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बाबा रामदेव के पास क्यों समय नहीं है जस्टिस आनंद सिंह के लिये??????

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

अभी हाल ही में देखा कि अदालती नौटंकी करने वाले एक चैनल पर बाबा रामदेव लहरा-लहरा कर मुस्कराहटों के फ़ार्म भर रहे हैं और जवाब पर जवाब दिये जा रहे हैं। आखिर क्या बात है कि बाबा रामदेव के पास में काश्मीरा शाह (हिंदी फिल्मों की एक अभिनय शून्य नचनिया) और संभावना सेठ (इन्हें भी आप इसी श्रेणी में गिन सकते हैं) के हर सवाल का बड़ा ही मुस्कराता हुआ उत्तर है और समय भी है। जस्टिस आनंद सिंह से लेकर डा.देशबंधु बाजपेयी तक किसी से मिलने के लिये इनके पास एक सेकंड भी नहीं है। अभी हाल ही में मुझे कूड़े के ढेर पर से एक पत्रक दिखा जिस पर इनकी तस्वीर बनी थी तो कौतूहल वश मैंने उठा लिया पढ़ने पर पता चला कि वो इनकी नई दुकान “भारत स्वाभिमान ट्रस्ट” का प्रचार पत्र है। इस पत्र में बाबा ने स्वदेशी के बारे में अपना राग गाया है निःसंदेह हर अक्षर प्रभावशाली है लेकिन पहली ही बात झूठ सिद्ध हो रही है जहां लिखा है......1. स्वदेशी चिकित्सा व्यवस्था 2. स्वदेशी शिक्षा व्यवस्था 3. स्वदेशी अर्थ व्यवस्था...... वगैरह वगैरह....।
अब कोई इन से पूछे कि मक्कारों के शिरोमणि ! जब तुम आयुर्वेद और योग के नाम पर अपना पेट भर रहे हो तब डा.देशबंधु बाजपेयी के बनाए क्रान्तिकारी अविष्कार “इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम” की बात तक करने में तुम्हें बुखार क्यों आ रहा था? जब भड़ास पर कस कर डंडा करा गया तब योगसंदेश मासिक पत्रिका में एक लाइन निकाल दी। उपचार में कफ़-पित्त-वात की बात करेंगे लेकिन जब बात उस पैथोलाजी की आएगी तो झट से एलोपैथी के पाले में कूद कर ब्लड टैस्ट और ई.सी.जी. की बात करने लगते हैं। अरे नौटंकीबाजों ! स्वदेशी की दुहाई देकर भोले देशवासियों को तो भुलावे में ले लोगे लेकिन इतना तो बताओ कि जिन बातों की दुहाई देकर देश को दुह रहे हो उसके क्रियान्वयन का प्रारूप है भी तुम्हारे पास या बस यूं ही लिख दिया कि अगर हम देशहित में काम न करें तो हमें और संगठन को छोड़ देना। कितने भोले बनते तुम सब.... इसी तरह से सारे राजनेता जनता को दशकों से चूस रहे हैं तुम भी उतर आए पाइप लेकर खून पीने। साहस और सत्यता है तो जस्टिस आनंद सिंह को मिलने का समय दो तब समझ में आएगा कि सच्चाई क्या है।
जय जय भड़ास

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बाबा रामदेव को अभी भी सदबुद्धि नहीं बनियापा छाया है

सोमवार, 18 मई 2009

"बाबा रामदेव की पत्रिका "योग सन्देश ", अप्रैल २००९ के अन्क में ईलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राम तकनीक का वर्णन : E.T.G. Technology descriptions in YOGA SANDESH magazine ,April 2009 issue, published by Baba Ram Dev"
जैसा कि सामान्य जन की आदत हो चली है कि भेड़ों की तरह जहां झुंड है उस तरफ चल पड़ो वैसा ही बाबा रामदेव के बारे में आम जनता ने करा। बिना सोचे समझे ही इन्हें इतना बड़ा बना दिया कि अब ये राजनीति में आकर देश की बीमारियां दूर करेंगे। याद होगा कि मैंने एक बार लिखा था कि ये व्यक्ति मात्र एक दोमुंहे पैमाने पर जीने वाला बंदा है तो ये गलत नहीं था। साफ़ है कि जब उपचार कफ-पित्त-वात के सिद्धांत पर आधारित है यानि योग और आयुर्वेद से हो रहा है तो उसका निदान ऐलोपैथी से क्यों कराया जा रहा है। अगर तकनीक न मौजूद होती तो बात अलग थी लेकिन कई साल से गुरूजी डा.देशबंधु बाजपेयी ने इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम(E.T.G.)तकनीक बना रखी है(इस तकनीक के द्वारा शरीर में कफ, पित्त, वात तथा इनके सभी पांच-पांच भेदो तथा सप्त धातुओं का विस्तार से कम्प्युटराइज्ड विवरण मिलता है चाहे वह कोई सा भी रोग हो) जिसके विषय में बाबा से पत्राचार भी सतत जारी रखा लेकिन बाबा के पास तो प्रसिद्धि और मालपानी कमाने से फुर्सत कहां है। अब जब भड़ास ने इस बात पर मुहिम छेड़ दिया कि बिहार के एक संस्थान द्वारा खोजे गए तरीकों पर बाबाजी अपने नाम की मुहर लगा कर कि उन्होंने योग का सांइटिफ़िक विवेचन कराया है ऐसा भ्रम फैला रहे हैं तथा प्रचार माध्यमों से धन्ना सेठ किस्म के "गुरू" बन बैठे है। इस पर अब कहीं जाकर इस लाबी को होश आया है तो इनके एक पंटर द्वारा लिखे एक लेख में इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम(E.T.G.)तकनीक का जरा सा विवरण लिखा है लेकिन अविष्कारक गुरूजी का नाम देने में अभी भी दुराग्रह है साथ ही अब तक इनकी दुकान में इन लोगों ने आयुर्वेद को जूता ही मार रखा है इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम(E.T.G.)तकनीक को वहां स्थान न देकर। यदि जरा सा भी ईमान शेष है इन लोगों में तो ये आयुर्वेद और योग के भले की आड़ में ऐलोपैथी को ऊपर ले जाने का काम तत्काल बंद करेंगे।
जय जय भड़ास

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आरोग्य मेले में E.T.G.यानि इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम के विषय में किसी चिकित्सक जानकारी ही नहीं है

शनिवार, 31 जनवरी 2009

मुंबई, देश की आर्थिक राजधानी में आयुष से संबंधित मंत्रालय ने आयुर्वेद(A), योग एवं नेचुरोपैथी(Y), यूनानी(U), सिद्धा(S), होम्योपैथी(H) के विकास के लिये ३० जन. से २ फर. तक आरोग्य मेला लगाया हुआ है। सरकार अपनी नीतियों के तहत इस तरह के विकास कार्यक्रमों पर चाहे वह भाषा के विकास हेतु पुस्तक मेले हों या स्वास्थ्य व आरोग्य जागरूकता के लिए ऐसे आरोग्य मेले हों ,करोड़ों रुपए व्यय करती है। आज मैं इरादा कर के गया था कि वहां जिन वैद्य, चिकित्सकों और हक़ीमों ने मुफ़्त स्वास्थ्य परीक्षण के नाम पर अपनी दुकान सजा रखी है उनकी क्लास लेना है कि आप देह में कफ-पित्त-वात की स्थिति का क्या कागजी प्रमाण दे सकते हैं; इस पर सभी बगलें झांकने लगे और कन्नी काट कर व्यस्तता का ढोंग रचाने लगते थे। यूनानी पंडाल में मौजूद डाक्टर मुनव्वर ए. काजिमी जो कि जे.जे. अस्पताल में किसी विषय पर शोध कर रहे हैं, उनसे जब मैने बात करी तो मैं हतप्रभ रह गया जब उन्होंने यूनानी और आयुर्वेद को साइंस मानने से ही इंकार कर दिया; वे कहते रहे मैं सुनता रहा कि वे किस तरह आधुनिक ऐलोपैथी की पैथोलाजी और उसके पैमानों से किस कदर प्रभावित हैं कि आयुर्वेद और यूनानी पर सवालिया निशान लगाते रहे। जब मैंने ऐसे कई लोगों से बात कर ली तो मैं समझ गया कि E.T.G.यानि इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम के विषय में इन लोगों से चर्चा करना मूर्खता है क्योंकि इन्होंने आंखों पर ऐलोपैथी का चश्मा चढ़ा रखा है और मजबूरी में आयुर्वेद या यूनानी से जुड़े हैं। लेकिन मैं एक प्रण कर चुका हूं कि आयुर्वेद और योग को गौरव दिलाने के लिये पातंजलि योगपीठ वाले बाबा रामदेव की तरह आयुर्वेद और योग के प्रमाणन के लिये ब्लड टैस्ट या ई.सी.जी. का सहारा नहीं लूंगा क्योंकि यह तो एक तरह से दोहरा मापदंड है कि उपचार के लिए आयुर्वेद और योग और पैथोलाजी और लाभ के प्रमाण के लिये ऐलोपैथी की मोहताजी........।

जय जय भड़ास

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मेडिकल ब्लागिंग करने वालों क्या E.T.G. के बारें में चर्चा करने से डरते हो????

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

अब एक तो हिंदी ब्लागर ऊपर से मेडिकल के बारें में लिखने वाला तो भला सोचिये कि कितना गया गुजरा होगा वो चिकित्सक जो प्रेक्टिस वगैरह के नोट छापने के धंधे को छोड़ कर ब्लागिंग के कीचड़ में कूद पड़े। हमारे देश में तो वैसे भी हिंदी कुंठित और गंवार लोगों की भाषा मानी जाती है ऐसे में भला कोई आयुर्वेद के बारे में क्यों लिखे? लिखे भी तो क्या कफ-पित्त-वात का चूतियापा करे? अरे लिखना है तो बड़ी-बड़ी बातें लिखो जैसे कि डॉ.प्रभात और डॉ.प्रवीन लिखते हैं मजाल है कि हमारे जैसा कोई गंवार वहा पहुंच जाए वहां तो टिप्पणी करने वाले भी गधी के दूध से नहा कर आते हैं। हमारे जैसे धुर गंवारों के गुरूदेव हैं डॉ.देशबंधु बाजपेयी जी बेचरऊ ने अपनी जीवन भर की रचनात्मक ऊर्जा समेट कर एक ऊलजुलूल सा अविष्कार कर डाला है जिसे हम इलैक्ट्रो त्रिदोषग्राम(E.T.G.) कहते हैं। इस अविष्कार के बारे में मैने पहले कुछ लाइने लिखी थीं तो शराफत और बौद्धिकता का जिनका ठेका है उनमें से कई जनों के तो पिछवाडे़ में हवन कुंड बन गया, सुलग गई, धुंआ उठने लगा। मैंने बाबा रामदेब के दोहरे मानदंडों के बारे में लिखा था इसी E.T.G. के संदर्भ में......। अब बाबा जी जैसे वणिक सोच और राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा रखने वाले प्राणी हमारे जैसे तुच्छ, क्षुद्र और गलीज़ लोगों की बातों पर अगर प्रतिक्रिया भी कर दें तो हम बड़े हो जाएंगे तो बाबाजी चुप्पी साध गए। मैंने अब सोचा कि चलो हर एग्रीगेटर(ब्लागो की जानकारी का संकलक) पर सेहत-स्वास्थ्य के खांचे को घेरे रहने वाले डाक्टरों को उंगली करके देखूं क्या होता है क्या वे E.T.G. के बारे में अपनी अति बौद्धिक संपदा हिंदी के ब्लाग पर इस चीज का जिक्र करते हैं या हरामी राजनेताओं की तरह कन्नी काट कर चुप्पी साध लेते हैं। E.T.G. के बारे में बस इतना ही कहना काफी है कि दुर्भाग्य है ये मेरे अविष्कारक गुरूदेव डॉ.देशबंधु बाजपेयी का कि उन्होंने भारत में जन्म लिया है अगर यही वे अमेरिका या किसी भी पश्चिमी देश में पैदा हुए होते तो साले हरामी स्वास्थ्यमंत्री इस तकनीक को खरीदने के लिये मर रहे होते क्योंकि उस तकनीक की खरीद में करोड़ों का घोटाला करने का मौका जो मिल रहा होता। लेकिन हमारा स्वास्थ्य मंत्री है कि उसे समलैंगिकों के बारे में ज्यादा चिंता है पता नहीं क्या खुद भी उल्टी साइकिल तो नहीं है भगवान ही जाने......।
मैं इस पोस्ट के द्वारा साइबर स्पेस में हिंदी के खांचे में मेडिकल का पुछल्ला पकड़ कर अपनी विद्वता की उल्टियां करने वाले सारे ब्लागरों को गरियाता हूं कि कम से कम तुम तो साहस दिखाओ या बस जीवन का सामाजिक संदर्भ बस यही है कि अपनी ही उंगली सूंघो और कहो कि इसमें जरा ही बदबू नहीं है क्योंकि मैं तो गुलाब और केवड़े के फूल खाता हूं। लिखो वरना थू है तुम्हारी ब्लागिंग पर....।

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बाबा रामदेव के दोहरे मानदंडों का ढकोसला

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

स्पष्ट कह देने वाला व्यक्ति मुंहफट मान लिया जाता है लेकिन क्या करें यदि सत्य पर सेंसर लगा दें तो फिर वह सत्य नहीं रह जाता। आज दुनिया भर में विश्व एड्स दिवस मनाया जा रहा है। एक तरफ़ बाबा रामदेव अयुर्वेद की वकालत करते हुए कहते हैं कि वे W.H.O. को शीर्षासन करवा देंगे आयुर्वेद के बल पर। इनके दोहरे मानदंडों का प्रमाण ये है कि ये दवाएं तो आयुर्वेद की बेचते हैं और उन दवाओं के प्रभाव के परीक्षण की बात आती है तो एलोपैथी के पाले में कूद कर ई.सी.जी. वगैरह निकलवाने की बात करने लगते हैं यानि कि निदान अभी भी एलोपैथी के आगे घुटने टेके खड़ा है। बाबा रामदेव को या तो जानकारी नहीं है या फिर वे भी उसी व्यापारिक सोच के आदमी हैं जो बस माल छापना चाहता है किसी चीज की ब्रांडिंग करके। आप सबके साथ ही बाबा रामदेव की जानकारी में भी इजाफ़ा करना है ताकि वे प्रभावों की जांच के लिये आधुनिकता के नाम पर ऐलोपैथी के आगे न गिड़गिड़ाएं। अपने ही देश के एक आयुर्वेद महर्षि ने आयुर्वेद के विकास के लिये वह कार्य करा है जो कि न कभी हुआ है न होगा वह है "इलैक्ट्रो त्रिदोषग्राम" का अविष्कार करना, इसके अविष्कारक हैं कानपुर उ.प्र. के रहने वाले डा.देशबन्धु वाजपेयी जी। यह यन्त्र जिसे संक्षेप में E.T.G. कहा जाता है शरीर के कफ-पित्त-वात की स्थिति के बारे में विस्तारित कम्प्युटराइज्ड रिपोर्ट देता है तो अब हमें आयुर्वेद की दवाएं देने के बाद फायदा हुआ या नहीं अथवा कितना प्रभाव हुआ ये जानने के लिये ऐलोपैथी का मोहताज होने की जरूरत नहीं है। डा.वाजपेयी की तकनीक सरकारी उठापटक में वर्षों से उलझी है लेकिन क्या बाबा रामदेव को भी इस बारे में जरा भी पता नहीं है या फिर वे जानबूझ कर आंख बंद करे हुए हैं, क्यो नहीं पातंजलि योग प्रतिष्ठान में इस तकनीक को स्थान देते है और आयुर्वेद की ऐलोपथी के प्रति मोहताजी समाप्त करने की दिशा में पहल करते हैं सायद इस लिये कि कहीं हमारे देश में जो एड्स लाबी विकसित हुई है उसकी चूलें न हिल जाएं ???????
जय जय भड़ास

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  © भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८

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