डा.दिव्या श्रीवास्तव जी चलिये माफ़ी के साथ लोहे से ज़ंग हटा लेता हूं लेकिन उत्तर अवश्य दीजिये

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

आज कुछ दिन बाद तक इंटरनेट पर न आ सकने के कारण दिव्या जी की प्रतिक्रिया से वंचित रहा। दिव्या जी ने जो भी आपत्ति दर्ज़ कराई है वो इस बात पर है कि उन्हें लौह महिला स्वीकारने पर भी मैंने ये क्यों लिखा कि वैचारिक लोहे पर ज़ंग लग गया है। उन्होंने माफ़ी की भी बात सशर्त रखी है कि वे तभी आगे आएंगी तो मैं बिना किसी शर्त के माफ़ी मांग लेता हूं मेरे शब्द कड़े अवश्य हैं लेकिन मैं कभी भी आप दोनो भाई बहन के रिश्ते के बीच नहीं आना चाहता क्योंकि मेरे लिये भी डा.रूपेश श्रीवास्तव उतने ही आदरणीय हैं जितने कि किसी भी भड़ासी के लिये होंगे। वे आपको बहन स्वीकारते हैं तो आप मेरे लिये भी सम्माननीय हैं लेकिन ये बात अब भी वैचारिक विमर्श के उसी स्तर पर रुक कर आपके उत्तर की प्रतीक्षा करेगी। आप निःसंदेह डा.रूपेश श्रीवास्तव की बहन हैं लेकिन मैं उनका "एकलव्य-शिष्य" हूं और इसी लिये मैंने ये सवाल करा था कि वे आपके ऐसे विचारों पर भी आपको बहन कैसे स्वीकारे हुए हैं। उनका दिल बड़ा है वे तो मनीषा दीदी से लेकर आएशा धनानी तक सभी को अपने दिल में वात्सल्य के स्थान पर रखे हैं सवाल उनसे भी था उन्होंने अपना उत्तर टिप्पणी में दे दिया है उनसे प्रश्न समाप्त हो गया।
क्या अब आप निशाप्रिया भाटिया या ऐसी किसी भी शख्सियत के बारे में वही विचार रखती हैं? क्या आप भड़ास पर हमेशा विमर्श में बने रहने वाले जस्टिस आनंद सिंह से परिचित नहीं हैं या जुडीशियरी पर कुछ लिखने में हिचकिचाती हैं? दूसरी ओर आपके भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव तो चीफ़ जस्टिस औफ़ इंडिया के विचारों से भी असहमत होने पर अत्यंत कड़े शब्दों में तन्कीद करते हैं। समाज और राष्ट्र जिस विधि से चले वह ही तो देश का कानून है दिव्या जी जब तक इसमें सुधार न हो आप लाख लिखाई करें कुछ नहीं बदलने वाला, विधि ही सुधार की दरकार रखती है आज के समय में। समाज के विचारकों ने विधि और संविधान निर्धारित करा लेकिन जब हम समाज को सुधारने की बात करते हैं तो सहज ही पता चलता है कि जो दोषपूर्ण है उसे ही सुधारा जाना अपेक्षित है तो फिर विधि में भी तो सुधार की आवश्यकता हुई न क्योंकि वह भी तो समाजोद्भूत है।
निशाप्रिया भाटिया कोई सामान्य घूंघट निकाले हुए चूल्हा-चौका करने वाली स्त्री नहीं हैं यदि वे असंयमित हुई हैं या जस्टिस आनंद सिंह इसी सिस्टम से प्रताड़ित होते आ रहे हैं तो आप कौन कौन से कारगर उपाय, सुझाव, तरीके, सलाहें इस मंच पर देने वाली हैं जिनसे कि आततायी सिस्टम के पोषक जज, माफ़िया, ब्यूरोक्रेट्स, राजनेता आदि अपने बाल नोच लें और कपड़े फाड़ कर पागल हो जाएं।
आपने जो माफ़ी की शर्त लिखी थी वह मैंने सहज भाव से पूरी कर दी है क्योंकि मैं विमर्श चाहता हूं व्यर्थ का प्रलाप नहीं जैसे कि मैंने जब रणधीर सिंह सुमन जी और गुफ़रान सिद्दिकी जी को भड़ास पर आमंत्रित करना शुरू करा तो वे भाग लिये। आप पधारें या अपने ब्लाग पर लिखें मैं आपके ब्लाग और विचारों का इसी तरह प्रचार-प्रसार करता रहूंगा ; वादा है कि न सिर्फ़ आनलाइन बल्कि आफ़लाइन भी।
सादर
जय भड़ास
संजय कटारनवरे
मुंबई

5 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

:)
बघा पुढे काय होतय
गप्प किंवा गप्पा...
जय जय भड़ास

ZEAL ने कहा…

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संजय जी ,

आपने माफ़ी मांग ली है तो हमने भी आपको माफ़ कर दिया । लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूँ आपको निशाप्रिया भाटिया से सहनुभूति ज़रूर होगी , लेकिन आपके दिल में स्त्रियों के लिए सम्मान नहीं है । आपके संवाद का अंदाज़ ललकार भरा और अपमानजनक है ।

जब मेरे ब्लौग पर विमर्श होता है तो आप कभी अपने विचार नहीं प्रस्तुत करते । फिर आपको मुझसे इतनी अपेक्षाएं क्यूँ हैं की मैं आपके लेख पर आकर विमर्श करुँगी । आपकी तरह , हर दूसरा व्यक्ति मुझे ललकारकर विमर्श के लिए बुलाएगा तो मैं हरेक से विमर्श तो नहीं कर सकती ।

जिन लोगों के ह्रदय में स्त्री के लिए सम्मान नहीं है , उनसे बात करने की धृष्टता मैं नहीं कर सकती । जब कोई मुझे शुतुरमुर्ग, जंग लगा लोहा और , माटी का माधव , लोहारिन आदि नामों से संबोधित करता है तो आपको बुरा नहीं लगता , क्यूंकि मैं आपकी कुछ नहीं लगती । एक बार मित्रवत होकर देखिये । बहुत से अनुत्तरित प्रश्न आपको स्वयं ही मिल जायेंगे ।

आप लोग बड़े लोग हैं , मैं आपके आगे , स्वयं को बहुत छोटा पाती हूँ , इसलिए विमर्श नहीं कर सकती । आपके भड़ास ब्लॉग पर विद्वानों की कोई कमी नहीं है । आप उन्हीं के साथ बौद्धिक चर्चा कर सकते हैं ।

आभार ।

.

मुनेन्द्र सोनी ने कहा…

हा हा हा...
और भी ज्यादा हा हा हा...
दिव्या बहन जी ने कितना बड़ा चुटकुला छोड़ा है कि भड़ास पर बौद्धिक और विद्वान लोग मौजूद हैं। बहन जी भड़ासी तो घोषित बुरे,गंवार,अड़ियल,सड़ियल,अनपढ़,जिद्दी,बेवकूफ़,महामूर्ख किस्म के लोग हैं जो कि कदापि बौद्धिक नहीं हैं और आपके बड़े भाई यानि हमारे गुरूजी डा.रूपेश श्रीवास्तव हम सबके सरदार हैं :)
जय जय भड़ास

ZEAL ने कहा…

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मुनेन्द्र जी ,

क्या करूँ ? डरती हूँ कुछ लोगों से , जो बिना वजह अपमानित करते हैं । अरविन्द मिश्र , अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी और मिथिलेश दूबे जैसे लोग अनायास ही पीछे पड़े हैं । अब संजय जी भी नाराज़ हैं । नहीं जानती लोग जबरदस्ती दुश्मनी क्यूँ कर लेते हैं ।

मुझे तो ये सभी बुद्धिजीवी ही लगते हैं । मैं ही अनपढ़ , गंवार हूँ । शायद इससे इनका पुरुष-दर्प कुछ कम हो जाए।

.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

@ अरविन्द मिश्र , अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी और मिथिलेश दूबे जैसे लोग अनायास ही पीछे पड़े हैं ।.....
&
....शायद इससे इनका पुरुष-दर्प कुछ कम हो जाए।

nirdosh hone par bhi yadi kisi ke khilaph aap anaf-sanaf bakati rahen, to wah bhi majboor ho jataa hai, nafarat karane layak hee hain aap, mujhe shauk to nahin hai !!

aapake kiye dhare ki ek jhalak yah hai jahan aap aaj bhee apane jhooth ko logon tak link de de kar failaa rahi hai, mitane ka naatak karne ke baad
https://profiles.google.com/zealzen8/posts/3Wzdp9qAziM

PAR TUMHARE JHOOTH-PAAP KAA GHADAA FUTEGA EK DIN , AWASHY !!

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