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अचानक किसी बेनामी को बूढी माई की चिंता होने लगी

बुधवार, 15 जून 2011


अचानक किसी बेनामी को बूढी माई की चिंता होने लगी और मुझे सलाह दी जा रही है | बेटा / बेटी जब तुममें इतना साहस नहीं है की तुम अपनी पहचान के साथ पधार सको तो क्या उम्मीद करी जा सकती है हो सकता है की तुम ही वो नीच औलाद हो जो आठ महीने बाद अपनी माँ की तस्वीर भड़ास पर देख कर अब ये जानना चाहता है की वो जीवित है या मर गयी | अरे तुम मुझे बता रहे हो की मैं रेलवे या पुलिस को सूचना दे सकता था लेकिन उसकी जगह कलम घसीट रहा हूँ | मैं क्या हूँ और क्या करता हूँ क्या कर सकता हूँ ये अगर जानना है तो अपनी पहचान बता दो और मुंबई कर देख लो पता चल जायेगा की आजकल की महानगर की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में मुंबई में रह कर मैं जो कर रहा हूँ उसे लोग चूतियापा क्यों कहते हैं समझ में जाएगा | अरे हाँ यदि एक हालिया चूतियापे का ताज़ा नमूना देखना है तो हमारी वरिष्ठ भड़ासी बहन मुनव्वर सुल्ताना के ब्लॉग "लंतरानी" पर देख लो लेकिन तुम्हारी परेशानी है की तुम उर्दू नहीं पढ़ पाओगे की मैंने कई दिन से एक व्यस्त इलाके में सड़ती हुयी एक अनजान इंसान की लाश के लिए पुलिस को सिर्फ बुलाया बल्कि धंधे पर भी लगाया | कई घंटे लगे और पुलिस स्टेशन भी कई बार जाना हुआ लेकिन तुम्हे इससे क्या जिसकी अपनी पहचान तक बताने में फट रही है
अरे गधे! कितने रेलवे के अधिकारी और पुलिस वाले मुंबई में ऐसे लोगों की देखरेख कर रहे हैं जो इन माई की करने लगते तेरे जैसे सभ्य सब लोग नहीं रह गए जो मुँह छिपा कर सभ्यता का पाठ पढ़ाएं। हम सब तो असभ्य हैं लेकिन जो करते हैं सबके सामने चाहे तेरी मरम्मत या मजलूमों से प्यार....
जय जय भड़ास

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पईचान कोन???

शनिवार, 28 मई 2011

मेरा भड़ासी दोस्त, कद्दावर शख्सियत, कुशाग्र बुद्धि, सुदर्शन व्यक्तित्व का धनी, मुस्कराता चेहरा, सिद्धान्तों के लिये अड़ियल होने की हद तक आग्रही......

अनुमान लगाइये कि अब तक छिपा रहा ये बंदा मुंबई का कौन सा भड़ासी है जिसने भड़ास पर तमाम लोगों को डंडा कर रखा था

जय जय भड़ास

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पर्यावरण मंत्रालय सिर्फ़ ऊंची इमारतें देखता है

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

जो लोग ये सोचते हैं कि हमारे देश का पर्यावरण मंत्रालय असल में नदी, पहाड़, जंगल, झरने, पशु-पक्षी आदि के बारे में कार्य करता है तो वे अव्वल दर्ज़े के बेवकूफ़ हैं। मुंबई में समुद्री जंगल(सी वुड़्स यानि मैन्ग्रोव) हो या गंगा के घाट हों पर्यावरण मंत्रालय ने कभी उनकी अंधाधुंध कटाई या विनाश के बारे में उतनी अधिक मुस्तैदी दिखाई है जितनी कि मुंबई की आदर्श सोसायटी और "लवासा" जैसे प्रोजेक्ट्स पर दिखाई जा रही है। नदियाँ और जंगल प्रदूषण और बेतहाशा कटाई से मर रहे हैं, मुंबई में समुद्र के आसपास के नमक के खेत सिमट कर गायब होते जा रहे हैं समुद्री जंगल पहाड़ी जगहों से मिट्टी पत्थर ला-लाकर भराई करके दफ़न करे जा रहे हैं कभी पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने साँस भी नहीं ली लेकिन अरबों खरबों रुपये की बात आते ही इस प्राणी को अस्थमा हो गया और गहरी गहरी फुंफकार छोड़ने लगा। इससे हमारी भोली भाली जनता को लगने लगा कि पर्यावरण मंत्रालय भी काम करता है। नई मुंबई में जब एक तरफ से जुईनगर खाड़ी से और दूसरी तरफ से अलीबाग खाड़ी से पानी भर कर सब डूब जाएगा तब इस धूर्त को अवैध उत्खनन के बारे में होश आएगा।
जय जय भड़ास

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मुंबई में मैराथन दौड़ क्यों होती है?कौन कराता है??कौन दौड़ता है???

मंगलवार, 18 जनवरी 2011


पिछले कुछ दिनों से देख रहा था कि मुंबई में मैराथन दौड़ को लेकर बड़ी गहमागहमी छायी हुई थी। वो लोग जिन्हें जनता देखने को तरस जाती है जैसे कि फिल्म स्टार, अंबानी-संबानी टाइप के बिजनेस टाईकून्स, समाजसेवा से मेवा खाने वाले समाजसेवक आदि। इस पूरी दौड़ में कुछ ऐसे लोग भी शामिल हो जाते हैं जिन्हें कोई काम धंधा नहीं रहता और जिन्हें लगता है कि वे इसमें हिस्सा लेकर "कुछ" कर रहे हैं। इनमें वे लोग शामिल नहीं रहते जो कि सुबह मुंह अंधेरे घर से निकल कर भागते हुए लोकल ट्रेन पकड़ते है और बैठने की जगह पाने के लिये ट्रेन स्टेशन पर आकर खड़ी होने से पहले ही लपक कर चढ़ जाते हैं, बसों में धक्के खाते हैं आफ़िस में जाकर मालिक की डांट खाते हैं और शाम को ताश के पत्ते खेलते हुए उसी लोकल ट्रेन में कसमसाते हुए अपने अपने दड़बेनुमा घरों(जिन्हें मुंबई में फ़्लैट्स कहकर सम्मान दिया जाता है) लौट जाते हैं। वो नेता भी नहीं रहते हो को घोटालों में सतत व्यस्त रहते हैं। तो फिर कौन कराता है ये सब और क्यों??? अरे यार बड़े लोगों का मनोरंजन है, टाइमपास है, आदर्श सोसायटियों की तरफ से ध्यान हटाने का प्रयास है। प्याज, खाने का तेल, रसोई गैस, टमाटर, लहसुन जैसी आम जरूरत की वस्तुओं की सुरसा के बदन की तरह बढ़ती कीमतों की तरफ से थोड़ा सा ध्यान हटाने के लिये आयोजन रहता है। मोबाइल फोन आदि की कीमतें दिन ब दिन कम हो रही हैं आखिर हमारा देश तरक्की कर रहा है अगर किसान आत्महत्या कर लें या मध्यम वर्गीय परिवार की कमर टूट जाए तो क्या फ़र्क पड़ता है तरक्की के लिये कुर्बानी देनी पड़ती है।
अबे लोकल ट्रेनों और बसों में सफ़र करने वालों तुम तो रोज ही मैराथन दौड़ते हो लेकिन जीतते नहीं जीतेगा तो वो जो इथयोपिया से इधर तक दौड़ कर आया है तुम तो सिर्फ़ उत्तर प्रदेश बिहार तमिलनाडु कर्नाटक या फ़िर बीजापुर कोल्हापुर से मुंबई आए हो तुम्हारी दौड़ भी छोटी और तुम्हारी रफ़्तार भी कम है।
जय जय भड़ास

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पहले बनाने में घोटाला अब गिराने के ठेके में घोटाले की प्रतीक्षा में हमारे नेता जी : आदर्श सोसायटी घोटाला

बेहद प्रसन्नता का विषय है कि हमारे देश की महान जनता द्वारा लोकतान्त्रिक तरीके से वोट देकर चुने गए हमारे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों आदि की शह पर जिन ब्यूरोक्रेट्स ने आदर्श सोसायटी नामक बिल्डिंग बनाने के संबंध में अनुमति आदि दी थी अब वही लोग उसे मंत्रालय के निर्देश पर गिराने का ठेका देंगे। कचहरी ने कहा है कि उस इमारत को गिराने का उत्तरदायित्व सोसायटी के लोगों का ही है।
हा..हा...हा......
जनता को अपने जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रादि मुद्दों के आधार पर चुने नेताओं पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिये कि इस तरह के काम पूरी ईमानदारी से होंगे। झुग्गी-झोपड़ी तोड़े जाने पर जिस प्रकार गरीबों का पुनर्वसन करा जाता है ठीक उसी प्रकार अमीरों को भी हक है कि यदि वे किसी गलत सौदे में इस तरह फंस गए हैं तो उनका पुनर्वास करा जाए। इसलिये बहुत संभव है कि इस बहुमंजिला इमारत को तोड़ कर हरेक को एक एक बंगला सरकार की ओर से दिया जाएगा। जनता परेशान न हो कोई भी आदर्श सोसायटी वाला उनके सामने आकर जमीन पकड़ कर झुग्गी-झोपड़ी नहीं बनाएगा।
हमारे लोकतंत्र की बारंबार जयजयकार साथ ही भारत की टीवी देखने और अखबार पढ़ने वाली जनता की जय हो।
जय जय भड़ास

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पेशाब जैसे पानी को मुंबई की मेयर शुद्ध पेयजल बता रही हैं

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

आजकल मुंबई की महानरकपालिका की मेयर बाई जी की नजरें इतनी खराब हो गयी हैं कि मुंबई शहर के तमाम इलाकों में जो पेशाब जैसा पीला पानी आ रहा है उसे वे शुद्ध पीने योग्य पानी बता रही हैं। बाई जी ने एक और मजेदार बात कही है जो कि मैं भड़ास के मंच के द्वारा पूरी दुनिया के साथ बांटना चाहती हूं कि पानी का पीला रंग मुंबई में पड़ने वाली ठंड के कारण है। इस महाइंटैलिजेंट किस्म की औरत को ये नहीं पता कि दिल्ली और मुल्क के अनेकों हिस्सों में कितनी ठंड पड़ रही है अगर इसकी विद्वता से देखा जाए तो उत्तर भारत और दिल्ली में तो पानी का रंग पीला क्या सर्दी से भगवा हो जाना चाहिये था। मुंबई की जनता जानती है कि पीने योग्य पानी रंगहीन, गंधहीन होने के साथ ही न तो अम्लीयता लिये होता है और न ही क्षारीयता लिये यानि कि ph वैल्यू सात होनी चाहिये। जनता को पेशाब के रंग का पानी मजबूरी में पीना पड़ रहा है क्योंकि अब सबके पास तो नेताओं की कंपनियों में बनने वाला बाजारू मिनरल वाटर खरीद कर पीने का दम नहीं है।
मुंबई की मेयर को चाहिये कि वे समय रहते ये भी घोषणा कर दें कि जिन्हें पानी न मिल रहा हो वे शिवाम्बु यानि कि अपना अपना मूत्र पीकर काम चला लें वो अधिक फायदेमन्द रहेगा कम से कम कोई बीमारी तो न होगी।
जय जय भड़ास

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प्रिय अजमल आमिर कसाब मुंबई नगरी तुम्हारे लिये किसी रखैल जैसी ही है

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

आज दो साल हो गया जब तुमने अपने वीर धर्मयोद्धा साथियों के साथ हमारी नगरी मुंबई को बलात अपना बना लिया था। इस प्रकरण में माँ मुंबादेवी के लगभग पौने दो सौ बच्चों को तुम लोगों को मारना पड़ा लेकिन ये तुम्हारा प्रेम ही तो है जिसके लिये तुमने इतना सब कुछ कर डाला इस नगरी को बलपूर्वक अपनी रखैल बना लेने के लिये। हम जानते हैं कि तुम्हें इसकी प्रेरणा अपने बड़े भाई अफ़जल गुरु जी से मिली होगी जिन्होंने मुंबई नगरी की नानी माँ "संसद" को ही बलत्कृत कर डाला था और आज तक सुखी हैं ये बात अलग है कि संसद नानी से रोजाना ही साठ-पैंसठ सालों से यही सब होता आ रहा है लेकिन वो हम लोगों द्वारा चुने हुए अधिकृत बलात्कारी होते हैं जो संसद की गरिमा को नोचा खसोटा करते हैं।
कुछ लोग आज दिल्ली-मुंबई जैसी जगहों पर आज आपके उस वीरता पूर्ण कृत्य को याद करने के लिये मोमबत्तियों का धंधा करेंगे जिनसे खरीद कर कुछ लोग उन्हें जलाएंगे। मोमबत्ती जलाने वालों को लगता है कि वे ऐसा करके उन्हें श्रद्धांजलि दे रहें हैं जिन्हें आपने वीरतापूर्वक कीड़े-मकोड़ों की तरह मार दिया था। मोमबत्तियाँ बुझ जाएंगी सब अपने अपने घर चले जाएंगे। आप उसी तरह हमारे देश के कानून का कंडोम पहन कर संवैधानिक अधिकारपूर्वक अपनी रखैल मुंबई नगरी से जितना चाहें जैसे चाहें सब कुछ कर सकते हैं, जेल अधिकारियों को भी पीट दिया करिये यदि वे कुछ अड़चन पैदा करें।
हमारे देश में आप जैसे महावीर दामादों की सख्त कमी है आशा है कि आपके आका इस बात पर ध्यान देते हुए जल्द ही कुछ और लोगों को भेजेंगे। हमारी मुंबई नगरी अभी भी सुरक्षा के नाम पर अभी भी वैसी ही अधनंगी चौराहे पर खड़ी है जैसे पिछले साल इस दिन थी क्योंकि उसकी गरिमा की नीलामी करने वाले तो हमारे देश के नेता,जनता और अधिकारी ही हैं।
आपको सादर नमन
जय जय भड़ास

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माता जी की मृत्यु के बाद सिर्फ़ भड़ास-भड़ास ही लिखने का दिल कर रहा है

रविवार, 21 नवंबर 2010

मुंबई के तमाम भड़ासी मेरी माताजी की मृत्यु के बाद और उससे पहले से ही मेरे साथ ऑफ़लाइन रह कर मुझ दो हाथ वाले प्राणी का माताजी की तीमारदारी में सहयोग कर रहे थे। माँ तकरीबन दो माह से बिस्तर पर ही थीं। मन को संतोष देने के लिये कह सकते हैं कि उम्र हो गयी थी तो एक न एक दिन जाना ही था लेकिन मन पर एक बोझ है जो भड़ास के अलावा किधर निकाला जा सकता है। भाई अजय मोहन से लेकर मुनव्वर सुल्ताना आपा तक सभी तो जानते हैं। बुज़ुर्ग सहयोगी जनाब मुहम्मद उमर रफ़ाई साहब से लेकर बादशाह बासित सभी तो अपने अपने स्तर पर लगे हुए थे कि किस तरह माताजी के लिये कुछ कर सकें। बादशाह बासित ने जहाँ अपने सारे दोस्तों को sms करे कि मेरी नानी जी के स्वास्थ्य के लिये प्रेयर करिये वहीं रफ़ाई साहब ने आब-ए-ज़मज़म से लेकर तस्बीह तक हाथ में लेकर न जाने क्या क्या जाप कर डाले। मुंबई जैसे बड़े शहर के तमाम नामचीन अस्पताल और उनकी रिपोर्ट्स लगातार कराए जाते रहे पैथोलॉजिकल टैस्ट्स एक दिन २९ अक्टूबर शाम ६:५० पर सब थम गया। माता जी की साँसों की डोर टूट गयी। माताजी की मृत्यु का कारण आज तक हमारी समझ में न आया क्योंकि उन्हें तो बस बुखार ही रहा करता था जिसे हम लोग किसी भी तरह से नियंत्रित करने का प्रयास करते रहते और वो था कि पागल साँड की तरह मेडिकल साइंस को धकियाता रहता था जैसे ही दवा देते साला 99 से बढ़ कर दस मिनट में 104 तक चला जाता और माँ बेसुध रहती, हम सब पागल की तरह ठंडे पानी की पट्टियां रखते पंद्रह बीस घंटे बिता देते तब कहीं जाकर हौले हौले बुखार नीचे आता और माँ धीमी आवाज़ में आँखें खोल कर पानी माँगती जिसे हम लोग बड़ी सफलता की तरह देखते दो चम्मच पानी हलक से नीचे उतर जाता तो बड़ी बात रहती इस बीच में हम सब इस जुगाड़ में रहते कि कुछ जूस आदि पिला दिया जाए।
बस्स्स्स्स्स...........
बस्स्स्स्स्स....
दिमाग खराब नहीं हुआ है मेरा कि ये सारी रामकहानी लिखूं । बात तो अभी आगे है जो कि लिखना शुरू करना है।
निवेदन है कि बिना जानकारी और पुख्ता सबूत के इस अनुभव में कोई न कूदे। मैं अपनी बातो के साथ समय समय पर प्रमाण के तौर पर चित्र वीडियो आदि रखता चलूंगा।
अनूप मंडल के विद्वानों से निवेदन है जैनों को कुछ समय के लिये छोड़ कर आप इस मामले में अपनी राय अवश्य रखियेगा।

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ऐसी नीच औलादें पैदा करने से अच्छा होता कि माताजी आप बांझ रहतीं.....

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010


आज से लगभग डेढ़ साल पहले का वाकया मैंने इसी मंच पर लिखा था कि बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता की कैसी दुर्गति होने के लिये छोड़ देते है। ३ फ़रवरी मंगलवार २००९ के दिन लिखे इस आलेख के बाद मैं ये सोच बैठा था कि कुछ दिन बाद वह बूढ़ी मां इसी तरह गुमनाम मौत मुंबई के किसी उपनगरीय रेलवे स्टेशन पर मर गयी होगी।

बूढ़े माता-पिता को मुंबई की ट्रेन में बैठा दीजिये

आज मुझे भड़ास से जुड़े मेरे आफ़लाइन बाल-गोपालों ने फोन करा कि आप किधर हैं, मैंने कहा कि मैं नई मुंबई जुईनगर में हूं तो वे बोले कि आप सानपाड़ा में उस जगह आ जाइये जिधर लोकल ट्रेनों की धुलाई-सफ़ाई होती है यहां एक खाली लोकल में हम लोग पानी की खाली प्लास्टिक की बोतलें बीनने आए थे तो एक बूढ़ी औरत को देखा जो कि पूरी पानी से भीगी हुई है और हमारी बात समझ नहीं पा रही है कहीं मर न जाए आप जल्द आइये। खाली बोतलें बीनने वाले बच्चों के बुलाने पर मैं अपने साथ मेरे एक मौलाना मित्र को लेकर तुरंत उस जगह पहुंचा तो देख कर हैरान रह गया कि ये वही बूढ़ी महिला है जिसके बारे में मैं लिख कर आक्रोश निकाल चुका था और ये सोच चुका था कि बेचारी अब तक तो कहीं मर खप गयी होगी। लेकिन वाह रे दुनिया बनाने वाले.... तू भी कमाल करता है जिसे न ठीक से खाने को है न रहने को उसे जिंदा रखे है और जिन्हें सब सुविधाएं हैं वो अचानक चले जाते हैं।ठिठुरती माई को हम सब ने सूखे कपड़े जो कि मौलाना साथ लेकर आए थे दे दिये और चाय वड़ा-पाव देकर चले आए क्योंकि वो अब लोकल ट्रेन से उतरना ही नहीं चाहती थीं। शायद वो लोकल ट्रेन उन्हें अपने उन बेटा-बहू से ज्यादा भली लगने लगी है जिसमें कोई भी सहारा देकर कुछ खाने पीने को दे देता है जबकि बेटा बहू ने तो धोखे से यू.पी. से मुंबई आने वाली ट्रेन में धोखे से बैठा दिया था।
न जाने कब तक भटकेगी ये मां इसी तरह? ऐसी नीच औलादों को पैदा करने से तो अच्छा होता कि वो मां ही न बन पाती, आजीवन बांझ होने का ताना सह लेती लेकिन ये दिन न देखने पड़ते।
जय जय भड़ास

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जिस पत्रकार ने अपनी अम्मा का दूध पिया हो वो एक ही अखबार के दो RNI नंबरों के बारे में रहस्य खोले

बुधवार, 11 अगस्त 2010

अभी हाल ही में समाचार पत्र के प्रकाशन संबंधी नियमों और RNI के विषय में कई बार पढ़ा तो हर बार एक ही बात निकल कर सामने आयी कि आप देश में पहले से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र से मिलता जुलता कोई दूसरा नाम पंजीकृत नहीं करा सकते हैं वरना ऐसे में तो नामचीन टीवी चैनलों की बजाने में स्थानीय चिरकुट चैनल पीछे न रहें। यानि आप अपने चैनल का नाम आजतक की तर्ज पर अबतक या अभीतक नहीं रख सकते। अब ये समझ में नहीं आ रहा है कि नवभारत टाइम्स दो अलग RNI नंबरों से वो भी एक ही शहर में कैसे प्रकाशित हो रहा है? भड़ास पर दिन भर में सैकड़ों पत्रकार आते हैं और चुपचाप देख कर निकल जाते हैं टिप्पणी देने का तो साहस तब होगा जब ईमानदारी कायम होगी वैसे भी भड़ास को टिप्पणियों की दरकार कभी नहीं रही। भाई रजनीश झा शायद अस्वस्थ हैं इस कारण इस विषय पर लिखना संभव न हो सका लेकिन हमें यकीन है कि इस गोरख धंधे का पर्दाफ़ाश जरूर होगा कि ये क्या चक्कर है।
जय जय भड़ास

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मुंबई में मोटरमैनों की भूख हड़ताल के सच को देखा हम भड़ासियों ने...... जनता,नेता,अधिकारी,मजदूर यूनियन सबके सब कमीने निकले

बुधवार, 5 मई 2010

मुंबई में हाल ही में हुई मोटरमैनों की भूख हड़ताल के बारे में बड़े भाई साहब डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी ने भाई रजनीश झा से कहा था कि हम कुछ भड़ासी मिल कर इस पूरे वाकये को देखने और समझने जा रहे हैं। इसका कारण ये था कि आम आदमी तक सरकारी भोंपू बने न्यूज़ चैनल गलत संदेश पहुंचा रहे थे कि ये मामला महज वेतन वृद्धि से जुड़ा है। हमने देखा कि इससे पहले भी लोकल ट्रेन चालकों ने भूख हड़ताल की बात कही थी उस समय एक राजनैतिक लॉलीपॉप उन्हें पकड़ा दिया गया कि सरकार की तरफ़ से "फ़ास्ट ट्रैक कमिटी गठित कर दी गयी है जो इस पर विचार करके परिणाम देगी। ये कमिटी कितनी फ़ास्ट रही ये किसी ने नहीं देखा समय बीतता गया, चालकों ने फिर सरकार को चेतावनी दी लेकिन नेताओं को अपना घर भरने से फुरसत कहाँ है। एक माह पहले से ही इन मोटरमैनों ने पोस्टर लगा कर जनता से सारी वस्तुस्थिति बताते हुए सहयोग की अपील करी थी। लेकिन यथा राजा तथा प्रजा के अनुसार मुंबई की जनता भी वैसी ही है भूख हड़ताल की चेतावनी को बंदर घुड़की समझ कर निकल पड़ी धंधे पर लेकिन जब अटक गए तो रोना शुरू कर दिया। ज्ञात हो कि एक दिन पहले तक मुंबई के स्वयंभू हितैषी बालठाकरे और उनकी शिव सेना ने इस भूख हड़ताल का नैतिक समर्थन करा था लेकिन दूसरे दिन जब दूसरे दिन जनता की परेशानी देखी तो समर्थन वापिस ले लिया अब आप लोग खुद सोचिये कि क्या जनता की समस्या के बारे में नीच ठाकरे पार्टी अनभिज्ञ थी ,सब के सब दूध पीते बच्चे हैं कि इन्हें अंदाज नहीं था कि लोकल बंद होने से क्या होगा लेकिन इससे इनका धोखेबाज चरित्र सामने आ गया। भूख हड़ताल करने वाले मोटरमैनों में से अधिकाँश(लगभग ८०%) तो शिवसेना समर्थित रेलकामगार सेना के ही थे लेकिन उन्हें भी अपने नेताओं का चरित्र समझ आ गया जब वे गिरफ़्तार हो गये और नेताओं ने पीछे से पीठ में छुरा घोंप दिया समर्थन वापिस लेकर। वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र का भला चाहने वाला एक और बड़बोला बंदर राज ठाकरे भी इस भूख हड़ताल में अपनी लाल करने आ गया ये बयान देकर कि यदि मोटरमैन हड़ताल खत्म नहीं करते तो म.न.से. उनसे अपने तरीके से यानि मारपीट कर निपटेगी, जो कि इन कमीनों ने करा भी जिसे किसी न्यूज चैनल ने नहीं बताया कि इन कुत्तों ने एक भूखे पेट काम करते मोटरमैन को दादर में मारापीटा भी था।
इन मोटरमैनों के कार्य की प्रकृति को जानिये तो आपको शायद इन पर दया आ जाएगी न तो इनके खाने का समय निर्धारित होता है न ही दैनिक कर्मों का, इनकी सामाजिक और पारिवारिक जिन्दगी का तो आप ऐसे अंदाज लगा लीजिये कि साल में ३६५ दिन काम करते हैं इन्हें साप्ताहिक अवकाश नहीं होता,स्टाफ़ की भारी कमी के चलते जबरन ओवरटाइम कराया जाता है जो कि ये भारी मानसिक दबाव में मजबूरी में करते है और फिर जनता के सामने इनका वेतन रखा जाता है कि देखो इतनी पगार है मोटरमैन की, ये कोई नहीं जानता कि उसमें जबरन कराया ओवरटाइम भत्ता कितना है जिसे सरकार इन्कम टैक्स के रूप में वित्त वर्ष के अंत में वापिस चूस लेने वाली है। लोग कहते हैं कि ये पब्लिक सर्वेंट हैं इन्हें ऐसा नहीं करना चाहिये यानि कि लोग ये मानते हैं कि मोटरमैन पब्लिक का हिस्सा नहीं होते। एक महामूर्ख अधिकारी न्यूज चैनल पर मुँह फाड़ कर गधों की तरह बयान दे रहा था कि ये हड़ताली कर्मचारी किसी मान्यता प्राप्त मजदूर संगठन के नहीं हैं इसलिये इनसे बातचीत का तो प्रश्न ही नहीं पैदा होता, इसपर हमारे भाईसाहब ने उसे गरियाते हुए कहा कि सरकार आतंकवादियों से बात कर सकती है वो क्या सरकारी मान्यता प्राप्त रहते हैं या जो डंडा ठॊक दे उससे ही बात करते हो तो बेटा लो जल्द ही तुम लोगों को एहसास हो जाएगा कि सरकार के तलवे चाटते मजदूर संगठन और उसके नेता अगर इनको समर्थन न भी दें तो इनकी एकता सबको कैसा नाक रगड़वाती है पूरी दुनिया ने देखा कि आर.आर.पाटिल को मध्यस्थता करना पड़ा।
ये मोटरमैन जितने लोगों की जान की जिम्मेदारी लेकर चलते हैं उससे कहीं बहुत कम लोगों की जिम्मेदारी एक एयर पायलट पर होती है जबकि पदनाम इन्हें भी "ट्रेन पायलट"(मोटरमैन कोई पदनाम नहीं है) दे रखा है लेकिन एक एयर पायलट के साथ को-पायलट भी रहता है जबकि उसे तो ऑटो-पायल्ट जैसी यान्त्रिक व्यवस्था भी हासिल है। इन गरीबों को सहायक चालक नहीं दिया जाता जिसकी ये माँग जमाने से कर रहे हैं जो कि जायज़ भी है लेकिन कमीनी सरकार को उसके लिये रोजगार बढ़ाना होगा कुछ और बेकार नौकरी पा जाएंगे इस लिये ये मांग नहीं पूरी करी जाती। दूसरी बात जन सुरक्षा की है किसी बस में आप निश्चित संख्या से अधिक सवारी नहीं भर सकते यहाँ तक कि यदि आप अपनी स्कूटर पर चार लोग बैठा कर निकल जाएं तो ट्रैफ़िक पुलिस आपका चालान कर देती है, हवाई जहाज़ में आप मुंबई से दिल्ली तक का मात्र डेढ़ घंटे का सफ़र स्टैंडिंग का टिकट लेकर क्यों नहीं कर सकते ये दूरी तो बस इतनी ही हुई न जितनी पनवेल से अंधेरी। इसकी वजह है कि कोई भी यातायात व्यवस्था आपको अपनी जान जोखिम में डाल कर यात्रा की अनुमति नहीं देती लेकिन मुंबई की लोकल ट्रेन में हमारी प्यारी सरकारें इस जनसुरक्षा के मामले को शिथिल कर देती हैं और बिना ट्रेन की संख्या बढ़ाये आपको उन्हीं ट्रेनों में हजारों टिकट जारी करके कीड़े-मकोड़ों की तरह यात्रा करने को बाध्य कर देती है। क्या कभी किसी प्रवासी संगठन ने इस बात की तरफ ध्यान दिया है???
(चित्र में आप देख सकते हैं कि डॉ.रूपेश श्रीवास्तव ने खुद लोकल ट्रेन के ड्राइविंग कैब में बैठ कर उस पीड़ा को बाँटा है जो एक सच्चा भड़ासी ही कर सकता है)
ऐसी ही सैकड़ों बाते हम लोगों ने उनको नजदीक से जान कर समझ पायी हैं जो कि यदि आप संवेदनशील हैं तब ही समझ सकते हैं अन्यथा तो देश में गृहयुद्ध भी होता रहे तो आप सब मुंबईकर आई.पी.एल. मैच ही देखेंगे।
जय जय भड़ास

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दूध की कीमत तीन रुपये बढ़ गयी है, मैंने गोलोकधाम जाने का इरादा कर लिया.....

रविवार, 28 मार्च 2010

दिमाग का दही बन जाता है लेकिन दूध का दही बना पाने की इजाज़त तो धीरे धीरे जेब बंद करती जा रही है। दूध की कीमत एक बार फिर से तीन रुपये बढ़ा दी जाएगी इस बात का निर्णय लिया गया द बाम्बे मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन की बैठक में; लेकिन साला एक बात समझ में आती नहीं कि इस बैठक में न तो एक भी गाय को आमंत्रित करा गया न ही एक भी भैंस बुलायी गयी, ये साले तबेले वाले कभी भी चारा-भूसा मंहगा हो गया कह कर मूल्य बढ़ा देते हैं। भाई हमने तो खुन्नसिया कर चाय पीना ही छोड़ दिया है। अब ससुरा कोई मंत्री संत्री तो हैं नहीं कि चीजों के दाम घटाना बढ़ाना हमारे हाथ में हो। गरीब आदमी की तरह कटौती कर लेते हैं और एक एक करके छोड़ते जाते हैं एक दिन देखियेगा जब जिंदगी मंहगी हो जाएगी तो जीना भी छोड़ देंगे और निकल पड़ेंगे भगवान कृष्ण के गोलोकधाम इस उम्मीद में कि कम से कम उधर तो दूध फ़ोकट में मिला करेगा लेकिन क्या भरोसा उधर पर चाय की पत्ती न मिले और शक्कर की भी मारामारी हो अगर ये सब सुलभ हुआ तो गैस और मिट्टी के तेल की समस्या तो नहीं होगी बगल में नर्क होगा सुना है कि वहाँ हमेशा आग जलती रहती है तो अपनी चाय भी उसी आग में पकवा लिया करेंगे।
जय जय भड़ास

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जिस बात से भय लग रहा था

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010


जिस बात से भय लग रहा था कि कहीं हम जैसे लैंगिक विकलांगों के समाज में स्वीकारे जाने पर हमारी पहचान न विकृत हो जाए। आजकल जिस तरह से लैंगिक विकलांगता को एक तीसरा लिंग जताया जा रहा है ये सबसे खतरनाक साजिश है कुछ कुटिल दिमागों की जो कि अपनी विकृत और बीमार मानसिकता को इस तरह से सामने लाकर भोले बन रहे हैं। मुंबई में होने वाली इस तरह की सौंदर्य प्रतियोगिताएं क्या भला कर पा रही हैं ये सवाल कोई नहीं उठाने का साहस करता। स्त्री एवं पुरुष समलैंगिक संबंधों को अपनी सैक्स प्रायोरिटी(काम वरीयता) बता कर रुग्ण कामुकता के लोग अपने लिये समाज में सहानुभूति पैदा कर रहे हैं और साथ में एक जो धूर्तता कर रहे हैं वह है हम जैसे लैंगिक विकलांगों को कुछ पैसों का लालच दिखा कर अपने कार्यक्रमों में शामिल करना। मैं इस तरह के आयोजनों का पूरी ताकत से विरोध करती हूँ, थू है उन आयोजकों पर जो कि अपने लाभ के लिये बेचारे कम पढ़े-लिखे और अपना भला बुरा न समझ पाने वाले लैंगिक विकलांग बच्चों को इस्तेमाल कर रहे हैं। ये प्रतियोगिताएं मात्र वैसी ही हैं जैसे कि अंधों या लंगड़ों के लिये अलग से सौन्दर्य प्रतियोगिता कराई जाए। मूल मुद्दा शिक्षित करके समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है ताकि देहव्यवसाय(गुदामैथुन के द्वारा) या मजबूरी में नाच गाकर पेट पालने की पीड़ा को समाप्त करा जा सके।
जय जय भड़ास

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महाराष्ट्र की भाषा अकादमियों की दुर्दशा

गुरुवार, 21 जनवरी 2010


जिस राज्य में भाषा की ही राजनीति की कबड्डी खेल कर खुद को चमकाने के जतन करने वाले नेता हों वहां हिन्दी साहित्य अकादमी या उर्दू साहित्य अकादमी की क्या हालत होगी इसका तो कोई बेवकूफ़ भी अंदाज लगा सकता है। महाराष्ट्र में हिंदी की बात करने वालों को तो जुतिआया जाता है

ये
बात करना कि यहां हिंदी साहित्य अकादमी की क्या हालत है वो साहित्य प्रेमी स्वयं समझ सकते हैं। रही बात उर्दू साहित्य अकादमी की तो एक कार्यक्रम में जाने का मौका लगा जहां कि मंच पर तीन राज्यस्तरीय मंत्री मौजूद थे और "उर्दू महफ़िल" नाम से आयोजित इस कार्यक्रम में कितने लोग थे ये तो आप तस्वीरों से जान जाएंगे। आयोजन करने वाले लोग मंत्रियों के आगे रिरिया रहे थे कि उर्दू के नाम पर काम करने वालों को बड़ा स्थान दिया जाना चाहिये कार्यालय के लिये क्योंकि अभी जो स्थान दिया गया है वह मछेरों की बस्ती के बीच में एक बहुत छोटा और खस्ताहाल है जिस कारण बड़ी दिक्कतें होती हैं। मंच पर हाल ही में अंजुमन इस्लाम नाम की एक बहुत बड़ी संस्था के अध्यक्ष बने श्री ज़हीर काज़ी ने इस बात पर बड़ी विचित्र प्रतिक्रिया दी कि उर्दू स्कूल के बच्चे अच्छी अंग्रेजी नहीं जानते जिस कारण वे पिछड़ जाते हैं। ये देख कर अफ़सोस हुआ कि महाशय काज़ी साहब अभी भी दिमागी तौर पर ये मान कर गुलामी ही कर रहे हैं कि अंग्रेजी न जानने वाला साहब नहीं बन सकता और पिछड़ा ही रहता है। कुल मिला कर यही रोना चलता रहा कि किस तरह उर्दू विद्यालयों के बच्चों को अंग्रेजी सिखा-पढ़ा कर बाबूसाहब बनाया जाए। मुझे लगा कि इस महफ़िल का नाम यदि अंग्रेजी महफ़िल रखा जाता तो बेहतर रहता। हम हमारे देश में स्वतंत्रता के इतने साल बाद भी ये मान रहे हैं कि भारतीय भाषाओं में पढ़ाई करके तरक्की नहीं करी जा सकती तो ऐसे लोगों के लिये क्या चीन एक बड़ा उदाहरण नहीं है जो कि अपने कम्प्यूटर के सौफ़्टवेयर अपनी ही लिपि और भाषा में बनाता है। ये पता नहीं कि आम आदमी कितना समझ पाता है लेकिन जो पुरोधा हैं नेता हैं भाषा के क्षेत्र में वे भी अपनी भाषा और लिपियों को दोयम दर्ज़े का बड़ी ही खुशी से स्वीकार रहे हैं।
जय जय भड़ास

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उर्दू समाचार पत्र "इंकलाब" को गलती से भी आप इन्टरनेट पर मत पढ़ लीजिएगा

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

उर्दू समाचार पत्र "इंकलाब" को गलती से भी आप इन्टरनेट पर मत पढ़ लीजिएगा| कारण ये नही है कि इसे पढ़ लेने से आप क्रान्ति ले आयेंगे बल्कि कारण ये है कि आपके कंप्यूटर पर एक मॉलवेयर आ जाएगा जो की एक तरह का वायरस ही है और फिर हर एक दो मिनट बाद आपकी कंप्यूटर स्क्रीन पर कुछ भी अनचाहा विज्ञापन आता रहेगा और आप कुछ नही कर पाएंगे | वैसे भी ये वही समाचार पत्र है जो कि अपने नाम से भी ऊपर साँडे के तेल का पौरुष शक्ति बढ़ाने का विज्ञापन स्वीकारने में भी नही हिचकिचाता है शायद इसके सम्पादक को ये लगता है कि वैचारिक क्रान्ति लाने का यही एक मार्ग हो जो कि तेल से स्निग्ध हो कर दुष्कर न रह जाए और उर्दू जानने वाले क्रान्ति ला ही दें| सम्भव है कि इसके ई -संस्करण पर इन लोगो ने जानबूझ कर ऐसा करा हो कि वैसे भी लोगो को तो विज्ञापन देखने कि आदत है ही तो चलो ऐसे भी बेवकूफ बनाया जाए वैसे भी अभी हिन्दी और उर्दू के पट्टी पर इन्टरनेट प्रयोग करने वाले लोग ज्यादा जागरूक नही हैं |
जय जय भड़ास

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दैनिक उर्दू टाईम्स (उर्दू) मुंबई संस्करण,सबसे तेज़ अखबार.....

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

"पेज क्रमांक पर प्रकाशित एलानात में दिया एक एलान"
आज पहली बार मैं आपके सामने पेश कर रहा हूं उर्दू के सबसे तेज़ अखबार "दैनिक उर्दू टाईम्स "(मुंबई संस्करण) ये तमाम टीवी न्यूज़ चैनलों के बाप का भी बाप निकला। इतना तेज़ है कि १५ अगस्त के एलान को आज दिनांक २२ सितम्बर को प्रकाशित कर रहा है। इतने तेज़ अखबारों को पढ़ने से अच्छा है कि आदमी रद्दी की दुकान पर जाकर पुराने अखबार पढ़ ले जिसमें डेढ़ महीने पुरानी खबर बड़े मजे से छापी जा रही है

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चलो स्वाइन फ़्लू एन्ज्वाय करें......

बुधवार, 12 अगस्त 2009

मैंने स्टेशन पर पिल्लै इंजीनियरिंग कालेज के तीन युवकों को ये कहते सुना तो बड़ा विचित्र लगा कि एक तरफ़ तो सारे देश की हवा तंग है और दूसरी तरफ़ ये नादान स्वाइन फ़्लू को एन्ज्वाय करने की बात कर रहे हैं। चूंकि मैं भी ट्रेन के इंतजार में था तो उन्हीं बालकों के पास खड़ा हो गया ताकि उनकी बातें सुन सकूं और जान सकूं कि ये दिलेर जानलेवा बीमारी के भय को कैसे एन्ज्वाय करने की बात कर रहे हैं। ट्रेन आयी तो लोग उतरे और उसमें से एक लड़की को देख कर तीनों शरारत भरी मुस्कान लिये उसकी तरफ बढ़े, एक ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे लगबग डांटते हुए बोला, "काय ग... तू काय येड़ी-वेड़ी झालीस, काल ठाण्या ची गाड़ीत बसली होती.......।" तभी लड़की ने अपना हाथ छुड़ाया और हिंदी में बोली क्या मैं आपको जानती हूं? इतना कहते हुए उसने अपने चेहरे पर लगाया हुआ मास्क हटा दिया। इस पर तीनो शरारती लड़के नाटकीय अंदाज़ में माफ़ी मांगते हुए बोले कि सत्यानाश हो इस स्वाइन फ़्लू का... हमें लगा कि हमारी दोस्त आशा है। लड़की इन तीनो की शरारत समझ ही न पायी और कोई बात नहीं कह कर मुस्कराते हुए आगे बढ़ ली। ये तीनो फिर अगली गाड़ी के इंतजार में खड़े टाइम पास करने के लिये।
मुंबई में तो अधिकांश लोग रुमाल या मास्क लगा कर घूम रहे हैं जिसका ये दिलेर शरारती लड़के मजा ले रहे हैं, मुझसे ये कहते हुए कि अंकल एक दिन तो सबको मरना है तो क्यों न डर को भी एन्ज्वाय कर लिया जाए। पक्के भड़ासी हैं ये बालक जो मौत के डर का भी मजा ले रहे हैं और ऐसे मौके पर भी इन्हें शरारत सूझ रही है।
जय जय भड़ास

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कसाब...कसाब...कसाब और भड़ास का मंच

रविवार, 26 जुलाई 2009

जरा ध्यान दीजिये इन सारी बातों पर.......
मुंबई पर आतंकी हमले के आरोपी अजमल कसाब को आर्थर रोड जेल में स्थानांतरित किए जाने के बाद महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ मंत्री ने उससे जेल में मुलाकात की थी। यह जानकारी गृह विभाग से जुड़े भरोसेमंद सूत्रों ने दी है। इनके मुताबिक, इस मंत्री ने पुलिस महकमे के आला अफसरों को इस बारे में सूचित किया था। कसाब से मुलाकात के दौरान मंत्री ने अपनी पहचान भी उससे छिपाई थी।सूत्रों के अनुसार, जेल में सुरक्षा इंतजामों का जायजा लेने आए इस मंत्री ने कसाब को बताया था कि उसका देश पाकिस्तान उसे अपना नागरिक मानने को तैयार नहीं है। यह सुनने के बाद कसाब के चेहरे पर चौंकाने वाले भाव थे। मुंबई आतंकी हमलों के मुख्य आरोपी आमिर अजमल कसाब ने बुधवार को स्पेशल कोर्ट में कहा कि मुझे दुनिया वाले ही सजा दें। कसाब का कहना था कि उसका बयान किसी दबाव में नहीं दिया गया है। उन्होंने गुनाह किसी के दबाव में नहीं कबूला है।उसने कहा कि मेरे गुनाह की सजा खुदा भी माफ नहीं कर सकता और मेरी सजा यही है कि मुझे फांसी दे दी जाए। इसके पहले कसाब ने कोर्ट में कहा था कि उसे अपना गुनाह कबूल है और उसे जल्द से जल्द सुनवाई कर सजा दे दी जाए। मुंबई पर पिछले साल 26 नवंबर को हुए आतंकी हमले के आरोपी अजमल कसाब ने हमले संबंधी क्लोज सर्किट टीवी फुटेज वाली सीडी की मांग की, जिसे विशेष अदालत ने ठुकरा दिया। वकील अब्बास काजमी के मुताबिक, ‘कसाब के दिमाग में विचित्र विचार आते रहते हैं। मुझे पूरा भरोसा नहीं है कि वह सीडी शब्द का मतलब भी जानता होगा।’ पिछले हफ्ते कसाब ने विशेष कोर्ट से कहा था कि वह एक पत्र मक्का भेजना चाहता है। अभियोजन पक्ष ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान छह गवाहों से पूछताछ की थी। इसके बाद अभियोजन ने कसाब तथा उसके साथी अबू इस्माइल द्वारा सीएसटी के समीप हमले के सीसीटीवी फुटेज दिखाने का आग्रह किया था। काजमी ने इस आग्रह पर आपत्ति जताई। जब कसाब ने फुटेज की सीडी मांगी तो विशेष जज एमएल टाहिलियानी ने उससे पूछा कि वह क्यों यह सीडी चाहता है।तब कसाब ने कोई जवाब नहीं दिया। जज ने कसाब से यह भी पूछा कि क्या उसके पास जेल में सीडी प्लेयर है तो उसने नकारात्मक उत्तर दिया। इस पर जज ने कहा कि कसाब को सीडी देने से कोई मतलब नहीं निकलेगा, क्योंकि उसके पास उसे देखने का कोई साधन नहीं है।
आप इन सारी बातों का क्या मतलब समझ पा रहे हैं? इस पूरी अदालती प्रक्रिया का क्या अर्थ निकल रहा है? कौन किसे बेवकूफ़ बनाने की कोशिश कर रहा है? जनता तो रेडीमेड है आप सबका अब्बास काज़मी और अजमल कसाब के बारे में क्या ख्याल है और ये मंत्री कौन है जो कि जीजाजी से मिलने गया था कहीं ये राष्ट्र ससुर तो नहीं बनना चाहता?????? हजारों सवाल और बस एक भड़ास का मंच...........
जय जय भड़ास

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वो साला NGO वाला देश के लोकतंत्र में भुस भरना चाहता है

सोमवार, 29 जून 2009

एक बार मुंबई में एक ब्लागर मीट रखी गयी। अंग्रेजी में टर्राने वाले सारे लोगों में हिंदी बोलने वाले देसी ठर्र गंवार भड़ासी भी पहुंच गये। वही हुआ जो हमेशा होता है। हम तो वही करते हैं जो हमें सही लगता है बुरे,जिद्दी,जाहिल और बुद्धू जो ठहरे....बीच बीच में उठ कर हिंदी में रेंक देते थे। सबने अपनी अपनी ढपली बजाकर विदेशी राग अलापा और पगले भड़ासी अवधी,बुन्देली,मगही जैसे राग अलापते रहे। असर हुआ कि मीट कत्म होते होते सब टोडी बच्चे हिंदी,मराठी और गुजराती बोलने लगे। इसी मीट में एक सेशन रहा "असोका" नाम के एक NGO के प्रतिनिधियों का भी जो कि अपनी अपनी पेलते रहे कि हम ये, हम वो, हम सौदागर हैं, हमारे चौदाघर हैं वगैरह वगैरह......(भौं भौं...)। उनमें से एक ने जो बोला वो अब तक दिल में चुभा था लेकिन आज उस बंदे का ट्विटर पर रोल देख कर चरित्र समझ में आ गया। उसने बड़े मार्मिक अंदाज में कहा था कि मैं जब छोटा था तो मेरे अंकल ने मेरे साथ कुकर्म करा था इसलिये आप सब इस बात पर नजर रखें कि बच्चों का यौनशोषण न हो,इसने एक बात और कही कि यदि सभी लोग एक NGO की तरह कार्य करने लगें तो हमें सरकार की जरूरत ही न पड़ेगी।
अब इसकी बात समझ में आ रही है क्योंकि ये पट्ठा मुंबई में हुए गे और लेस्बियन लोगों के सम्मान परेड की वकालत कर रहा है। ये विदेशों से पैसा पाने वाले NGO भारतीय जीवन मूल्यों से बलात्कार करने में नहीं चूकते। दूसरी बात कि ये बड़े ही बौद्धिक तरीके से लोकतंत्र की धारणा को ध्वस्त करने की साजिश का भी हिस्सा हैं। जब हम सब दिमागी तौर पर इनके गुलाम हो जाएंगे और हमारे जीवन मूल्य ही नष्ट हो जाएंगे तो इन्हें हम पर अधिकार करने के लिये किसी हमले की जरूरत ही नहीं रहेगी क्योंकि हम में से ही न जाने कितने लोग इनकी वकालत में उठ खड़े होंगे। न जाने कितनी सेलिना जेटलियां और अशोकराव कवि सामने आ जाएंगे।
जय जय भड़ास

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खोया बच्चा अल्तमश मिल गया, शुक्रिया भड़ास.....

शुक्रवार, 26 जून 2009

मिल गया गुम हुआ बालक अल्तमश शेख
आपको याद होगा कि कुछ दिन पहले भड़ास पर अल्तमश शेख नाम के बच्चे के गुम हो जाने की खबर दी गयी थी। भड़ास के महाघुमक्कड़ भड़ासियों की मुंबई घुमंतू टीम में से एक को बालक मिल गया जिसे लाकर मानखुर्द में उसकी नानी के हवाले कर दिया गया। बच्चा स्कूल न जाने के कारण नानी के डांटने से घर से भाग गया था और लगभग एक सप्ताह से मुंबई में ही भटक रहा था। अब नानी भी खुश और नाती भी खुश क्योंकि अब बच्चे की भी भटक-भटक कर हवा तंग हो चुकी है और नानी ने भी कसम खा ली है कि बिना मां-बाप के बच्चे को पीटेंगी नहीं। ईश्वर से प्रार्थना है कि सभी खोए-बिछड़े अपने परिवार से मिल जाएं। नानी जी भड़ासियों का शुक्रिया करते नहीं थक रही हैं।
जय जय भड़ास

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