क्या टी20 चैम्पियन लीग फिक्स था ?

सोमवार, 27 सितंबर 2010


ये प्रश्न शायद कामनवेल्थ गेम, अयोध्या नक्सल और बिहार चुनाव में गम हो जाए मगर चौंकाने वाले परिणाम तो साफ़ इंगित करते हैं जो पुरे प्रतियोगिता को संदेह के घेर्रे में खड़े करते हैं.


मुनाफे और बाजार के लिए खेला जाने वाला खेल जिसमें एक एक खिलाडी तक बिका हुआ हो ( सम्बंधित टीम से ही ) और पुरे प्रतियोगिता का आयोजन मुनाफे के लिए हो रहा हो तो परिणाम अपने आप में गड़बड़ की और इंगित करते हैं. स्थानीय अफ्रीकी टीम वारिअर हो या भारतीय सुपर किंग फाइनल से पूर्व इनके संतोषजनक प्रदर्शन के बावजूद सर्वश्रेष्ठ नहीं रहा.

सेमीफाइनल के मुकाबले से ही संदेह का कीड़ा आने लगा जब बेंगलोर फिसड्डी की तरह हारी और पुरे प्रतियोगिता में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली रेडबैक को वारियर ने एकतरफा मुकाबले में हराया. इस से पूर्व रेडबैक और रोयल चैलेंजर किसी मुकाबले में एकतरफा नहीं हुए थे और इनकी हार ने ही शक को कुलबुलाना शुरू किया.

एक स्थानीय टीम और पुरे प्रतियोगिता के आयोजन में खर्चे का भार उठाने वाला भारतीय बाजार सो एक भारतीय टीम के फार्मूले पर इस प्रतियोगिता का समापन साफ़ इंगित करता है की मुनाफे के लिए आयोजित खेल के इस प्रतियोगिता में कहीं न कहीं खेल से ऊपर बाजार को रखा गया था.

2 टिप्पणियाँ:

Suresh Chiplunkar ने कहा…

क्रिकेट में तो अब कुछ भी हो सकता है… :)

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

मैं आज तक ये न समझ पाया कि क्या गोरों ने ये खेल झींगुर से प्रेरित होकर और बल्ले को चमगादड़ से प्रेरित होकर शुरू करा है? किसी भी देश की जनता को वैचारिक षंढ बनाना हो तो उसे मनोरंजन-प्रिय बना दीजिए, बीच बीच में इस खेल की खुराकें देते रहिये। खेल में कुछ भी करिये जनता झंड दिमाग की तरह कोई संदेह करे बिना खेल देखती रहेगी।
जय जय भड़ास

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