चलो तुम्हारे ही विमर्श को आगे बढ़ाते हैं मित्र अनोप मंडल !

शनिवार, 21 मई 2011

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मित्र अनोप मंडल मुझे कहता है :-

"हम प्राणप्रण से से तुम्हारे दानवीय स्वप्न "जयति जिन शासनम" को पूरा होने से रोकने में अवश्य सफल होंगे।"

मैं भले ही लाख कहूँ कि मैं जैन नहीं, परंतु अनोप को इससे क्या... वह तो बार-बार इसी बात को रटता रहेगा... शायद इसीलिये वह अनोप मंडल है आज... :)

बहरहाल उसका बार बार जैन धर्म के उपासकों को जिन्नों के उपासक कहना मुझे जैन धर्म के बारे में कुछ जानने की ओर ले गया... 

यहाँ ब्लॉग एग्रीगेटर 'रफ्तार' पर... मैंने लिखा पाया ... (रफ्तार को साभार )...

पुराने समय में तप और मेहनत से ज्ञान प्राप्त करने वालों को श्रमण कहा जाता था। जैन धर्म प्राचीन भारतीय श्रमण परम्परा से ही निकला धर्म है। ऐसे भिक्षु या साधु, जो जैन धर्म के पांच महाव्रतों का पालन करते हों, को ‘जिन’ कहा गया। हिंसा, झूठ, चोरी, ब्रह्मचर्य और सांसारिक चीजों से दूर रहना इन महाव्रतों में शामिल हैं। जैन धर्म के तीर्थंकरों ने अपने मन, अपनी वाणी और काया को जीत लिया था। ‘जिन’ के अनुयायियों को जैन कहा गया है। यह धर्म अनुयायियों को सिखाता है कि वे सत्य पर टिकें, प्रेम करें, हिंसा से दूर रहें, दया-करूणा का भाव रखें, परोपकारी बनें और भोग-विलास से दूर रहकर हर काम पवित्र और सात्विक ढंग से करें। मान्यता है कि जैन पंथ का मूल उन पुरानी परम्पराओं में रहा होगा, जो इस देश में आर्यों के आने से पहले प्रचलित थीं। यदि आर्यों के आने के बाद से भी देखें तो ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परम्परा वेदों तक पहुंचती है। महाभारत के समय इस पंथ के तीर्थंकर नेमिनाथ थे। ई।पू। आठवीं सदी में 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए। उनके बाद महावीर और बुद्ध के समय में संप्रदाय बंट गया। कुछ बौद्ध तो कुछ जैन हो गए। जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर वर्धमान हुए। उन्होंने जैन धर्म को काफी मजबूत किया। इस वक्त जैन धर्म के दो दल हैं। एक श्वेतांबर मुनि (सफेद कपड़े धारण करने वाले) तो दूसरे दिंगबर (बिना कपड़े धारण किए रहने वाले) मुनि।
Source: Raftaar Live
 



स्पष्ट है कि जैन धर्म सनातन भारतीय परंपरा से निकला हुआ धर्म है...
जबकि अनोप मंडल द्वारा बताये गये जिन्न एक अरबी-इस्लामी-मुस्लिम अवधारणा है...



अब क्या कहोगे मित्र अनोप... तुम्हारा तो इतिहास-दर्शन-जुगराफिया सब कुछ उलट-पुलट हो चुका है... इसिलिये तुम आज कह रहे हो "अंग्रेज के समय जो गुहार तुम्हारे मायाजाल से छुटकारा दिलाने की लगाई गयी थी वह अब कहीं जाकर रंग ला रही है"... अंग्रेज कौम ने भले ही बहुत गल्तियाँ की परंतु मूर्खो और सरफिरों को भाव देने की गलती कभी नहीं की... इसीलिये तुम्हारी वह गुहार लगाती अर्जी अभी भी पेंडिंग है..

अपनी समझदानी का पहले इलाज करा लो फिर किसी विमर्श की बातें करना !



3 टिप्पणियाँ:

मुनव्वर सुल्ताना Munawwar Sultana منور سلطانہ ने कहा…

प्रवीण शाह जी सही जिसे आप जिन्न लिख रहे हैं जिसे इस्लाम या अन्य सेमिटिक धार्मिक मान्यताओं में ईश्वर रचित मानवों से अधिक श्रेष्ठतर रचना स्वीकारा गया है आप अपनी जानकारी को पुनः टटोलिये वह उर्दू, अरबी, फ़ारसी, ईरानी आदि में "जिन" ही है न कि जिन्न। हिंदी में इसी शब्द को कई लोग बोली के तौर पर जिन्द भी कहते हैं जो कि पंजाबी में भी <>जिंदयानि आत्मा के भाव में प्रयुक्त होने वाला शब्द है अब अनूप मंडल के लोग क्या कहते हैं वो उनका विषय है।
आपसे एक निजी सवाल कि क्या आप इस श्रमण परम्परा से उपजे इस धर्म से सहमत हैं?ताकि आप महानुभावों के इस विचार विमर्श में मैं भी मुंह मार सकूं।
काले जादू के अस्तित्त्व पर विमर्श विचलित होकर अब जैन धर्म पर आ गया साथ ही संचालकों पर जितने आरोप लगे उन्हें बस संदिग्धावस्था में डाल कर विस्मृत कर दिया जाए ये उचित नहीं कि ब्लागर की गड़बड़ी के दौरान आपने जो स्क्रीन शाट लिये वे सही थे आपके द्वारा "कुक्ड" नहीं जबकि मनीषा दीदी ने इस विषय पर तार्किक बात करी तो आपने तो बस ये कह दिया कि मैं सच्चा हूं, ये कोई तर्क न हुआ,दीदी ने तो पूरी दुनिया के सामने बता दिया कि आपके ये ट्रिक कैसे करी है। कृपया समुचित स्पष्टीकरण दें क्योंकि आपका आरोप सीधे संचालकों को संदेह के घेरे में लाता है।
जय जय भड़ास

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

प्रवीण शाह जी यदि तर्क की बात करी जाए तो मुनव्वर आपा ने जो कहा उससे मेरी राय भिन्न नहीं है आप और अमित जैन पपीते में से निकले तंत्र मंत्र के सामान पर हो रही काले जादू की चर्चा को आप लोगों ने हम उन तमाम लोगों को अंधविश्वासी कह कर टरका दिया। अब अनूप मंडल को तर्क के तौर पर आप वो दिखा रहे हैं जो कि सारी दुनिया देख सकती है। आपने अपने तार्किकता पूर्ण होने की बात के समर्थन में अब तक ये नहीं बताया कि पूरे प्रकरण की जांच कैसे करवाना चाहते हैं या बस आप सही हैं हम गलत इतना कह देना ही तर्क होता है?आपने किस यूनिवर्सिटी में तर्कशास्त्र पढ़ा था मैंने झांसी महारानी लक्ष्मीबाई विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र पढ़ा जिसमें एक उपविषय तर्कशास्त्र भी था। बखूबी जानता हूं कि बेनामी गालियां लिखने वाले भी अपनी तर्कक्षमता नहीं बल्कि बेचारगी और खिसियाहट ही दिखा रहे हैं। बेचारे चिरकुटई करते बेनामी गालियां लिख सकते हैं इससे ज्यादा कुछ करने के चक्कर में अगर कभी हाथ आ गए तो मैं खुद पटक-पटक कर मारूंगा अजय भाई तो बाद में आएंगे। सुअर और गदहिया का वर्णसंकर आयशा और मुझे गाली दे रहा है। उसे मेरे बारे में सचमुच पता नहीं है कि मै आफ़लाइन जिन्दगी में भी भड़ास को हरपल जीता हूं। मुझे शराफत की बीमारी नहीं है कि कोई मेरी धर्मपुत्री को गाली दे और मैं चुप रह जाऊं सिर्फ़ इसलिये कि मैं पढ़ालिखा हूं।
जय जय भड़ास

अनोप मंडल ने कहा…

आदरणीय मुनव्वर आपा आप देख रही हैं कि प्रकरण को इन राक्षसों ने कैसे कुटिलता से पीछे धकेलने का यत्न करा है। इस धूर्त के साइंटिस्ट अब तक प्रकरण की जांच के लिये मुंबई न आए। न ही इसने अब तक बताया कि ये प्रकरण की जांच कैसे करेगा और सिद्ध करेगा कि आप सब मूर्ख हैं और ये विद्वान। खुद को ये मक्कार तार्किक बता कर ईश्वर को नकार देना ही सबसे बड़ा तर्क समझता है। ब्रह्म और श्रम में अंतर में उलझा कर ये राक्षस अपने आपको ब्राह्मण और श्रमण परम्परा में छिपाए हुए हैं। इसके तर्क क्या हैं ये तो आप सब देख चुके हैं कि मैं सच्चा हूं बस इतना तर्क देता है। ये राक्षस जानते हैं कि अंग्रेजों के समय प्रयास कर रहे हैं और अब कहीं जा कर ऐसा मौका बना है कि हमारी बात सुनी जा सके। आओ गालियां देते अपनी सही पहचान दिखाते।
जय जय भडास
जय नकलंक देव

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