आनंद श्रीवास्तव लिखता है तो पुण्य और डॉ.रूपेश श्रीवास्तव लिख दें तो पाप हो जाता है....

बुधवार, 1 सितंबर 2010



हमारे डॉ.साहब रूपेश जी तो ठहरे यारों के यार बस इसी स्वभाव के चलते किसी ने अपनी वेबसाइट पर लिखने का आग्रह करा तो चल पड़े लेकिन ये न देखा कि वहाँ कैसे मक्कार, धूर्त और मुखौटेबाज बौद्धिक जुगाली करके खुद को शरीफ़ जताने वालों की भीड़ जुटी हुई है और वेबसाइट के संचालक को भला इससे क्या उसे तो विवाद से अधिक हिट्स मिल रहे हैं। अभी हालिया एक आलेख में इस साइट पर डॉ.साहब ने हरामखोर शब्द लिख जिस पर इन पाखंडियों ने रंडीरोना शुरू कर दिया कि अभद्र भाषा है वगैरह वगैरह जो कि ऐसे पाखंडी हमेशा करते हैं। इस पर भाईसाहब ने इस धूर्त और जाहिल नाटकबाज को हरामखोर का अर्थ बताया कि हलाल और हरामखोर के साथ शीरखोर जैसे भी शब्द हैं। भाई इतने भोले हैं कि इन कपटियों को समझा रहे हैं जबकि ये सिर्फ़ शरीफ़ होने का नाटक करने वाले लोग हैं। क्या इस पाखंडी आनंद श्रीवास्तव को पता है कि जूतखोर भी वैसा ही शब्द है जिसका मतलब हुआ जूता खाने वाला जो कि शायद ऐसे ही लोग हो सकते हैं।

इन्हीं जैसे बौद्धिक जुगाली करने वाले लोगों में ये श्याम जगोता नाम का कार्टूनिस्ट है जो इन्हीं मक्कारों के सुर में सुर मिला कर लिख रहा था कि भाईसाहब को अनदेखा कर दिया जाए। इस प्रलापी कार्टून को नहीं पता कि भड़ासी इन्हें तब तक पेले रहेंगे जब तक ये चिल्लाने न लगें। इनको लगता है कि चुप्पी साध कर ये नेता बने रहेंगे। अब मेरी बारी है पाखंडियों देखो कैसे ये भड़ासी तुम्हारे शराफ़त के मुखौटे उतार कर बेनकाब करता है।
जय जय भड़ास

3 टिप्पणियाँ:

फ़रहीन नाज़ ने कहा…

शम्स भाईसाहब सिर्फ़ मिलता जुलता सरनेम होने से कोई डॉ.रूपेश श्रीवास्तव नहीं बन जाता। आपको याद होगा कि ऐसे ही एक मक्कार संजय सेन सागर ने भी श्रीवास्तव सरनेम से एक फ़र्जी आई.डी. गढ कर डॉ.साहब के बराबर खड़ा होना चाहा था लेकिन जिधर असलियत नहीं है वो भड़ासियों के साथ कैसे खड़ा हो सकत है। आनंद हो या कोई और इनके अस्तित्त्व क्या हैं कितने ठोस हैं ये लोग ये तो पता चल ही रहा है। मुझे तो ये कार्टूनिस्ट भी एक नंबर का बनावटी व्यवहार वाला प्रतीत हो रहा है।
जय जय भड़ास

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

शम्स भाई किसी भी साइट पर जाइये वहाँ कोई न कोई ऐसे दो चार लोग मिल ही जाते हैं। आप अपना काम करिये वो अपना काम कर रहे हैं
जय जय भड़ास

अजय मोहन ने कहा…

पेलो और कस कर पेलो इन मुखौटाधारियों को लेकिन इतना बड़ा बना कर नहीं ये सब वो लोग हैं जिनकी हड्डियों में कैल्शियम फ़ास्फ़ेट नहीं होता बल्कि चूतियम सल्फ़ेट पाया जाता है जिसके कारण ये आजीवन लिबलिबे बने रहते हैं लेकिन खुद को इतना बड़ा बताते हैं कि शब्द कम पड़ जाते हैं
जय जय भड़ास

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