हरकीरत हक़ीर बाईजी दर्द के बदले गूगल अंकल से पइसा चाहती हैं
शनिवार, 2 मई 2009
हरकीरत हकीर ने अभी कुछ समय पहले तक भड़ास पर काफ़ी मच-मच करी थी कि मेरा दर्द चुरा लिया, शरीर चीर कर कविता लिखी थी और न जाने क्या-क्या.....। मामला था मुनव्वर आपा द्वारा अनजाने में हरकीरत हकीर की(भगवान जाने उनकी भी है या किसी और की?????) रचना का उर्दू में अनुवाद करके अपने उर्दू ब्लाग लंतरानी पर प्रकाशित कर दिया था। इस पर हरकीरत हकीर बाई ने दुनिया भर का ड्रामा करा और उनके पक्ष में पाखंडियों की पूरी जमात खड़ी हो गयी कि तर्जुमा करना चोरी है जबकि सारे स्पष्टीकरण के बाद भी उनका नाटक जारी रहा। अब कहीं जाकर पता चला कि बाईजी के दर्द का कारण क्या था, मामला पइसा का है बाबू ये पइसा ही है जो सारे नाटक करा रहा है। सारी कहानी समझ में आ जाएगी आप जरा इस चित्र पर नजर मार लीजिये कि बाईजी अपने दर्द से कमाई करना चाहती हैं। भगवान करे बाई जी को इतना दर्द हो जितना कि कैंसर,एड्स और बवासीर के रोगी को दर्द होता है ताकि बाईजी गूगल अंकल से दर्द के बदले में एडसेंस लगा कर मालपानी बना सकें।
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जय जय भड़ास
