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लैंगिक विकलांगों को सेक्स का खिलौना बनाने के बौद्धिक प्रयास

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010




हमारे देश में समलैंगिकता को ज से उच्च न्यायालय ने अपराधबोध से मुक्त क्या कराया(भले ही उच्चतम न्यायालय में अभी भी इसके विरुद्ध अपील करी गयी है) उनकी चांदी हो गयी जो कि लैंगिक विकलांगो को सेक्स के खिलौने मानते हैं। मुंबई में लैंगिक विकलांगों के हितों के नाम पर काम करने वाले हम जैसे ही एक बंदे लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने काफ़ी नाम कमाया है। अस्तित्त्व नाम से एक गैर सरकारी संगठन भी चला रखा है। विदेश यात्राओं से लेकर टीवी कार्यक्रमों में दिखना इनका शगल है। जिस तरह हर समुदाय में होता है कि उनके ही स्वयंभू नेता उन्हीं का दोहन और शोषण करते हैं हमारे समुदाय में भी हो रहा है। शबनम मौसी नाम सब जानते हैं उन्होंने लैंगिक विकलांगता को राजनैतिक ताकत हासिल करने के लिये इस्तेमाल करा और लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी प्रसिद्धि और पैसा कमाने के लिये इस्तेमाल कर रहे हैं।
अभी हाल ही में मुंबई में एक सौन्दर्य प्रतियोगिता का आयोजन करा गया जिसमें कि तमाम जगहों से लैंगिक विकलांगों को बुलाया गया और लाखों रुपये का खर्च कार्यक्रम के आयोजन में दर्शाया गया। जीनत अमान और सेलिना जेटली जैसे भ्रष्टबुद्धि फिल्म अभिनेत्रियो का भी इस कार्यक्रम में सहयोग रहा। इन लोगों ने बड़े बड़े व्याख्यान दे डाले कैमरे के सामने कि जैसे ये कोई क्रान्तिकारी पहल कर चुके हों।
इन सभी से सवाल कि क्या समाज की मुख्यधारा से लैंगि विकलांगों को जोड़ने का एक यही रास्ता है? सौन्दर्य स्पर्धाओं के बाद ये कहाँ खो जाते हैं सेलिना जेटली की तरह माडलिंग या फिल्मों में आकर सम्मानपूर्वक जीवन क्यों नहीं जी पाते? क्यों नहीं लैंगिक विकलांग बच्चों के लिये आजतक लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी या शबनम मौसी ने स्कूल की मांग करी या खुद ही खोल दिया? क्यों नहीं ये आगे आकर CRY जैसी संस्थाओं का सहयोग लेकर बच्चों को पढ़ाती लिखाती हैं? क्यों नहीं इन आयोजकों ने मुंबई में ट्रेन में भीख मांगने या कमाठीपुरा में सेक्स के भूखे दरिंदों की भूख मिटा कर अपने पेट की भूख मिटा कर दर्दनाक जीवन जीने वाले मासूम लैंगिक विकलांगों को इस आयोजन की सूचना तक दी?(ये कहेंगे कि हमने तो अखबारों में सूचना दी थी तो जरा ये कुटिल बताएं कि कितने हिजड़े अखबार पढ़्ने के लायक बनाए आजतक इन लोगों ने???)
आखिरी सवाल कि इन आयोजकों ने कैसे निर्धारित करा कि सारे प्रतिभागी लैंगिक विकलां(हिजड़े) ही हैं, क्या कोई डॉक्टरी सर्टिफ़िकेट था? यदि नहीं तो लाली पाउडर लगा कर तो शाहरुख खान से लेकर आमिर खान तक सभी भाग ले सकते थे। कोई उत्तर नहीं है किसी के पास ......... इस दिशा में कोई प्रया करा जाएगा कि लैंगिक विकलांगता के चिकित्सकीय पैमाने निर्धारित हों और इस आधार पर उन्हें शिक्षा से लेकर नौकरियों में वरीयता दी जाए, आरक्षण दिया जाए। ऐसे तो अंधे भी सुंदर होते हैं तो क्या उनके अंधेपन को लेकर उन्हें अलग सा जीव मान लिया जाए और उनकी सौन्दर्य स्पर्धाएं कराई जाएं? क्यों ये विचार इन मासूमों के दिमाग में ठूँसा जा रहा है कि ये सौन्दर्य प्रतियोगिता में ही अपना टैलेंट दिखा सकते हैं ? कभी इनकी कुश्ती या दौड़ की प्रतियोगिता रखकर देखा जाए, बस इतना बताना है कि हम जैसे मनुष्य जैसे दिखने वाले प्राणी सचमुच मनुष्य ही हैं तुम्हारे ही पेट से पैदा हुए, हमें एलियन या दूसरे ग्रह से आया न समझो। भड़ास परिवार का प्रयास जारी रहेगा सर्वशिक्षा के बारे में...........
जय जय भड़ास





(सभी चित्र हिन्दुस्तान टाइम्स,मुंबई से साभार)

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मटुक भाई और जूली बहन का वास्ता जिन लोगों से पड़ा होगा वे काफ़ी बनावटी किस्म के लोग होंगे

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

भाई ! सच तो ये है कि अब तक मटुक भाई और जूली बहन का वास्ता जिन लोगों से पड़ा होगा वे काफ़ी बनावटी किस्म के लोग होंगे। अंदर से लिबलिबे और बाहर से ठोस दिखाने का जतन करते हुए। भड़ासी अपनी कमियों खामियों को स्वीकारते हैं और उन्हें दूर करने के लिए अपने बूते भर प्रयत्न करने हैं,जीर्ण गली हुई सोच को भस्म करके उस राख को तन पर मल कर औघड़ी तरीके से जिंदगी जीते हैं। हम घोषित बुरे लोग हैं। भड़ास का एक अपना निजी दर्शन है जो सबके गले से आसानी से क्यों उतरेगा? मेरा तो कहना है कि यदि हम उल्टी भी करें तो वो किसी के खाने के काम आ जाए तब तो सार्थकता है अन्यथा तो बस हवाई बकैती ही रहेगी। दिल दिमाग में अटकी बातें उगल कर रचनात्मकता की ओर बढेंगे और ये एकल प्रयास न रह कर समेकित हो तो आनंद सहत्रगुणित हो जाएगा, जीवन का हर पल आनंदोत्सव है। खेत की मेड़ पर बैठ कर पसीने से भीगी फटी बनियान निचोड़ते किसान बीड़ी सुलगाते हुए जब गन्ने के सरकारी खरीदी मूल्य के बारे में सरकार को गरियाए या एक प्राथमिक पाठशाला की अध्यापिका शिक्षा के "सरकारी माफ़िया" को दबी जुबान में मासिक पाली के दिनों में पोलियों ड्राप्स या जनगणना में ड्यूटी लगा देने पर कोसे; भड़ास वो आवाज़ है वैश्विक मंच पर..... पुरज़ोर उस दबी जुबान को दहाड़ में बदलते हुए ताकि उनकी चूले हिल जाएं जो शोषण,दोहन,दलन कर रहे हैं। मटुक भाई से निवेदन है कि स्पष्टतः हम लोगों के पास सुन्दर शब्द नहीं हैं बातों को कह पाने के लिये जो है वह अनगढ़ है, ऊबड़-खाबड़ है,कोई सौन्दर्य नहीं है इसलिये यदि अब प्रेम के साथ अन्य सामाजिक सरोकारों को भी ले कर आगे चलें तो भला हो। शब्दों में एक दूसरे की टांग खींच कर क्या हासिल होने वाला है ये तो आनलाइन घोषित "चूतियापा" है जिंदगी आफ़लाइन भी घटित होती है जीवन वर्चुअल नहीं फिजिकल है। अब बाहर आइये और भड़ास को जिंदगी में जिएं। आशा है कि दीनबंधु भाई ने जो भी लिखा है उसे आप सहज भाव से स्वीकारेंगे ये हम शब्द-सुदामाओं के मुट्ठी भर चावल हैं कि हम थोड़े कुत्ते हैं, थोड़े कमीने हैं...... इस चावल में कुछ कंकड़ भी हैं या शायद कंकड़ों के बीच कुछ चावल भी हैं। नागफ़नी के फूलों से भड़ासी भोले किस्म के गदहे हैं ये स्वीकारा है हमने।
सादर
जय जय भड़ास

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यु जी सी द्बारा उच्च शिक्षा में सुधार के प्रयास

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

यु जी सी ने सुझाव दिया है की यूनिवर्सिटियां कुछ ऐसा उपाय भी करें जिसमें कोई छात्र अपने कॉलिज में पढ़ाई करे, मगर उसी पाठ्यक्रम का कोई खास पर्चा यदि वह किसी विशेष संस्थान से करना चाहे और उसकी व्यवस्था कर ले, तो उसे ऐसा करने की छूट हो। सैद्धांतिक रूप से यूजीसी के ये प्रस्ताव अच्छे हैं, पर फिलहाल इनका विरोध भी हो रहा है। अध्यापकों को यह शिकायत है कि यूजीसी बिना इन पर पर्याप्त चर्चा कराए और बगैर ब्लू प्रिंट बनाए ही इसे थोपने की कोशिश कर रही है। सभी यूनिवर्सिटियों में इसके लिए ऐसा ढांचा नहीं है कि वहां साल में दो बार परीक्षाएं हो सकें। इसी तरह जिस आंतरिक मूल्यांकन का प्रतिशत बढ़ाने की सिफारिश यूजीसी कर रही है, पर वह छात्रों पर उलटी भी पड़ सकती है। टीचर किसी छात्र से अपनी कोई नाराजगी इसके जरिए निकाल सकते हैं। इसलिए टीचरों द्वारा किए जाने वाले आंतरिक मूल्यांकन की निगरानी का भी तो उपाय करना होगा। लीक से हटने की यूजीसी की इच्छा का स्वागत है, पर यह खयाल रखना होगा कि जल्दबाजी से काम बिगड़ नहीं जाए। यूनिवर्सिटियों को तैयारी के लिए पर्याप्त वक्त मिलना चाहिए।
वैसे भी आतंरिक मूल्यांकन में यह बात सामने आई है की टीचर अपने पसंदीदा छात्रों को ज्यादा नंबर देते है और कुछ तो इतने लोभी किस्म के होते है की पैसा भी खाते है । इसी तरह से कुछ छात्रों से अपने घर का काम भी कराते है । आतंरिक मूल्यांकन से ऐसे प्रोफेसरों की चांदी हो जायेगी ।
कुछ अन्य सुझाव है ...यूजीसी ने शैक्षिक व प्रशासनिक सुधारों के लिए गठित ए. गणनम समिति की सिफारिशों के आधार पर सभी यूनिवर्सिटियों में ग्रेडिंग और सेमिस्टर सिस्टम लागू कराने की पहल की है। उच्च शिक्षा के ग्लोबल मानकों के मद्देनजर हमारी यूनिवर्सिटियों को अंकों और डिविजन की पारंपरिक प्रणाली से बाहर निकलना चाहिए।यह सुझाव काफी अच्छा है चर्चा और व्यापक व्यवस्था कर इसे लागू किया जा सकता है ।
आज बहुत बड़ी तादाद में हमारे छात्र उच्च और प्रफेशनल डिग्रियों व कोर्सों के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं। जब उनकी डिग्रियां और अंक वहां के सेमिस्टर या ग्रेडिंग सिस्टम से मेल नहीं खाते, तो दाखिले में दिक्कत होती है। अगर हमारा सिस्टम उनकी तरह होगा तो हमारे छात्रों को ऐसी परेशानी नहीं होगी। हमारी भी संभावना बढेगी विदेशों से और ज्यादा छात्र भारतीय यूनिवर्सिटियों में दाखिला लेगें क्योंकि यहां ऐसी शिक्षा उन्हें बहुत सस्ती पड़ेगी। ग्रेडिंग प्रणाली अंक प्रदान करने के सिस्टम से ज्यादा उपयोगी है, इसीलिए यहां सीबीएसई की परीक्षाओं में भी उसे अपनाया जा रहा है। पढ़ाई के लिहाज से साल में सिर्फ एक बार परीक्षा लेने से स्टूडंट पर सारे कोर्स की तैयारी एक साथ करने का दबाव बनता है। इसकी जगह सेमिस्टर और निरंतर मूल्यांकन करने वाला पैटर्न उन्हें ज्यादा सीखने के अवसर देता है और तनाव मुक्त रखता है।इस प्रकार यह प्रणाली व्यक्तित्व के विकास में भी मददगार साबित हो सकती है ।

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नई पीढी की साख पर बट्टा लग गया है .....

गुरुवार, 19 मार्च 2009

यह शर्म की बात है की आज भी इतने प्रयासों के बाद रैंगिंग जारी है। कुछ दिन पहले ही हिमाचल प्रदेश के डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलिज में हुई रैगिंग के कारण गुड़गांव के छात्र अमन काचरू की मौत हो गई . आंध्र प्रदेश के एक एग्रीकल्चर कॉलिज की छात्रा त्रिवेणी ने भी रैगिंग से परेशान होकर जहर पी लिया। इसके बाद से ही रैगिंग पर अंकुश लगाने के तमाम उपायों पर बहस हो रही है । देश में रैगिंग पर लगाम कसने के लिए राघवन कमिटी का भी गठन किया गया है. पर इतना तो तय है की केवल कमिटी बना देने भर से रैंगिंग ख़त्म नही हो सकती है. अब कुछ विशेष उपाय करना होगा । यु जी सी ने भी कहा है की जो संस्थान रैंगिंग को रोकने में असफल रहते है , उनके फंड में कटौती की जा सकती है । सुपिम कोर्ट ने इन राज्यों को नोटिस भी भेजा है । देखते है की अब कुछ कदम आगे उठाया नही जाता है या नही । हैरानी की बात है की देश के प्रमुख बड़े बड़े संस्थानों में खूब रैंगिंग होती है । मेडिकल कालेज तो इस मामले में कुख्यात है । इस बार तो हद ही हो गई रैंगिंग ने एक छात्र की जान ले ली । वहशीपन की सारे हदे पार हो गई । ऐसे डॉक्टर किसी का क्या भला करेगे । वैसे भी आज ज्यादातर डॉक्टरों की साख बची कहा है ....ऐसी घटनाओं से तो सिक्षा व्यवस्था पर कालिख पुत गई है । अब जिम्मेदारी हमारी सरकार पर और शिक्षा संस्थानों पर है की वे अपने मुंह पर पुते हुए कालिख को कैसे साफ़ करते है । साथ ही हमारी नई पीढी की साख पर भी बट्टा लग गया है । कुछ सोचो यार ऐसा क्यों हो रहा है ?... परवरिश में कहाँ कमी रह गई है ?

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वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर कड़ी ...

रविवार, 15 मार्च 2009

आज शिक्षा की हालत किसी से छिपी नही है । आजादी के इतने सालों बाद भी लगभग ३५ फीसदी जनसँख्या पढ़ना लिखना नही जानती है । पुरे भारत में खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार न होना एक बहुत बड़ी चुनौती है । हम और आप मिलकर कुछ प्रयास कर सकते है । इसी क्रम में मै शिक्षा पर आधारित एक कड़ी की शुरुआत कर रहा हूँ । उम्मीद है आप सबका साथ जरुर मिलेगा ।
आइये कुछ जानते और करते है .....
१९७६ में शिक्षा को समवर्ती सूचि में डाला गया था । इसके साथ ही शिक्षा के प्रसार में काफी प्रगति हुई । लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है । १९४७ में केवल १४ फीसदी लोग ही साक्षर थे जबकि २००१ की जनगणना के अनुसार ६५ फीसदी लोग साक्षर है । आकडे से लगता है की हमने काफी कुछ किया है , पर दुसरे बड़े देशों से तुलना करनेपर पाते है की हम अभी बहुत पीछे है । अगली कड़ी में और बातें होगी ।

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हम भी साथ हैं.......,

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

चन्दन भाई,
प्रशांत की बीमारी का पता आपको काफी पहले चल चूका था लेकिन आपने इलाज करने में कुछ देर कर दी है.पर फरहीन और बाकी लोग हमेशा इसी प्रयास में रहे की शायद अब प्रशांत का मन हल्का हो जाय और प्रशांत देश और समाज को ठीक से समझने लगे लेकिन मुझे लगता है की अभी काफी वक़्त लगेगा भाई प्रशांत को ठीक होने में रुपेश भाई ने भी कोशिश की लेकिन मुझे लगता है की वो अभी प्रशांत को और समय देना चाहते हैं और उसके बाद इलाज शुरू करना चाहते हैंलेकिन चन्दन भाई मै आपको बताना चाहूँगा की प्रशांत भाई एक अध्यापक हैं ऐसा उन्होंने बताया और मुझे लगता है की प्रशांत भाई को भी ये समझना होगा की एक अध्यापक होने के नाते वो अपने अन्दर के ज़हर को जितनी जल्दी निकाल देंगे उनके छात्रों के भविष्य के लिए उतना ही बेहतर होगा आखिर एक शिक्षक ही समाज को बेहतर नज़रिए से देखता है और समाज को सही दिशा भी दिखता है और प्रशांत भाई आपकी सोच और समझ एक अध्यापक की नहीं लगती क्योकि अभी तक न ही शिक्षा और न ही बाकी सामाजिक मुद्दों पर आपने कोई भी लेख नहीं दिया मेरा आपसे अनुरोध है की तुस्टीकरण के साथ साथ अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी आप लेख लिखें!
शुभकामनाओं सहित आपका हमवतन भाई ....गुफरान...(A.P. Forum Faizabad)

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हम भड़ासिन शिक्षिकाएं

शनिवार, 20 दिसंबर 2008



बांए से दांए- श्रीमती कृष्णा शर्मा व मुनव्वर आपा
दो भड़ासी शिक्षिकाएं जिनमें एक भड़ासिन तो दूसरी महाभड़ासिन हैं इनमें से मुनव्वर आपा(मुनव्वर सुल्ताना) को तो अपनी तेज़-तर्रार पैनी लेखनी के कारण खाली (कु)ख्याति हासिल कर चुकी हैं और दूसरी हैं नव भड़ासिन कृष्णा शर्मा जी। अब देखिये कि इनके मिलने से आगे क्या-क्या होने वाला है किसकी खुली हुई सिलाई पर टांके कसे जाएंगे और किसकी सिलाई फाड़ी जाएगी:)


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  © भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८

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