राजस्थानी पर रार

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

शिरीष खरे

बीते दिनों अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति ने राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को एक ज्ञापन सौंपा और उसके बाद 28 राज्यों के अप्रवासी राजस्थानियों को एक सू़त्र में जोड़कर पूरे आंदोलन को देशव्यापी बनाने का फैसला लिया. संघर्ष समिति के प्रदेश मंत्री सत्यनारायण सोनी ने तहलका को बताया कि 25 अगस्त को राजस्थानी भाषा दिवस मनाया जाएगा जिसमें गांव-गांव से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोग जमा होंगे. उन्होंने कहा कि राजस्थानी विधानसभा में संकल्प लिए आठ वर्ष हो गए लेकिन राजस्थानी को अब भी आठवीं अनुसूची में शामिल होने का इंतजार है. अगर इसे मानसून सत्र में नहीं लाया गया तो दिल्ली में आमरण अनशन शुरू हो जाएगा.
दूसरी तरफ राजस्थानी भाषा के विरोध में गठित राजस्थानी भाषा संकल्प विरोधी समिति के केंद्रीय महामंत्री राजेन्द्र अग्रवाल ने आरोप लगाया कि 11वीं विधानसभा में राजस्थानी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का संकल्प भ्रामक, तथ्यहीन और पक्षपातपूर्ण है. उन्होंने कहा कि राजस्थान एक इसलिए हुआ कि तब भाषाई विवाद नहीं था लेकिन अब अगर राजस्थानी की लड़ाई तेज होती है तो तेलंगाना जैसी नौबत भी आ सकती है.
राजस्थानी भाषा विरोधी कई असंगठित धड़ों ने बातचीत में कहा कि राजस्थानी की अबतक कोई परिभाषा तय नहीं हुई और राजस्थानी के नाम पर मारवाड़ी को बढ़ावा दिया जा रहा है. हाड़ौती के साहित्यकार नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी का मानना है कि राजस्थानी के नाम पर मारवाड़ी या कह लीजिए कि जोधपुर की भाषा का साहित्य और व्याकरण है. राजस्थानी का अपना कोई मानक स्वरुप नहीं है. राज्य की कोई एक भाषा कभी नहीं थी. हां 22 रियासतों की अपनी-अपनी बोलियां जरूर थीं लेकिन इनदिनों जोधपुर रियासत की भाषा को मान्यता दिलाने का प्रयास चल रहा है.
राजस्थानी समर्थक भाषाविद ओम पुरोहित 'कागद' के मुताबिक राजस्थानी भाषा को लेकर यह एक भम्र है. राजस्थानी का अर्थ केवल मारवाड़ी से नहीं बल्कि ब्रज, हाड़ौती, वागड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी और शेखावाटी सहित 73 बोलियों के एक समूह से हैं. मान्यता के कई समर्थकों का दावा है कि राजस्थान के अलावा गुजरात, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में भी राजस्थानी बोली है.
दूसरी तरफ वरिष्ठ पत्रकार मोहनलाल मधुकर को विधानसभा के संकल्प में ब्रज को राजस्थानी के भीतर लाने पर आपत्ति जताते हुए कहते हैं ब्रज को क्रियापद से ही देखिए भला यह राजस्थानी कैसे हो गई?
राजस्थानी भाषा संकल्प विरोधी समिति के उपाध्यक्ष डाॅ विष्णुचंद पाठक के मुताबिक अगर राजस्थानी के नाम पर मारवाड़ी को बढ़ावा देना भम्र है तो क्यों दूरदर्शन और आकाशवाणी के समाचार मारवाड़ी में ही प्रसारित किए जाते हैं. यह राजस्थानी तो हम भरतपुरियों को समझ नहीं आती. ऐसी स्थिति में अगर गैर-मरवाड़ी के सामने मारवाड़ी सीखने का विकल्प आता भी है तो उसके लिए मारवाड़ी सीखना उतना ही मुश्किल है जितना कि कोई नई भाषा.
साहित्यकार राजाराम भादू के लिए वह स्थिति बड़ी असहज लगती है जब विधानसभा का सदस्य अपना सवाल वागड़ी में रखे और मंत्री उसका उत्तर मारवाड़ी में दे तथा दोनों के बीच हुआ यह संचार ब्रज के सभापति को समझ ही न आए. उनका दावा है कि बांसवाड़ा की वागड़ी जैसी कई जुबानों खासकर कोटा की हाड़ौती, जयपुर की ढूंढाड़ी या सीकर की शेखावाटी को तथाकथित राजस्थानी भाषा का महान ज्ञाता संचार नहीं कर सकता.
जबकि साहित्यकार-इतिहासकार आनंद शर्मा का दावा है कि राजस्थानी राज्य की एक संपर्क भाषा है. हिन्दी जैसे राजस्थानी भी अपनी सभी बोलियों से संचार कर सकती है. 'जलते दीप' समाचारपत्र के प्रकाशक-संपादक पदम मेहता का मानना है कि जब अंग्रेजी और हिन्दी समझ में आ सकती है तो राजस्थानी भी आ सकती है. मेहता के मुताबिक जो (राजस्थानी) भाषा अपने 2,500 वर्षों के इतिहास में 20 हजार प्रकाशित 3 लाख हस्तलिखित ग्रंथ और स्वतंत्र शब्दकोष के अलावा केंद्रीय साहित्य अकादमी की मान्यता लिए हो वह किसी भाषाई प्रमाण की मोहताज नहीं है.
साहित्यकार सत्येन्द्र चतुर्वेदी का मत है कि साहित्यिक भाषा होना एक बात है जबकि प्रशासनिक भाषा होना एकदम दूसरी बात है. केंद्रीय साहित्य अकादमी भाषाओं का साहित्यिक प्रतिनिधित्व कर सकती है, राजनीतिक नहीं. वरिष्ठ पत्रकार-संपादक ईश मधु तलवार के मुताबिक हर भाषा-प्रांत की अपनी-अपनी पत्र-पत्रिकाओं की भरपार होती है, जैसे गुजराती, मराठी, उडि़या, बंगाली या तमिल में कई पत्र-पत्रिकाएं और उनकी अपनी-अपनी प्रसार संख्याएं हैं लेकिन यहां एकाध अपवाद को छोड़ दिया जाए तो राजस्थानी पत्र-पत्रिकाओं का अकाल है.
भाषाविद-साहित्यकार हेतु भारद्वाज का मानना है संस्कृत से समृद्ध तो कोई भाषा नहीं है लेकिन संस्कृत या राजस्थानी हमारी आधुनिक संवेदनाओं को व्यक्त नहीं कर सकती हैं, जबकि हिन्दी आधुनिक, वैज्ञानिक और तकनीक संवेदनाओं को व्यक्त कर पा रही है. भारद्वाज के मुताबिक राजस्थानी जैसी कोई भाषा नहीं है. डिंगल नामक एक ऐतहासिक भाषा जरूर है जिसमें 'पृथ्वीराज रासो' लिखा गया है. अगर डिंगल की समृद्धि का लाभ उठाकर राजस्थानी के रुप में मारवाड़ी की स्थापना की योजना है तो यह स्पष्ट होना चाहिए.
राजस्थान विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष गिरिराज प्रसाद तिवारी बताते हैं कि आजादी के पहले से गजट और स्कूलों में राजस्थानी की बजाय हिन्दी ही पढ़ाई जाती रही है.
राजस्थानी समर्थकों की एक दलील है कि राजस्थानी बनेगी तो राजस्थानी युवाओं के लिए स्कूलों, काॅलेजों, विभिन्न विभागों से लेकर प्रशासनिक स्तर तक रोजगार के दरवाजे खुल जाएंगे. जैसे कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पंजाबी युवाओं को पंजाबी माध्यम का फायदा मिलता है वैसे ही राजस्थानी माध्यम बनने से राजस्थानी युवाओं को भी मिलेगा. लेकिन गिरिराज प्रसाद तिवारी के मुताबिक राजस्थानी मान्य हुई तो उसका फायदा राजस्थानी यानी मारवाड़ी युवाओं को ही मिलेगा.
तिवारी के मुताबिक अगर दूरदर्शन राजस्थान का नाम दूरदर्शन राजस्थानी किया जाता है तो उसमें राजस्थान की सभी भाषाओं-बोलियों को स्थान मिलना तय किया जाए. इसी तरह अगर राजस्थानी को अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है, शिक्षण संस्थाओं के खाली पदों पर केवल राजस्थानी जानने वालों को नौकरी दी जाती है, राजस्थानी भाषा के नाम से अलग विभाग बनाए जाते हैं और आगामी लोकसभा के लिए राजस्थान से निर्वाचित प्रत्याशी राजस्थानी में शपथ लेते हैं तो सभी भाषाओं-बोलियों को स्थान मिलना तय किया जाए. अगर ऐसा नहीं होता है और अघोषित रुप से केवल मारवाड़ी को ही राजस्थानी के नाम पर प्रतिनिधित्व दिया जाता है तो यह गैर-मारवाडि़यों के साथ अन्याय होगा.
राजस्थानी समर्थकों की दूसरी दलील यह है कि राजस्थानी को सम्मान मिला तो उसके बोलने वालों को भी मिलेगा. हालांकि भाषाविदों के नजरिए से अंग्रेजी के सामने हिन्दी भायिायों की स्थिति को देखते हुए यह दलील भावनात्मक ही लगती है.
मौजूदा स्थिति में भारत में 22 अनुसूचित भाषाएं हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी तीसरे स्थान पर है लेकिन राजस्थानी के साथ भोजपुरी को भाषा बनती है तो हिन्दी तकरीबन दसवें स्थान पर पहुंच जाएगी. इसीलिए ओम पुरोहित 'कागद' का स्पष्ट मत है कि राजस्थानी को कोई चुनौती है भी तो वह हिन्दी को स्थापित करने वालों से है. राजस्थानी को पृथक करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी का असर बहुत सीमित हो जाएगा. 'कागद' का सवाल है कि अगर कोई हमारी रोटी न खाने से कमजोर होता है तो क्या हम अपनी रोटी खाना छोड़ दें?
नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी की राय में 60 वर्षों में राजस्थान बहुत बदला हैं. कई राज्यों के लोगों से यह राज्य भरा हैं. इसी तरह सिंधी, मुसलमान या पंजाबियों की भाषा तो राजस्थानी नहीं है. राजस्थान के श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में पंजाबी प्रचलित है. हालांकि राजस्थानी में राज्य की सभी भाषा-बोलियों की जनसंख्या जोड़कर एक बड़ा आकड़ा बता रहे हैं लेकिन उनकी राजस्थानी (मारवाड़ी) 5 जिलों तक है. इसलिए आज की तारीख में राजस्थान के तकरीबन 28 जिलों को नजरअंदाज करके कोई एक भाषा को प्रभाव में लाए तो यह संभव नहीं लगता और इसीलिए मान्यता का मामला लंबा खिंच रहा है.
दूसरी तरफ अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के मनोज स्वामी का मानना है कि मामला किसी अंतद्र्वंद या विरोध से नहीं बल्कि राजनीतिक उदासीनता से खिंच रहा है. पदमश्री डाॅ चंद्र प्रकाश देवल बताते हैं कि किसी भी भाषा की मान्यता के लिए संघ लोक सेवा आयोग और रिजर्व बैंक की सहमति जरूरी है जिसमें देरी लग रही है.
राजस्थानी भाषा संकल्प विरोधी समिति के डाॅ विष्णु पाठक की राय में राजस्थानी की मान्यता कोई भाषाई नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों पर निर्भर है. यह महज संयोग नहीं है कि जब-जब जोधपुर के अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बनते हैं तब-तब यह भाषाई आंदोलन तेज हो जाता है. भाषाई विवाद के कारण महाराष्ट्र से गुजरात अलग हुआ था और जिस तारीख को यह राजस्थानी बनाएंगे उसी तारीख से राजस्थान के चार टुकड़े होने शुरू हो जाएंगे.
दोनों तरफ से दावें हैं जिनका कोई अंत नहीं. अगर एक तरफ से राजनीतिक दवाब बनता है तो दूसरी तरफ से उससे कहीं ज्यादा दवाब बनाना शुरू हो जाएगा. इस स्थिति में भाषाई विवाद पर अगर राजनीति का रंग और गाढ़ा होता है तो राजस्थान के राजनीतिक परिदृश्य में राज्य के नेता राजस्थानी और गैर-राजस्थानी को लेकर अपने-अपने मोर्चे संभालते नजर आएंगे.
Shirish Khare
First Floor, 71/191
Bhairav Path, Near Patel Marg
Mansarovar, Jaipur, Rajasthan-302020

1 टिप्पणियाँ:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

अपनी-अपनी ढपली पर बजा अपना-अपना राग
भाषा का भूसा उठा भाग डी.के.बोस डी.के.बोस भाग...
जय जय भड़ास

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