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आईटी दूल्हा हाईटेक दुल्हन

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

दूल्हा शब्द अपने आप में ही इतनी शक्ति रखता है कि हर कुंवारे के रोम-रोम में झूरझूरी पैदा हो जाती है। आप इस झूरझूरी को मोबाइल के वायब्रेशन से कंपेयर कर सकते हैं। क्योंकि हाईटेक ज़माना है और इस कंम्यूटरीकृत माहौल में हिंग्लिश ज्यादा समझ में आती हैं, इसलिए कन्फ्यूजियाईये बिल्कुल नहीं हम आपको, आपकी ही भाषा में समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं। चूंकि मंदी ने ऐसा मनगढंत माहौल क्रियेट कर दिया है कि आईटी दूल्हों की मांग में अचानक कमी का दौर देखा जा रहा है। मगर, हाईटेक दुल्हनें हैं कि मानने को तैयार ही नहीं। ऑनलाइन दूल्हा सर्च करने के इस युग में बाप और मां की भूमिका भी नगण्य हो चली है। एक ज़माना था, जब पिता के पैरों की कई जोड़ी चप्पलें एक अदद दूल्हा खोजने में ही घिस जाया करती थी। तब भी दुर्लभ प्रजाति का दूल्हा मिल ही जाता था, क्योंकि अंत में उसे भी तो एक गऊ जैसी बेगम की दरकार होती थी? सच तो यही है महाराज! कि दूल्हा शब्द की उत्पत्ति ही संस्कृत के दुर्लभ शब्द से हुई है, बाद में दुल्लहो हुआ और खड़ी बोली आने के बाद इसे दूल्हा नामक शार्ट और सिंपल शब्द में तब्दील होना पड़ा। खैर, यह हमारा विषय नहीं है, हम बात कर रहे हैं आज के आईटी दूल्हे और हाईटेक दुल्हन पर। तो मामला ऑनलाइन चल रहा था, हाईटेक दुल्हन ने बाकायदा अपना विज्ञापन किया- नाम बन्नो रानी, उम्र 28 साल (हालांकि मामला 35 के उपर था), रंग- गोरा, जबकि गेहूंआ रंग से भी एक प्वांइट कम कलर था बन्नो रानी का, लंबाइ 5 फीट 1 इंच, हकीकत यह थी कि 6 इंच मोटी हाई हील पहनने के बाद भी लंबाई बमुश्किल साढ़े चार फीट का आंकड़ा पार कर पाती थी। मगर विज्ञापन तो विज्ञापन है और हर विज्ञापर का अपना हिडेन एजेंडा तो होता ही है। चूंकि मामला दूल्हा खोजने से जुड़ा हुआ था, इसलिए यह सब चलता है। फिर क्या था, ऑनलाइन दूल्हा ढूढऩे का दावा करने वाली वेबसाइट ने कुछ हजार की डिमांड की और पैसा मिल जाने पर हाईटेक दुल्हन का जबरदस्त प्रोफाइल बनाकर दूल्हा खोजन यज्ञ चालू कर दिया गया। उस वेबसाइट पर जितने भी कुंवारे, विधुर पंजीकृत थे, सबको दनादन मेल दाग दिया गया। आलम यह था कि कोई भी फंसे और इस हाईटेक दुल्हन के लिए सुघड़, सुन्दर और टिकाऊ दूल्हे का बंदोबस्त किया जा सके। इधर पिछले कई सालों से कुंवारेपन का दंश झेल रहे रामखेलावन को अखबार का विज्ञापन रोमांचित कर गया। मगर, बेचारे करें तो क्या करें, उम्र 38 बसंत के झूले झूल चुकी थी और कमाई के नाम पर सरकारी स्कूल की प्यूनगिरी! मगर, उन्होंने भी हार न मानने की ठान रखी थी और मन में यह दृढ़प्रतिज्ञ हो चुके थे कि शादी करेंगे जरुर मगर किसी शहर वाली अंग्रेजी बूकती छोरी से ही। इसीलिए बेचारे आज तक कुंवारे ही रह गये थे। अखबार का पन्ना बगल में दबाये सुबह से ही घूम रहे थे, तभी झूरी मास्टर की नज़र रामखेलावन पर पड़ी। झूरी मास्टर चिल्लाकर बोले- अबे रामखिलवना कहां गुमशुम घूम रहा है रे, तनिक इधर तो आ। रामखेलावन चुपचाप मास्टर जी के सामने जाकर खड़ा हो गया। झूरी मास्टर तपाक से उसके बगल में दबा अखबार छिन लिए और बोले कौनौ फंसी है का रे, बहुत दबाये फिर रहा है। मामला यह था कि रामखेलावन को जो भी प्रोफाइल अखबार के स्वंयवर विज्ञापन में जम जाता, वे उसे ऐसे ही लेकर दिन भर घूमते रहते थे और मास्टरी जी लोग मजे ले लेकर उनका मजाक उड़ाया करते थे। आज भी वहीं हुआ, झूरी मास्टर ने आवाज़ लगाकर पूरी मास्टर मंडली इकट्ïठी कर ली और रामखेलावन की हंसी उड़ा, उसका मोह भंग कर डाला। लेकिन आज प्रदीप मास्टर नहीं हंस रहे थे, सबके वहां से बिदा हो जाने के बाद प्रदीप मास्टर ने रामखेलावन के कंधे पर हाथ रखा और बोले, आज शाम को मेरे घर आ जाना, तुम्हारी समस्या का समाधान ढूढ़ा जायेगा। शाम को तय समय पर रामखेलावन, प्रदीप मास्टर के घर पहुंच गया। प्रदीप मास्टर के घर पर कंम्प्यूटर था और उन्होंने बाकायदा इंटरनेट सेवा भी ले रखी थी। प्रदीप मास्टर ने ऑनलाइन ही रामखेलावन को आईटी इंजिनियर घोषित कर, उनकी बढिय़ा वाली प्रोफाइल बना डाली और एक हाईटेक दुल्हन की खोज में उसका विज्ञापन दे डाला। अल सुबह ही बेवसाइट वालों ने रामखेलावन से संपर्क किया और कुछ हजार रुपये लेकर, उनके लिए हाईटेक दुल्हन खोज देने का वायदा कर, चलते बने। कुछ दिनों के बाद वेबसाइट वालों ने सोचा कि क्यों न घोषित आईटी इंजिनियर रामखेलावन व हाईटेक दुल्हन बन्नो रानी की शादी करा दी जाए। आइडिया अच्छा था, सो सबको पसंद भी आया और वेबसाइट वालों ने दोनों पक्षों को टेलीफोन कर मीटिंग फिक्स कर ली। इधर प्रदीप मास्टर ने रामखेलावन को पूरी तरह ट्रेंड कर दिया। ब्रांडेड जींस, कट वाले जूते और हल्के रंग का धारीदार शर्ट पहनाकर, उन्हें समझा दिया कि यस, नो और वेरीगुड से काम न बने तो नो कमेंट्ïस बोल देना। शहर के मंहगे रेस्टोरेंट में मिलन तय हुआ था। ऑनलाइन हाईटेक बन्नो रानी, दरअसल शहर के मॉल में लैडिज प्रोडक्ट का काउंटर संभालती थीं, मगर अपने को रईस और रसूखदार घोषित कर रखा था। खैर, कंम्प्यूटर की आभासी दुनिया में दोनों ने अपनी-अपनी वर्चुअल इमेज बनायी थी, जिसका एक ही घोषित उद्ïदेश्य था, शादी। दोनों ही अंग्रेजी में अटक-अटककर बोलने वाले थे, इसलिए सोच-समझकर कम ही शब्द निकालते थे। जो भी हो रेस्टोरेंट की मुलाकात में यस, नो, वेरीगुड के साथ या या करके मामला सुलटा लिया गया। दोनों पक्ष राजी हो गये, एक-दूसरे को पसंद भी कर लिया। बन्नो रानी को आईटी दूल्हा मिल गया और रामखेलावन को अंग्रेजी बूकती हाईटेक दुल्हन! तो टेंशन खतम हो चुकी थी और बड़े ही धूम-धाम से पंडित की मौजूदगी तथा बारातियों की गैरमौजूदगी में ऑनलाइन महाराज को साक्षी मानकर दोनों विवाह के बंधन में बंध गये। तो अब आप भी हमारे साथ बोलिए ऑनलाइन महाराज की जय
जय भड़ास जय जय भड़ास

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हरी अनंत हरी कथा अनंता.................. (अतीत के पन्ने से....)

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

:-(सोमवार का दिन हमारा रुपेश भाई से भरत-मिलन का दिन था। मैं ये नाम इस लिए दे रहा हूँ क्यूंकि इसे हमारे दादा ने भरत-मिलन कहा। मैं इस मिलन की चर्चा करता शब्दों को ढूंढ रहा था की हमारे भाई ने पहले ही सब कह दिया मगर वो उनके मन की बात थी और मुझे भी अपना अनुभव अपने इस परिवार से साझा करना था। सो कर रहा हूँ।



कहने सुनने की बहुत सारी बातें मगर अनुभव ऐसा की मानो सच में वर्षों बाद मिलन। दादा ने जो वर्णन हमरे डॉक्टर साब का किया था उसी के अनुरूप मैं भी जेहन में एक परछाई बना कर चला था। मगर अपने डॉक्टर साब तो बड़े छुपे रुस्तम निकले और मेरी सारी अवधारणा के विपरीत एक अल्ल्हड़, मस्त ,बिंदास मगर इंसानियत और मानवता के संवेदना से लबरेज युवा उर्जावान और भाड़ी के भडासी हमारे डॉक्टर रुपेश। पनवेल से घर तक और वापस घर से वाशी तक एक ऐसा युवा तुर्क मेरे साथ था जिसके बारे में आज के समाज में "कल्पना" नाम दिया जा सकता है।



घर पहुँचने पर सर्वप्रथम माता जी के दर्शन और फिर हमारी चर्चा का दौर। मैं मंत्रमुग्ध सा डॉक्टर साहब को सुनता जा रहा था और हमारी चर्चा जो की अविराम है चलती रहेगी। इसी बीच भडास माता हमारी मुनव्वर आपा, अन्नपूर्ण बनकर आयी और चली भी गयी.उनके जाने का कचोट मुझे रहा. बहरहाल हमने साथ भोजन किया और चर्चा "भडास" चालू रहा. मेरे प्रति भाई रुपेश का आत्मविश्वास खुद मेरे कदम डगमगा रहा था मगर भाई की उर्जा ने मुझे भी उर्जा का श्रोत दिया. सच में भडास की सार्थकता पर हमें विचार करना ही होगा की क्या सिर्फ भडास निकालना और इतिश्री। यक्ष प्रश्न तमाम भडासियों के लिए. परन्तु इस मिलन के दौरान जो मेरा अनुभव है वो मुझे कुछ और भी सोचने को प्रेरित करता है।



ट्रेन में मुझे एक "लैंगिक-विकलांग" मिली या यूँ कहिये की वो अपना कार्य कर रही थी और इसी दौरान मैं उन से रु-ब-रु हुआ। उनको देखते ही एक पलक मुझे हमारी मनीषा जी का ध्यान आया और मैं उनसे मुखातिब हुआ। थोरा सा परिचय और उन्होने बताया की वो मनीषा जी की बहन हैं और उनकी भी अभिरुचि लिखने में है और वो कोशिश भी कर रही है. डॉक्टर साब ने बताया की वो मोहतरमा भी पढी लिखी स्नातक हैं मगर समाज की मार उनके लिए बस ये ही साधन है. वापस लौटने तक या यूँ कहें की अभी भी मेरे जेहन में ये ही घूम रहा है की एक विकलांग को विकलांग आरक्षण, महिला को महिला आरक्षण, दलित को दलित ऐव मेव कुछ ना कुछ सभी को मगर "लैंगिक विकलांग" नाम का अभिशाप के लिए क्या............???????



सच में ये भी तो हमारे समाज का ही एक हिस्सा है, हमारे ही बच्चे हैं तो ये भेद-भाव क्यों। दिल का दर और मानसिक ऊहापोह अपने प्रश्न का जवाब खुद पता नहीं मगर ख्वाहिश इन्हें ससम्मान सम्माज में एक मुकम्मल दर्जा हो। शिक्षित, योग्य,काबिल,लायक तो फिर पर्तिस्पर्धा के पैमाने के खोटेपन का शिकार क्योँ।



प्रश्न है भडास परिवार से जो वाकई में अब बरगद हो गया है। बरगद इसलिए क्योँ की इसी की तरह हमारे भडास के सिर्फ डाल,तना,पत्ती ही नहीं अपितु जड़ें भी उसी हिसाब से जमती चली गयी है की हम आपने सार्थकता को इस वेब के पन्ने से अलग समाज के गलियारे में कब ले जाना शुरू करें की हमारी सार्थकता समाज के उन हरेक पहलू में दिखाई दे।



संग ही हमारा अनुरोध है सलाहकार मंडल के आदरणीय सदस्यौं के साथ साथ सम्पूर्ण भडास परिवार से की अपने व्यक्तिगत राय, विचार, और मशविरा जरूर दें की आगे क्या.............

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नारी, नग्नता और हमारा समाज

मंगलवार, 27 जनवरी 2009

संवादघर ( www.samwaadghar.blogspot.com) में नारी की दैहिक स्वतंत्रता व सामाजिक उपयोगिता पर जो बहस चल रही है वह रोचक तो है हीबहुत महत्वपूर्ण भी है । एक ऐसा एंगिल जिससे अभी तक किसी ने इस विषय पर बात नहीं की हैमैं सुधी पाठकों के सम्मुख रख रहा हूं !  बहस को और उलझाने के लिये नहीं बल्कि सुलझाने में मदद हो सके इसलिये !


 

नारी देह के डि-सैक्सुअलाइज़ेशन (de-sexualization) की दो स्थिति हो सकती हैं ।  पहली स्थिति है - जहरीला फल चखने से पहले वाले आदम और हव्वा की -जो यौन भावना से पूर्णतः अपरिचित थे और शिशुओं की सी पवित्रता से ईडन गार्डन में रहते थे।  ऐसा एक ही स्थिति में संभव है - जो भी शिशु इस दुनिया में आये  उसे ऐसे लोक में छोड़ दिया जाये जो ईडन गार्डन के ही समकक्ष हो । वहां यौनभावना का नामो-निशां भी न हो ।  "धीरे धीरे इस दुनिया से भी यौनभावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना है" - यह भी लक्ष्य हमें अपने सामने रखना होगा ।



 यदि यह संभव नहीं है या  हम इसके लिये तैयार नहीं हैं तो दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि हम न्यूडिस्ट समाज की ओर बढ़ें और ठीक वैसे ही रहें जैसे पशु पक्षी रहते हैं ।   सुना हैकुछ देशों में - जहां न्यूडिस्ट समाज के निर्माण के प्रयोग चल रहे हैंवहां लोगों का अनुभव यही है कि जब सब पूर्ण निर्वस्त्र होकर घूमते रहते हैं तो एक दूसरे को देख कर उनमें यौन भावना पनपती ही नहीं ।  "सेक्स नग्नता में नहींअपितु कपड़ों में है" - यही अनुभव वहां आया है ।  इस अर्थ में वे पशु-पक्षियों की सेक्स प्रणाली के अत्यंत निकट पहुंच गये हैं ।   प्रकृति की कालगणना के अनुसारमादा पशु-पक्षी जब संतानोत्पत्ति के लिये शारीरिक रूप से तैयार होती हैं तो यौनक्रिया हेतु नर पशु का आह्वान करती हैं और गर्भाधान हो जाने के पश्चात वे यौनक्रिया की ओर झांकती भी नहीं । पूर्णतः डि-सैक्सुअलाइज़ेशन की स्थिति वहां पाई जाती है ।  पशु पक्षी जगत में मादा का कोई शोषण नहीं होताकोई बलात्कार का भी जिक्र सुनने में नहीं आता । मादा या पुरुष के लिये विवाह करने का या केवल एक से ही यौन संबंध रखने का भी कोई विधान नहीं है।  उनकी ज़िंदगी मज़े से चल रही है ।  ये बात दूसरी है कि पशु - पक्षी समाज आज से दस बीस हज़ार साल पहले जिस अवस्था में रहा होगा आज भी वहीं का वहीं है ।  कोई विकास नहींकोइ गतिशीलता नहीं -भविष्य को लेकर कोई चिंतन भी नहीं ।



 हमारे समाज के संदर्भ में देखें तो कुछ प्राचीन विचारकोंसमाजशास्त्रियों का मत है कि यौनभावना का केवल एक उपयोग है और वह है - 'संतानोत्पत्ति। उनका कहना है कि प्रकृति ने सेक्स-क्रिया  में आनन्द की अनुभूति केवल इसलिये जोड़ी है कि जिससे  काम के वशीभूत नर-नारी  एक दूसरे के संसर्ग में आते रहें और सृष्टि आगे चलती चली जाये ।  विशेषकर स्त्री को मां बनने के मार्ग में जिस कष्टकर अनुभव से गुज़रना पड़ता हैउसे देखते हुए प्रकृति को यह बहुत आवश्यक लगा कि यौनक्रिया अत्यंत आनंदपूर्ण हो जिसके लालच में स्त्री भी फंस जाये ।  एक कष्टकर प्रक्रिया से बच्चे को जन्म देने के बाद मां अपने बच्चे से कहीं विरक्ति अनुभव न करने लगे इसके लिये प्रकृति ने पुनः व्यवस्था की -बच्चे को अपना दूध पिलाना मां के लिये ऐसा सुख बना दिया कि मां अपने सब शारीरिक कष्ट भूल जाये । विचारकों का मानना है कि मां की विरक्ति के चलते बच्चा कहीं भूखा न रह जायेइसी लिये प्रकृति ने ये इंतज़ाम किया है ।


 

 सच तो ये है कि सृष्टि को आगे बढ़ाये रखने के लिये जो-जो भी क्रियायें आवश्यक हैं उन सभी में प्रकृति ने आनन्द का तत्व जोड़ दिया है।  भूख लगने पर शरीर को कष्ट की अनुभूति होने लगती है व भोजन करने पर हमारी जिह्वा को व पेट को सुख मिलता है।  अगर भूख कष्टकर न होती तो क्या कोई प्राणी काम-धाम किया करता ! क्या शेर कभी अपनी मांद से बाहर निकलताक्या कोई पुरुष घर-बार छोड़ कर नौकरी करने दूसरे शहर जाता ?



पर लगता है कि हमें न तो ईडन गार्डन की पवित्रता चाहिये और न ही पशु-पक्षियों के जैसा न्यूडिस्ट समाज का आदर्श ही हमें रुचिकर है ।  कुछ लोगों की इच्छा एक ऐसा समाज बनाने की है जिसमे यौन संबंध को एक कप चाय से अधिक महत्व न दिया जाये । जब भीजहां पर भीजिससे भी यौन संबंध बनाने की इच्छा होयह करने की हमें पूर्ण स्वतंत्रता होसमाज उसमे कोई रोक-टोकअड़ंगेबाजी न करे ।  यदि ऐसा है तो हमें यह जानना लाभदायक होगा कि ये सारी रोक-टोकअड़ंगे बाजी नारी के हितों को ध्यान में रख कर ही लगाई गई हैं ।  आइये देखें कैसे ?



 पहली बात तो हमें यह समझना चाहिये कि समाज को किसी व्यक्ति के यौन संबंध में आपत्ति नहीं हैनिर्बाध यौन संबंध में आपत्ति है और इसके पीछे वैध कारण हैं !  हमारे समाजशास्त्रियों ने दीर्घ कालीन अनुभव के बाद ये व्यवस्था दी कि यौन संबंध हर मानव की जैविक आवश्यकता है अतः हर स्त्री - पुरुष को अनुकूल आयु होने पर यौन संसर्ग का अवसर मिलना चाहिये ।    चूंकि सेक्स का स्वाभाविक परिणाम संतानोत्पत्ति हैइसलिये दूसरी महत्वपूर्ण व्यवस्था यह की गयी कि संतान के लालन पालन का उत्तरदायित्व अकेली मां का न होकर माता - पिता का संयुक्त रूप से हो । यह व्यवस्था केवल मानव समाज में ही है ।  बच्चे का लालन पालन करनाउसे पढ़ाना लिखानायोग्य बनाना क्योंकि बहुत बड़ी और दीर्घकालिक जिम्मेदारी है जिसमें माता और पिता को मिल जुल कर अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करना होता हैइसलिये विवाह संस्था का प्रादुर्भाव हुआ ताकि स्त्री पुरुष के संबंध को स्थायित्व मिल सकेसमाज उनके परस्पर संबंध को पहचाने और इस संबंध के परिणाम स्वरूप जन्म लेने वाली संतानों को स्वीकार्यता दे। स्त्री-पुरुष को लालच दिया गया कि बच्चे का लालन-पालन करके पितृऋण से मुक्ति मिलेगीबच्चे को योग्य बना दोगे तो गुरुऋण से मुक्ति मिलेगी|   विवाह विच्छेद को बुरा माना गया क्योंकि ऐसा करने से बच्चों का भविष्य दांव पर लग जाता है । जो स्त्री-पुरुष इस दीर्घकालिक जिम्मेदारी को उठाने का संकल्प लेते हुएएक दूसरे के साथ जीवन भर साथ रहने का वचन देते हुए विवाह के बंधन में बंधते हैंउनको समाज बहुत मान-सम्मान देता हैउनके विवाह पर लोग नाचते कूदते हैंखुशियां मनाते हैंउनके प्रथम शारीरिक संबंध की रात्रि को भी बहुत उल्लासपूर्ण अवसर माना जाता है ।  उनको शुभकामनायें दी जाती हैंभेंट दी जाती हैं ।  उनके गृहस्थ जीवन की सफलता की हर कोई कामना करता है ।



 दूसरी ओर,  जो बिना जिम्मेदारी ओढ़ेकेवल मज़े लेने के लियेअपने शारीरिक संबंध को आधिकारिक रूप से घोषित किये बिनाक्षणिक काम संतुष्टि चाहते हैं उनको समाज बुरा कहता हैउनको सज़ा देना चाहता है क्योंकि ऐसे लोग सामाजिक व्यवस्था को छिन्न विच्छिन्न करने का अपराध कर रहे हैं ।



 अब प्रश्न यह है कि ये व्यवस्था व्यक्ति व समाज की उन्नति मेंविकास में सहयोगी है अथवा व्यक्ति का शोषण करती है ?  दूसरा प्रश्न ये है कि कोई पुरुष बच्चों के लालन-पालन का उत्तरदायित्व उठाने के लिये किन परिस्थितियों में सहर्ष तत्पर होगा ?  कोई स्त्री-पुरुष जीवन भर साथ साथ कैसे रह पाते हैं ? जो स्थायित्व और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी कीवात्सल्य की भावना पशु-पक्षी जगत में कभी देखने को नहीं मिलतीवह मानव समाज में क्यों कर दृष्टव्य होती है?

 


 जब कोई स्त्री पुरुष एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हुएएक दूसरे के साथ सहयोग करते हुएसाथ साथ रहने लगते हैं तो उनके बीच एक ऐसा प्रेम संबंध पनपने लगता है जो उस प्यार मोहब्बत से बिल्कुल अलग है - जिसका ढिंढोरा फिल्मों मेंकिस्से-कहानियों मेंउपन्यासों में पीटा जाता है। एक दूसरे के साथ मिल कर घर का तिनका-तिनका जोड़ते हुएएक दूसरे के सुख-दुःख में काम आते हुएबीमारी और कष्ट में एक दूसरे की सेवा-सुश्रुषा करते हुएस्त्री-पुरुष एक दूसरे के जीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं । वे एक दूसरे को "आई लव यू"कहते भले ही न हों पर उनका प्यार अंधे को भी दिखाई दे सकता है ।  यह प्यार किसी स्त्री की कोमल कमनीय त्वचासुगठित देहयष्टिझील सी आंखों को देख कर होने वाले प्यार से (जो जितनी तेज़ी से आता हैउतनी ही तेज़ी से गायब भी हो सकता हैबिल्कुल जुदा किस्म का होता है।   इसमे रंग रूप,शारीरिक गुण-दोष कहीं आड़े नहीं आते।  इंसान का व्यवहारउसकी बोलचाल,उसकी कर्तव्य-परायणतासेवाभावसमर्पणनिश्छलतादया-ममता ही प्यार की भावना को जन्म देते हैं। ये प्रेम भावना पहले स्त्री-पुरुष के गृहस्थ जीवन को स्थायित्व देती हैफिर यही प्रेम माता-पिता को अपने बच्चों से भी हो जाता है। यह प्यार बदले में कुछ नहीं मांगता बल्कि अपना सर्वस्व दूसरे को सौंपने की भावना मन में जगाता है।


        

 ये सामाजिक व्यवस्था तब तक सफलतापूर्वक कार्य करती रहती है जब तक स्त्री-पुरुष में से कोई एक दूसरे को धोखा न दे ।  पुरुष को ये विश्वास हो कि जिस स्त्री पर उसने अपने मन की समस्त कोमल भावनायें केन्द्रित की हैंजिसे सुख देने के लिये वह दिन रात परिश्रम करता हैवह उसके अलावा अन्य किसी भी व्यक्ति की ओर मुंह उठा कर देखती तक नहीं है।  स्त्री को भी ये विश्वास हो कि जिस पुरुष के लिये उसने अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया हैवह कल उसे तिरस्कृत करके किसी और का नहीं हो जायेगा ।  बच्चों का अपने माता - पिता के प्रति स्नेह व आदर भी माता-पिता के मन में अपनी वृद्धावस्था के प्रति सुरक्षा की भावना जगाता है ।



 "पुरुष भी स्त्री के साथ बच्चे के लालन-पालन में बराबर का सहयोग दे" -इस परिकल्पनाव इस हेतु बनाई गई व्यवस्था की सफलताइस बात पर निर्भर मानी गयी कि पुरुष को यह विश्वास हो कि जिस शिशु के लालन-पालन का दायित्व वह वहन कर रहा हैवह उसका ही हैकिसी अन्य पुरुष का नहीं है। इसके लिये यह व्यवस्था जरूरी लगी कि स्त्री केवल एक ही पुरुष से संबंध रखे ।  कोई स्त्री एक ही पुरुष की हो कर रहने का वचन देती है तो पुरुष न केवल उसके बच्चों का पूर्ण दायित्व वहन करने को सहर्ष तत्पर होता हैबल्कि उस स्त्री को व उसके बच्चों को भी अपनी संपत्ति में पूर्ण अधिकार देता है।  इस व्यवस्था के चलतेयदि कोई पुरुष अपने दायित्व से भागता है तो ये समाज उस स्त्री को उसका हक दिलवाता है ।



 स्त्री ने जब एक ही पुरुष की होकर रहना स्वीकार किया तो बदले में पुरुष से भी यह अपेक्षा की कि पुरुष भी उस के अधिकारों में किसी प्रकार की कोई कटौती न करे ।  दूसरे शब्दों में स्त्री ने यह चाहा कि पुरुष भी केवल उसका ही होकर रहे ।  पुरुष की संपत्ति में हक मांगने वाली न तो कोई दूसरी स्त्री हो न ही किसी अन्य महिला से उसके बच्चे हों ।



 शायद आप यह स्वीकार करेंगे कि यह सामाजिक व्यवस्था न हो तो बच्चों के लालन पालन की जिम्मेदारी ठीक उसी तरह से अकेली स्त्री पर ही आ जायेगी जिस तरह से पशुओं में केवल मादा पर यह जिम्मेदारी होती है । चिड़िया अंडे देने से पहले एक घोंसले का निर्माण करती हैअंडों को सेती हैबच्चों के लिये भोजन का प्रबंध भी करती है और तब तक उनकी देख भाल करती है जब तक वह इस योग्य नहीं हो जाते कि स्वयं उड़ सकें और अपना पेट भर सकें । बच्चों को योग्य व आत्म निर्भर बना देने के बाद बच्चों व उनकी मां का नाता टूट जाता है । पिता का तो बच्चों से वहां कोई नाता होता ही नहीं ।



इसके विपरीतमानवेतर पशुओं से ऊपर उठ कर जब हम मानव जगत में देखते हैं तो नज़र आता है कि न केवल यहां  माता और पिता - दोनो का संबंध अपनी संतान से हैबल्कि संतान भी अपनी जन्मदात्री मां को व पिता को पहचानती है ।  भारत जैसे देशों में तो बच्चा और भी अनेकानेक संबंधियों को पहचानना सीखता है - भाईबहिनताऊताईचाचा - चाचीबुआ - फूफा,मामा - मामीमौसा - मौसीदादा - दादीनाना - नानी से अपने संबंध को बच्चा समझता है और उनकी सेवा करनाउनका आदर करना अपना धर्म मानता है ।  ये सब भी बच्चे से अपना स्नेह संबंध जोड़ते हैं और उसके शारीरिक,मानसिकबौद्धिक और आर्थिक विकास में अपने अपने ढंग से सहयोग करते हैं ।



 बात के सूत्र समेटते हुए कहा जा सकता है कि यदि कोई स्त्री या पुरुष सेक्स को"महज़ चाय के एक कपजैसी महत्ता देना चाहते हैंउन्मुक्त सेक्स व्यवहार के मार्ग में समाज द्वारा खड़ी की जाने वाली बाधाओं को वह समाज की अनधिकार चेष्टा मानते हैंयदि उन्हें लगता है कि उनको सड़क परकैमरे के सामनेमंच पर नग्न या अर्धनग्न आने का अधिकार हैऔर उनका ये व्यवहार समाज की चिंता का विषय नहीं हो सकता तो इसका सीधा सा अर्थ है कि वह इस सामाजिक व्यवस्था से सहमत नहीं हैंइसे शोषण की जनक मानते हैं और इस व्यवस्था से मिलने वाले लाभों में भी उनको कोई दिलचस्पी नहीं है ।  यदि स्त्री यह विकल्प चाहती है कि वह गर्भाधानबच्चे के जन्मफिर उसके लालन-पालन की समस्त जिम्मेदारी अकेले ही उठाए और बच्चे का बीजारोपण करने वाले नर पशु से न तो उसे सहयोग की दरकार हैन ही बच्चे के लिये किसी अधिकार की कोई अपेक्षा है तो स्त्री ऐसा करने के लिये स्वतंत्र है । बसउसे समाज द्वारा दी जाने वाली समस्त सुख-सुविधाओं को तिलांजलि देनी होगी । वह समाज की व्यवस्था को भंग करने के बाद समाज से किसी भी प्रकार के सहयोग की अपेक्षा भी क्यों रखे ? अस्पतालडॉक्टरनर्सदवायेंकपड़ेकॉपी-किताबस्कूल,अध्यापकनौकरीव्यापार आदि सभी सुविधायें समाज  ही तो देता है ।  वह जंगल में रहेअपना और अपने बच्चे का नीड़ खुद बनायेउसक पेट भरने का प्रबंध स्वयं करे।  क्या आज की नारी इस विकल्प के लिये तैयार है?



 यदि समाज द्वारा दी जा रही सेवाओं व सुविधाओं का उपयोग करना है तो उस व्यवस्था को सम्मान भी देना होगा जिस व्यवस्था के चलते ये सारी सुविधायें व सेवायें संभव हो पा रही हैं । सच तो ये है कि शोषण से मुक्ति के नाम पर यदि हम अराजकता चाहते हैं तो समाज में क्यों रहेंसमाज सेसमाज की सुविधाओं से दूर जंगल में जाकर रहें न !  वहां न तो कोई शोषणकर्ता होगा न ही शोषित होगा ! वहां जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहोकौन मना करने आ रहा है ?


 सुशान्त सिंहल

www.sushantsinghal.blogspot.com 

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डा.रूपेश के नए बच्चे करेंगे पुराने सवाल

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

मनीषा दीदी की नयी पोस्ट जो उन्होंने अर्धसत्य पर लिखी आप सबकी नज़र कर रही हूं......
क्या सारी समस्याएं समाप्त हो गयी हैं? हरगिज नहीं...लेकिन अब वो समस्याएं हमें अब हमारी एकजुटता और प्यार के आगे बौनी नजर आने लगी हैं। कुछ समय पहले तक राशन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेन्स जैसी चीजें लगता था कि हमारे अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए ये बहुत जरूरी हैं लेकिन अब से डा.रूपेश जैसे भाई का साथ और बाबूजी(श्री जे.सी.फिलिप) का मार्गदर्शन हमें ये बता रहा है कि हम जल्द ही एक स्वीकार्य पहचान के साथ समाज में समान संवैधानिक अधिकारों के साथ खड़े होंगे। डा.रूपेश ने सभी लैंगिक विकलांग बच्चों को पिता की हैसियत से अपना नाम देकर सभी बच्चों के भीतर एक नई आत्मा फूंक दी है, सारे बच्चे अलग-अलग की बोर्ड लेकर दिन में अक्सर मांग कर आने के बाद अभ्यास करते मिलते हैं; जल्द ही सारे सरकारी विभागों में इन बच्चों के द्वारा भेजी गई एप्लीकेशन्स दिखेंगी......। सूचना प्राप्ति के अधिकार का प्रयोग करते हुए सरकार से जाना जाएगा कि हमारे जैसे लैंगिक विकलांगों के लिए क्या सरकार ने कुछ विचार करा है अथवा नहीं? हमारी कानूनी स्थिति के क्या संदर्भ है? हमारी नागरिकता की पुष्टि कैसे करी जाती है? जो लैंगिक विकलांग चुनाव में अपना नामांकन भरते हैं या जो वोट देते हैं वो किस परिचय से ऐसा कर पाते हैं? इत्यादि...इत्यादि...।

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