रहा है। कहीं इसका नाम माओवाद है और कहीं राष्ट्रवाद। कहीं इसका नाम नक्सलवाद है और कहीं इसे इस्लामी आतंकवाद कहा जाता है।
हल केवल माओवाद का ही क्यों ढूंढा जाये ?
हल तो हरेक वाद और हरेक विवाद का ढूंढा जाना चाहिये।
'भड़ास बिग्रेड' को बताना चाहिये कि वह कौन सी तकनीक या विधि है जिसकी वजह से

शासक वर्ग लोगों को उनका वाजिब हक़ अदा करने के लिये खुद को बाध्य महसूस करे?
और जनता जो मिले उस पर संतुष्ट हो जाये, फ़ालतू आंदोलन करके बवंडर खड़ा न करे ?
और सबसे बड़ी बात यह कि ‘वाजिब हक़‘ क्या है यह कौन तय करेगा ?
शासक या जनता ?
यह हक़ केवल ईश्वर अल्लाह का है लेकिन अगर आप उसका यह हक़ स्वीकार नहीं करते तो फिर आप यह काम अंजाम देकर दिखाएं। उसपर लोगों को संतुष्ट करके दिखाएं।

شمس शम्स Shams ने कहा…

अनवर जमाल साहब से संवाद हेतु बेहतर रहेगा कि एक पोस्ट लिखी जाए न कि टिप्पणी में बात संक्षिप्त करी जाए। भड़ास ब्रिगेड शब्द अच्छा सा लगा काफ़ी संगठित जताया जा रहा है इस शब्द के जामे को पहना कर हम चिरकुटों को :)
जय जय भड़ास

बकरे खस्सी करने वाले टोबाटेक सिंह ने कहा…

दैनिक ‘हरी-भरी भूमि‘ की ओर से दिव्या रानी जी
आज सुबह मेरे चंडूखाने पर तशरीफ लाईं। बिना किसी भूमिका के उन्होंने अपना परिचय देते ही क्वेश्चन दाग दिया- आप ब्लॉग जगत में क्यों चले आए ?


मैं भी तुरंत धीर गंभीर सा बनकर विचारवानों के एक्शन में बोला- मुझे मेरा फरज खींच लाया है यहां ।


व्हाट टाइप आफ़ ड्यूटी मैन ?- वह बोलीं।


देखिये मैं जो कुछ निकालता हूं वही निकालने मैं यहां भी आया हूं जी।


बट मैन, यहां कोई बकरा नहीं है।- उन्होंने कहा।


है क्यों नहीं जी, कई बकरे यहां घूम रहे हैं । - मैंने कहा
आप पहचानते हैं उन्हें ? अच्छी तरह से जी ।- मैंने जवाब
मैंने ठीक है आप नाम बताइये- वह बोलीं
उन्हें सारे नाम बता दिये तो वह बोलीं- इम्पॉसिबल , आल आफ़ देम आर ह्यूमन .

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

'भड़ास बिग्रेड' को बताना चाहिये कि वह कौन सी तकनीक या विधि है जिसकी वजह से
शासक वर्ग लोगों को उनका वाजिब हक़ अदा करने के लिये खुद को बाध्य महसूस करे?
और जनता जो मिले उस पर संतुष्ट हो जाये, फ़ालतू आंदोलन करके बवंडर खड़ा न करे ?
और सबसे बड़ी बात यह कि ‘वाजिब हक़‘ क्या है यह कौन तय करेगा ?
शासक या जनता ?

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

सही मुद्दे को उठाया, बेतुकी बातों को सेक्स से सनसनी बनाकर बेचने से बेहतर हो कि हमारी आम लोगों कि समस्या के निबटारे पर मौलिक लेख आये.
जय जय भड़ास

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