मुनव्वर सुल्ताना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मुनव्वर सुल्ताना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

अचानक किसी बेनामी को बूढी माई की चिंता होने लगी

बुधवार, 15 जून 2011


अचानक किसी बेनामी को बूढी माई की चिंता होने लगी और मुझे सलाह दी जा रही है | बेटा / बेटी जब तुममें इतना साहस नहीं है की तुम अपनी पहचान के साथ पधार सको तो क्या उम्मीद करी जा सकती है हो सकता है की तुम ही वो नीच औलाद हो जो आठ महीने बाद अपनी माँ की तस्वीर भड़ास पर देख कर अब ये जानना चाहता है की वो जीवित है या मर गयी | अरे तुम मुझे बता रहे हो की मैं रेलवे या पुलिस को सूचना दे सकता था लेकिन उसकी जगह कलम घसीट रहा हूँ | मैं क्या हूँ और क्या करता हूँ क्या कर सकता हूँ ये अगर जानना है तो अपनी पहचान बता दो और मुंबई कर देख लो पता चल जायेगा की आजकल की महानगर की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में मुंबई में रह कर मैं जो कर रहा हूँ उसे लोग चूतियापा क्यों कहते हैं समझ में जाएगा | अरे हाँ यदि एक हालिया चूतियापे का ताज़ा नमूना देखना है तो हमारी वरिष्ठ भड़ासी बहन मुनव्वर सुल्ताना के ब्लॉग "लंतरानी" पर देख लो लेकिन तुम्हारी परेशानी है की तुम उर्दू नहीं पढ़ पाओगे की मैंने कई दिन से एक व्यस्त इलाके में सड़ती हुयी एक अनजान इंसान की लाश के लिए पुलिस को सिर्फ बुलाया बल्कि धंधे पर भी लगाया | कई घंटे लगे और पुलिस स्टेशन भी कई बार जाना हुआ लेकिन तुम्हे इससे क्या जिसकी अपनी पहचान तक बताने में फट रही है
अरे गधे! कितने रेलवे के अधिकारी और पुलिस वाले मुंबई में ऐसे लोगों की देखरेख कर रहे हैं जो इन माई की करने लगते तेरे जैसे सभ्य सब लोग नहीं रह गए जो मुँह छिपा कर सभ्यता का पाठ पढ़ाएं। हम सब तो असभ्य हैं लेकिन जो करते हैं सबके सामने चाहे तेरी मरम्मत या मजलूमों से प्यार....
जय जय भड़ास

Read more...

पैसा मिले तो ये दलाल किस्म के लोग रंडियों का भी विज्ञापन लगा कर एडवर्टाइज़ कर सकते हैं

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

अभी कुछ दिन पहले मुंबई में एक गैर सरकारी संस्था जो मुस्लिम हितों का गाना गाते हुए प्रोफ़ेशनल मुस्लिमों की तरक्की की कोशिश में जुटी है उसने शिक्षा के क्षेत्र में धंधे की अधिक संभावनाएं देखते हुए एक फ़ेस्टिवल का आयोजन करा। कैरियर फ़ेस्टिवल2011 के नाम से तमाम मुसलमान व्यवसायी जुटा लिये गये दुकानें बाँट दी गयी, नोट छप गए इस पूरे कार्यक्रम को आर्थिक सहयोग देने वाली एक कंपनी थी जो कि सोने में इन्वेस्ट कराती है लेन-देन का काम करती है कुल मिला कर है बैंकिंग का धंधा लेकिन भारत सरकार को बेवकूफ़ बनाने का काम कर रही है(जो कि पहले से ही धूर्तों के हा में है)।
बच्चों के अच्छे भविष्य के नाम पर कैरियर-कैरियर का बाजा बजा कर इन लोगों ने अंजुमन इस्लाम,मुंबई द्वारा संचालित एक कॉलेज में ग्राउंड ले लिया, हॉल ले लिया लेकिन जब साइबर स्पेस में इनके मीडिया पार्टनर पर नज़र पड़ी तो देखा कि इनके मीडिया पार्टनर तो बिलकुल इनकी ही सोच के चुने हैं, इस वेबसाइट ने कुछ दिन तक इनका डाकटिकट के आकार का विज्ञापन लगा कर रखा लेकिन उससे बीस गुना बड़ा विज्ञापन इस वेबसाइट पर ऐसी वेबसाइट का लगा हुआ है जो कि जीवन में अकेली औरतों के द्वारा जीवन में रंग भरने और जोश जगाने का काम करती है जिसे आप चित्र में देख सकते हैं। पैसा मिले तो ये दलाल किस्म के लोग रंडियों का भी विज्ञापन लगा कर एडवर्टाइज़ कर सकते हैं।
सही है भाई क्या मुस्लिम प्रोफ़ेशनल्स औरतों के धंधे में नहीं हो सकते। अब अगर ये मुस्लिम प्रोफ़ेशनल्स मुनव्वर आपा की उर्दू वेबसाइट लंतरानी पर अपना विज्ञापन देते और उन्हें मीडिया पार्टनर बनाते तो गलत हो जाता आखिर "इनका इस्लाम" औरतों को बाहर आने की तक अनुमति नहीं देता और एक बात और कि विज्ञापन मुफ़्त में होता जिसमें ये मलाई नहीं खा पाते ;)
जय जय भड़ास

Read more...

मुंबई में उर्दू की कोई अदबी महफ़िल लंतरानी की उपस्थिति के बिना अधूरी रहती है

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

इसे कमाल ही कहा जाएगा कि हमारी वरिष्ठ भड़ासिन मुनव्वर सुल्ताना आपा अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ ही स्कूल की नौकरी के बाद उर्दू अदब की हर महफ़िल में मौजूद रह कर उसे उनके उर्दू ब्लॉग लंतरानी के लिये कवर करती हैं। अक्सर उनके ब्लॉग पर जाना होता है तो पता चलता है कि उर्दू के बेशर्म अखबार "उर्दू टाइम्स" ने लंतरानी से मुनव्वर आपा की खींची हुई तस्वीरों को लेना शुरू कर दिया है। मैं नहीं जानता कि मुनव्वर आपा को ये जानकारी है या नहीं| बहरहाल मुनव्वर आपा ने जिस लगन उर्दू को फ़रोग़ दिया है वे साधुवाद की पात्र हैं। मैं प्रयास करूंगा कि मुंबई की इन हलचलों को लंतरानी के साथ साथ भड़ास पर भी ला सकूँ यदि उनमें कुछ भड़ास जैसा है। अब तो हर संस्था और उर्दू शोबा रखने वाले कॉलेज में मुंबई में इस बात की होड़ रहती है कि कहीं वे लंतरानी से बिछुड़ न जाएं।
मुनव्वर आपा की जय हो
लंतरानी की जय हो
जय जय भड़ास

Read more...

लीजिये मैं भी हो आया यमराज के पास......

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010


अभी यमराज जी के ब्लॉग पर गया था तो पाया कि बदस्तूर स्पेलिंग मिस्टेक करे चले जा रहे हैं और गूगल का एडसेंस नहीं लगाया है क्योंकि हिंदी में शायद अब तक ये अनुमेय नहीं है। बहरहाल यम अंकल कमेंट मॉडरेशन लगा दें इससे पहले जितने कमेंट कर सकते हो कर लो भड़ासियों। मैं भी एक कमेंट करने के साथ उनकी भी पोस्ट लेकर चित्र के रूप में आया हूँ। मैं तो नतमस्तक हूँ मुनव्वर आपा और हमारे डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी के आगे जिनसे सीधे यमराज मुखातिब हैं।
जय जय भड़ास

Read more...

पत्रकारिता बनाम पत्राकारिता

बुधवार, 20 जनवरी 2010

ब्लागिंग के लिये हिंदी में क्या शब्द स्वीकार्य हो जो कि पूर्णरूपेण इसकी चारित्रिक विशेषताओं और क्षमताओं को बता सके ये आपस में भाषा के स्वयंभू कई विद्वानों ने सिरफोड़ी करने के बाद भी स्पष्ट नहीं हो सका है। फिलहाल काम चलाने और हिंदी की नाक बचाए रखने के लिये लोगों ने "चिट्ठाकारी" शब्द अपना रखा है। मैं चूंकि भड़ास पर हिन्दी में लिखने के साथ ही लंतरानी नाम के उर्दू ब्लाग पर भी लिखती हूं जिसके कारण मुझे विश्व की पहली महिला उर्दू(नस्तालिक) ब्लागर होने का मान प्राप्त है। एक कड़वा सच ये है कि उर्दू और कम्प्यूटर का रिश्ता अभी भी कुछ खास अच्छा नहीं है। उर्दू के क्षेत्र के बड़े-बड़े विद्वान कम्प्यूटर के बारे में चर्चा करने में भी सकपकाए रहते हैं। उन्हें एक भ्रम निरन्तर है कि कम्प्यूटर सिर्फ़ अंग्रेजी जानने वाले ही प्रयोग कर सकते हैं लेकिन लंतरानी के मंच पर ये भ्रम तोड़ने का प्रयत्न जारी है।
उर्दू महफ़िल में एक सज्जन ने कहा कि ब्लागिंग के लिए हिंदी में क्या शब्द है क्योंकि चिट्ठाकारी तो हिंदी का शब्द नहीं है। इसपर हमारे आदरणीय गुरुवर्य भड़ास के संचालक द्वय में से एक डा.रूपेश श्रीवास्तव जी ने तत्काल उनका मुंह एक नया(मेरे लिये तो एकदम नया है) शब्द देकर बंद कर दिया कि महाशय ! ब्लागिंग के लिये उर्दू में चिट्ठाकारी और हिंदी में पत्राकारिता शब्द सही है। डा.रूपेश जी के अनुसार पत्राकारिता परंपरागत पत्रकारिता की आगे की पीढ़ी है और तकनीकी तौर पर विकसित रूप है। तब से अभी तक मैं इस बात पर विचार कर रही हूं। शब्दकोश में "पत्रा" शब्द को भी देखा, अब तक ये शब्द परंपरा से मात्र ज्योतिष के संदर्भ में प्रयुक्त संचायी-पोथी(ARCHIEVE) के लिये ही प्रयुक्त होता रहा है किन्तु अत्यंत सूक्ष्मता से मनन करने पर ये शब्द सटीक व उचित प्रतीत हुआ। आपको याद होगा कि हमारे डा.रूपेश जी ने अपनी इसी विशिष्ट प्रज्ञा के चलते मनीषा(नारायण) दीदी जैसे लोगों के लिए एक शब्द प्रस्तुत करा था जिन्हें कि सामान्य भाषा में लोग कठोरता पूर्वक हिजड़ा कहते हैं और न जाने किसकी विद्वता के परिणाम स्वरूप "किन्नर" कहने लगे, वह नया शब्द रहा "लैंगिक विकलांग" जोकि अब धीरे से भाषा में स्वीकार लिया गया है और लेखन में प्रयोग होने लगा है। ठीक वैसा ही एक नया शब्द इन्होंने प्रस्तुत करा है "पत्राकारिता", इससे पत्रकारिता यानि जर्नलिज़्म का विकास ही होगा और भाषा का शब्दकोष भी सम्पन्न होगा। पत्रकार के ही समानान्तर नया शब्द उभरेगा "पत्राकार" और कदाचित इसी तरह के अनेक शब्द विकसित होंगे जो कि सटीक व क्षमतावान होंगे कि पद की व्याख्या कर सकें।
जय जय भड़ास

Read more...

कुछ महीने न लिख कर क्या देख सकी वो बताना है

पिछले कुछ महीनों से सक्रिय लेखन बंद कर के एक प्रयोग करके देख रही थी। इस प्रयोग में मैने ब्लागिंग के बाद में मैंने जो नजरिया पाया था उस नई नजर से दुनिया को देख कर समझने की कोशिश कर रही थी कि शायद कुछ बदलाव आया होगा लेकिन कुछ बदला ही नहीं है बस ये है कि कुछ लोग मुझे पहचानने लगे हैं, इस नयी पहचान के चलते जो सामाजिक कद हासिल हुआ है उसमे पत्रकार बंधुओं को लगने लगा है कि मैं भी घटनाओं पर अपनी राय दूं। अभी जब कुछ समय पहले समलैंगिकता वाले मामले में कानूनी उठापटक चल रही थी तो कई लोगों ने मेरी राय जानना चाहा कि मैं इस बारे में क्या विचार करती हूं। मैंने एक बात देखी कि हर जगह पूंजी का जोर है पैसे की ताकत से सारे काम सिद्ध हो रहे हैं। हमारी न्याय व्यवस्था और न्याय प्रणाली के साथ साथ ही मैंने न्याय का पालन कराने वाली संस्थाओं को भी नये नजरिये से देखने का प्रयास करा लेकिन कुछ भी बदलाव नहीं है। बाबू जी डा. जे.सी.फिलिप सही कहते हैं कि हमारा मसला तो सामाजिक मसला है और सामाजिक बदलावों की गति बहुत धीमी होती है इसलिये फिलहाल कुछ अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। लैंगिक विकलांगता के मुद्दे को दरकिनार करके धनी और कुटिल लोगों ने खुद ही एक लैंगिक अल्पसंख्यक वर्ग रच डाला जिसे उन्होंने "LGBT समूह" नाम दे डाला और गुदा मैथुन से लेकर मुख मैथुन तक को अपनी निजी काम-वरीयताओं में गिना कर कानूनी नौटंकी करके भारतीय सभ्यता के मुंह पर कालिख पोत दी पर हमारे माननीय न्यायाधीश तर्कों के आगे घुटने टेके रहे। आश्चर्य होता है जब न्यायाधीश अपने निजी विवेक का जरा भी प्रयोग नहीं करते। आजकल मेरा रुझान ’विधि के शासन’(Rule of law) की तरफ है जिसे एक आम नागरिक होने की हैसियत से जानने का प्रयत्न कर रही हूं। काफ़ी दिनों बाद लिख रही हूं तो विचारों का तारतम्य आसानी से नहीं बन पा रहा है। मुझे पता है कि जो भड़ास इतने दिनों से दम साध कर रोके हुए थी अब उबल-उबल कर बाहर आएगी। इस बीच मैं अपने बड़े भाई और गुरुदेव डा.श्री रूपेश श्रीवास्तव जी के सम्पर्क में रही, लंतरानी समूह की संचालिका और भड़ास की संरक्षिका मेरी बड़ी बहन मुनव्वर(सुल्ताना)आपा के जुड़ाव में भी लगातार हूं इसलिये कुछ अविस्मरणीय पल तस्वीरों के रूप में कैद हो सके जो आप सबके साथ बांटना है।
जय जय भड़ास

Read more...

दुनिया की पहली नस्तालिक महिला एवं पहली हिंदी लैंगिक विकलांग ब्लागरों के संग चले हम

मंगलवार, 5 जनवरी 2010


सम्मान वगैरह तो वैसे भी भड़ासियों के हिस्से में कभी आता ही नहीं है और आता भी है तो हमें हज़म नहीं होता है। अभी हाल ही में एक स्वयंभू हास्य कलाकार ने वर्ष २००९ के सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का सम्मान करने का टोटका करा और शर्त थी कि पहले रजिस्टर कराओ। अब अपने भाई अविनाश वाचस्पति भोले-भाले आदमी ठहरे, पहुंच गये भलमनसाहत के चलते मना न कर पाने की मनोस्थिति में पशोपेश में उलझ कर। दिमाग में भाई के उठापटक चलती रही और फिर आखिर दिल की आवाज़ जीत गई। भाई ने प्रतियोगिता से अपना नाम ही वापिस ले लिया और अपने ब्लाग पर एक लम्बी-चौड़ी-उत्तम स्वास्थ्य वाली पोस्ट भी लिख मारी। तमाम लोग आकर चींऊ-चींऊ करे उस पोस्ट पर। भला सम्मान किसे नहीं चाहिये, प्रसिद्धि की भूख किसे नहीं है? लेकिन कुछ लोग भाईसाहब की तरह से अपवाद होते हैं जो कि अपना काम करते हैं और उनके करने से काम सम्मानित होता है। अबे! ये मत सोचना कि हम तेल लगा रहे हैं , हमें आदत नहीं है लेकिन जो है सो बक दिया करते हैं। भड़ासियों को भी आयोजित सम्मान वगैरह के पीछे दौड़ कर आभासी प्रसिद्धि की लालसा नहीं है। यारों! व्यक्ति का काम बोलता है। अविनाश भाई का काम ही चमचमा रहा है अब क्या प्रशस्ति पत्र और क्या मेडल....... सब उनके आगे बौने हो चुके हैं। भड़ास परिवार की दो वरिष्ठ संरक्षिकाएं मुनव्वर(सुल्ताना) आपा दुनिया की पहली नस्तालिक(उर्दू) महिला ब्लागर हैं और वहीं मनीषा(नारायण) दीदी दुनिया की पहली हिंदी लैंगिक विकलांग ब्लागर हैं हो सकता है कि ये भी रिकार्ड-सिकार्ड में दर्ज़ करने जैसी बात हो लेकिन भड़ास पर इसकी चर्चा तक नहीं करी जाती कि इनकी उपलब्धि को सम्मान का विषय बना कर तोते उड़ाए जाएं। जिसे इनकी उपलब्धियों की सराहना करनी हो वो खुद भाई अविनाश के ब्लागों या मनीषा दीदी और मुनव्वर आपा के ब्लाग पर जाकर पुच्च पुच्च कर आए।
जय जय भड़ास

Read more...

कार्यपालिका और विधायिका में सब चोर-बदमाश और न्यायपालिका में सब साधु संत

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

बात भ्रष्टाचार और कामचोरी की हो तो देश के संदर्भ में बुद्धिजीविता की जुगाली करने वाले अपने दोनो हाथों की हर उंगली अंगूठे के साथ साथ पैरों की उंगलियां भी कार्यपालिका और विधायिका की तरफ उठा देते हैं। बुद्धिजीवियों की नजरों में राजनेता भ्रष्ट और दुराचारी हैं, अफ़सर शाही इतनी भयंकर है कि भ्रष्टाचार ही काम करने का उचित मार्ग प्रतीत होने लगा है। सब चोर हैं, बदमाश हैं, लम्पट हैं, औरतों और रिश्वत को देख कर लार टपकाने लगते हैं। जिसे देखिये वही मुंह उठा कर मीडिया, विधायिका और कार्यपालिका को पानी पी-पीकर कोसता है। अब यदि सीधे ही देखा जाए तो भ्रष्टाचार लोकतंत्र के हर स्तम्भ में समा गया है लेकिन क्या कारण है कि इन बुद्धिजीवियों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार दिखायी ही नहीं देता या न्यायपालिका से जुड़े सारे लोग साधु संत हैं। इस देश में न्यायपालिका और सेना भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है लेकिन मजाल है कि कोई इनके बारे में चूं चां भी कर दे। उसका कारण है विधि का शासन। हमारे प्यारे देश भारत में कानून का शासन चलता है पता है न.....? रूल औफ़ ला.....। जो लोग इस प्रणाली से जुडे हैं उनके हाथ में डंडा है अगर कोई उनके आचरण पर उंगली उठाए तो वो उसी डंडे से उंगली का भुरकस बना देंगे और आप कोई छिपकली तो हैं नहीं कि पूंछ कट गयी तो चिन्ता न करें दूसरी निकल आएगी; इसलिये जिनकी उंगली शहीद हुई है या जिन्होंने इस प्रणाली के ठेकेदारों से कानूनी तौर पर मार खायी है उनकी तो आवाज ही निकलना बंद हो जाती है। हमारे जैसे जड़बुद्धि तो बिना सोचे किसी भी गलत बात को गलत कह देते हैं लेकिन बुद्धिजीवी लोग इस बात का ध्यान रखते हैं कि उसी मुद्दे पर चर्चा करी जाए जिससे कि परेशानी न खड़ी हो और सनसनी भी फैली रहे कि फलनवा बहुत बुद्धिमान है कितनी बड़ी बात करता है। सारे वकील, जज, कचहरी के क्लर्क साधु संत होते हैं वो कभी एक पैसा तक रिश्वत नहीं लेते, उन सबके चरित्र अत्यंत उज्ज्वल रहते हैं वे सब दूध से नहाते हैं। ये बात हम नहीं बुद्धिजीवी कहते हैं, नहीं ..... वे ये भी नहीं कह पाने का साहस जुटा पाते।
जय जय भड़ास

Read more...

भड़ास बनाम भड़ास blog -दूसरा भाग

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

मैं स्वयं यानि मुंबई की लोकल ट्रेनों में तालियां बजा कर भीख मांगने वाला एक हिजड़ा, जिसे डा.रूपेश श्रीवास्तव ने बहन स्वीकार कर सामाजिक दायरों को झकझोर डाला। एक लम्बे समय तक मैं आदरणीय भाई से बचती थी क्योंकि मुझे यकीन ही नहीं हो पा रहा था कि जिधर एक तरफ़ लोग छक्का, हिजड़ा और न जाने किन किन अजीबोगरीब संबोधनों से पुकार कर मजे लेते हैं वहीं एक आदमी इस तरह का भी है जो कि दीदी कहने में न तो हिचकता है और न ही सबके सामने रेलवे स्टेशन पर ही प्यार और आदर से गले लगा लेता है। भाई से ट्रेन में अक्सर होने वाली मुलाकातें एक दिन मुझे उनके घर तक ले आयीं। घर आने पर मुझे उनके व्यक्तित्त्व के बारे में जो भी बचा खुचा भ्रम था वह दूर हो गया। एकदम सादगी भरा घर जिसमें किताबों, दवाइयों व कम्प्यूटर के अलावा कुछ खाने-पकाने का सामान और कुछ नहीं। इसी घर में यशवंत सिंह, गुरुदत्त तिवारी, अनिल रघुराज आदि आकर गये हैं। भाई ने धीरे-धीरे मुझे समझा-बुझा कर कम्प्यूटर बैठाया क्योंकि इससे पहले मैं जब भूमिका को लेकर एक कप्यूटर इंस्टीट्यूट सीखने गयी थी तो दूसरे दिन उस बंदे ने मुझे फीस वापिस लौटा दी थी ये कह कर कि आपके आने से दूसरे स्टुडेंट्स आना बंद हो जाएंगे। इस बात से जो गांठ मन में आ गयी थी उससे भाई ने मुक्ति दिला दी। बात-बात में गाली देने की आदत भी छूट गयी। एक दिन भाई ने कहा कि दीदी आपको अब अपनी बातें इंटरनेट पर लिखना है। हिचकिचाहट लगी लेकिन भाई के आग्रह के आगे झुकना पड़ा। हिजड़ा मनीषा भड़ास पर लैंगिक विकलांग मनीषा नारायण के नाम से आयी और सबके प्यार ने मनीषा दीदी बना दिया। मुझे याद है कि इस बीच एक महिला पत्रकार मनीषा पाण्डेय से यशवंत सिंह का कुछ विवाद हुआ था जिसके चलते यशवंत सिंह ने एक बड़ी सी पोस्ट मेरे अस्तित्त्व पर सवाल उठा कर भाई डा.रूपेश को कटघरे में खड़ा करा था कि वो बताएं कि मेरा अस्तित्त्व है या मैं कल्पित हूं। मनीषा पाण्डेय ने तो भाई को फोन करके अपने अंदाज में खोखली सी धमकी भी दी कि उसके परिवार के लोग कानून-कानून का खेल भाई के साथ खेलेंगे क्योंकि ये उसका मखौल उड़ाने के लिये बनाया हुआ एक काल्पनिक चरित्र है। मैं एक बार फिर क्षुब्ध हो गयी तब तक आत्मविश्वास इतना बढ़ा नहीं था लेकिन भाई ने संबल दिया और मैंने यशवंत सिंह के सवाल और मनीषा पाण्डेय को उत्तर दिया। यशवंत सिंह ने लिखा था कि मनीषा ’हिजड़ा’ के होने के बारे में डा.रूपेश स्पष्ट करेंगे। यशवंत सिंह ने इसी प्रकार दुनिया की पहली महिला उर्दू नस्तालिक ब्लागर मुनव्वर सुल्ताना यानि हमारी मुनव्वर आपा के अस्तित्त्व पर भी संदेह करा था। सच तो ये था कि दरअसल यशवंत सिंह ने कभी जीवन में कल्पना भी नहीं करी थी कि डा.रूपेश श्रीवास्तव जैसे भी लोग होते हैं। जब डा.रूपेश श्रीवास्तव मिल गये तो जितना लाभ उठाया जा सकता है भावनाओं में लेकर उठा लो क्योंकि कब ये आदमी अलग हो जाए पता नहीं।
आगे जारी रहेगी...
जय जय भड़ास

Read more...

मुनव्वर आपा!कुछ लोग आपकी ऊंचाई से जले मरे जा रहे हैं

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

जिस तरह मुनव्वर आपा ने अपने आसपास के परिवेश में सामाजिक व शैक्षणिक सक्रियता दिखायी और दुनिया की पहली महिला उर्दू(नस्तालिक) ब्लागर होने की ऊंचाई हासिल करी है उससे कुछ ईर्ष्यालु लोग अकारण जले भुने जा रहे हैं। मुझे याद है जब आपने पहली बार भड़ास पर अपनी उपस्थिति दर्शाई थी तो एक टुच्चे ने कहा था कि डा.रूपेश श्रीवास्तव ही हैं जो कि नाम बदल कर लिख रहे हैं दरअसल मुनव्वर सुल्ताना नाम की कोई शख्सियत नहीं है और यही हुआ था मनीषा दीदी के साथ जब उनके नाम से मिलते नाम की एक महिला पत्रकार ने डा.रूपेश श्रीवास्तव पर आरोप लगाया था कि भड़ासी उस मनीषा पांडे को सताने के लिये मनीषा नारायण नाम का लैंगिक विकलांग(हिजड़ा) काल्पनिक चरित्र गढ़े हुए हैं। समय आगे बढ़ता गया और भड़ासी बिना इन अवरोधों की परवाह करे आगे बढ़ते गये। भड़ास ने अपना अस्तित्त्व सिद्ध कर दिया कि हम हैं।
"माना कि एक क़तरा हूं मैं, मेरा वज़ूद तो है
होगा कोई सागर कहीं तलाश में मेरी"
मुनव्वर आपा ने भड़ास के मंच पर अपनी उपस्थिति के साथ ही आदरणीय डा.रूपेश श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में अपना ब्लाग "लंतरानी" (http://lantrani.tk) शुरू करा। उर्दू की लिपि के कारण बहुत तकनीकी दिक्कतें आयी साथ ही अपने साथ हितैषी का मुखौटा लगा कर खड़े कई लोगों के असल चेहरे भी सामने आए जो नहीं चाहते थे कि एक मुस्लिम औरत ब्लागिंग करके इंटरनेट पर अपने विचार रखे। इन सबके मुंह पर कालिख पुती हुई है और इनकी छाती पर सांप लोट रहे हैं ये देख कर कि "वुमेन औन टौप" मैगजीन ने इन पर स्टोरी करके बताया कि वे दुनिया की पहली महिला उर्दू(नस्तालिक) ब्लागर हैं। हम ईश्वर से मुनव्वर आपा के अच्छे स्वास्थ्य और सफ़लता की प्रार्थना करते हैं। वे इसी तरह से अपने क्षेत्र में सदा-सर्वदा प्रकाशवान रहें और अन्य लोगों को प्रेरणा देती रहें। हमारा सौभाग्य है कि वे हमारे साथ हैं और उनका प्रेम व आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ रहता है। आप सदा हंसते-मुस्कराते हुए हम सबको परेशानियों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देती रहें।
जय मुनव्वर आपा
जय जय भड़ास

Read more...

दुनिया की पहली महिला उर्दू ब्लागर हैं मुनव्वर आपा....., मुबारक हो

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

आज तक मैं मुनव्वर आपा को एक तेज तर्रार भड़ासिन के रूप में पहचानता था। कभी उनसे मुलाकात का सौभाग्य नहीं हो पाया। उनकी लेखनी की प्रखरता तो बस कमाल की है। उनका लिखना मैं एक लम्बे समय से पढ़ता आ रहा हूं, सच कहूं तो भड़ास से जुड़ने की प्रेरणा ही उनका लेखन रहा है। आज पत्नी के लिये "वूमेन औन टौप" नाम की पत्रिका लेकर आया तो पन्ने पलटने पर अंदर देखा कि मुनव्वर आपा के ऊपर मिसाल-बेमिसाल नामक स्तंभ में प्रकाशित हुआ है। मैं भड़ास पर उनका चित्र हजारों बार देख चुका हूं तो पहचानने में कैसे चूक हो सकती थी लेकिन एक आश्चर्य भी हुआ कि क्या लोग भड़ासियों को भी तवज्जो देते हैं। एक बड़ी बात पता चली कि हमारी आदरणीय मुनव्वर आपा दुनिया की पहली उर्दू(नस्तालिक लिपि) की महिला ब्लागर हैं। एक बात और काबिले तारीफ़ है कि उनका बेटा भी भड़ास पर है और बेटी भी दोनो बादशाह बासित और फ़रहीन नाज के नाम से लिख रहे हैं। कमाल का परिवार है न? इन दोनो को भी मैं भड़ास पर तस्वीर देख कर ही पहचानता हूं, इस ब्लागर परिवार से मिलना चाहता हूं। मुनव्वर आपा के ब्लाग "लंतरानी" भी कई बार जाता हूं ताकि उर्दू ट्यूटोरियल पर चल रहे वीडियोज़ से उर्दू सीख सकूं, जिन्हें कि मुनव्वर आपा खुद सिखा रही हैं। एक बार फिर आपा को इस अप्रितम उपलब्धि पर हार्दिक बधाई हो।

ये उस लेख का पहला पन्ना है जिसे मैंने एक वेबसाइट से उठाया है
मैं कोशिश कर रहा था कि उसे डाउनलोड कर सकूं लेकिन उस वेबसाइट ने कुछ खुराफ़ात कर रखी है। कोई बात नहीं आप इसके लेखक श्री राममिलन मौर्य को भी शुभेच्छा दे सकते हैं। भड़ास और भड़ासी इसी तरह नये कीर्तिमान रचते रहेंगे। मुनव्वर आपा ने अपनी सफ़लता का श्रेय गुरुदेव डा.रूपेश श्रीवास्तव जी को दिया है जो कि बिलकुल सही है। वो सचमुच एक महान और गहरे व्यक्तित्त्व के मालिक हैं जो कि सामने देखने पर कई बार समझ में नहीं आता लेकिन बहुत नजदीक से समझ आता है कि ये इंसान सचमुच प्रशंसा का पात्र है। मुझे पता है कि बादशाह बासित और बहन फ़रहीन नाज़ को भी हमारे गुरुदेव ने ही ब्लागिंग सिखायी होगी।
जय जय भड़ास

Read more...

मुनव्वर आपा को हार्दिक शुभेच्छा

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

मुनव्वर आपा ने जिस तरह से मेहनत करी है और नस्तालिक लिपि में ब्लागिंग करने का साहस जुटाया है वह निःसंदेह प्रशंसनीय है। भड़ास के मंच ने लोगों को अपने भीतर दबी कुचली कुंठाओं तक को बाहर उगल कर निर्मल हो जाने का मार्ग दिया है वह सचमुच चमत्कारिक प्रभाव युक्त है। चाहे मुनव्वर आपा हों या मनीषा दीदी इन लोगों को इनके लौह दायरों से बाहर ला पाना भड़ास पर ही संभव हो पाया। जाहिर सी बात है कि इसमें सारे भड़ासियों का एक दूसरे के प्रति असीमित प्रेम आधार बनता है।

मुनव्वर आपा घरेलू माहौल में SEA&WE(Social,Educational Awareness & Women Empowerment) संस्था के सक्रिय सदस्यों के साथ, बांये से दांये : हुमा नाज़, आयशा आपा, सफ़िया आपा, मुनव्वर आपा
सारे भड़ास परिवार की तरफ़ से आदरणीय मुनव्वर आपा को बधाइयां। मुंबई में ये पत्रिका अब तक नहीं आयी है। शायद कल परसों तक आ जाए।
जय मुनव्वर आपा
जय जय भड़ास

Read more...

अब कसाब और उस जैसे हरामियों को रोज़ा रखने का कोई अधिकार नहीं है

रविवार, 23 अगस्त 2009

मुंबई पर आतंकी हमला करके पौने दो सौ बेकुसूर मासूमों को निर्दयता से मार डालने वाले नरपिशाचों अजमल कसाब, फ़हीम अंसारी और सब्बाहुद्दीन शेख को आज से शुरू होने वाले मुस्लिमों के पवित्र माने जाने वाले महीने में रोज़ा रखने की हमारी सरकार की संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत चलने वाली विशेष अदालत ने अनुमति दे दी है। अब इससे क्या होगा? इससे होगा ये कि एक संदेश जो कि सारे देश में जाएगा कि रोज़ा रख कर अल्ला को प्रसन्न करने वाले ऐसे भी होते हैं और इनसे हमारी सरकारें भी ड्रती हैं वरना पूछ सकती थी अदालत कि क्या तुम अब भी अपने आप को मुसलमान मानते हो जबकि इतने बेकुसूरों के खून से तुम्हारे हाथ रंगे हुए हैं लेकिन मामला चूंकि अलालती है तो उसमे धर्म पर कोई रोकटोक नहीं है। कल को अगर साध्वी प्रग्या ठाकुर और कर्नल पुरोहित जेल में दुर्गा पूजा और गणपति की स्थापना करना चाहेंगे तो क्या सरकारी अदालत उन्हें अनुमति देगी। अब इन राक्षसों के लिये सरकार सहरी और अफ़्तारी के समय का ध्यान रखेगी और सही समय पर भोजन देकर वे रोज़ा खोल सकें, अल्ला की इबादत करें इस बात के लिये सरकार उनकी सहायता करेंगी। घिन आने लगी है मुझे ऐसी धार्मिक व्यवस्था और ऐसी न्यायिक प्रणाली से। देश का कोई कठमुल्ला मुस्लिम संगठन आगे आकर बोलने की हिम्मत नहीं रखता कि अब कसाब और उस जैसे हरामियों को रोज़ा रखने का कोई अधिकार नहीं है शायद क्या वे सब वैचारिक तौर पर उससे सहमत हैं कि जो उसने करा वह एक मुसलमान कर सकता है?????? इस सवाल के आगे लाखों सवालिया निशान भी कम हैं।
जय जय भड़ास

Read more...

भड़ास फ़ैन क्लब/एग्जास्ट फैन क्लब/कूलर क्लब/ए.सी. क्लब में मैं कहां रहूंगी? (अतीत के पन्ने से......)

शुक्रवार, 1 मई 2009

भड़ासी बाईयों और भाईयों, जब किसी साम्राज्य का विस्तार हो जाता है तो उसमें फटाव आने लगता है और अलग-अलग विचार धाराएं पैदा होने लगती हैं। ठीक वैसा ही भड़ास के साथ हो रहा है। पहले यहां सब भड़ासी मात्र हुआ करते थे अब इनमें भी श्रेणियां बनने लगी हैं। कुछ सक्रिय, कुछ निष्क्रिय, कुछ अक्रिय लेकिन भड़ासी तो सभी हैं क्योंकि जो कभी एकाध बार गलती से इधर मुंह मार लिये होंगे। अब भड़ास में फ़ैन क्लब बना है यानि कि जो फैन हैं वही भड़ासी हैं बाकी सब जो हैं नाम के भड़ासी हैं लेकिन उनकी सदस्यता अक्रियता या निष्क्रियता के आधार पर समाप्त करी तो गिनती के मुश्किल से पचास ही बचें शायद। मैं एक भविष्यवाणी कर रही हूं कि आने वाले समय में इस क्लब में कई विभाजन हो जाएंगे जैसे कि अभी कुछ लोग फैन हैं उनमें से जो ज्यादा सक्रिय होंगे उन्हें "एग्जास्ट फैन" कहा जाएगा, जो इनकी अपेक्षा अधिक सक्रिय होंगे उन्हें "कूलर" और जो कूलरॊं से ज्यादा सक्रिय होंगे उन्हें "ए.सी" की श्रेणी में रखा जाएगा।

Read more...

क्या हरकीरत हकीर मुनव्वर आपा की मां है???

रविवार, 12 अप्रैल 2009

मैं कुछ दिन से अपनी परीक्षाओं में व्यस्त रही लेकिन भड़ास चूंकि जीवन का हिस्सा है तो फिर भला इससे ज्यादा वक्त अलग कैसे रहा जा सकता है। देखा तो हरकीरत हकीर के पक्ष में तमाम मुखौटा लगा कर शराफ़त का ढोंग करने वाले धूर्त लार टपका-टपका कर सहला रहे हैं सब अपनी अपनी राय दे रहे हैं लेकिन किसी ने उस औरत से ये नहीं पूछा कि हरकीरत बाई जी तुम क्या तुम मुनव्वर सुल्ताना की मां हो या फिर कुछ ऐसे रिश्ते में आती हो कि तुम्हें उनके अब्बा हुजूर ने अधिकार दे दिया कि तुम उनका नाम सुल्ताना से बदल कर "उलटाना" कर दो??? इस औरत का मुनव्वर आपा ने इस बात की तरफ़ अपने अंदाज़ में ध्यान भी दिलाया लेकिन इसे कहां परवाह है ये तो उनसे पता नहीं कौन सा रिश्ता जोड़े बैठी है जो इस बारे में अपना हक समझती है कि नाम ही बदल देगी। अभी भी अगर जरा सी शर्म बाकी है तो माफ़ी मांग कर गलती सुधार ले भड़ासी तो बड़े भोले हैं लेकिन महाऔघड़ी हैं ये याद रखना। पीछा नहीं छूटेगा शब्दप्रपंच करने से......
जय जय भड़ास

Read more...

हरकीरत मैडम जी भड़ास का डा.रूपेश श्रीवास्तव भी एक काल्पनिक पात्र है मुखौटों का मेला लगा हुआ है

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

मैं डा.रूपेश श्रीवास्तव हरकीरत मैडम(???? पता नहीं कि मैडम हैं या एडम या फिर कोई हिजड़ा मनीषा दीदी जैसा) को बता रहा हूं कि मुनव्वर सुल्ताना क्या और क्या कोई लैंगिक विकलांग मनीषा या ऐसी पच्चीसों ...... ये सब मैं ही तो हूं; इन सबका कोई अस्तित्व नहीं है ये सभी काल्पनिक हैं दरअसल सच तो ये है कि डा.रूपेश श्रीवास्तव भी एक काल्पनिक पात्र है जिस पर पच्चीसों लोग खुद अपने आपको होने की घोषणा लिख कर दुनिया के सामने कर चुके हैं। चूंकि ये एक ऐसा नाम और एकाउंट है जिसे अधिकांश भड़ासी इस्तेमाल करते हैं यहां तक कि मैं भी..... मेरा तो कोई नाम नहीं है मैं आप लोगों की तरह नहीं हूं बेनाम हूं अनाम हूं गुमनाम हूं लेकिन शायद हूं जरूर इसलिये लिखता हूं चेहरा नहीं है अस्तित्व नहीं है व्यक्तित्व नहीं है तो मुखौटा लगाने का आधार भी नहीं है।
हरकीरत हक़ीर को एक छोटा सा टिप्पणा नज़र करके आया हूं आप सब भी देखिये, मुखौटों का मेला लगा हुआ है ..............
आदरणीय हरकीरत जी कहने में जो हिचकिचाहट आपने उपजा दी है सो न ही कहूं तो शायद सहज हो सकूंगा वो इसलिये कि खुद एक छद्मवेशधारी जो मुझे ये कह रहा है कि मैं मुनव्वर सुल्ताना के बुर्के में छिप कर कुछ कर रहा हूं और आप उस जड़बुद्धि से सहमति जता रही हैं तो मुझे उस गलीज़ के साथ आपकी भी बुद्धि पर तरस आने लगा है कि कितना हलका वजन है आपकी सोच का....
मैडम जी डा.रूपेश श्रीवास्तव ने आज तक कोई काम छिप कर नहीं करा वरना आप लोगों की शराफ़त की कतार में सबसे आगे बैठा होता। डा.रूपेश श्रीवास्तव का एक ही रूप है और वो है भड़ास जो कि आप सबके सुन्दर मुखौटों से ज्यादा बदसूरत लग सकता है जिसकी मैंने कभी परवाह नहीं करी। मुनव्वर सुल्ताना कब की बुर्के से बाहर आ चुकी हैं लेकिन आप अपने "महिला"पन नापने का न जाने कौन सा पैमाना लेकर ये नाप रही हैं कि वो सब मेरा लिखा है। गलती से भड़ास पर जाइये तो आपको पता चल जाएगा कि डा.रूपेश श्रीवास्तव एक इंसान नहीं है ये कम से कम पच्चीस लोगों ने लिखा है कि वे हैं डा.रूपेश श्रीवास्तव.... भड़ास के मंच पर महिला पुरुष और हिजड़े सभी लिखते हैं भड़ास इन सबसे कब का मुक्त हो चुका है जो ये नहीं चाहते कि सड़ी-गली परंपराए टूटें या महिलाएं बुर्के से बाहर आएं या इनके घरों में जन्में हिजड़े बच्चे तालियां बजा कर भीख मांगना छोड़ कर आप शरीफ़ों के साथ आएं तो आपको मुबारक हो आपकी बौद्धिकता हमें तो हमारी कुंठाएं,गंवारूपन,भदेसपन और ओछापन ही सही लगा। समीर लाल जी को बताना है कि जब मनीषा नारायण ने अर्धसत्य ब्लाग बना कर मेरे सहयोग से लिखना शुरू करा तो इनकी करुणा का मुखौटा सामने न आया लेकिन जब गुरूदेव ने सारथी पर हिजड़ो पर कलम चलाई हमें निर्देशित करने के लिये तो पहुंच गए सहानुभूति के श्लोक पढ़ने, हिन्दी का कोई भी ब्लागर अगर खांसी या छींक पर भी लिखे तो जनाब की टिप्पणी पहुंच जाती है पर हिजड़ा कैसे लिख सकता है वो भी ब्लागर बनकर.... महाराज मुखौटा कभी व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं बनता ये आप भली प्रकार जानते हैं लेकिन क्या करें मजबूरी है कि इस बात पर एक लाइन लिखने से काम नहीं चलेगा तो किचकिचा कर बौद्धिक शब्दप्रपंच कर डाला। बेटा राजेश स्वार्थी भड़ास के बारे में जानने के लिये तुम्हें इंटरनेट पर अभी ब्लागिंग के बारे में बहुत कुछ जानना बाकी है खाली ब्लाग बना लेने से कुछ नहीं होता कंटेंट डालना पड़ता है भले चोरी का ही डालो:)बच्चे भड़ास स्पष्टवादिता में मुंहफ़ट होने की हद से आगे है दुनिया सबसे कुख्यात हिंदी ब्लाग है कभी गलती से किसी सर्च इंजन को इस्तेमाल कर लेना। अरविंद मिश्रा जी आप जिस टीम के सिरमौर हैं उसके सचिव जी से मेरे बारे में और भड़ास के बारे में जान लीजियेगा मैं वही हूं जो आयुषवेद नाम की दुकान ब्लागिंग के क्षेत्र में मुफ़्त में चला रहा हूं,खुद ही समझ जाएंगे कि मेरी सोच क्या है। मैडम जी आप कहती हैं कि हमने इस मोहतरमां को माफ़ किया ...कृपया इनसे कहिये दोबारा मेरे ब्लॉग का रुख न करें ...!! आपको मुझ उजड्ड की ओर से बिनमांगी सलाह है कि आप सिर्फ़ खास पाठकों के लिये ही सेटिंग में जाकर अपने ब्लाग को जमा लें ताकि हम जैसे गंदे लोग न आ सकें।
हरी जोशी जी तो पता नहीं किस दुनिया में रमण करते हैं कि यशवंत सिंह का मुखौटा नोच कर ही भड़ासियों ने उन्हें उनके ब्लाग का नाम ही बदल देने पर मजबूर कर दिया,भड़ास उस ब्लाग का नाम है जिसे हम सब चलाते हैं जिसका URL http://www.bhadas.tk है हम भड़ासियों ने हिंदी ब्लागिंग में यू आर एल बदल कर पहले इसे bharhaas.blogspot.com बनाया फिर उसे पुराने परिचय पर लौटाने के लिये नए स्थान पर डाइवर्ट करा,इस डाके के लिये बड़ी मशक्कत करनी पड़ी लेकिन इतनी बड़ी करतूत किसी ब्लागर ने न देखी न ही किसी ने.... शराफ़त अलियों के सिरमौर यशवंत सिंह बकौल अविनाश वाचस्पति उस पाखंडी का मेल आई डी दे रहे हैं,क्या होगा इससे? अरे भाई उसका पाखंड खुल जाएगा कि उसने क्या करा था भड़ास और भड़ासियों के साथ? क्या कारण है कि उसे अपने ब्लाग का नाम भड़ास से बदल कर भड़ासblog करना पड़ा???मामले को भड़ास पर प्रकाशित करना धमकी नहीं है वो एक कम्युनिटी ब्लाग है जिसके स्वप्न जी भी सदस्य हैं पूछ लीजिये उनसे और मनु बाबू भड़ास के दूसरे माडरेटर रजनीश के.झा से बड़ा गहरा प्रेम जताते नहीं थकते। अगर कभी आपमें से कोई शारीरिक तौर पर अस्वस्थ महसूस करे और लगे कि मैं बुरा आदमी होने के साथ एक अच्छा चिकित्सक हूं तो निःसंकोच संपर्क करें, इस बुरे आदमी में अगर आप अच्छे लोग चाहें तो अच्छाइयां तलाश सकते हैं लेकिन मुखौटे में न आएं।
जय जय भड़ास

Read more...

आदरणीय हरकीरत बहन से बिना शर्त माफ़ी चोरी के लिये

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

Harkirat Haqeer said...
आदरणीय डा.रुपेश जी,आपसे मै सिर्फ एक सवाल पूछना चाहती हूँ अगर आपकी किसी रचना को कोई अपने नाम से प्रकाशित करता तो आप क्या करते...?? मुनव्वर जी क्या जाने मैंने ये रचनाएँ किन हालातों में , कितने दर्द के बीच गुजरते हुए लिखीं हैं ....अगर शब्दों के हेर फेर से ही नज्में लिख हो जाएँ तो आज हर कोई अमृता, परवीन या ग़ालिब हो......हाँ मुझे आपत्ति है क्योकि इन नज्मों में बसे दर्द के साथ मैंने बरसों काटे हैं ...उन्हें भोगा है...ओढा है ...अपने सीने में बरसों दफ़न कर रखा है ...अपने आंसुओं से सींचा है मैंने...तो अब इतनी जल्दी किसी और के साथ कैसे जाने दूँ ...?? पहले वो बरसों की तड़प लाये...वो सिसकियाँ लाये ...हाँ मुझे तकलीफ है क्योकि ये दर्द सिर्फ मेरा है.......जब जिस्म चीर कर कुछ लिखा जाये रुपेश जी तो दर्द तो होता ही है.....!!
April 5, 2009 9:12 AM

आदरणीय हरकीरत बहन जी,मैं आपसे मुनव्वर सुल्ताना जी और उनके जैसे तमाम भोले चोरों की तरफ़ से बिना शर्त माफ़ी मांगता हूं लेकिन जब तक आप इन तमाम बातों पर विमर्श नहीं करतीं उन्होंने कहा है कि वे उस रचना को ब्लाग पर से हरगिज न हटाएंगी क्योंकि छिछॊरपन और बेशर्मी का आरोप जो आपने लगाया उन्होंने उसे भी सहर्ष स्वीकार लिया है साथ ही आपने उनके चित्र सहित लंतरानी की जो लिंक अपने महाप्रसिद्ध ब्लाग पर लगा कर सहयोग करा है उसके लिये हार्दिक धन्यवाद कहा है और साथ ही पूछा है कि अब जब पता चल ही गया है कि आप इतनी महान नज़मनिग़ारा हैं तो जितनी भी बिना नाम की रचनाएं पसंद आएंगी और लंतरानी पर लिखना होगा उन्हें benefit of doubt के अंतर्गत आप का ही मान लिया जाएगा जिसके लिये वे आपके ब्लाग की लिंक लगाने की अनुमति चाहती हैं। अब आपकी बारी है कि आप अपनी विशाल सोच का परिचय दें। उम्मीद है कि आप मेरी सोच से सहमत न होंगी मैं सहर्ष धन्यवाद करूंगा उस व्यक्ति को जिसने ऐसा करा कि मेरी रचना को अपना कह दिया है जैसे कि मेरे बच्चे को सभी उतना ही प्यार करें जितना कि मैं करता हूं। आप जिन सिसकियों और दर्द के साथ जिस्म को चीर कर काव्य लिखने की बात कर रही हैं वह भी मात्र शब्द प्रपंच नहीं है तो और क्या है? जितने भी लोग सिसकते हैं पीड़ित और उत्पीडि़त होते हैं आपकी तरह कविता नहीं लिख कर व्यक्त करते तो क्या दर्द और पीड़ा की अभिव्यक्ति का कापीराइट ले लेते हैं। बहन जी दर्द की एक मात्र अभिव्यक्ति होती है और वो है रोना न कि कविता लिखना ये एक चिकित्सक से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। दरअसल आपकी छटपटाहट का कारण तो ये है कि आपको लग रहा है कि आपकी प्रसिद्धि जो इतनी महान-महान रचनाओं से आपको हासिल है वह शायद मुनव्वर सुल्ताना जी ने चुरा ली। अरे बहन जी! जब आप देख रही हैं कि उन्होंने कहीं ये नहीं कहा कि ये रचना उनकी है और उन्होंने माना है कि आपकी रचना है जो कि उन्हे पता न था जैसा कि उन्होंने घटना का उल्लेख भी करा है मात्र उर्दू में तर्जुमा करा है तो फिर इतना कष्ट किसलिये? कहीं इस बात का कष्ट तो नहीं है कि आपका दर्द बिना आपका नाम जाने उर्दू जानने वाले भी जान गये। दो तरह के लोग देखे हैं एक तो वो जो किसी पीड़ित इंसान या हैवान की पीड़ा को दूर करने के लिये औषधि की व्यवस्था करते हैं दूसरे वो जो सबको जाकर उसकी पीड़ा की कविता,नाटक और कहानी सुना कर शराफ़त जताते हैं कि वे उसकी पीड़ा से कितने दुखी हैं,इस तरह की छ्द्म सहानुभूति कितनी उपयोगी है इस बात का उत्तर दीजिएगा यदि हो तो वरना मुझे भी छिछोरा और बेशर्म कह कर चुप हो जाइयेगा क्योंकि आपने ये बता दिया कि आपके दर्द और संवेदनशीलता का असली चेहरा क्या है। जिस्म चीर कर या तो हत्या होती है या फिर शल्य चिकित्सा, कविता नहीं लिखी जाती ये महज शब्दाडंबर है जो कि मेरे जैसे जाहिल लेकिन दूसरों का सचमुच दर्द महसूस करने वाले चिकित्सक को तो भली प्रकार पता है। किसी स्त्री के पीठ पर पड़े जूतों के निशानों में कला और कविता तलाशना कम से कम मैं अब तक न सीख पाया। दर्द महसूस करने के लिए वेबपेज से बाहर आकर दर्दियों को देखना होता है और ये काम कर रहा हूं इसके लिये किसी नाम या पैसे की जरूरत नहीं है। आप मात्र मानसिक श्रम करने वाली एक श्रमिक हैं जिसके श्रम का मूल्य कोई भी प्रकाशक देकर सारे अधिकार प्रकाशकाधीन कर लेता है तब दर्द और संवेदनाएं वगैरह सिर्फ़ रायल्टी का साधन होते हैं। बस एक अंहकार रहता है कि इस रोने चिल्लाने वाले जाहिलों की पीड़ा को कितने सुंदर शब्दों में बांधा है और इस बात के लिये वाहवाही तो मुझे ही मिलना चाहिये। जब कोई पीड़ा आपको हुआ करे तो दवा लेने की बजाए कविता लिख कर अपने टिप्पणीकारों की नजर कर दिया करिये यकीन मानिये कि आप जैसी संवेदनशील कवियत्री का दर्द दूर हो जाएगा। अगर इतना ही भय है कि कोई आपका "दर्द" चुरा लेगा या उसमें शरीक हो जाएगा तो उस दर्द को दुनिया के सामने दिखाने की जरूरत नहीं है।
कुछ बातें आपके टिप्पणीकारों के लिये भी हैं जो भड़ास पर अपना मुखौटा लेकर आने तक का साहस नहीं करते जैसे कि समीरलाल जो कि उड़नतश्तरी के नाम से लिखते हैं खुद को अत्यंत संवेदनशील दर्शाते हैं कोई कुछ भी लिखे तो तत्काल टिप्पणी करने पहुंच जाते हैं, लैंगिक विकलांग(आप जैसे संवेदनशील लोगों के लिए "हिजड़ा") मनीषा नारायण के ब्लाग अर्धसत्य पर कभी एक टिप्पणी देने कोई आगे नहीं आए लेकिन जब बाबू जी ने लिखा तो पहुंच गये शराफ़त का पोटला लेकर कि भाई हम भी सहानुभूति रखते हैं। बस एक व्यक्ति ने साहस करा जिन्होंने वेबपेज से आगे आकर मनीषा नारायण के प्रति न सिर्फ़ सहानुभूति और प्रेम जताया वरन उन जैसे सभी की पीड़ा को बखूबी समझा और अपने ब्लाग पर लिखने के साथ ही इन सबसे सीधा जुड़ाव भी स्थापित करा वो एकमात्र इंसान हैं गुरूवर्यसम शास्त्री जे.सी.फिलिप। मैं निजी तौर पर कहता हूं कि क्यों किसी ने एक पूरा ब्लाग भड़ास ही चोरी हो जाने की चर्चा तक नहीं करी क्योंकि वे सब स्वयंभू शरीफ़ हैं बस आपकी कविता की "चोरी" की सूचना देने और भर्त्स्ना करने दौड़ पड़े और चोरी भी ऐसी है कि जिसका सामान दुनिया के सामने रखा है एक वैश्विक मंच पर जबकि आपके द्वारा चोरनी ठहरा दी गयी मुनव्वर आपा ने बताया है कि उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं थी। क्या सामाजिक सरोकार है ऐसे लोगों के जीवन का बस बड़ी-बड़ी बातें,सिद्धांतों और आदर्शों की जुगाली करना लेकिन जब सचमुच में समाज को इनकी जिन कोनो पर जरूरत है वहां से ये कोसों दूर हैं क्योंकि वहां तो बदबू है गंदगी है बुराइयां है। पाखंडी और ढकोसलेबाजों के जिस जमावड़े से आपने कहा है कि सभी ब्लागर एकत्र होकर आपको न्याय दिलवाएं वो खुद अपनी मदद नहीं कर सकते आपके लिये क्या आगे आएंगे? चार शब्द टिप्पणी में लिख दिये तो आप लगीं इनके आगे रोने कि न्याय दिलवाएं। आपकी बात सुनते हैं तो जरा इन सबको किसी सामाजिक मुद्दे पर आफ़लाइन एकजुट करिये आपको पता चल जाएगा।
अंतिम बात कि कम से कम मेरे नाम के आगे "आदरणीय" जैसा गरिष्ठ शब्द न लगाएं मैं जरा भी आदरणीय नहीं हूं आप हैं न सिर्फ़ आदरणीय बल्कि पूज्यनीय क्योंकि आप कवियत्री हैं शब्दों में अपने दर्द को बताती हैं न कि रो-चीख कर............
जय जय भड़ास

Read more...

डॉ. रूपेश श्रीवास्तव मैं ही हूं

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

कौन कहता है कि मुनव्वर सुल्ताना का कोई असल वजूद है मैं ही तो हूं डॉ. रूपेश श्रीवास्तव। वो तो मात्र एक विचार है जो हर उस व्यक्ति में है जो सच्चा है और सच के हक़ में लड़ने का साहस रखता है जैसे अमर शहीद भगत सिंह हुआ करते थे। आज मैं इस आभासी संसार में खुल कर एलान करती हूं कि असली डॉ. रूपेश श्रीवास्तव मैं ही हूं। लंतरानी नामक ब्लाग http://merilantrani.blogspot.com मैं ही तो लिख रही हूं यकीन करिये मैं ही हूं डॉ. रूपेश श्रीवास्तव.......
जय जय भड़ास

Read more...

सलीम भाई, चलिये विमर्श आगे ले चलते हैं अच्छा विषय है....

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

सलीम भाई, आपकी बातों को पढ़ा निःसंदेह आपने जो भी लिखा है कम से कम उसमें आलोचना की भी गुंजाईश छोड़ी है वरना अगर आप भी लट्ठ लेकर खड़े हो जाते तो बात आगे ही न बढ़ पाएगी और विमर्श का मार्ग ही बंद हो जाएगा। आप और सभी भड़ासियों व भड़ास-प्रेमियों की सेवा में अपने विचार प्र्स्तुत कर रहा हूं आशा है कि विमर्श आगे बढ़ सकेगा।
1- अगर एक मर्द के पास एक से अधिक पत्नियाँ हों तो ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे के माँ-बाप का पता आसानी से लग सकता है लेकिन वहीँ अगर एक औरत के पास एक से ज़्यादा पति हों तो केवल माँ का पता चलेगा न कि बाप का इस्लाम माँ-बाप की पहचान को बहुत ज़्यादा महत्त्व देता है मनोचिकित्सक कहते है कि ऐसे बच्चे मानसिक आघात और पागलपन के शिकार हो जाते है जो जो अपने माँ-बाप विशेष कर अपने बाप का नाम नहीं जानते अक्सर उनका बचपन ख़ुशी से खाली होता है इसी कारण तवायफों (वेश्याओं) के बच्चो का बचपन स्वस्थ नहीं होता यदि ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे का किसी स्कूल में अड्मिशन कराया जाय और उसकी माँ से उस बच्चे के बाप का नाम पूछा जाय तो माँ को दो या उससे अधिक नाम बताने पड़ेंगे
भाई आप कौन सी सदी में रह रहे हैं आजकल आप डी.एन.ए. टैस्ट करा कर किसी के भी माता-पिता के बारे में जान सकते हैं क्या आप तकनीक की तरक्की को सिरे से खारिज कर देने के पक्ष में हैं? आजकल स्कूल में दाखिले के समय पिता के नाम की अनिवार्यता इसी लिये समाप्त कर दी है ताकि सभ्य समाज की से तिरस्कार करी गयी वेश्याओं के बच्चे भी स्कूल में सहज भाव से जा सकें शिक्षा का क्षेत्र तो कम से कम इन पोंगापंथी परंपराओं से मुक्त हो चला है। मैं निजी तौर पर तवायफ़ों के बच्चों को पढाने जाता हूं और सभी को प्रेरित करता हूं कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजें ताकि जिल्लत से मुक्त होने में मदद मिले। शिक्षा ही हीनभावना और अपराधबोध से मुक्ति दिलाने में सहायक हो सकती है। मुझे एक भी ऐसा बच्चा पागल या मनोरोगी नहीं मिला , आपको किन मनोचिकित्सकों ने ये तथ्य दिया है मुझे अवश्य बताइये।
2- मर्दों में कुदरती तौर पर औरतों के मुकाबले बहुविवाह कि क्षमता ज़्यादा होती है
क्या ये तथ्य भी आपको किसी धार्मिक किताब में पढने को मिला है? मैंने तो आयुर्वेद(कामसूत्रम और कोकशास्त्र) में पढ़ा है कि स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा कामक्षमता आठ गुना अधिक होती है। मैं एक चिकित्सक होने के नाते इस बात से साफ़ तौर पर असहमत हूं कि कुदरत ने कुछ ऐसा वरदान(?) पुरुषों को दिया है और सामाजिक अध्ययन के अनुसार कह सकता हूं कि ये एक निहायत ही भ्रामक तथ्य है। इस बात पर मैं किसी भी जानकार से शास्त्रार्थ करने को कभी भी तैयार हूं।
3- बायोलोजी के अनुसार एक से ज़्यादा बीवी रखने वाले पुरुष एक पति के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना आसान होता है जबकि उसी जगह पर अनेक शौहर रखने वाली औरत के लिए एक पत्नी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना संभव नहीं है विशेषकर मासिकधर्म के समय जबकि एक स्त्री तीव्र मानसिक और व्यावहारिक परिवर्तन से गुज़रती है
कर्तव्यों का निर्वाह करना बायोलाजी का क्षेत्र न हो कर अपितु समाज शास्त्र का विषय है। एक से अधिक पत्नी होना या पत्नी के विवाहेतर संबंध हमेशा से ही पारिवारिक कलह और हत्या जैसे आपराधिक घटनाओं के पीछे पाए जाते हैं।
4- एक से ज़्यादा पति वाली औरत के एक ही समय में कई ....... साझी होंगे जिसकी वजह से उनमे ...... सम्बन्धी रोगों में ग्रस्त होने की आशंका अधिक होंगी और यह रोग उसके पति को भी लग सकता है चाहे उसके सभी पति उस स्त्री के अन्य किसी स्त्री के साथ ....... सम्बन्ध से मुक्त हों यह स्थिति कई पत्नियाँ रखने वाले पुरुष के साथ घटित नहीं होती है
ये आपने किस साइंस की किताब में पढ़ लिया है भाईसाहब? क्या एड्स की बीमारी स्त्री या पुरुष देख कर फैली है? यदि एक पति सुजाक या सिफ़लिस जैसे यौनरोग से ग्रस्त है तो वह अपनी सभी पत्नियों को लगे हाथ एक साथ बीमार कर सकता है, एड्स का शिकार बना सकता है।
और भी बहुत से कारण है इंशा अल्लाह वक़्त मिला तो उन्हें भी छापूंगा जिससे ये आसानी से समझा जा सके कि क्यूँ इस्लाम औरत को एक से ज़्यादा शौहर (पति) रखने कि इजाज़त नहीं देता है? इसके अलावा अन्य बहुत से कारण हो सकते हैं तभी तो परमपिता परमेश्वर/अल्लाह ने स्त्रियों के लिए एक से ज़्यादा पति रखने को पूर्णतया वर्जित कर दिया
इस संबंध में तो बस मैं अपनी निजी सोच न कह कर मुनव्वर आपा की बात को शब्दशः दोहराना चाहता हूं कि चाहे इस्लाम हो, सनातन धर्म हो, यहूदी हों, पारसी हों अथवा संसार की कोई भी मजहबी सोच वह मात्र पुरुष प्रधान है यही वजह है कि ईश्वर, अल्ला या वह जो भी है कभी स्त्री के रूप में क्यों अवतरित नहीं होता? क्या वजह है कि एक लाख चौबीस हजार नबियों और भगवान विष्णु के सारे अवतार पुरुष रूप(मोहिनी रूप को छोड़ कर क्योंकि वह कुछ खास महत्त्वपूर्ण स्थान में हैं ही नहीं) में ही हैं???
जल्द ही आपकी सेवा में अगली पोस्ट मुनव्वर आपा की होगी जो मैं खुद पोस्ट करूंगा किंतु विचार उनके निजी हैं यह एक काफ़ी पुरानी पोस्ट होगी जो कि भड़ास(पंखों वाली) पर प्रकाशित हो चुकी है जब कि रक्षंदा अख्तर रिज़वी ने कुछ बातें उठायी थीं। इस पोस्ट का शीर्षक था
--नमाज के पाश्चर्स अच्छे फिजिकल एक्सर्साइजेस हैं ,क्या बस यही साइंस मान्य है????
जय जय भड़ास

Read more...

उर्दू नाटक "ये किसका लहू बहा..ये कौन मरा" का मंचन

मंगलवार, 20 जनवरी 2009

मुंबई में २६नवंबर को हुए आतंकी हमले पर आधारित एकपात्रीय नाटक के बाद कविता "कबूतर लौट आयेंगे"को अभिव्यक्ति देते उर्दू मंच के मंझे हुए कलाकार, बांए से दांए- वैभव देशमुख,मजहर शेख,मोहिनी

वैभव ने मंच पर जो अभिनय की आग धधका दी उसे और भड़काए रखा मोहिनी ने फिर मजहर ने...
बांए से दांए: डांबर वाले का किरदार करने वाले श्री वैभव देशमुख, मनसुख पटेल की आत्मा के किरदार को अभिनीत करने वाले श्री मजहर शेख, नाटक के लेखक-निर्देशक उर्दू अदब के नामचीन ड्रामानिग़ार श्री इक़बाल नियाज़ी, घरेलू किस्म की महिला संगीता राजन खरे के किरदार में जादू जगाने वाली कु.मोहिनी(ये मुंबई के एक एफ़.एम.रेडियो चैनल में रेडियो जाकी है)।
नाटक का नाटक खत्म करते करते मुझसे जब औपचारिकताएं सहन न हुईं तो मैं भड़ासी अंदाज में चढ़ गया मंच पर और भाई को गले लगा कर दे डाली जोरदार शुभकामनाएं........
बांए से दांए: मनीषा नारायण,भाई इक़बाल नियाजी,मुनव्वर सुल्ताना
भाई इक़बाल नियाजी को हम सब भड़ासियों की तरफ से इस गहरे संवेदना भरे नाटक के सफल मंचन की हार्दिक शुभकामनाएं और उम्मीद है कि भाई जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्रादि की खाई को पाटने का काम इसी तरह संतो की तरह जारी रखेगें,भड़ास इनके जज़्बे को सलाम करता है.....
जय जय भड़ास

Read more...
प्रकाशित सभी सामग्री के विषय में किसी भी कार्यवाही हेतु संचालक का सीधा उत्तरदायित्त्व नही है अपितु लेखक उत्तरदायी है। आलेख की विषयवस्तु से संचालक की सहमति/सम्मति अनिवार्य नहीं है। कोई भी अश्लील, अनैतिक, असामाजिक,राष्ट्रविरोधी तथा असंवैधानिक सामग्री यदि प्रकाशित करी जाती है तो वह प्रकाशन के 24 घंटे के भीतर हटा दी जाएगी व लेखक सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी। यदि आगंतुक कोई आपत्तिजनक सामग्री पाते हैं तो तत्काल संचालक को सूचित करें - rajneesh.newmedia@gmail.com अथवा आप हमें ऊपर दिए गये ब्लॉग के पते bharhaas.bhadas@blogger.com पर भी ई-मेल कर सकते हैं।
eXTReMe Tracker

  © भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८

Back to TOP