बगा़वतें जन्मती हैं इंसानी शक्ल में तब कहीं एक रजनीश पैदा होता है
रविवार, 29 नवंबर 2009
जन्मदिन पर किसी की ले ली जाए तो भड़ासी जन्मदिन पूरा हो।
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तराजू छोड़ ये गुंडई करेंगे ......
बुधवार, 5 अगस्त 2009
येन-केन-प्रकारेण पैसा कमा लिया जाए इसके अलावा वणिक के जीवन का कोई सिद्धांत या आदर्श होता होगा कम से कम मुझे तो नहीं पता। समाचार और आम का अचार इनके लिये एक जैसी चीज हैं दोनो को ये दुकान पर तौल कर बेच सकते हैं। जब दुर्गंधाती, बास मारती और न जाने किस किसको तेल लगा कर पोंछे गए हाथों से चीकट हुई बनियान वाला बनिया अनप्नी दुकान में इज्जत,ईमान,धर्म आदि बेचने के बाद पत्रकारिता बेचे तो कैसा माहौल होगा। समानान्तर सूचना संचार माध्यमों में विगत कुछ वर्षों में ब्लागिंग ने इंटरनेट पर जोर पकड़ा है अखबारों और टीवी चैनलों से जुतिया लतिया कर भगाए चोरकट चिरकुट किस्म के डंडी मारने वाले लोग अपना अपना तराजू लेकर इस क्षेत्र में आ गए और दो जून की रोटी का आसरा पा गए। दुकान पर चार-छह ग्राहक आने लगे तो दिमाग और तोंद पर चरबी की पर्तें चढ़ने लगती हैं। बड़ी बातें करने लगते हैं,केंचुआ अपने को कोबरा समझने लगता है और फ़निहरों की जमात में जाकर फ़ुफ़कारने की बात करने लगता है, जहर चाहिए तब जुबान लपलपाओ वरना कोई गौरैया या मेढ़क चट कर लेगा तब समझोगे कि क्या औकात है।
पिछली भड़ास का भड़वा मुर्दा ममी लेकर बैठा दलिन्दर मोबाइल नंबरों और ई-मेल आई डी का उपयोग दुकान के प्रचार के लिए कर रहा है। इस चीसड़ लाला को जब इस तरह के प्रमोशनल मेल्स भेजने से मना करा तो आंखे दिखा रहा है। भाई! अंडे-ब्रेड बेचने वाला सुबह आवाज देकर चिल्लाता हुआ रोज निकलता है, हम नहीं खाते तो ध्यान नहीं देते वो चिल्ला कर चला जाता है अपने धंधे की राह पर। अगर आपके दरवाजे पर ही खड़ा रह कर आपकी नींद खराब कर रहा है जाता ही नहीं है तो बाहर आइये, समझाइये अगर गुंडई की बात करे और न माने तो वापिस अंदर आइये लट्ठ या हाकी स्टिक उठाइये और कस कर फोड़ दीजिए साले को। ध्यान रहे कि घर-परिवार वाला गरीब आदमी है चरबी चढ़ने के कारण गुर्रा रहा है था इसलिये मरहम पट्टी से लेकर अंडे-ब्रेड की भरपाई आपको दे देना चाहिये।
जय जय भड़ास
राजीव करूणानिधि! आओ मुझ हिजड़े से पंजा लड़ाओ ( अतीत के पन्ने से.....)
बुधवार, 6 मई 2009
ये रही तुम्हारी टिप्पणी और साथ में है मेरा जवाब ताकि डा.साहब की पोस्ट की तरह कोई गलतफ़हमी पैदा न हो...हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा, तू जिस तरह से भभक रही है इससे तो साफ़ जाहिर होता है कि तू जिस्म से नहीं दिमाग से भी हिजडा है. तेरी औकात क्या है मै जान चूका हूँ, मेरी औकात नापने का प्रयास मत करो, तेरे जैसी बेहूदी शख्स से मै मुह भी नहीं लगाना चाहता. मैंने डॉ रुपेश को कोई गाली नहीं दी थी, बस सलीके से एक जवाब लिखा था कि ''कृपया अच्छे शब्दों का इस्तेमाल करे. अन्यथा ये समझा जायेगा कि आपकी मानसिक स्थिति अच्छी नहीं है.'' रही बात शराफत की चादर ओढ़ने की बात तो मै बता दू कि ये चादर नहीं मेरा व्यक्तित्व है. और तेरी जैसी नाली के कीडे के साथ मै कोई भी रहम नही रखता. आइन्दा सलीके से जवाब देना. तू भडासी है मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. पर मै जो हु उससे तुझे जरूर फर्क पड़ेगा.. डॉ रुपेश इतने अच्छे इंसान है, इसके लिये उन्हें धन्यवाद, पर क्या अपनी बात कहने के लिये या उसका महत्व बढ़ाने के लिये गाली और अभद्र भाषा का प्रयोग करना उचित है. क्या रुपेश साहब अपने घर में अपने परिवार के सामने ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते है. अपनी बात या अपनी भडास निकलने के लिये सलीके दार शब्दों का भी इस्तेमाल हो सकता है. ये जरूरी नहीं कि गाली या बेहूदी भाषा बोलकर ही भडास निकली जा सकती है. और हा जो कुकृत्य बड़े समाज में क्लबों में होते है क्या वो गाँव की गलियों में नहीं होते. अच्छे और बुरे लोग हर जगह है, सिर्फ गाली बोलकर बात करने वाले ही साहसी, स्पस्टवादी, नेक विचार और साफ़ दिल नहीं होते.
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यशवंत सिंह को भड़ास से क्यों हटाना पड़ा???
बुधवार, 15 अप्रैल 2009
अजीब लगता है न ये बात जान कर कि यशवंत सिंह भड़ास से कब का चलता कर दिये गये हैं। दरअसल भड़ास नामक मंच एक निश्चित सिद्धांत और दर्शन को समर्पित रहा है जो हिंदी की पट्टी पर लिखने वाले ग्रामीण परिवेश से जुड़े शहरों की तरफ आए लोगों के लिये रहा है, जो कि कहीं न कहीं अभी भी अपनी जड़ों से जुड़े हैं। पंचसितारा रहन-सहन और ऊंची इमारतों के चालीसवे-पचासवें मंजिल पर रह कर भी बारिश में मिट्टी से उठती सोंधी गंध के लिए दीवाने हैं, चमचमाती बत्तियों में असहज महसूस करते हैं लेकिन लालटेन और मिट्टी के तेल की चिमनी में सहज महसूस कर पाते हैं। एलीट क्लास/आभिजात्य वर्ग में शामिल होने के लिये चेहरे पर कोई मुखौटा नहीं लगा पाने वाले लोग भड़ास के भदेस,ग्रामीण,गंवारू,आंचलिक, मूल भारतीयता के मनोरथ को जिंदा रख पाए हैं। भड़ास ऐसे लोगों का मंच बन पाया जो कि मजदूर वर्ग की भाषा बोल पाने में अधिक सहज महसूस कर पाते न कि मां को गाली भी अंग्रेजी में भी दें, जुबान से कड़वे भड़ासियों ने हमेशा जहां एक ओर शराफ़त का पाखंड करने वाले और सरलता का मुखौटा लगा कर भावनाओं का धंधा करने वालों से नफ़रत पायी है तो वहीं दूसरी ओर उनसे हजार गुना अधिक लोगों का निश्छल प्यार पाया है। एक समय था जब यशवंत सिंह का नाम भड़ास का पर्याय हुआ करता था लेकिन जब इन सज्जन पर खुद ही अंग्रेजी शराब और प्रसिद्धि का नशा चढ़ गया तो इन्होंने भड़ास की प्रसिद्धि को अपने शुद्ध लालच से एक रूप दिया जिसमें सीधे ही भड़ास की लोकप्रियता और भोले भड़ासियों की भावनाओं को विक्रय करा गया है। ईश्वर की दया है कि भड़ास की सुगंध इनकी करतूत से जुड़े होने के कारण इनकी दाल-रोटी के साथ ही दारु मुर्गे का भी खर्च निकलने लगा है। जब इनसे ये कहा गया कि आप जब भड़ास की प्रसिद्धि के टके करा रहे हैं तो मेहरबानी करके देश के कोने-कोने में साइबर कैफ़े में पचास-साठ रुपए प्रति घंटा शुल्क देकर कंटेंट लिखने वाले भड़ासियों को उनकी सक्रियता के आधार पर इस नए उपक्रम में भागीदार बनाया जाए और लाभांश दिया जाए तो इनका सीधा उत्तर रहा कि भड़ासी तो चूतिया हैं वो अपनी भड़ास निकालने के लिये लिखते हैं हमने उन्हें मंच उपलब्ध कराया है ये मेरा निजी मामला है इसमें बेवकूफ़ों की कोई हिस्सेदारी मुझे स्वीकार नहीं है आपको क्या चाहिये वो बता दीजिये, तो भड़ासियों और गैर भड़ासियों आपके सामने है कि हमें क्या चाहिये था उस स्थिति में..... हमें मुखौटाधारी हरगिज बर्दाश्त नहीं हैं तो फिर एक साथी के मुखौटे में एक लालची बनिया जो कि आपकी कोमल भावनाओं की दुकान सजा ले भला कैसे सहन करा जा सकता था। इसलिये भड़ास के अंदाज ने बिना किसी गणित के कि क्या फ़ायदा नुकसान होगा इन्हें भड़ास से चलता कर दिया। एक बात और कि जब तक तकनीकी अधिकार इनके हाथ में थे इन्होंने अकारण ही अपनी दादागिरी के चलते बहुत सारे लोगों को बिना भड़ासियों की जानकारी के हटा दिया था अब वही व्यवहार इनके लिये उचित है। इस पोस्ट से तमाम वे लोग जान जाएं जो कि अभी भी यशवंत सिंह को भड़ास से जुड़ा मानते हैं।
जय जय भड़ास
Read more...दो गणितीय भड़ासी 24 कैरेट सोना और I4you_simel4me
गुरुवार, 19 मार्च 2009
भड़ासी मित्रों आज एक बार फिर भड़ास परिवार में कोई ऐसा जुड़ा है जो कि नाम में अंक समेटे हुए है। पहली तो हमारी परम स्नेही सोना अक्का हैं जो कि 24 कैरेट सोना के नाम से हैं जिन्हें मुंबई के सभी भड़ासी नजदीक से जानते पहचानते हैं । सोना अक्का मनीषा दीदी की गुरू बहन हैं जैसे कि रम्भा अक्का जिन्हें हम सब रम्भा हसन के नाम से जानते हैं। लेकिन ये आज जुड़ने वाले जो मित्र हैं इन्होंने अपने प्रोफ़ाइल पर भी पर्दा कर रखा है इसलिये हम जान ही न पाए कि ये जीवन में गणित लेकर चलने वाले I4you_simel4me विचित्रनामधारी कौन हैं। आप जो कोई भी हों मेहरबानी करके कम से कम अपना परिचय माडरेटर्स को तो इस मोबाइल नं. पर दे दीजिये --
भाई रजनीश के.झा : 09899730304
डा.रूपेश श्रीवास्तव : 09224496555
आप यकीन मानिये कि यहां अपनी पहचान छुपाने का कोई मतलब नहीं है, यही वह मंच है जहां यदि आपको लगता है कि माडरेटर ने गलत लिखा है या आपका उनसे विरोध है तो आप उन्हें भी कस कर खींच सकते हैं बस इतना ध्यान रखिये कि हम सभी भड़ासी अकारण गालियां नहीं देते और अगर देते भी हैं तो आम प्रचलन में चलने वाली मां बहन को दी जाने वाली गाली तो हरगिज नहीं क्योंकि हम सबकी मां बहन का उतना ही सम्मान करते हैं जितना कि अपनी मां बहन का। मेहरबानी करके अपना परिचय यदि कोई बहुत बड़ी मजबूरी न हो तो एक पोस्ट के रूप में ही सही चार लाइन में लिख डालिये।
जय जय भड़ास
कोसते श्रापते बनिये का आशीर्वाद: जय भड़ास
सोमवार, 12 जनवरी 2009
बेचारा बनिया सोचता था कि एक शब्द डिक्शनरी से ले आएगा और उसे जिंदगी भर रुपए में बदल कर नोट छापेगा। भड़ास की लोकप्रियता बढ़ने लगी तो बनिया बौरा गया सोचने लगा कि अब तो वो मलाई छानेगा और चूतिया भड़ासी उसके लिये दूध औटाएंगे। उसकी नजरों में भड़ासी निरे बुद्धू हैं लेकिन जब भड़ासियों ने देखा कि बनिया तो औकात दिखाने लगा है मुखौटा तक उतार फेंका है और आंखे भी तरेर रहा है, भड़ास का दर्शन दम तोड़ देता इससे पहले हम लोगों ने उसकी आत्मा चुरा ली और उस DNA का प्रयोग कर हमारे डाक्टर और टैक्नोराइट ने उसे दोबारा अवतरित करा दिया। बनिया बोला जाओ नहीं दूंगा तुम्हें धनिया... लेकिन अब भड़ासी जान चुके हैं कि बनिया धनिया नहीं घोड़े की लीद बेचता है। बुजुर्ग भड़ासी ने लिखा कि हिंदी ब्लागरों भड़ास के दर्शन को अपनाओ और हर ब्लागर एक ब्लाग बनाओ जिसका नाम हो "भड़ास"....। पहले बनिया फड़फड़ाया कि हे भगवान ये दुष्ट मेरी बौद्धिक संपदा चुरा ले गए लेकिन अब जब हर टोटका आजमाने के बाद भी भयंकर भड़ासी नहीं माने तो अब रिरियाने और आशीर्वाद देने का नाटक रच रहा है बेचारा..... जबकि पिछवाड़े से धुंआ निकलना बंद नहीं हो रहा है ये हर हिंदी ब्लागर को दिख रहा है। बनिये राजा ! इस पेज को भी आशीर्वाद देने का नाटक करो शायद कुछ पंखे और मिल जाएं पर देख तो रहे हो मिलावटीराम कि ये पंखे तुम्हारी ही बिजली चूस रहे हैं...हा...हा...हा... अपने ब्लाग पर संडास4मीडिया की लिंक लगाने की विनतियां करते रहे पर पंखे सयाने हैं एक ने नहीं सुनी और अपनी फोटू जरूर चिपकाए पड़े हैं......। भले मन में कोसना श्रापना पर मुंह पर आशीर्वाद ही रखना ताकि बौद्धिक बनिया की बनियान की सड़ांध न पता चले किसी पंखे को।
जय जय भड़ास
असली-नकली ’भड़ास’ के रुदन की महानता और उदारता
सोमवार, 5 जनवरी 2009
एक बार एक आदमी अपने कक्षा चार में पढ़ने वाले बच्चे को एक महात्मा जी के प्रवचन में ले गया। बच्चा बैठ कर उबासियां लेता रहा। घर आकर पिता ने पूछा कि इतनी अच्छी बाते बताई जा रही हैं और तुम उबासी ले रहे थे बेटा अंदर जाकर डिक्शनरी उठा लाया और बोला उन्होंने जो भी शब्द बोले वो इस किताब में हैं बस उन्होंने आगे पीछे करके बोले इसमें नया और अच्छा क्या है? बच्चा है कैसे समझेगा कि सोच क्या है शब्दों में छिपा दर्शन क्या है वह तो बस शब्द जानता है। कल तक जिस डा.रूपेश के वकालत करते हुए तमाम कसीदे पढ़े जा रहे थे आज वो गालीबाज हो गया है जबकि डा.रूपेश के अनुसार भड़ास तो एक वैचारिक तल पर होने वाली ऐसी क्रिया है जो कि "कैथार्सिस" या "विचार-रेचन" कर के अपने चित्त को क्लेश-मुक्त रख कर स्वस्थ बने रहने से जुड़ा है ताकि आजकल के तनाव भरे माहौल में जो तेज रफ़्तार जिंदगी में होने वाली ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन आदि जैसी तमाम मनोशारीरिक बीमारियों से सहज ही मुक्त हुआ जा सके। भगवान रजनीश(ओशो) से जुड़े लोग इस तथ्य को सहज ही समझ सकते हैं। भड़ास नामक ब्लाग की लोकप्रियता को अपनी वणिक सोच का प्रयोग करते हुए भड़ास4मीडिया नामक पोर्टल(जिसका चित्र इस पेज पर बांयी तरफ की पट्टी पर लगा है) की रचना करी गयी जिसमें कोई मौलिकता नहीं है बल्कि हर ब्लागर जानता है कि "खबरी अड्डा"(http://khabriadda.blogspot.com/) नामक ब्लाग से चुराई हुई सूचनाएं संकलित करी जाती हैं। भड़ास नया क्या पुराना क्या और क्या सदस्यता का समाप्त करा जाना......इन बातों का विचारों पर कोई प्रभाव पड़ता है क्या? डा.रूपेश की कोई टीम न तो थी न ही वो गिरोहबंदी करने वालों में से हैं जो उन्हें जानते हैं उन्हें पता है कि वो हैं "वन मैन आर्मी"....। भड़ास पर लगे खुले निमंत्रण को वैसा ही मानिये जैसे किसी आश्रम या धर्मार्थ चिकित्सालय का द्वार हो आप आना चाहें आपकी मर्जी आपको कोई बुलाने न जाएगा कि आओ भीड़ लगाओ ताकि हम अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा ब्लाग सिद्ध कर के दो टाइम की रोटी की जुगाड़ बना सकें। रजनीश के झा, मनीषा नारायण और मोहम्मद उमर रफ़ाई का कोई अस्तित्त्व नहीं है ये मात्र काल्पनिक पात्र हैं जो कि यहां वहां से फोटो चुरा कर फ़र्जी आई.डी. के आधार पर बनाए गए हैं। दर असल मेरा भी कोई वजूद नहीं है मैं भी एक वर्चुअल कल्पना हूं डा.रूपेश श्रीवास्तव के भड़ासी दिमाग की.........
जय जय भड़ास
रजनीश भाई की भड़ासी टिप्प्णियों पर मठाधीशी कैंची...
शनिवार, 29 नवंबर 2008
हमारे रजनीश भाई ठहरे भयंकर भड़ासी; सो भड़ास पर जो करते हैं सो करते ही हैं और जब ज्यादा उबकाई आने लगती हैं तो अन्य ब्लागॊं पर भी जाकर अपनी तेजाबी टिप्प्णियों से लोगों की सुलगाने लगते हैं। एक निवेदन कर रही हूं इस पोस्ट के द्वारा इन हजरत से कि महाराज अब कसम खाइये कि किसी मुद्दे पर अगर किसी ने हगा-मूता है तो आप उसका विश्लेषण करने न जाया करें जो करना है यहीं करिये वरना क्या होता है आपको पता है न? आपकी टिप्पणियों को डिलीट कर आपसे अत्यंत कुटिलता पूर्ण मैत्री भाव दिखाते हुए माफ़ी मांग ली जाती है। हम आपकी टिप्पणियों की दिल से इज्जत करते हैं, आपकी हर टिप्पणी में कड़वी दवा जैसा असर होता है। आप दिशा देने की क्षमता रखते हैं तो मेहरबानी करिये और कहीं और किसी को उंगली मत करिये। हमारा समूह ब्लाग ही लोगों के शराफत के मुखौटे के चिथड़े उड़ाने की ताकत रखता है। हम मठाधीशी कुटिलता से परे हैं भले हमें लोग बुद्धू और ढक्कन समझें हमें कुबूल है लेकिन यही हमारी ताकत है जो हम बाजार से नहीं खरीद कर लाए, ये ताकत तो भीतर से पैदा होती है।
जय जय भड़ास





