जब तक मन करा तो अच्छॆ थे और जब जिस बनियागिरी और मठाधीशी के विरोध में भड़ास का प्रवाह था उसको मोड़ने का प्रयास करने का विरोध करा तो हम सब बुरे हो गये। देखिये इस बनिया किस्म की वणिक सोच का एक उदाहरण इस टिप्पणी में जो कि लालाजी के मिलावटी माल तौलने वाले छोरे ने दी थी जब पंखों वाली भड़ास पर डा.रूपेश श्रीवास्तव ने एक पोस्ट लिखी थी जो कि एक दूसरी पोस्ट का प्रत्युत्तर मात्र थी। हमारे डाक्साब ठहरे फ़क्कड़ औघड़ छाप तो उन्होंने सोंटा लेकर दौड़ाया उसे जिसने तमाम सामाजिक समस्याएं छोड़ कर उन पर व्यक्तिगत आक्षेप करा था कि लल्लू के पिल्लू मुझे छोड़ मैं तो एक नामालूम सा आदमी हूं अपनी ऊर्जा लगा कुछ ऐसे लेखन में जिससे कि चार जन का भला होवे........तब तक लाला के छोरे को लग रहा था कि शायद डाक्साब काम के हैं तो इनकी वकालत में इत्ती लंबी टिप्पणी कर दी ......... और अब जब डाक्साब ने बनियागिरी का मुखर विरोध करा तो "मालिक व प्रधान संरक्षक" कह कर दुलराए गये बंदे की सदस्यता समाप्त कर दी.....लीजिये भदेस भाषा की बनिया ने वकालत में क्या-क्या कहा था नजर मारिये.....
यशवंत सिंह yashwant singh said...
हेडिंग और मैटर में गांड़ शब्द का इस्तेमाल कर दिया डा. साहब ने तो कई लोगों का गांड़ क्यों फटने लगी, समझ में नहीं आ रहा है। अरे यहां, जैसे हाथ मुंह नाक सिर पेट उंगली उसी तरह गांड़ लंड बुर। इसमें गलत क्या है? गलत तब है जब इन शब्दों के इर्द गिर्द कामुक कथाएं बुनिए। डाक्टर साहब ने इन शब्दों का इस्तेमाल एक बहस के संदर्भ में किया है तो आप शब्द पर जाने की बजाय बहस पर जाइए। भई, देखिए। भड़ास बेसिकली फ्रस्टेट और कुंठित लोगों का ही प्लेटफार्म है। मेरा मानना है कि दुनिया में 99.99999 फीसदी लोग फ्रस्टेट हैं। किसी को सेक्सुअल फ्रस्टेशन है, किसी को नौकरी का फ्रस्टेशन है, किसी को अच्छे पैसे के लिए फ्रस्टेशन है, किसी को नाम कमाने का फ्रस्टेशन है, किसी को इनफिरियारिटी का फ्रस्टेशन है.....। फ्रस्टू तो हर प्राणी है, अगर अपने भीतर ठीक से झांक कर देखे। पर कोई कहता नहीं कि वो फ्रस्टेट है। सब अपने को स्वस्थ मानते हैं लेकिन हम लोग अपने को फ्रस्टेट मानते हैं, देहाती मानते हैं, कुंठित मानते हैं, चूतिया मानते हैं, गंवार मानते हैं, अजायबघर का प्राणी मानते हैं, गांव से आए हुए गोबर मानते हैं....जितना कुछ देश दुनिया में गंदा कहा और लिखा जा सकता है, वो मानते हैं। हम लोग रोज खाते हैं, और हगते भी हैं। रोज पूजा भी करते हैं और रोज दारू भी पीते हैं। रोज बवाल भी काटते हैं और रोज किसी के दुख में दुखी होकर रोते भी हैं....हमारे एक नहीं पचास चेहरे हैं। किस चेहरे के आधार पर राय बना रहे हो? वैसे, ज्यादा अच्छा है कि राय खराब ही बनाके रखिए, ताकि हम लोगों को अपने मित्रों के बारे में कोई मुगालता न रहे। हम लोगों ने बहुत खराब दिन देखे हैं, बहुत उलटे दिन देखे हैं, बहुत तरीके के आरोप झेले हैं, खत्म कर दिए जाने तक की साजिशें और घेराबंदियां झेली हैं, इसी फक्कड़ और औघड़ स्वभाव के चलते। हम किसी खांचे में फिट होने वाले लोग नहीं है। हम सनकी और मूडी लोग हैं। जाति धर्म और क्षेत्र से उपर उठे हुए लोग हैं। आम जन के दुख दर्द के साथ खड़े हुए लोग हैं। आम जनता की भाषा, संस्कृति और आदतों के अनुयायी हैं। हम शहर में आकर सभ्य नहीं हो सकते और गांव में जाकर शहरी नहीं बन सकते। हम गंवार गांव में भी थे, शहर में भी हैं और आगे भी रहेंगे।तथाकथित शहरी अभिजात्य जिसमें सामूहिक तौर पर किसी क्लब में चुपचाप ड्रग्स पीकर खुलेआम एक दूसरे की आगे और पीछे दोनें तरफ से मारने की परंपरा रही हो और वहां से बाहर निकल कर फर्राटेदार अँग्रेजी बोलते हुए खुले दिमाग और अत्याधुनिक बनने-दिखने का दर्प झलकाया जाता हो, और इन्हीं लोग के आगे गांड़ शब्द बोल दो तो शिट कहकर सामने वाले को माइंड योर लैंग्वेज बोल देंगे, इनसे तो लाख गुना अच्छा हैं न कि हम जो हैं, सामने हैं। क्लब में कुछ और, बाहर कुछ और तो नहीं हैं। और हमेशा से सच कहने वालों की बातों को दुनिया ने बेहद कड़वा, घटिया, अश्लील करार दिया है। हम गर्व से कहते हैं कि इस देश के राजनेताओं के गांड़ पर चार लात पड़नी चाहिए ताकि उनकी गांड़ फटे और उस फटी गांड़ पर मरहम पट्टी करने की बजाय नमक-मिर्च छिड़क देना चाहिए ताकि वो देश को धर्म, जाति, क्षेत्र के आधार पर बांटने की बजाय, देश को नकली राष्ट्रवाद के नाम पर युद्धोन्माद की आग में ढकेलने की बजाय अपनी फटी गांड़ के दर्द से रक्षा के लिए यहां-वहां मारे-मारे फिरते रहें। जय भड़ास
हो सकता है कि अब ये टिप्पणी वहां से हटा दी गयी हो क्योंकि अब वहां पंडित जी का पवित्रीकरण कार्यक्रम चल रहा है
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