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बाबा रामदेव को अभी भी सदबुद्धि नहीं बनियापा छाया है

सोमवार, 18 मई 2009

"बाबा रामदेव की पत्रिका "योग सन्देश ", अप्रैल २००९ के अन्क में ईलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राम तकनीक का वर्णन : E.T.G. Technology descriptions in YOGA SANDESH magazine ,April 2009 issue, published by Baba Ram Dev"
जैसा कि सामान्य जन की आदत हो चली है कि भेड़ों की तरह जहां झुंड है उस तरफ चल पड़ो वैसा ही बाबा रामदेव के बारे में आम जनता ने करा। बिना सोचे समझे ही इन्हें इतना बड़ा बना दिया कि अब ये राजनीति में आकर देश की बीमारियां दूर करेंगे। याद होगा कि मैंने एक बार लिखा था कि ये व्यक्ति मात्र एक दोमुंहे पैमाने पर जीने वाला बंदा है तो ये गलत नहीं था। साफ़ है कि जब उपचार कफ-पित्त-वात के सिद्धांत पर आधारित है यानि योग और आयुर्वेद से हो रहा है तो उसका निदान ऐलोपैथी से क्यों कराया जा रहा है। अगर तकनीक न मौजूद होती तो बात अलग थी लेकिन कई साल से गुरूजी डा.देशबंधु बाजपेयी ने इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम(E.T.G.)तकनीक बना रखी है(इस तकनीक के द्वारा शरीर में कफ, पित्त, वात तथा इनके सभी पांच-पांच भेदो तथा सप्त धातुओं का विस्तार से कम्प्युटराइज्ड विवरण मिलता है चाहे वह कोई सा भी रोग हो) जिसके विषय में बाबा से पत्राचार भी सतत जारी रखा लेकिन बाबा के पास तो प्रसिद्धि और मालपानी कमाने से फुर्सत कहां है। अब जब भड़ास ने इस बात पर मुहिम छेड़ दिया कि बिहार के एक संस्थान द्वारा खोजे गए तरीकों पर बाबाजी अपने नाम की मुहर लगा कर कि उन्होंने योग का सांइटिफ़िक विवेचन कराया है ऐसा भ्रम फैला रहे हैं तथा प्रचार माध्यमों से धन्ना सेठ किस्म के "गुरू" बन बैठे है। इस पर अब कहीं जाकर इस लाबी को होश आया है तो इनके एक पंटर द्वारा लिखे एक लेख में इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम(E.T.G.)तकनीक का जरा सा विवरण लिखा है लेकिन अविष्कारक गुरूजी का नाम देने में अभी भी दुराग्रह है साथ ही अब तक इनकी दुकान में इन लोगों ने आयुर्वेद को जूता ही मार रखा है इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम(E.T.G.)तकनीक को वहां स्थान न देकर। यदि जरा सा भी ईमान शेष है इन लोगों में तो ये आयुर्वेद और योग के भले की आड़ में ऐलोपैथी को ऊपर ले जाने का काम तत्काल बंद करेंगे।
जय जय भड़ास

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योग एवं आयुर्वेद मात्र मदारियों और गंवारों की पद्धतियां नहीं हैं : E.T.G. तकनीक

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

आयुर्वेद एवं योग के जानकारी रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने "इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम" के अविष्कार पर सुखद आश्वर्य व्यक्त करा है। यह एक क्रांतिकारी खोज है जो कि शरीर में कफ़-पित्त-वात की स्थिति बताने के साथ ही कफ़-पित्त-वात के जो पांच-पांच भेद हैं उन्हें भी बताती है कि देह में ये कितने प्रतिशत मौजूद हैं, मल,मूत्र,स्वेद(पसीना),वीर्य,मांस,अस्थि आदि की उपस्थिति की बाकायदा कंप्यूटराइज्ड जानकारी लगभग बीस पन्नों पर छाप कर उपलब्ध कराने की बात इस जादुई यंत्र का चमत्कार है। यदि किसी योग या आयुर्वेद के अभ्यासी को यह मशीन जानकारियां देती रहे कि देह में सप्त धातुओं,मल व दोष किस स्थिति में हैं तो योग एवं आयुर्वेद को मात्र मदारियों और गंवारों की पद्धतियां कह कर मजाक बनाने वालों के मुंह पर ताला लग जाएगा। लीजिये आप सुधीपाठक भी इस चमत्कारिक यंत्र के आविष्कारक डा.देशबंधु बाजपेयी जी बयानी इसे चरणबद्ध क्रम में पढिये ताकि पता चल सके कि कौन हैं वो पाखंडी और मुखौटाधारी माफ़िया जो कि इस यंत्र की तकनीक को आम आदमी तक लाने में कहीं न कहीं अवरोध बने हुए हैं.......
विकास का प्रथम चरण
विकास का द्वितीय चरण
विकास का तीसरा चरण
विकास का चतुर्थ चरण
विकास का पांचवां चरण
विकास का छठवां चरण
अब तक जो कुछ भी डा.बाजपेयी ने लिखा है इस विकास के क्रम में वह आपके सामने प्रस्तुत है।
जय जय भड़ास

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आरोग्य मेले में E.T.G.यानि इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम के विषय में किसी चिकित्सक जानकारी ही नहीं है

शनिवार, 31 जनवरी 2009

मुंबई, देश की आर्थिक राजधानी में आयुष से संबंधित मंत्रालय ने आयुर्वेद(A), योग एवं नेचुरोपैथी(Y), यूनानी(U), सिद्धा(S), होम्योपैथी(H) के विकास के लिये ३० जन. से २ फर. तक आरोग्य मेला लगाया हुआ है। सरकार अपनी नीतियों के तहत इस तरह के विकास कार्यक्रमों पर चाहे वह भाषा के विकास हेतु पुस्तक मेले हों या स्वास्थ्य व आरोग्य जागरूकता के लिए ऐसे आरोग्य मेले हों ,करोड़ों रुपए व्यय करती है। आज मैं इरादा कर के गया था कि वहां जिन वैद्य, चिकित्सकों और हक़ीमों ने मुफ़्त स्वास्थ्य परीक्षण के नाम पर अपनी दुकान सजा रखी है उनकी क्लास लेना है कि आप देह में कफ-पित्त-वात की स्थिति का क्या कागजी प्रमाण दे सकते हैं; इस पर सभी बगलें झांकने लगे और कन्नी काट कर व्यस्तता का ढोंग रचाने लगते थे। यूनानी पंडाल में मौजूद डाक्टर मुनव्वर ए. काजिमी जो कि जे.जे. अस्पताल में किसी विषय पर शोध कर रहे हैं, उनसे जब मैने बात करी तो मैं हतप्रभ रह गया जब उन्होंने यूनानी और आयुर्वेद को साइंस मानने से ही इंकार कर दिया; वे कहते रहे मैं सुनता रहा कि वे किस तरह आधुनिक ऐलोपैथी की पैथोलाजी और उसके पैमानों से किस कदर प्रभावित हैं कि आयुर्वेद और यूनानी पर सवालिया निशान लगाते रहे। जब मैंने ऐसे कई लोगों से बात कर ली तो मैं समझ गया कि E.T.G.यानि इलैक्ट्रोत्रिदोषग्राम के विषय में इन लोगों से चर्चा करना मूर्खता है क्योंकि इन्होंने आंखों पर ऐलोपैथी का चश्मा चढ़ा रखा है और मजबूरी में आयुर्वेद या यूनानी से जुड़े हैं। लेकिन मैं एक प्रण कर चुका हूं कि आयुर्वेद और योग को गौरव दिलाने के लिये पातंजलि योगपीठ वाले बाबा रामदेव की तरह आयुर्वेद और योग के प्रमाणन के लिये ब्लड टैस्ट या ई.सी.जी. का सहारा नहीं लूंगा क्योंकि यह तो एक तरह से दोहरा मापदंड है कि उपचार के लिए आयुर्वेद और योग और पैथोलाजी और लाभ के प्रमाण के लिये ऐलोपैथी की मोहताजी........।

जय जय भड़ास

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मेडिकल ब्लागिंग करने वालों क्या E.T.G. के बारें में चर्चा करने से डरते हो????

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

अब एक तो हिंदी ब्लागर ऊपर से मेडिकल के बारें में लिखने वाला तो भला सोचिये कि कितना गया गुजरा होगा वो चिकित्सक जो प्रेक्टिस वगैरह के नोट छापने के धंधे को छोड़ कर ब्लागिंग के कीचड़ में कूद पड़े। हमारे देश में तो वैसे भी हिंदी कुंठित और गंवार लोगों की भाषा मानी जाती है ऐसे में भला कोई आयुर्वेद के बारे में क्यों लिखे? लिखे भी तो क्या कफ-पित्त-वात का चूतियापा करे? अरे लिखना है तो बड़ी-बड़ी बातें लिखो जैसे कि डॉ.प्रभात और डॉ.प्रवीन लिखते हैं मजाल है कि हमारे जैसा कोई गंवार वहा पहुंच जाए वहां तो टिप्पणी करने वाले भी गधी के दूध से नहा कर आते हैं। हमारे जैसे धुर गंवारों के गुरूदेव हैं डॉ.देशबंधु बाजपेयी जी बेचरऊ ने अपनी जीवन भर की रचनात्मक ऊर्जा समेट कर एक ऊलजुलूल सा अविष्कार कर डाला है जिसे हम इलैक्ट्रो त्रिदोषग्राम(E.T.G.) कहते हैं। इस अविष्कार के बारे में मैने पहले कुछ लाइने लिखी थीं तो शराफत और बौद्धिकता का जिनका ठेका है उनमें से कई जनों के तो पिछवाडे़ में हवन कुंड बन गया, सुलग गई, धुंआ उठने लगा। मैंने बाबा रामदेब के दोहरे मानदंडों के बारे में लिखा था इसी E.T.G. के संदर्भ में......। अब बाबा जी जैसे वणिक सोच और राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा रखने वाले प्राणी हमारे जैसे तुच्छ, क्षुद्र और गलीज़ लोगों की बातों पर अगर प्रतिक्रिया भी कर दें तो हम बड़े हो जाएंगे तो बाबाजी चुप्पी साध गए। मैंने अब सोचा कि चलो हर एग्रीगेटर(ब्लागो की जानकारी का संकलक) पर सेहत-स्वास्थ्य के खांचे को घेरे रहने वाले डाक्टरों को उंगली करके देखूं क्या होता है क्या वे E.T.G. के बारे में अपनी अति बौद्धिक संपदा हिंदी के ब्लाग पर इस चीज का जिक्र करते हैं या हरामी राजनेताओं की तरह कन्नी काट कर चुप्पी साध लेते हैं। E.T.G. के बारे में बस इतना ही कहना काफी है कि दुर्भाग्य है ये मेरे अविष्कारक गुरूदेव डॉ.देशबंधु बाजपेयी का कि उन्होंने भारत में जन्म लिया है अगर यही वे अमेरिका या किसी भी पश्चिमी देश में पैदा हुए होते तो साले हरामी स्वास्थ्यमंत्री इस तकनीक को खरीदने के लिये मर रहे होते क्योंकि उस तकनीक की खरीद में करोड़ों का घोटाला करने का मौका जो मिल रहा होता। लेकिन हमारा स्वास्थ्य मंत्री है कि उसे समलैंगिकों के बारे में ज्यादा चिंता है पता नहीं क्या खुद भी उल्टी साइकिल तो नहीं है भगवान ही जाने......।
मैं इस पोस्ट के द्वारा साइबर स्पेस में हिंदी के खांचे में मेडिकल का पुछल्ला पकड़ कर अपनी विद्वता की उल्टियां करने वाले सारे ब्लागरों को गरियाता हूं कि कम से कम तुम तो साहस दिखाओ या बस जीवन का सामाजिक संदर्भ बस यही है कि अपनी ही उंगली सूंघो और कहो कि इसमें जरा ही बदबू नहीं है क्योंकि मैं तो गुलाब और केवड़े के फूल खाता हूं। लिखो वरना थू है तुम्हारी ब्लागिंग पर....।

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