JUCS यदि रीढ़ की हड्डी बची हो तो उत्तर देना वरना मुँह काला करो

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

एक जैसी सोच वाले वो लोग जो ये सोचते हैं कि जितने ज्यादा पाइप लगाएंगे उतना अधिक चूस सकेंगे, सब एक जगह एकत्र होकर अपनी बौद्धिकता का पम्प चला देते हैं। ये कुटिल सोच के लोग लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलने का हर संभव प्रयास करते हैं इसके लिए ये लोकतंत्र के हर स्तम्भ में दीमक की तरह लगे रहते हैं और अपनी लार से लोकतंत्र के खम्भों को गलाने में लगे रहते हैं। ये हर जगह हैं कार्यपालिका, विधायिका, मीडिया और न्यायपालिका में भी घुसे हैं अब अगर कोई न्यायपालिका के खिलाफ़ असहमति जताए तो ये उसे कानूनन रौंद देने का कुचक्र शुरू कर देते हैं। पहले भड़ास के मंच पर इसी दीमक कुल की तरह लोकसंघर्ष के नाम से एक अति सयाना वकील रणधीर सिंह सुमन अपनी लार से लोकतंत्र को गलाने के लिये भड़ास पर अपनी बौद्धिकता की लार से इसे गलाने की कोशिश कर रहा था साथ में उसी की तरह उसके जैसा एक और था गुफ़रान सिद्दकी जो बहुत बड़ा लोकतांत्रिक नेता बनने का स्वांग रचाए अयोध्या में नेता बना बैठा था और साथ ही इस्लामिक कट्टरता की भी बात खुल कर कहता था लेकिन जब भड़ास पर मजबूर होकर किसे दौड़ाया तो जो भागा मुँह काला करके तो आज तक न आया।
ये दीमक इतने बड़े नाटकबाज़ होते हैं कि बार बार अलग मुखौटे में आकर खुद को नेता जताने की कोशिश करने लगते हैं और जनता इनके धोखे में आ भी जाती है कि ये तो अलग है जबकि मुखौटा अलग होता है सोच वही पुरानी लूटतंत्र में सबसे आगे रहने के लिये जुटे रहना। अब ये ही लोकतंत्र के दीमक अलग शक्ल में JUCS(
शाहनवाज आलम, विजय प्रताप, राजीव यादव, शाह आलम, ऋषि सिंह, अवनीश राय,

नीरज कुमार, गुफरान, फहीम, लारेब अकरम, रियाज अहमद, मिथलेश, फहद, शिवदास,
सैयद अली अख्तर, राकेश कुमार, फहद हसन, मो.आरिफ
,राघवेंद्र प्रताप सिंह, अरुण उरांव, विवके मिश्रा, देवाशीष प्रसून, अंशु माला सिंह, शालिनी बाजपेई, महेश यादव, संदीप दूबे, तारिक शफीक, नवीन कुमार, प्रबुद्ध गौतम, शिवदास, ओम नागर, हरेराम मिश्रा, मसीहुद्दीन संजरी, राकेश, रवि राव) बन कर आ गये हैं जो कि सोचते हैं कि भीड़ इकट्ठी कर लेने से ये जनता के हितैषी होने का छद्मतंत्र लागू कर देंगे।
ये कह रहे हैं कि "भगवा ब्रिगेड" के लोगों के ऊपर रासुका आदि से बड़े कानूनी पेंच लगाए जाएं क्योंकि ये काफ़ी नहीं है तो इन सब लोगों से बस एक सवाल कि क्या "इनका" भगवा विरोधी इस्लाम जब सीधे ही देश के लोकतंत्र को नकार देता है तो क्या हर उस मुसलमान पर जो कि कुरान को मानता है उस पर रासुका आदि जैसे कानून नहीं लगा देने चाहिए?????? इस्लाम पूरी तरह से लोकतंत्र की मुखालफ़त करता है ये सब जानते हैं। जो लोग इस कट्टर सोच का विरोध कर रहे हैं उन्हें ये दीमक चाट लेना चाहते हैं। मैं किसी भी तरह से किसी कट्टर विचार धारा का समर्थक नहीं हूँ जो लोकतंत्र की आत्मा को नुकसान पहुंचाए लेकिन ये लोग यदि अपनी कुटिलता के चलते हिंदू-मुसलमान-ईसाई-जैन आदि करके लोगों को भरमाते लड़ाते रहेंगे लेकिन मैं इनकी टाँग तोड़ कर बैठाने का काम जारी रखूंगा। आप सब देख सकते हैं कि छद्म मुस्लिम नेता जो कि इस गैंग में शामिल गुफ़रान को आप देख सकते हैं कि नए मुखौटे के साथ ये फिर आ गया है।
संजय कटारनवरे
मुंबई
जय भड़ास

5 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

काय हो कटारनवरे कुठे गेलते तुम्ही बरेच दिवसाने आले परत?आपले वकिल साहेब सुमन जी ने तुम्हाला ओळखला होता पण ते तुमची खरी ओलख द्यायला आलेच नाही। तुम्ही आले कि ते सर्व पळाले हे काय चाललय बाबानों पळवा पळवी.......???
जय जय भड़ास

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

जिस दिन हिन्दुओं ने अपने लिये वोट बैंक बनाकर प्रोजेक्ट कर दिया उसी दिन इन सब के हथियार कुन्द पड़ जायेंगे.... इन धर्मनिरपेक्षियों को ईरान-ईराक-मलेशिया-पाकिस्तान-बांग्लादेश नजर क्यों नहीं आते... इनकी धर्मनिरपेक्षता बस भारत और हिन्दुओं तक ही सीमित क्यों है.. इसलिये क्योंकि मुस्लिमों को धर्मनिरपेक्षता सिखाते ही वे इन्हें फिट कर देंगे...

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

क्या बात है, संजय जी ने गोले छोड़े. खूब सही धमाके.
भारतीय नागरीक भाई आपके नाम पर ही संदेह हो रहा है, सभ्यता और संस्कृति के लिए रामायण से लेकर महान सम्राट अशोक को फिर से पढ़ें संतुष्ट न हों तो हमारा संविधान पढ़ लें.
जय जय भड़ास

बेनामी ने कहा…

वाह क्या बम फोड़े है , इन धमाको की गूँज दूर तक जायेगी

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