बौद्धिक ठरकी जीत गए हम हिजड़ों को हरा कर खुश हैं......

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

सरकार की तरफ से लैंगिक विकलाँगता का जो मजाक बनाया जा सकता था वो असल में मजाक नहीं एक सोची समझी साजिश के तहत करा गया कमीनापन है। UIDAI कार्ड्स बनाए जाएंगे और भारत में वो हुआ जो मानव इतिहास के किसी दौर में नहीं हुआ। किसी भी धर्म के गृन्थ को उठा कर देख लीजिये तीसरा लिंग न तो कभी रहा है न हो सकता है लेकिन धूर्त, संस्कृति का नाश करने वाले, कमर के नीचे से सोचने वाले ठरकी बौद्धिकों ने गैर सरकारी संगठनों की फौज खड़ी करके पहले तो लैंगिक विकलाँगता को तीसरे लिंग के रूप में कानूनी मान्यता दिलाने में सफलता पायी। इसके बाद अब मतदान का लोभ दिखाकर पहचान के लिये तीसरा लिंग मान लिया है। कितने मक्कार और नीच हैं ये लोग कितनी आसानी से अपनी बातों को कानूनी जामा पहनाते जाते हैं। जो लोग चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति का सर्वनाश न हो वे इस बात पर ध्यान दें कि तीसरा लिंग होता ही नहीं है वरना इस कुत्सित विचार के कंधे पर सवार होकर ये धूर्त आगे क्या क्या करेंगे आप अंदाज़ भी नहीं लगा सकते। LGBT समूह बना कर ये लोग किस तरह खुला खेल चला रहे हैं आप सब देख कर भी खामोश हैं तो भुगतियेगा अपनी आने वाली पीढ़ियों के नाश होने के रूप में। लैंगिक विकलाँगता को तीसरा लिंग बनाए जाने के कुत्सित षडयंत्र सफल होता दिख रहा है अभी भी मौका है सम्हल जाइये।
जय जय भड़ास

2 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

दीदी,ये साजिश इतनी गहरी है कि इनसे पार पाना कठिन है। लेकिन क्या हम इन धूर्तों से हार कर बैठ जाएंगे?
हरगिज नहीं...
इनकी तो हम बजा कर रख देंगे। आपका कहना बिलकुल सही है।
जय जय भड़ास

बेनामी ने कहा…

लगे रहो , कभी न कभी जीत मिलेगी

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