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आदरणीय हरकीरत बहन से बिना शर्त माफ़ी चोरी के लिये

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

Harkirat Haqeer said...
आदरणीय डा.रुपेश जी,आपसे मै सिर्फ एक सवाल पूछना चाहती हूँ अगर आपकी किसी रचना को कोई अपने नाम से प्रकाशित करता तो आप क्या करते...?? मुनव्वर जी क्या जाने मैंने ये रचनाएँ किन हालातों में , कितने दर्द के बीच गुजरते हुए लिखीं हैं ....अगर शब्दों के हेर फेर से ही नज्में लिख हो जाएँ तो आज हर कोई अमृता, परवीन या ग़ालिब हो......हाँ मुझे आपत्ति है क्योकि इन नज्मों में बसे दर्द के साथ मैंने बरसों काटे हैं ...उन्हें भोगा है...ओढा है ...अपने सीने में बरसों दफ़न कर रखा है ...अपने आंसुओं से सींचा है मैंने...तो अब इतनी जल्दी किसी और के साथ कैसे जाने दूँ ...?? पहले वो बरसों की तड़प लाये...वो सिसकियाँ लाये ...हाँ मुझे तकलीफ है क्योकि ये दर्द सिर्फ मेरा है.......जब जिस्म चीर कर कुछ लिखा जाये रुपेश जी तो दर्द तो होता ही है.....!!
April 5, 2009 9:12 AM

आदरणीय हरकीरत बहन जी,मैं आपसे मुनव्वर सुल्ताना जी और उनके जैसे तमाम भोले चोरों की तरफ़ से बिना शर्त माफ़ी मांगता हूं लेकिन जब तक आप इन तमाम बातों पर विमर्श नहीं करतीं उन्होंने कहा है कि वे उस रचना को ब्लाग पर से हरगिज न हटाएंगी क्योंकि छिछॊरपन और बेशर्मी का आरोप जो आपने लगाया उन्होंने उसे भी सहर्ष स्वीकार लिया है साथ ही आपने उनके चित्र सहित लंतरानी की जो लिंक अपने महाप्रसिद्ध ब्लाग पर लगा कर सहयोग करा है उसके लिये हार्दिक धन्यवाद कहा है और साथ ही पूछा है कि अब जब पता चल ही गया है कि आप इतनी महान नज़मनिग़ारा हैं तो जितनी भी बिना नाम की रचनाएं पसंद आएंगी और लंतरानी पर लिखना होगा उन्हें benefit of doubt के अंतर्गत आप का ही मान लिया जाएगा जिसके लिये वे आपके ब्लाग की लिंक लगाने की अनुमति चाहती हैं। अब आपकी बारी है कि आप अपनी विशाल सोच का परिचय दें। उम्मीद है कि आप मेरी सोच से सहमत न होंगी मैं सहर्ष धन्यवाद करूंगा उस व्यक्ति को जिसने ऐसा करा कि मेरी रचना को अपना कह दिया है जैसे कि मेरे बच्चे को सभी उतना ही प्यार करें जितना कि मैं करता हूं। आप जिन सिसकियों और दर्द के साथ जिस्म को चीर कर काव्य लिखने की बात कर रही हैं वह भी मात्र शब्द प्रपंच नहीं है तो और क्या है? जितने भी लोग सिसकते हैं पीड़ित और उत्पीडि़त होते हैं आपकी तरह कविता नहीं लिख कर व्यक्त करते तो क्या दर्द और पीड़ा की अभिव्यक्ति का कापीराइट ले लेते हैं। बहन जी दर्द की एक मात्र अभिव्यक्ति होती है और वो है रोना न कि कविता लिखना ये एक चिकित्सक से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। दरअसल आपकी छटपटाहट का कारण तो ये है कि आपको लग रहा है कि आपकी प्रसिद्धि जो इतनी महान-महान रचनाओं से आपको हासिल है वह शायद मुनव्वर सुल्ताना जी ने चुरा ली। अरे बहन जी! जब आप देख रही हैं कि उन्होंने कहीं ये नहीं कहा कि ये रचना उनकी है और उन्होंने माना है कि आपकी रचना है जो कि उन्हे पता न था जैसा कि उन्होंने घटना का उल्लेख भी करा है मात्र उर्दू में तर्जुमा करा है तो फिर इतना कष्ट किसलिये? कहीं इस बात का कष्ट तो नहीं है कि आपका दर्द बिना आपका नाम जाने उर्दू जानने वाले भी जान गये। दो तरह के लोग देखे हैं एक तो वो जो किसी पीड़ित इंसान या हैवान की पीड़ा को दूर करने के लिये औषधि की व्यवस्था करते हैं दूसरे वो जो सबको जाकर उसकी पीड़ा की कविता,नाटक और कहानी सुना कर शराफ़त जताते हैं कि वे उसकी पीड़ा से कितने दुखी हैं,इस तरह की छ्द्म सहानुभूति कितनी उपयोगी है इस बात का उत्तर दीजिएगा यदि हो तो वरना मुझे भी छिछोरा और बेशर्म कह कर चुप हो जाइयेगा क्योंकि आपने ये बता दिया कि आपके दर्द और संवेदनशीलता का असली चेहरा क्या है। जिस्म चीर कर या तो हत्या होती है या फिर शल्य चिकित्सा, कविता नहीं लिखी जाती ये महज शब्दाडंबर है जो कि मेरे जैसे जाहिल लेकिन दूसरों का सचमुच दर्द महसूस करने वाले चिकित्सक को तो भली प्रकार पता है। किसी स्त्री के पीठ पर पड़े जूतों के निशानों में कला और कविता तलाशना कम से कम मैं अब तक न सीख पाया। दर्द महसूस करने के लिए वेबपेज से बाहर आकर दर्दियों को देखना होता है और ये काम कर रहा हूं इसके लिये किसी नाम या पैसे की जरूरत नहीं है। आप मात्र मानसिक श्रम करने वाली एक श्रमिक हैं जिसके श्रम का मूल्य कोई भी प्रकाशक देकर सारे अधिकार प्रकाशकाधीन कर लेता है तब दर्द और संवेदनाएं वगैरह सिर्फ़ रायल्टी का साधन होते हैं। बस एक अंहकार रहता है कि इस रोने चिल्लाने वाले जाहिलों की पीड़ा को कितने सुंदर शब्दों में बांधा है और इस बात के लिये वाहवाही तो मुझे ही मिलना चाहिये। जब कोई पीड़ा आपको हुआ करे तो दवा लेने की बजाए कविता लिख कर अपने टिप्पणीकारों की नजर कर दिया करिये यकीन मानिये कि आप जैसी संवेदनशील कवियत्री का दर्द दूर हो जाएगा। अगर इतना ही भय है कि कोई आपका "दर्द" चुरा लेगा या उसमें शरीक हो जाएगा तो उस दर्द को दुनिया के सामने दिखाने की जरूरत नहीं है।
कुछ बातें आपके टिप्पणीकारों के लिये भी हैं जो भड़ास पर अपना मुखौटा लेकर आने तक का साहस नहीं करते जैसे कि समीरलाल जो कि उड़नतश्तरी के नाम से लिखते हैं खुद को अत्यंत संवेदनशील दर्शाते हैं कोई कुछ भी लिखे तो तत्काल टिप्पणी करने पहुंच जाते हैं, लैंगिक विकलांग(आप जैसे संवेदनशील लोगों के लिए "हिजड़ा") मनीषा नारायण के ब्लाग अर्धसत्य पर कभी एक टिप्पणी देने कोई आगे नहीं आए लेकिन जब बाबू जी ने लिखा तो पहुंच गये शराफ़त का पोटला लेकर कि भाई हम भी सहानुभूति रखते हैं। बस एक व्यक्ति ने साहस करा जिन्होंने वेबपेज से आगे आकर मनीषा नारायण के प्रति न सिर्फ़ सहानुभूति और प्रेम जताया वरन उन जैसे सभी की पीड़ा को बखूबी समझा और अपने ब्लाग पर लिखने के साथ ही इन सबसे सीधा जुड़ाव भी स्थापित करा वो एकमात्र इंसान हैं गुरूवर्यसम शास्त्री जे.सी.फिलिप। मैं निजी तौर पर कहता हूं कि क्यों किसी ने एक पूरा ब्लाग भड़ास ही चोरी हो जाने की चर्चा तक नहीं करी क्योंकि वे सब स्वयंभू शरीफ़ हैं बस आपकी कविता की "चोरी" की सूचना देने और भर्त्स्ना करने दौड़ पड़े और चोरी भी ऐसी है कि जिसका सामान दुनिया के सामने रखा है एक वैश्विक मंच पर जबकि आपके द्वारा चोरनी ठहरा दी गयी मुनव्वर आपा ने बताया है कि उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं थी। क्या सामाजिक सरोकार है ऐसे लोगों के जीवन का बस बड़ी-बड़ी बातें,सिद्धांतों और आदर्शों की जुगाली करना लेकिन जब सचमुच में समाज को इनकी जिन कोनो पर जरूरत है वहां से ये कोसों दूर हैं क्योंकि वहां तो बदबू है गंदगी है बुराइयां है। पाखंडी और ढकोसलेबाजों के जिस जमावड़े से आपने कहा है कि सभी ब्लागर एकत्र होकर आपको न्याय दिलवाएं वो खुद अपनी मदद नहीं कर सकते आपके लिये क्या आगे आएंगे? चार शब्द टिप्पणी में लिख दिये तो आप लगीं इनके आगे रोने कि न्याय दिलवाएं। आपकी बात सुनते हैं तो जरा इन सबको किसी सामाजिक मुद्दे पर आफ़लाइन एकजुट करिये आपको पता चल जाएगा।
अंतिम बात कि कम से कम मेरे नाम के आगे "आदरणीय" जैसा गरिष्ठ शब्द न लगाएं मैं जरा भी आदरणीय नहीं हूं आप हैं न सिर्फ़ आदरणीय बल्कि पूज्यनीय क्योंकि आप कवियत्री हैं शब्दों में अपने दर्द को बताती हैं न कि रो-चीख कर............
जय जय भड़ास

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मैंने गा़लिब से लेकर हरकीरत हकीर जैसे महान लोगों की रचनाएं चुराई हैं

रविवार, 5 अप्रैल 2009

आत्मन हरकीरत हकीर बहन जी ने मेरे ऊपर जो चोरी का आरोप लगाया है मैं उसे खुशी से स्वीकार कर दंड भुगतने को तैयार हूं। भड़ास से जुड़ने के बाद बस सहजता का जो गुण उपजा है वही सबसे बड़ी उपलब्धि है मेरे जीवन की।
बहन हरकीरत हकीर ने भड़ास के सभी सदस्यों को संदेह के घेरे में ले लिया, बड़ी भोली हैं वो ये नहीं जानती हैं कि ये एक कम्युनिटी ब्लाग है यहां सब किस्म के प्राणी हैं भला मेरी किसी करतूत से उनका क्या लेना देना? बहन की टिप्पणी है---
मेरी भडास के सभी सदस्यों से एक गुजारिश है ..आपने जिस महिला की तस्वीर अपने ब्लॉग में (मुनव्वर सुल्ताना) लगा रखी है कृपया उस से पूछें की मेरी नज़्म को अपने नाम से अपने ब्लॉग में डालने का हक उसे किसने दिया......क्या इस घृणित कार्य में आप उसके साथ हैं...???अगर नहीं तो मुझे न्याय दिलाएं ....!!
उन्होंने "लंतरानी" पर टिप्पणी करी थी जो कि मैं व्यसततावश देख ही न पायी आज देखी तो प्रकाशित कर दी ताकि बौद्धिक लोगों को ये न लगे कि भड़ासी आरोप तक नहीं स्वीकारते। अरे बहन! आरोप क्या हम तो सहर्ष इस अपराध को स्वीकार रहे हैं और दंड के लिये तैयार हैं :) कोई जिरह नहीं.....
Harkirat Haqeer ने कहा… Munawwar ultana ji,
Aapne meri nazam ko bina meri anumati ke shirsak badal kar apne blog me apne nam se prakashit kiya hai...yah zurm hai...is se pahle ki mai koi sakht kadam uthaun aapko jald se jald mere blog par aakar apni safai pesh karni hogi.
Harkirat 'Haqeer"April 3, 2009 9:41 PM
हरकीरत बहन को बताना चाहती हूं कि मुझे ये रचना नौंवी कक्षा में पढने वाली एक लड़की की किताब में हिंदी में लिखी हुई मिली, जब मैंने उससे जानना चाहा कि ये किसने लिखा तो उसने कहा कि मेरी आपा ने लिखा है इससे ज्यादा वह लड़की बता न पायी। मुझे रचना बड़ी प्यारी लगी और मैंने इसे उर्दू में अनुवाद करके लंतरानी पर लिख दिया। अब चूंकि हम जैसे लोग रोज़ाना तो इंटरनेट पर आ नहीं पाते हैं तो पता ही नहीं चला कि इस अनुवाद के अक्षम्य अपराध के लिये हरकीरत बहन क्या सख्त कदम उठाने वाली हैं वैसे बहन जी को एक बात बताऊं कि मेरे ब्लाग पर प्रकाशित ९९% सामग्री दूसरों की लिखी है चाहे वो चचा ग़ालिब हों या फिर कोई अन्य; अब हम ठहरे निपट बुद्धू कि ये बेवकूफ़ी आपको इतना ठेस पहुंचा देगी कि आप बौखला कर मेरा नाम सुल्ताना से बदल कर "उलटाना" कर देंगी। कम से कम इसी बहाने आप भड़ास पर पधारीं तो और हम एक कोने में पड़े अबौद्धिक लोग आपसे परिचित हो पाए। किसी बात के लिये अगर माफ़ी चाहती हूं तो वह है कि मैं आप और आपकी महान रचनाधर्मिता से परिचित नहीं थी। आपकी सेवा में अत्यंत ढीठतापूर्वक एक पता नहीं किस महान इंसान की बतायी लघुकथा रख रही हूं--
एक बार एक व्यक्ति अपने आठ साल के बेटे को लेकर एक महान संत की सभा में गया। पिता तो मन लगा कर एक एक शब्द सुन रहा था और भावविभोर हुआ जा रहा था लेकिन बेटा था कि उबासियां ले रहा था। जब घर आकर पिता ने कहा कि मूर्ख! बाबाजी इतनी सुंदर बातें कह रहे थे और तुम उन्हें मन लगा कर सुनने की बजाय उबासियां ले रहे थे तो बेटा बिना कुछ बोले कमरे में गया और अपनी पढाई की किताबों में से एक डिक्शनरी उठा लाया और पिता को देकर बोला कि आपके बाबाजी ने जो शब्द बोले वो सारे के सारे इस किताब में पहले से ही लिखे हैं उन्होंने बस हेराफेरी करके आगे-पीछे करके बोले हैं। बच्चा भाव नहीं समझता है भोला है मासूम है उसे नहीं पता कि बाबाजी कितने महान हैं जो शब्दों की हेराफेरी करके सबसे ज्यादा समझदार बन चुके हैं। मेरा भी हाल कुछ उसी बच्चे जैसा है जो कि आपकी महान कीर्ति से परिचित नहीं थी तो बस लिख मारा। शब्दों की मौलिकता, भावों की मौलिकता और विचारों की मौलिकता से जुड़ी महानता के बारे में मैं जागरूक नहीं हूं। आप जैसी महान ब्लागर महिला जो कि भावों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति भी दे लेती है उनकी महान रचना का तर्जुमा करने का अपराध सहर्ष स्वीकार है लेकिन इस अपराध के लिये माफ़ी नहीं मांगूंगी बल्कि आपके द्वारा कोई महान सजा पाना चाहती हूं ताकि लोग मुझ गुमनाम भड़ासिन को भी जान लें कि इस दुष्टा को महान रचनाकार हरकीरत हकीर ने दंड दिया था। आपके दंड का स्वागत रहेगा बल्कि अभी से खुश हो रही हूं ये सोच-सोच कर कि इतनी संवेदनशील नारी इस घृणित कार्य के लिये क्या सजा निर्धारित करेगी। काश वाल्मीकि इस युग में होते तो महाराज तुलसीदास को रगेद रहे होते कि बदमाश तुमने मेरी रचना चुरा ली अब मेरी रायल्टी का क्या होगा।मैं एक बात और ढिठाई से कहती हूं कि हो सकता है कि भाव सड़क पर पत्थर फोड़ने वाली किसी गरीब औरत के हों और आपने उन्हें शब्दों का जामा पहना दिया हो तो उस गरीब को तो ये भी नहीं पता कि कविता क्या और ब्लागिंग क्या....। मैं आपके ब्लाग पर तो जाउंगी ही ताकि इसी तरह की अन्य रचनाएं चोरी के लिए मिल सकें लेकिन जो दिल की बाते हैं हकीकत के साथ यहां पर लिख दिया है आप जैसी प्रतिक्रिया करना चाहें मुझे सिर झुका कर स्वीकार है लेकिन ये सिर शर्मिंदगी से नहीं आपके प्रति आदर से झुका है और इसे झुका रहने दीजियेगा। अगर आप भड़ास पर आकर ये बात कह दें कि आप ही वो शख्स हैं जिसके मन में दुनिया में पहली बार वो विचार,शब्दगुंफन,काव्यात्मक अभिव्यक्ति आयी है तो मैं लंतरानी से उस रचना को अवश्य हटा दूंगी क्योंकि मुझे तो आपकी संवेदनाएं संदिग्ध लगने लगी हैं। आपने प्रकाशित करा है बस भाव तो मेरे ही है प्यारी बहना... अब ये मत कहना कि क्या कमाल की ढिठाई है:)
जय जय भड़ास

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