प्रवीण शाह साहब, आपका भ्रम निवारण हो गया इसके लिये राहत की सांसे ले रहा हूं।

रविवार, 15 मई 2011

प्रवीण शाह साहब, आपका भ्रम निवारण हो गया इसके लिये राहत की सांसे ले रहा हूं। कौन सी दो पोस्ट्स हैं जिनका आप जिक्र कर रहे हैं?ठीक ऐसी ही बात भाई अमित जैन ने लिखी थी कि उनकी पोस्ट और अनूप मंडल का कमेंट संचालकों ने हटा दिया है जिस पर आपने तो भड़ास का संचालन "हैक" तक होने का संदेह व्यक्त करा था। पुनः स्पष्ट कर रहा हूं कि भाई रजनीश के.झा और मेरे अलावा भड़ास का कोई तीसरा संचालक नहीं है और न ही हमारे एकाउंट्स में सेंधमारी हुई है। मैं आपको और अमित जैन जी दोनो को कहता हूं कि यदि कोई पोस्ट न प्रकाशित हुई हो तो दोबारा, तिबारा, चौबारा.... सौबारा भेज दें मंच आपका है कोई क्या कर लेगा ज्यादा से ज्यादा ये होगा कि आप खुद ही अपनी पोस्ट दस बार प्रकाशित हुई देख कर स्वयं अपने एकाउंट से उसे डिलीट कर देंगे(समय होगा तब अन्यथा नहीं)
अब जब भ्रमों के निराकरण का दौर चल ही रहा है तो संचालकों को आरोपों से मुक्त कर दें। मैने आपको जो तकनीकी बारीकियां दिखाई(सिखाई) हैं उम्मीद है कि उससे आपको समझ में आ गया होगा कि भड़ास का संचालन दोनो हाथों में अंगारे लेकर शांत बैठने जैसा ही है। हम तो चीख-चिल्ला भी नहीं सकते। तर्क वगैरह करके जब लोगों को रगेदना भी चाहूं तो आरोप लगने लगते हैं कि बंदे ने जो लिखा उसे डिलीट कर दिया या संपादित कर दिया। भड़ास का दर्शन जिस दिन आप समझ लेंगे या शुरूआती पोस्ट्स पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि हम भड़ास को किस कत्लगाह से निकाल कर लाए हैं दोबारा प्राण डाले और अब पुनर्जन्म पर भड़ास कितने सशक्त रूप में आपके सामने हैं,एक ऐतिहासिक वैचारिक युद्ध का दर्ज़ा देता हूं मै इस पूरे प्रकरण को जिससे आप शायद अन्जान हैं।
भड़ास मात्र आनलाइन किचिर-किचिर नहीं करता, समस्याओं का रोना नहीं रोता, भ्रष्टाचार पर टसुए नहीं बहाता बल्कि समाधान प्रस्तुत करवा कर उसे अमल में लाने की जद्दोज़हद भी करता है। हम समस्याओं का रोना रोने वाले बौद्धिक मनोरोगी नहीं हैं जो कि अपने वातानुकूलित कमरों में लैपटाप पर अपनी राय देते हैं और सोचते हैं कि पिकनिक मनाने की तरह किसी मुद्दे पर जाकर मोमबत्ती जला देने से क्रान्ति आ जाएगी। हम खेतों की मेड़ों पर पसीना बहा कर उन थके हुए किसानों की आवाज हैं जिनकी फसल को सरकार शराब बनाने में इस्तेमाल करना चाहती है, उन नौजवानों की आवाज़ हैं जो सूचना प्राप्ति के लिये अपनी जान दे देते हैं और हासिल क्या होता है सिवाय एक स्वस्थ देश का सपना, उन महिलाओं की आवाज़ हैं जो कि बैडरूम से लेकर कार्यालय तक अपने पीछे पसीने की गंध को मेक अप के पीछे दबाने की नाकाम कोशिश करती सारी जिंदगी बिताए दे रही हैं, उनकी आवाज़ हैं जो न स्त्री हैं न ही पुरुष............. भड़ास हर वो आवाज़ को मंच प्रदान करने के लिये कटिबद्ध है जिसे हाशिए से भी परे धकेल दिया गया है।
यदि हमारी सोच इतनी स्वतंत्र लोकतांत्रिक न होती तो आप इस समय भड़ास पर न लिख कर कहीं और लिख रहे होते जैसे कि लाखों अन्य ब्लाग हैं जिन्हें मात्र उनके लेखक ही दिन में पचास-सौ बार देख कर खुश हो लेते हैं ज्यादा हुआ तो खुद ही बेनामी कमेंट लिख लिया करते हैं।
जय जय भड़ास

3 टिप्पणियाँ:

बेनामी ने कहा…

matlab duniya me bus bhadas hi rah gaya ,baki sab gaye teel len .......:)))

شمس शम्स Shams ने कहा…

@Anonymous
साफ़ सी बात है डा.साहब जब कि ये दोनो प्रवीण शाह और अमित जैन भड़ास के सदस्य बन चुके हैं तो बस साइन-इन करके बेनामी कमेंट कर सकते हैं। आप इस चूतियापे की कितनी बार बखिया उधेड़ चुके हैं लेकिन ये गधे इस हरकत से बाज़ ही नहीं आते संजय कटारनवरे इसीलिये इन्हें महागधा लिखते हैं।
अरे अक्ल के अंधों भड़ास पर बेनामी कमेंट बिना संचालक की अनुमति के नहीं प्रकाशित होते या फिर सदस्य खुद ही ऐसा करने के लिये तकनीकी अधिकार रखते हैं।
हां...हां...हां सिर्फ़ और सिर्फ़ भड़ास ही रह गया है। ये बाकी तील लेने क्यों जा रहे हैं। अरे ढक्कन कम से कम अपने गूगल बाबा का गू गला कर हिंदी सही नहीं लिख पाता तो अंग्रेजी तो सही लिख।

प्रवीण शाह ने कहा…

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@ डॉ० साहब,

आप जब लिख रहे हैं कि "कौन सी दो पोस्ट्स हैं जिनका आप जिक्र कर रहे हैं?"... तब मैं अचंभित हो उठता हूँ कि यह किस तरह का स्मृतिलोप हो रहा है आपको... हुआ यह था कि ब्लॉगर की मेन्टेनेन्स के दौरान अचानक मैंने पाया कि मेरी भड़ास में लिखी सभी पोस्टों के नीचे प्रस्तुतकर्ता "शैतान" लिखा आ रहा था... मैंने तुरंत पोस्ट लगाई ' संचालक बतायें कि यह क्या हो रहा है अब '... आप की बहुत ही उग्र प्रतिक्रिया आई थी उस पर... जिसमें मुझ को किसी यशवंत सिंह की तरह ही भड़ास के दर्शन से रगेड़ने की तक बात की गई थी... फिर उस प्रतिक्रिया को विस्तार देते हुऐ आपकी एक पोस्ट आई... अब आपके लिखे को देख लग रहा है कि आप इस पूरे मामले से अनजान हैं... ऐसा कैसे हो रहा है, कुछ समझाइये मुझे भी...




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