जैन अल्पसंख्यक हैं या राक्षस ये मुद्दा सामाजिक है या न्यायायिक???
गुरुवार, 20 जनवरी 2011
प्रवीण शाह जी पधारे इसके लिये आश्चर्य सहित आभार लेकिन क्या आप स्वामी असीमानंद या अजमल कसाबों के दिमागों में चलते अनर्गल विचारों को विमर्श का मुद्दा बना कर मात्र बहस करना चाहेंगे? विधि सम्मत नियम किसलिये बनाए जाते हैं ताकि जनसामान्य को ये समझ आ सके कि देश किस व्यवस्था के अंतर्गत चलता है और नागरिक हित क्या हैं न कि बस ब्लाग पर एक दूसरे के विचार जान लेने से और उसे उचित या अनर्गल ठहरा देने से बात साफ हो जाएगी। आज तक अनूप मंडल के लोगों ने जैनों पर जो भी आरोप(प्रमाण सहित सत्य/असत्य) लगाए हैं तब आप नहीं पधारे क्या इसके पीछे भी कोई रहस्य है? क्या आपकी नजरों में वे लोग मूर्ख हैं जो को राम या मोहम्मद को गाली देने या कार्टून बना देने पर रोक लगाने के लिये न्यायालय से गुहार करते हैं? क्या आपकी निजी राय में इस तरह के धार्मिक विवादों में न्यायपालिका की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिये??जैनों को अल्पसंख्यक मान कर उनके हितों पर न्यायापालिका की क्या भूमिका होनी चाहिये या उन्हें राक्षस कह कर मानव समाज से बाहर खदेड़ देना चाहिये?????
ऐसे सैकड़ों सवाल हैं जिनका उत्तर देने के लिये शायद अब आप दोबारा इस मंच पर नहीं पधारेंगे जैसे अमित जैन चुप्पी साध गए हैं।
जय जय भड़ास
