शब्दों का सहारा लेते थे, अब साँस अटक गयी तो क्या करें ?

बुधवार, 21 जुलाई 2010

जैसे दिल्ली में भिषड़ गर्मी में हलकी बारिश की पड़ती है फुहार वैसे ही भड़ास पर मचलती है विचारों की बयार..तैयार सब है खड़े अपने-अपने तरकश में तीर सजाये..कौन सामने आये किसको मुआयें। लेकिन बाबू भड़ास वह मंच है जहाँ आकार लोग अपने आप पारदर्शी हो जाते हैं। भले ही ब्रांडेड विदेशी कपड़ों से अपने तन को कितना ही ढँक ले, लेकिन भड़ास के भदेश, सच्चे देश को तस्वीर दिखा ही देते हैं। भैय्या यही से कईयों तुर्रम खाओं को लुंगी लपेटे भागते देखा है। शब्दों को लबादा बना युद्ध लड़ने आये कई शूरवीर यही खांसते खासते चले गए तब भी बेचारों की जुबान से निरा एक शब्द भी नहीं झरा। कुंठित , लोपित, लोभित और तमाम तरीको से भ्रमित प्राणियों को इस मंच से कुछ न कुछ जरुर मिलता है। कभी कड़वा कभी मीठा। लेकिन इतना तय है की घोंट लिया तो बेडा पर। जैसे अभी कुछ लोग घोंट रहे हैं। लगे रहिये...अपने निहित अजेंडे को सहलाने- दुलारने में। कोई न कोई रास्ता मिल ही जायेगा। बड़े बड़े उच्च विचार पढ़ने को मिल रहे हैं। विचारों का दशकों पुराना आचार धूप में सुखाया जा रहा है, निम्बू , अदरक लपेट सरसों के तेल में डुबाया जा रहा है। फिर भी आशंका बराबर बनी है की सड़ चुके आचारों से यानि बदबूदार विचारों से अब मिजाज नहीं बननेवाला। बदलना है तो, तथाकथिक बुद्धिजीवियों अपने अहंकारेपन को बदलो। अपने नाकारेपन को बदलो और अपने सुपर संसकारेपन को बदलो। नहीं बदलोगे तो भड़ास के मंच पर चोला बदल दिया जायेगा। भड़ास का मुफ्त का चोला मिलेगा। जिसे धारण करना थोडा रिस्की हैं क्योंकि इस चोले में पारदर्शिता की चुस्की है। जो नहीं झेल पाता मिमियाने लगता है। अजीब-तहजीब वाले जुमले सुनाने लगता है। फिर भी बात न बने तो खुद ही गजल बनके गुनगुनाने लगता है। गुनगुनाइए गुनगुनाइए जनाब ..हम तो मुए फ़ोकट के फटीचर हैं कभी कभार उच्च श्रेणी की शेरो-शायरी मिल जाएगी तो थोडा सुकून मिलेगा। बस एक ही आग्रह है...ये गाली आगे से मुड़ती है, ध्यान से निकलिएगा कही टक्कर न हो जाय। थोड़े से शब्द बचे हैं। अपनी झोली में, क्योंकि कुछ लोग शब्दों को शोला बनाने पर तुले है। भगवन भला करे..बाबू कुछ शब्द हमारे लिए छोड़ियेगा..आखिर हमारी भी पेट-पूजा का इंतजाम ये निर्जीव शब्द ही करते हैं...
जय भड़ास जय भड़ास

2 टिप्पणियाँ:

हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा ने कहा…

भाईसाहब शब्द ब्रह्म है निर्जीव नहीं हैं प्राण हैं। भड़ास की आत्मा भी शब्दब्रह्म में निहित है
जय जय भड़ास

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

वाह दीदी क्या खूब कही,
अक्षरशः सहमत हूँ.
जय जय भड़ास

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