गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

व्यंज़न पाग, रसोईया, पागड़ी। कभी-कभी बन जाय। बनने को तो 'खिचड़ी' भी मन से बन जाय तो सारे पकवान फीके पड़ जाएंगे। कभी-कभी खूबसूरत 'दुर्घटनाएं' डर भगाती हैं। लगता है कि जिंदगी उतनी 'बोझिल' नहीं जितनी हमें महसूस होती है। बस! तमन्ना जीने की होनी चाहिए। सच में ये कभी-कभी बन जाने वाली चीजें हैं, जो हमें रोज नयेपन का अहसास कराती हैं। व्यंजन तो ऐसे-ऐसे हैं कि होंठों को सूखने का इंतजार करना पड़े। लेकिन कभी-कभी यह व्यंज़न बहुत महत्वाकांक्षी भी बन जाता है। कैसे? चलिए हमारे संग...

थोड़ा फ्लैश बैक में चलते हैं। अंग्रेजों का जमाना है। हेलिकॉप्टर से कुछ अंग्रेज 'इंदिया' घूमने चले हैं। काफी दूर निकल गये, प्यास की वजह से गला सूख चला है। हेलिकॉप्टर में सवार अंग्रेज अधिकारी की 'प्रेयसी' कूक पड़ी। वातर-वातर। अधिकारी बोला-हेलिकॉप्टर को नीचे उतारो। एक गांव के पास थोड़ी, खाली-सपाट जमीन देखकर हेलिकॉप्टर उतार दिया गया। दूर-दूर तक छोटे-छोटे कच्चे, खपरैल के खूबसूरत मकान फैले हुए थे। सारे अंग्रेज हैरान-परेशान की, करें तो क्या करें? तभी कुछ चरवाहे अपनी गायों को लेकर उधर से गुज़रे। अंग्रेजों ने उन्हें रोका और बोलने लगे। वातर-वातर। चरवाहों का अंग्रेजों व अंग्रेजी से यह पहला मिलन था। उन्हें बस इतना ही पता था कि ऐसे रंग-रुप और वेश-भूषा वाले ही देश चला रहे हैं। वातर-वातर की आवाज अब तेज होने लगी थी। चरवाहे समझ ही नहीं पा रहे थे कि वे क्या मांग रहे हैं? फिर एक को कुछ सूझा। वह साथ में लिए लोटे में गाय का दूध निकाल लाया। संभवत: वह अंग्रेज की प्रेयसी के इशारे को गंभीरता से समझ चुका था। उसे लगा कि मुंह के पास हाथ ले जाकर इन्हें दूध पीने की इच्छा हुई होगी। गायों को देखा तो इन्होंने रोक लिया है और ये दूध पीने को मांग रहे हैं। प्रेयसी ने झटपट लोटा लिया और पीने लगी। पानी न सही दूध की तरलता से ही गला तर कर लिया जाय, ऐसा सोचकर सभी अंग्रेजों ने बारी-बारी गाय का दूध पिया और अपनी तृप्ति की। यहां व्यंजन, पानी, जीवन-मरण का प्रश्न गया था। हेलिकॉप्टर में ईंधन तो था, लेकिन पानी नहीं था। जिससे आदमी की प्यास बुझायी जा सके। यह व्यंजन की महत्वाकांक्षा ही थी, जिसने नयी कहानी लिखी, ताज़ी और करारी। व्यंज़न की व्याकुलता जब विद्रोह पर आती है, तब भी इसकी महत्वाकांक्षा का पता चलता है। बॉलीवुड की फिल्में बताती हैं कि एक रोटी के लिए कैसे एक बच्चा गुनाह के रास्ते पर चल निकलता है। क्योंकि जब भूख लगती है तो कस कर लगती है। फिर, व्यंज़नाएं, ईष्या, कटुता थोड़ी देर के लिए ही सही छू-मंतर हो जाती हैं। तब कोई प्रकार, चाहे दाल-चावल, रोटी-सब्जी, खीर-पनीर, मसाला डोसा, रवा मसाला , उत्तपम, उपमा, चिली-चिकन, तंदूरी-पनीर, छोले-भटूरे, पाव भाजी, नूडल्स, सूडल्स, सूप, सलाद, दही, कचौड़ी, समोसा पकौडी, सैंडविच, पिज्ज़ा, बर्गर, सर्गर, क्रेजी कबाब, मुगलाई, चाइनीज़, कॉन्टिनेंटल, इंडियन, ए-फूड, बी-फूड, सी-फूड, फास्ट फूड, इटैलियन, मेक्सिकन, अमेरिकन, ब्रिटीश, चिलीज़, क्यूबियन, लिलिज, पीपलीज़, इत्यादि, इत्यादि, इत्यादि, जो भी मिलेगा आदमी खाने से परहेज़ नहीं करता। उस वक्त धर्म, कर्म, मर्म, सब कुछ परे होता है। पेट में भूख, हृदय में खाने की आस और सामने का भोजन। न सिर्फ व्यंज़न की महत्वाकांक्षा बताता है, बल्कि हमें सीख भी देता है कि पेट की आग सबसे ज्वलनशील आग है। क्योंकि इसमें हमारे सभी आदर, सम्मान, अभिमान, अपमान भष्म हो जाते हैं। जो किसी और आग से प्राय: जलाये नहीं जा सकते।देश में जनगणना चल रही है। सब कुछ गिना जा रहा है। लेकिन सरकार को एक कॉलम जरुर बनाना चाहिए। वह कॉलम होगा। एक, भूख महसूस करने वालों का दूसरा, भूख महसूस न करने वालों का। यही सबसे सटीक आंकड़ा होगा, हर विकास की नीति बनाने वाले नेताजी लोगों के लिए। क्योंकि भूख, जाति-पाति, उंच-नीच, अमीर-गरीब को देखकर नहीं लगती। इसलिए जाति वगैरह के स्थान पर यही दो कॉलम बढ़ा दिए जायं तो समस्या कुछ हद तक सुलझ सकती है। इसके पक्ष में दो तर्क दिए जा सकते हैं, पहला यह कि जिसके पास, अपना घर, मकान, जमीन-जायदाद, नौकरी, व्यवसाय है, वे प्राय: भूख महसूस नहीं करते, क्योंकि समय से भोजन व नाश्ते, यहां तक की पार्टी का भी इंतज़ाम हो ही जाता है। हां कभी-कभार अतिव्यस्तता के चलते ये स्वंय भोजन तक न पहुंच पाएं तो बात अलग है। जितने भी हैं। अभी गिनती तो नहीं हुई है, लेकिन हो जाय तो बेहतर होगा। क्योंकि हमेशा भूख महसूस करने वाले, महंगाई की रफ्तार से बढ़ते जा रहे हैं। इसी देश के हैं, यदि ऐसे लोगों की गणना ठीक तरह से हो जाय तो सारा आरक्षण वगैरह रद्ïद करके सिर्फ इन्हें दिया जाय। जिससे ये देशवासी भी जल्द से जल्द भूख महसूस न करने वालों की कैटेगरी में आ जायं। सवाल सीधा सा है? लेकिन राजनीति नाम का भी एक व्यंज़न है, जिसको पकाने की कला आनी चाहिए। इस व्यंज़न की महत्वाकांक्षाएं भी बहुत बड़ी है। जिस हांड़ी में दलिया न बनती हो, उसमें भी राजनीति का व्यंज़न पकाया जा सकता है। जिस बात से लोगों को कुछ न मिलता हो, उस बात से भी राजनीति का व्यंज़न तैयार हो सकता है। बशर्ते, आपको राजनीति को सही आंच पर सही समय तक पकाने की कला सीखनी पड़ेगी। देश में गुरुओं की कमी नहीं है। बस सही चेले नहीं मिल रहे। हाल ही में एक सर्वेक्षण आया जिसमें यह पाया गया कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा 'गुरुÓ इंडिया में पाये जाते हैं। नाम गिनाने चलूंगा तो यह सफर उपन्यास में तब्दील हो जाएगा। कॉमन सेंस की बात यह है कि ये सभी 'गुरुÓ व्यंज़न पकाने में महारत रखते हैं। अब शायद आप व्यंज़न की महत्वाकांक्षा को भली-भांति समझ रहे होंगे। हर सफर की शुरुआत व्यंजन से होती है और शायद अंत भी व्यंज़न घटते रहने से...। व्यंजन बनाने चला था, लेकिन 'खिचड़ीÓ बन गयी। चखिएगा जरुर हूजूर... मनोज द्विवेदी

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।

कवि धूमिल इस सवाल को करते करते चले गये आजतक अनुत्तरित है
जय जय भड़ास

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