एक लैंगिक विकलाँग ने संसद को हिला दिया........
शनिवार, 11 सितंबर 2010
इस कमेंट के बाद भी अट्ठाइस कमेंट प्रकाशित हैं,इसे धूर्तता नहीं तो क्या कहेंगे???
विचार विमर्श का साहस??? आओ बाबू जरा करो तो भाग मत जाना बाकी बौद्धिकों की तरह
आपकी बातें पता नहीं कुटिलता से भरी हैं कि बेवकूफ़ी से ये समझ पाना हम जाहिल गंवार भड़ासियों के लिये अत्यंत कठिन है। सच तो ये है कि हम घड़ियाल और इंसान के आँसुओं में अंतर नहीं कर पाते और किसी ही जानवर को रोता देखते हैं तो अपना गन्दा सा गमछा लेकर उसके आँसू पोंछने लगते हैं भले ही बाद में वो हाथ ही चबा जाए। यही तो भड़ासियों की शक्ति है उनके इमोशन्स, भावुकता ही तो है हमारे पास जिसके चलते मुंबई में रह कर ही ठाकरे परिवार को चुनौती दे देते हैं। आप कमेंट हटाने के बारे में लिख रहे हैं कि "मेरे अंतिम कमेंट में लिखा है कि अब इस बारे में कोई कमेंट पब्लिश नहीं करा जाएगा" जबकि उसके बाद अट्ठाइस कमेंट तो मुझे प्रकाशित दिख रहे हैं जाहिर है इस बात का भी कुछ न कुछ बचाव महक के पास होगा लेकिन यार आपको क्यों ऐसा लगता है कि आप यदि भड़ासियों की नजर में बुरे या चिरकुट हैं तो आप सचमुच चिरकुट हैं अरे भाई! आप महान हो सकते हैं हो सकता है कि आपकी महानता को देख पाने की नजर ही अभी हम सड़कछाप भड़ासियों में विकसित ही न हुई हो। आप ने लिखा कि आपके खिलाफ़ आपकी पूर्वबहन(मूर्खता वश स्वीकारा रिश्ता है ये आपके अनुसार) जो कमेंट लिखे हैं वो आपने हटाए नहीं तो प्यारे महान महक ! बात इतनी सी है कि ये तो एक सीधा तरीका है उस नादान बहन को बुरा से बुरा दिखा देने के लिये कि देखो ये दुष्टा मुझ महान आदमी को गाली दे रही है और मैं हूं कि अपनी महानता के चलते उन गालियों को सहेजे हुए हूं। आप यदि मानते हैं कि आपने मूर्खता करी है तो इन बातों को उसका प्रसाद मान कर स्वीकार लीजिये। यदि आपको मूर्ख या बेवकूफ़ लिख दिया गया है तो इसमें क्या गजब हो गया जनाब?
महक बाबू ! जिस दिन आप रिश्तों की गरिमा साफ़ मन से स्वीकार पाने जितनी निर्मलता पा लेंगे तब समझ सकेंगे कि भाई बहन के रिश्ते माउस की एक क्लिक से नहीं टूटते या जुड़ते। जब रिश्ते जुड़ जाते हैं तो फिर ऐसे वैचारिक मतभेदों से खत्म नहीं होते कि एक पोस्ट से पहले भाई-बहन थे फिर सौ पचास कमेंट्स आए और रिश्ता खत्म......। भड़ासी आपस में एक दूसरे को चुटकियाँ लेते हैं कभी कभी तो लपटा-लपटी भी कर लेते हैं इसी मंच पर लेकिन कभी रिश्ते नहीं खत्म होते यदि जुड़ने वाले ने भड़ास के दर्शन को आत्मसात कर लिया है। जब किसी को स्वीकारा तो उसकी सारी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ स्वीकारा जाता है ये नहीं कि अपने मेलबॉक्स में लगे फिल्टर की तरह उसकी बुराइयों को छान देना चाहो। अब शायद महक बाबू आप समझ सकें को फ़ेसबुक पर लगी पचास करोड़ लोगों की भीड़ और भड़ास पर मौजूद कुछ लोगों के रिश्तों में क्या अंतर है। भड़ासी देश के किसी भी कोने में हों लेकिन एक दूसरे से मिलते रहते हैं एक दूसरे के सुख दुःख में भागीदार होते रहते हैं। मुंबई जैसे व्यस्त शहर में हम एक दूसरे से मिल लेते हैं और तो और भाई गुफ़रान सिद्दिकी तो हमसे मिलने के लिये अयोध्या से मुंबई आ गए थे ये भड़ास से जुड़ा रिश्ता नहीं तो और क्या है कि भाई रजनीश झा दिल्ली से हम मुंबई के भड़ासियों से मिलते हैं, भाई गुरूदत्त तिवारी मिलने के लिये आ जाते हैं जो कि सतना(म.प्र.) के रहने वाले हैं......... ऐसे न जाने कितने रिश्ते हैं जिन्हें गिनाने लगूं तो आप थक जाएंगे।
बस इतना कि रिश्ते न तो क्लिक से टूटते हैं न ही क्लिक से जुड़ते हैं। आप जो हैं वह सामने है। हमें जो हैं बना रहने दीजिये यदि संसद की खिड़कियाँ सिर्फ़ सांसदों के लिये खुली रखें तो ही आपके लिये सही होगा क्योंकि यदि महलों की बात सड़क पर आएगी तो सड़क पर खड़ा गँवार भी उसपर अपनी राय देगा। उम्मीद है कि आप संसद को सिर्फ़ सांसदों के देखने और विजिट करने के लिये सीमित कर देंगे। लेकिन इससे आपको मिलने वाली प्रसिद्धि में अड़ंगा लग जाएगा। वैसे आप संसद की गतिविधियों को दूरदर्शन से प्रसारित करवा सकते हैं ताकि आम आदमी देख सके कि संसद में क्या चल रहा है। सोच लीजिये..............।
मनीषा दीदी की जय हो
जय जय भड़ास Read more...




