लमुहा ...

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

लमुहा एक स्थान जिससे मुझे काफी लगाव है .मेरे ननिहाल में एक तालाब है जिसे सभी लमुहा के नाम से जानते है .बचपन में यही पर छठ  माता की घाट बनती थी और सभी बच्चे वहां की साफ़ सफाई करते थे .छठ पर्व की रात को हम मिटटी की बनी ढकनी में दिया रख कर लमुहा में तैराते थे फिर उसे  धान की पुआल पर रख कर लमुहा के बीच ले जाने का  प्रयास करते थे . सच बहुत मज़ा आता था.मै एक अच्छा तैराक भी था .कई बार मैंने लामुहा को आर पार भी किया था .सब बच्चे मेरा लोहा मानते थे .अभी कुछ दिन पहले उस स्थान को देख कर वो दिन याद आ गए .लमुहा एक ऐसी जगह है जहाँ से मेरे बचपन की यादें जुडी है.
आज लमुहा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है ....चारो तरफ गन्दगी ही गन्दगी ...मछलियों का जीना दूभर हो गया है ...और चारो ओर से कब्ज़ा करने वाले कोई मौका नहीं छोड़ रहे ...साफ़ सफाई का भी बुरा हाल है ...उसका आयतन भी छोटा होता जा रहा है...कुछ सालों में वह हमसे विदा ले लेगा और  फिर वहां पर पक्के कंक्रीट के घर नज़र आयेंगे .....बेचारा!... उसे भी लोगों ने नहीं छोड़ा .

1 टिप्पणियाँ:

मुनव्वर सुल्ताना ने कहा…

बचपन से जुड़ी कई बातें ऐसे ही समय की गर्द के नीचे दफ़न होती जाती हैं। मार्क भाई जैसे आपको बचपन और तालाब याद आया वैसे ही मुझे मुंबई में आर.के.स्टूडियो याद आता है जिसके अंदर खेलते मेरा बचपन बीता था।

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