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एक बिनती

मंगलवार, 5 मई 2009

ये बिनती है, सभी प्रिय पाठक तथा टिप्पणीकारों से...पिछले कुछ महीनों पूर्व, मेरे ब्लॉग पे एक विवाद छिड़ गया था, जो वैयक्तिक कारणों को लेके था....... नाकि, लेखन को लेके...नम्र निवेदन है, कि, ब्लॉग पे केवल लेखन को लेकेही टिप्पणी देन...किस एक व्यक्ती विशेषको लेके नही कह रही, सभीको ये बिनती है...कृपया अन्यथा ना लें...

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भड़ास के प्रधान संरक्षक व मालिक की भड़ास से सदस्यता समाप्त

सोमवार, 5 जनवरी 2009

जब तक मन करा तो अच्छॆ थे और जब जिस बनियागिरी और मठाधीशी के विरोध में भड़ास का प्रवाह था उसको मोड़ने का प्रयास करने का विरोध करा तो हम सब बुरे हो गये। देखिये इस बनिया किस्म की वणिक सोच का एक उदाहरण इस टिप्पणी में जो कि लालाजी के मिलावटी माल तौलने वाले छोरे ने दी थी जब पंखों वाली भड़ास पर डा.रूपेश श्रीवास्तव ने एक पोस्ट लिखी थी जो कि एक दूसरी पोस्ट का प्रत्युत्तर मात्र थी। हमारे डाक्साब ठहरे फ़क्कड़ औघड़ छाप तो उन्होंने सोंटा लेकर दौड़ाया उसे जिसने तमाम सामाजिक समस्याएं छोड़ कर उन पर व्यक्तिगत आक्षेप करा था कि लल्लू के पिल्लू मुझे छोड़ मैं तो एक नामालूम सा आदमी हूं अपनी ऊर्जा लगा कुछ ऐसे लेखन में जिससे कि चार जन का भला होवे........तब तक लाला के छोरे को लग रहा था कि शायद डाक्साब काम के हैं तो इनकी वकालत में इत्ती लंबी टिप्पणी कर दी ......... और अब जब डाक्साब ने बनियागिरी का मुखर विरोध करा तो "मालिक व प्रधान संरक्षक" कह कर दुलराए गये बंदे की सदस्यता समाप्त कर दी.....लीजिये भदेस भाषा की बनिया ने वकालत में क्या-क्या कहा था नजर मारिये.....
यशवंत सिंह yashwant singh said...
हेडिंग और मैटर में गांड़ शब्द का इस्तेमाल कर दिया डा. साहब ने तो कई लोगों का गांड़ क्यों फटने लगी, समझ में नहीं आ रहा है। अरे यहां, जैसे हाथ मुंह नाक सिर पेट उंगली उसी तरह गांड़ लंड बुर। इसमें गलत क्या है? गलत तब है जब इन शब्दों के इर्द गिर्द कामुक कथाएं बुनिए। डाक्टर साहब ने इन शब्दों का इस्तेमाल एक बहस के संदर्भ में किया है तो आप शब्द पर जाने की बजाय बहस पर जाइए। भई, देखिए। भड़ास बेसिकली फ्रस्टेट और कुंठित लोगों का ही प्लेटफार्म है। मेरा मानना है कि दुनिया में 99.99999 फीसदी लोग फ्रस्टेट हैं। किसी को सेक्सुअल फ्रस्टेशन है, किसी को नौकरी का फ्रस्टेशन है, किसी को अच्छे पैसे के लिए फ्रस्टेशन है, किसी को नाम कमाने का फ्रस्टेशन है, किसी को इनफिरियारिटी का फ्रस्टेशन है.....। फ्रस्टू तो हर प्राणी है, अगर अपने भीतर ठीक से झांक कर देखे। पर कोई कहता नहीं कि वो फ्रस्टेट है। सब अपने को स्वस्थ मानते हैं लेकिन हम लोग अपने को फ्रस्टेट मानते हैं, देहाती मानते हैं, कुंठित मानते हैं, चूतिया मानते हैं, गंवार मानते हैं, अजायबघर का प्राणी मानते हैं, गांव से आए हुए गोबर मानते हैं....जितना कुछ देश दुनिया में गंदा कहा और लिखा जा सकता है, वो मानते हैं। हम लोग रोज खाते हैं, और हगते भी हैं। रोज पूजा भी करते हैं और रोज दारू भी पीते हैं। रोज बवाल भी काटते हैं और रोज किसी के दुख में दुखी होकर रोते भी हैं....हमारे एक नहीं पचास चेहरे हैं। किस चेहरे के आधार पर राय बना रहे हो? वैसे, ज्यादा अच्छा है कि राय खराब ही बनाके रखिए, ताकि हम लोगों को अपने मित्रों के बारे में कोई मुगालता न रहे। हम लोगों ने बहुत खराब दिन देखे हैं, बहुत उलटे दिन देखे हैं, बहुत तरीके के आरोप झेले हैं, खत्म कर दिए जाने तक की साजिशें और घेराबंदियां झेली हैं, इसी फक्कड़ और औघड़ स्वभाव के चलते। हम किसी खांचे में फिट होने वाले लोग नहीं है। हम सनकी और मूडी लोग हैं। जाति धर्म और क्षेत्र से उपर उठे हुए लोग हैं। आम जन के दुख दर्द के साथ खड़े हुए लोग हैं। आम जनता की भाषा, संस्कृति और आदतों के अनुयायी हैं। हम शहर में आकर सभ्य नहीं हो सकते और गांव में जाकर शहरी नहीं बन सकते। हम गंवार गांव में भी थे, शहर में भी हैं और आगे भी रहेंगे।तथाकथित शहरी अभिजात्य जिसमें सामूहिक तौर पर किसी क्लब में चुपचाप ड्रग्स पीकर खुलेआम एक दूसरे की आगे और पीछे दोनें तरफ से मारने की परंपरा रही हो और वहां से बाहर निकल कर फर्राटेदार अँग्रेजी बोलते हुए खुले दिमाग और अत्याधुनिक बनने-दिखने का दर्प झलकाया जाता हो, और इन्हीं लोग के आगे गांड़ शब्द बोल दो तो शिट कहकर सामने वाले को माइंड योर लैंग्वेज बोल देंगे, इनसे तो लाख गुना अच्छा हैं न कि हम जो हैं, सामने हैं। क्लब में कुछ और, बाहर कुछ और तो नहीं हैं। और हमेशा से सच कहने वालों की बातों को दुनिया ने बेहद कड़वा, घटिया, अश्लील करार दिया है। हम गर्व से कहते हैं कि इस देश के राजनेताओं के गांड़ पर चार लात पड़नी चाहिए ताकि उनकी गांड़ फटे और उस फटी गांड़ पर मरहम पट्टी करने की बजाय नमक-मिर्च छिड़क देना चाहिए ताकि वो देश को धर्म, जाति, क्षेत्र के आधार पर बांटने की बजाय, देश को नकली राष्ट्रवाद के नाम पर युद्धोन्माद की आग में ढकेलने की बजाय अपनी फटी गांड़ के दर्द से रक्षा के लिए यहां-वहां मारे-मारे फिरते रहें। जय भड़ास
हो सकता है कि अब ये टिप्पणी वहां से हटा दी गयी हो क्योंकि अब वहां पंडित जी का पवित्रीकरण कार्यक्रम चल रहा है

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उतर गया शराफत का मुखौटा राजीव करूणानिधि का, आ गया औकात पर....

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

आप सभी की नजर कर रहा हूं वो कमेंट जो कि प्रकाशित न कर के शायद बहुत बड़ा या अच्छा काम करा होगा भाईसाहब ने लेकिन मैं इस कमेंट को प्रकाशित कर रहा हूं क्योंकि मैं एक असभ्य आदमी हूं मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है कि मुझे कोई प्रमाणपत्र दिया जाए जिससे पता चले कि मैं अच्छा आदमी हूं। जो शराफत का मुखौटा लगाते हैं उनके मुखौटे उतारने के लिये मैं कई वेष बदलूंगा ताकि मुझे पहचाना न जा सके अपराध के विरुद्ध लड़ाई में मैंने ये कला सीखी है जो कि किसी नफ़े नुकसान की बातों से अलग है। वणिक सोच इसे नहीं समझ सकती। मैंने तो अपना नाश कर लेने की ही ठानी है चाहत के नाटक का परदा तो कब का गिर जाना चाहिये क्यों जारी रखा है मैं इस नाटक में अब कोई पात्र नहीं कर सकता। मेरी ऊर्जा गयी तेल लेने फटे बोरे में.......। मैं एक आदमी हूं जो एक दिन मर जाउंगा बस इतनी मेरी कहानी है मुझे कोई तीसरी लाइन लिखवाने में दिलचस्पी नहीं है मत थोपो मेरे ऊपर कोई ऐसा आरोप कि मैं विद्वान हूं मैं एक नंबर का चूतिया और घमंडी आदमी हूं और वही बना रहना चाहता हूं इसलिये इस मेल को प्रकाशित कर रहा हूं ताकि शरीफ़ लोगों की शराफ़त का नकाब उतर सके........
राजीव करूणानिधि has left a new comment on your post "राजीव करूणानिधि! आओ मुझ हिजड़े से पंजा लड़ाओ":

सुन रांड अब बहुत हो गया, मैंने जो बोला जो किया, उसको छोड़, तू क्या कर सकती है कर ले, मेरी सीधी चुनौती है. और हाँ, हगा कौन है और लेप कौन रहा है ये सब देख रहे हैं. वैसे भी मुझे किसी की नहीं परवाह. तेरी गांड में गुदा है तो मरवा मुझसे मत पूछ. और तू सच में नाली का कीडा है. तू कोई नया नहीं कर रही है. तेरी फितरत ही यही है. पत्रकार को गाली दे रही है, ये भी नया नहीं है, तुझे कुछ नया करना चाहिए. इसलिए मै खुले तौर पर बोल रहा हु. मरवा और अपने पिछवारे का दम दिखा. वैसे तू क्या है तुने अपने बारे में सब लिख ही दिया है. अब मै हिजडे की मार के क्या करूँगा.

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ये रही स्वयंभू शरीफ़ की शराफत का नमूना जो कि गालियां नहीं देता है और मुझे अभद्र भाषा के उपदेश दे रहा था। ये टिप्पणी इस शराफत के पुतले ने भेजी है जो कि इसकी असली शक्ल बताती है। हिजड़ों की तरह गालियां और तालियां बजाना ही इसकी पत्रकारिता है इसके परिवार के दिये संस्कार पता चल रहे हैं मैं तो बुरा आदमी हूं ये शरीफ़ आदमी कैसे अपने संस्कार छोड़ कर अपने माता-पिता को लज्जित कर रहा है???

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रजनीश भाई की भड़ासी टिप्प्णियों पर मठाधीशी कैंची...

शनिवार, 29 नवंबर 2008

हमारे रजनीश भाई ठहरे भयंकर भड़ासी; सो भड़ास पर जो करते हैं सो करते ही हैं और जब ज्यादा उबकाई आने लगती हैं तो अन्य ब्लागॊं पर भी जाकर अपनी तेजाबी टिप्प्णियों से लोगों की सुलगाने लगते हैं। एक निवेदन कर रही हूं इस पोस्ट के द्वारा इन हजरत से कि महाराज अब कसम खाइये कि किसी मुद्दे पर अगर किसी ने हगा-मूता है तो आप उसका विश्लेषण करने न जाया करें जो करना है यहीं करिये वरना क्या होता है आपको पता है न? आपकी टिप्पणियों को डिलीट कर आपसे अत्यंत कुटिलता पूर्ण मैत्री भाव दिखाते हुए माफ़ी मांग ली जाती है। हम आपकी टिप्पणियों की दिल से इज्जत करते हैं, आपकी हर टिप्पणी में कड़वी दवा जैसा असर होता है। आप दिशा देने की क्षमता रखते हैं तो मेहरबानी करिये और कहीं और किसी को उंगली मत करिये। हमारा समूह ब्लाग ही लोगों के शराफत के मुखौटे के चिथड़े उड़ाने की ताकत रखता है। हम मठाधीशी कुटिलता से परे हैं भले हमें लोग बुद्धू और ढक्कन समझें हमें कुबूल है लेकिन यही हमारी ताकत है जो हम बाजार से नहीं खरीद कर लाए, ये ताकत तो भीतर से पैदा होती है।
जय जय भड़ास

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मेरी पोस्ट पर टिप्पणी करने से आप हिजड़े बन सकते हैं

बुधवार, 26 नवंबर 2008


जैसे-जैसे मैं लिखना तीखा करती जा रही हूं देख रही हूं कि लोग बिदक कर भाग रहे हैं। एक बड़ी साधारण सी बात कहना है कि यही पोस्ट अगर किसी लड़की की होती भले ही कितनी भी मूर्खतापूर्ण होती, बकवास होती या लटका-पटका की तुकबंदी जोड़ कर लिखनी वाली कोई कवियत्री होती तो उस पर कम से कम बीस-पच्चीस टिप्पणीकार लार टपकाते आ गये होते लेकिन हम लोगों का लिखा भी पढ़ लेने से लोगों को छूत लग जाती है, शायद लगने लगता है कि कहीं हमें भी "अर्धसत्य" पर टिप्पणी कर देने से या प्रोत्साहित कर देने से लैंगिक विकलांगता का इन्फ़ेक्शन न हो जाए और हम भी हिजड़े बन जाएं। मैं इस पोस्ट के द्वारा हम सबके धर्मपिता व गुरू डा.रूपेश श्रीवास्तव से निवेदन कर रही हूं कि अब वे कम से कम मेरी लिखी किसी भी पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी न प्रकाशित करें। मुझे किसी की मक्कारी भरी सहानुभूति नहीं चाहिये। जब से मैंने लोगों के बनावटी मुखौटे नोचने खसोटने शुरू करे हैं हिंदी के छद्म शरीफ़ ब्लागरों में खलबली है, जवाब नहीं देते बनते इस बड़े-बड़े बक्काड़ और लिक्खाड़ लोगों से। हमारे कुनबे को हम खुद ही संवारने का माद्दा रखते हैं। मैं इस सोच से एक और फ़ायर-ब्रांड बहन को जोड़ रही हूं।

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