दूसरी वेबसाइट्स पर विचार विमर्श में भी कूटनीतियाँ अपनायी जाती हैं।

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

हमारे भाईसाहब डॉ।रूपेश जी अपने स्वभाव के कारण भोलेपन में एक व्यवसायी किस्म के बंदे के निमंत्रण पर उसकी वेबसाइट पर अपने विचार व्यक्त करने चले गये और वहाँ जो लिखा उसमें बनावट न हो कर साफ़ भड़ासी अंदाज कायम रखा और घूम फिर कर नतीजा पुराना ही निकला। उधर पर भी अधिकाँश वेबसाइट्स और सामुदायिक पत्राओं की तरह मुखौटाधारी पाखंडियों की भीड़ लगी थी जो कि भड़ास की दहाड़ से हिल गयी। कुछेक जो भड़ास को नहीं जानते थे वो नकली मुस्कराते दाँत निपोरते सामने आए लेकिन भाई के भड़ासाना स्टाइल से तुरंत अपनी जात-औकात पर आ कर उन्हें कोसने लगे। पिछली पोस्ट में ऐसे लोगों के लिये एक शब्द इस्तेमाल हुआ "वेश्या विलाप" जो कि इन धूर्तों के गरीबों के प्रति आँसुओं के लिये सटीक है।
अब मैं निजी तौर पर नजर रख रहा हूँ कि ये मीडिया क्लब क्या महापाखंडी अविनाश के मोहल्ले की तरह तो नहीं जिसे भड़ास पर कमाठीपुरा कहा गया था वैसे ही क्या मीडिया क्लब भी कहीं ऐसी ही एस्कॉर्ट एजेन्सी तो नहीं है?
जय जय भड़ास

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

दीनबंधु भाई आप सब जानते हैं कि इस तरह के लोगों की भरमार है जो कि जमाने से हमारे हितैषी होने का मुखौटा लगाए हमारे नेता बने बैठे हैं तो इनका असल चेहरा सामने लाने के लिये दूसरे मोहल्ले चला गया था ये घूमना फिरना तो हमारी यायावरी प्रवृत्ति का हिस्सा है
जय जय भड़ास

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