हिंदुत्व के नाम पर बाजार सजने लगा है, हिन्दू को बेचने वालों ने हिंदुत्व का दूकान कुछ यूँ खोला है।।।
मंगलवार, 28 मई 2013
गूगल चार करोड़ के लिए मेल भी करता है और सावधान भी !!!
डॉ.दिव्या श्रीवास्तव शायद भारतीय संविधान का टोचन सह न सकेंगी
मंगलवार, 17 अप्रैल 2012



अभी हाल ही में भड़ास पर इंजीनियर दिवस गौड़ जी की टिप्पणी और फिर उस पर निकली भड़ास को पढ़ा । पढ़ कर आगे बढ़ने चला तो देखा कि दिव्या जी ने कुछ नया लिखा है। उनके ब्लॉग पर जाकर पिछली एक पोस्ट देखी जिसमें उन्होंने फ़ेसबुक से किसी नियाज़ अहमद सिद्दीक नाम के बंदे की टिप्पणी (अंग्रेजी में) अपने ब्लॉग पर लगा रखी है और उसे "बेबाक टिप्पणी" का दर्ज़ा दे रखा है। आगे बढ़ कर देखता हूँ तो फ़ेसबुक से इस बन्दे ने(काफ़ी हद तक केजरीवाल गैंग का बनाया एक फर्ज़ी प्रोफ़ाइल लगता है) उक्त बात हटा दी है। साथ ही जब आँख खुली अंधे की तो.... इसने अब फ़ेसबुक पर लोगों से जुड़ना बंद कर दिया है समझ गया होगा कि अम्बेडकर को उंगली कर तो दी लेकिन उसके बाद जो कुतुबमीनार इसके पिछवाड़े घुसेगी उसका क्या होगा लेकिन दिव्या जी तो उन्मादित होकर उसे ललकार रही हैं कि ये भगोड़ापन है।
निर्मल बाबा जरा भड़ासियों को भी तो धमकी दो यार... बहुत दिन से किसी बवाल में नहीं पड़े
सोमवार, 9 अप्रैल 2012
मीडिया दरबार नामक हिंदी वेबसाइट चलाने वाले भाई ने मुझे फोन करा कि मैं वेबसाइट पर एक नज़र मारूं। पहुंचा तो देखा कि भाई ने निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ़ निर्मल बाबा की जम कर ले रखी है। इस मीडिया सृजित बाबा ने इन आलेखों के चलते मीडिया दरबार को कानूनी कार्रवाई की धमकी भी दे डाली। मीडिया दरबार ने अमेरिकन वेबसाइट "हबपेज" पर निर्मल बाबा के ऊपर एक बहस शुरू करी थी जिसकी लिंक उन्होंने अपने आलेख में दी भी है लेकिन अब लग रहा है कि मीडिया दरबार पर बाबा के आतंक का प्रभाव दिखने लगा है चित्र तो बता रहे हैं कि उक्त हबपेज को हटा दिया गया है। एक हिंदी वेबसाइट चलाने वाले को धमका लेना तो इस देश में सबसे आसान काम है जो कि पैसे की ताकत, स्थानीय गुंडे, स्थानीय पुलिस कोई भी कर सकता है।बहरहाल मीडिया दरबार ने जो भी करा हम उसका नैतिक समर्थन करते हैं। ऐसे बाबाओं और मीडिया की भड़वागिरी में कम से कम हम साथ नहीं हैं।
भड़ास के एक संचालक भाई रजनीश के.झा का भी डॉ.दिव्या श्रीवास्तव जैसा हाल है
शुक्रवार, 30 मार्च 2012

अभी जब लम्बे समय से भड़ास पर अक्रिय(निष्क्रिय नहीं) रहे भड़ास के संचालकों में से एक भाई रजनीश झा जी की वेबसाइट पर गया तो देखा कि विज्ञापनों के जिस लोभ में डॉ.दिव्या जी परेशानी में आ गयी थीं उसी कुचक्र में रजनीश जी भी अटक गये हैं। अब जब तक सब दुरुस्त नहीं हो जाता यही चलता रहेगा फ़िलहाल दिव्या जी का ब्लॉग सही हो गया है यानि कीड़े-मकोड़े हटा कर फ़िनिट डाल दिया गया है लेकिन यदि विज्ञापनों की लालच रही तो दोबारा संभावना है।
एक्ष्पेक्ततिओन्स, ग्रेअटर थे दिस्प्पोइन्त्मेन्त्स….. इसका अर्थ आपको नहीं पता होगा लेकिन हम और डॉ.दिव्या श्रीवास्तव जानते हैं
कल बहुत दिनों बहुत दिनों के बाद भड़ास पर आया तो देखा कि डॉ.रूपेश श्रीवास्तव बहन डॉ.दिव्या श्रीवास्तव की रिश्ते के चलते चोटी खींच रहे हैं। हमारे गुरूजी में एक बात है कि वे चोटी भी खींचते हैं तो इसी मंच पर न कि चुप्पे चुप्पे फोन या ई-मेल से, इसका कारण सीधा सा यही है कि वे एकदम पारदर्शी हैं। मैं खूब समझता हूँ डॉ.दिव्या जी के स्वभाव को कि वे गुरूजी की बात से चिढ़ गयी होंगी लेकिन दिव्या जी इस बात को कभी समझ नहीं पाएंगी कि जीवन की इसी पारदर्शी शैली के चलते मनीषा नारायण, आएशा धनानी, मुनव्वर आपा, स्वयं मैं और न जाने कितने ऐसे लोग हैं जो इनसे रिश्ते में जुड़ गये हैं। गुरूजी ने जो भी बताया जताया दिखाया सिखाया है उसके लिये धन्यवाद शब्द बौना है लेकिन दिव्या के ऊपर तो दया आ ही रही है। यदि वो अपने दंभ के खोल से बाहर आ पातीं तो कम से कम पाबला जैसे दुष्टों से बचतीं और एलियन भाषा(एक्ष्पेक्ततिओन्स, ग्रेअटर थे दिस्प्पोइन्त्मेन्त्स) की बजाए हिंदी की सेवा कर पातीं या अंग्रेजी में न लिखना पड़ता यानि कुल जमा ये कि ब्लॉगिंग ठीक से कर पातीं।
जय जय भड़ास
गूगल की नीति हिंदू-मुसलमानों मे बीच शाँति नहीं चाहती शायद....
शुक्रवार, 16 मार्च 2012
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जय जय भड़ास
ये विष कौन घोल रहा है सभी हिंदू देखें(मुसलमान भी देख लें तो बेहतर)
बुधवार, 14 मार्च 2012
बेचारी डॉ.दिव्या श्रीवास्तव की हालत पर दया आनी चाहिये
मंगलवार, 6 मार्च 2012
एक और सक्रिय ब्लॉगर के जैनियों के मायाजाल में फँस जाने पर कोई आश्चर्य नहीं है। पिछले कुछ समय से तमाम भड़ासी चुपचाप थे क्योंकि भड़ास पर प्रकाशित सामग्री के चलते बतौर संचालक उत्तरदायित्व डॉ.साहब का और भाई श्री रजनीश झा जी का बनता है। चूँकि देश की संवैधानिक स्थिति ऐसी है कि यदि आप छींक भी दें तो तमाम कानूनी पचड़ों में उलझ सकते हैं। मुंबई पुलिस क्राइम ब्रान्च के कार्यालाय में डॉ.साहब को कई बार घंटों बैठना पड़ा तो हमने भी सोचा कि अब कुछ समय के लिये उपवास करा जाए। लेकिन कब तक??? डॉ.साहब से पूछा तो उन्होंने सीधे कहा कि मैंने किसी को लिखने से मना तो करा नहीं है बस जो हो रहा है वह बताया था आप सबको। मैं तो लिख रहा हूँ अगर किसी ने पुलिस-पुलिस खेला तो हटा दूँगा (गीदड़ भभकी या बंदर घुड़की न देना सचमुच पुलिस-पुलिस खेलने पर ही कंटेंट हटाउंगा ये ध्यान रखना)।
जब भी किसी के विचारों पर जब जी मिचलाए तो उल्टी हो ही जाए बेहतर रहता है। पिछले कुछ दिनों से डॉ.दिव्या श्रीवास्तव जी का ब्लॉगरीय स्वास्थ्य गड़बड़ा गया है बेचारी हिंदू-मुसलमान करते-करते तीर्थंकर ऋषभदेव की राक्षसों द्वारा रची शुद्ध फर्ज़ी कहानियों में उलझ गयी है। वैसे दिव्या जी की बात करने से किसी भी ब्लॉग पर एक प्रकार की पवित्रीकरण प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है ऐसा वे मानती हैं।
जय जय भड़ास
वरिष्ठ भड़ासी "एक्स मैन" नहीं रहे
गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012
नाम उन्हें महाराष्ट्र पुलिस ने दिया था। एक लम्बे आपराधिक कैरियर के बाद उन्होंने सामान्य जीवन अपनाया था। उन्होंने अपने कैरियर में(भाई अपराध भी तो हमारे देश में एक कैरियर की ही तरह स्वीकृत है यदि यकीन न हो तो अपने राजनेताओं को देख लीजिये) कार चोरियाँ, हत्या, लूट आदि पर अपने हाथ आजमाए थे लेकिन वे सिर्फ़ कारचोरी की विधा में खुद को अधिक सहज पा सके जिसे उन्होंने अपने पूरे कैरियर में अपनाए रखा था। भड़ास से उनका जुड़ना सभ्य समाज के मुखौटाधारी व्यवहार के चलते था। हम सब उन्हें चाचाजी कहा करते थे और जबसे उन्होंने टैक्सी चलाना शुरू करा था तो उनके मनोरंजक अनुभव हम सबके लिये खासी हँसी का विषय बने रहते थे। अच्छे खासे चाचाजी हँसते मुस्कराते चाची को अपने हाथ से चाय पिलाने के बाद अपने पड़ोस में रहने वाली बुजुर्ग दादी टाइप सब्जीवाली को चाय पिला कर आते वक्त सिर दर्द हो रहा है ऐसा कह कर सड़क पर ही बैठ गये। बच्चों ने चाची को दौड़ कर खबर दी जिसपर उन्हें डॉक्टर के पास ले जाने का मन्सूबा करते करते चाचाजी चले गये। चाची ने हमें खबर दी और हमने उस वरिष्ठ भड़ासी को जिसने ऑफ़लाइन जीवन भर तमाम लोगों के मुखौटों को नोचा, ईश्वर से अशाँत रखने की प्रार्थना के साथ तुर्भे(वाशी) के कब्रिस्तान में दफ़ना दिया। कब्र में लिटाते वक्त भी चाचाजी के चेहरे की मुस्कराहट बरकरार थी जैसे कह रहे हों कि अब मैं देखता हूं उस दुनिया बनाने वाले को..... स्स्साआआल्ला.... पता नहीं क्या चाहता है?
जय जय भड़ास
फेसबुक पर भी लोग भड़ास निकालते हैं दिल खोल कर...
मंगलवार, 10 जनवरी 2012
| फेसबुक निःसंदेह एक बेहद ताकतवर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट है जो कि साइबर संसार में अपने सदस्यों की संख्या के चलते किसी छोटे-मोटे देश से कम महत्त्व नहीं रखती। देखिये कि एक बंदा अपने स्टेटस पर क्या लिख कर मँहगाई और सरकारी नीति का विरोध कर रहा है। | ||||
| प्रधानमंत्री के नाम एक भारतीय नागरिक का चेक |

आदरणीय प्रधानमंत्री जी
मेरी तरफ से बहुत बहुत बधाई स्वीकार करे .
चूँकि आपने हम सब भारतीयों का सपना पूरा किया है . हम सब भारतीय अमीर बनने के सपने देखा करते थे ओर अपने एक ही झटके मे हम सबका अमीर बनने का सपना पूरा कर दिया .
इसके लिए आप और सोनिया गाँधी बहुत ही बधाई के पात्र है ..
आपने [ क्योंकि योजना आयोग का मुखिया प्रधानमंत्री होता है ] सुप्रीम कोर्ट मे जो हलफनामा दिया की ३२ रूपये रोज कमाने वाला व्यक्ति अमीर है इससे हम सब भारतीयओ का सर गर्व से ऊँचा हो गया है . आखिर हम सब भारतीय अमीरों की परिभाषा मे जो आ गए .
प्रधानमंत्री जी शायद आपको फ़्रांसिसी क्रांति की कुछ जानकारी जरुर होगी .. एक बार जब फ्रांस का राजा अपनी रानी के साथ अपनी आलीशान बघ्घी मे जा रहा था तो उसके पीछे फ्रांस की भूखी और गरीब जनता रोटी रोटी रोटी चिल्ला रही थी फिर रानी ने बघ्घी रोककर जनता से कहा कि यदि तुम्हारे पास खाने को रोटी नहीं है तो तुम लोग केक क्यों नहीं खाते ?
आज आपकी पार्टी ने इस देश मे भी ठीक यही हालत पैदा कर दिए है ... एक तरफ आपकी सरकार के स्वाथ्य मंत्री संसद मे बयान देते है कि हमने इस देश को मेडिकल टूरिज्म हब बना दिया है लेकिन आश्चर्य कि बात है कि आपकी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया जी को भी आपकी सरकार पर विश्वास नहीं है इसलिए ही तो वे अपना खुद का इलाज भारत के बजाय अमेरिका मे करवाने गयी ..
आपको मैंने ३२ रूपये का एक चेक भेजा है और मै आपसे गुजारिश करता हूँ कि आप एक दिन जरा ईमानदारी से ३२ रूपये पर गुजारा करके तो देखिये
मेरी तरफ से बहुत बहुत बधाई स्वीकार करे .
चूँकि आपने हम सब भारतीयों का सपना पूरा किया है . हम सब भारतीय अमीर बनने के सपने देखा करते थे ओर अपने एक ही झटके मे हम सबका अमीर बनने का सपना पूरा कर दिया .
इसके लिए आप और सोनिया गाँधी बहुत ही बधाई के पात्र है ..
आपने [ क्योंकि योजना आयोग का मुखिया प्रधानमंत्री होता है ] सुप्रीम कोर्ट मे जो हलफनामा दिया की ३२ रूपये रोज कमाने वाला व्यक्ति अमीर है इससे हम सब भारतीयओ का सर गर्व से ऊँचा हो गया है . आखिर हम सब भारतीय अमीरों की परिभाषा मे जो आ गए .
प्रधानमंत्री जी शायद आपको फ़्रांसिसी क्रांति की कुछ जानकारी जरुर होगी .. एक बार जब फ्रांस का राजा अपनी रानी के साथ अपनी आलीशान बघ्घी मे जा रहा था तो उसके पीछे फ्रांस की भूखी और गरीब जनता रोटी रोटी रोटी चिल्ला रही थी फिर रानी ने बघ्घी रोककर जनता से कहा कि यदि तुम्हारे पास खाने को रोटी नहीं है तो तुम लोग केक क्यों नहीं खाते ?
आज आपकी पार्टी ने इस देश मे भी ठीक यही हालत पैदा कर दिए है ... एक तरफ आपकी सरकार के स्वाथ्य मंत्री संसद मे बयान देते है कि हमने इस देश को मेडिकल टूरिज्म हब बना दिया है लेकिन आश्चर्य कि बात है कि आपकी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया जी को भी आपकी सरकार पर विश्वास नहीं है इसलिए ही तो वे अपना खुद का इलाज भारत के बजाय अमेरिका मे करवाने गयी ..
आपको मैंने ३२ रूपये का एक चेक भेजा है और मै आपसे गुजारिश करता हूँ कि आप एक दिन जरा ईमानदारी से ३२ रूपये पर गुजारा करके तो देखिये
हड्डियों का पोकलपन है या बस अब बैटरी खत्म होने को है
मंगलवार, 3 जनवरी 2012
लोकपाल चाहिये... लोकपाल चाहिये.... रट लगा कर अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह अण्णा हजारे के कंधे पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति की बंदूक चलाई थी वह हम सबने देखा । एक बार तो केजरीवाल ने बुड्ढे को चने के झाड़ पर चढ़ा कर भूखे मरने की धमकी देने के लिये बैठा दिया लेकिन हमारे देश की जनता तो वही है न जिसके पूर्वज अंग्रेजों के पंद्रह सौ सिपाहियों को आते देखते हुए तालियाँ बजा बजा कर खुश हो रहे थे तो अब भला क्या नया होने वाला था । बुड्ढ़ा प्रसिद्धि का भूखा तो है इसलिये बेचारा कुटिल केजरीवाल के मीडिया मैनेजमेंट और गैरसरकारी संगठनों द्वारा येन-केन-प्रकारेण जुटाई हुई भीड़ के देख कर समझ बैठा कि देश की जनता उसके साथ है । अरे इस प्रसिद्धि के लिये बौराए बुड्ढे को दिखता तो है न कि ये तो मात्र बारह दिन अनशन के लिये बैठा तो इतनी भीड़ जुट गयी और वो इरोम शर्मिला बारह साल से भूखी मर रही है और उसे न तो मीडिया पूछ रहा है न ही उसके लिये भीड़ जुट रही है बस हम जैसे कुछ पगलाए, झक्की, सनकी किस्म के अनपढ़, जाहिल और घोषित कर दिये गए बुरे लोग ही उनके दीवाने हैं तो क्या वजह है। उस लड़की को भी ऑस्टियोपोरोसिस हुआ है, मासिक धर्म बंद हो चुका है लेकिन क्यों? क्यों?? क्यों??? केजरीवाल या किरन बेदी या इन जैसे किसी को वो दिखती ही नहीं? बुढ़ऊ हजारे तो भारत के संविधान के लोकतान्त्रिक कंकाल की जानकारी है नहीं कि आदमी ऊपर से कितना भी चर्बी चढ़ा मोटा दिखे जब तक उसकी हड्डियाँ मजबूत नहीं होती उसे घुटने का दर्द सहना ही पड़ता है वैसा ही हाल हमारे संविधान का है। अब हजारे महोदय ने बहुत प्रसिद्धि पा ली है देखियेगा कुछ दिन बीमारी-बीमारी का खेल खिलवाने के बाद शहीदों की फ़ेहरिस्त में शामिल करा दिये जाएंगे केजरीवाल एण्ड पार्टी द्वारा । बैटरी खत्म हो चुकी है तुम्हारी या कि ओवरचार्ज हो गये थे दिल्ली की फ़ोकटखाऊ लोगों की भीड़ देख कर कि अब तो बस तुम देश का कायाकल्प कर दोगे, कुछ भी हो बहरहाल बस अब तुम टरकने वाले हो ऐसा लग रहा है और अगर नहीं टरके तो तुम्हारे आसपास के लोग अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा की वेदी पर तुम्हारी बलि चढ़ा देंगे हमें सपने में ऐसी "डर्टी पिक्चर्स" दिखाई दे रही हैं। ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शाँति दे ।
जय जय भड़ास
जजे’स एकाउंटबिलिटी बिल और साम्प्रदायिक हिंसा वाले विधेयक से अण्णा हजारे को कुछ लेना देना नहीं है
बुधवार, 28 दिसंबर 2011
भड़ासियों को न तो ठंड लग रही है मुंबई में और न ही उनमें से किसी को बुखार है और हाज़मा खराब होने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता है। हम सारे लोग अधिकतर तो डॉ.साहब की महाभड़ासी प्रयोगात्मक फ़िल्म "प्रश्न" देखने के बाद कुछ समय तक सन्न थे और अब रहा नहीं गया तो अण्णा हजारे के बंदरपन और सुअरविन्द केजरीवाल के मदारीपन पर लिखने का मन करा है। जनता चूतिया है ये तो सब जानते हैं तभी तो इन कमबख्त नौटंकीबाजों के चक्कर में आ जाती है। जो साला मरने से नहीं डरता और भूखे मरने का नाटक कर अनशन करके सरकार से लोकपाल बिल लाने की बात करता है उसकी सरदी बुखार से इतनी कस कर फट जाती है कि एक दिन में अनशन फ़ुस्स्स हो गया । ये हरामखोर लोग जनता का ध्यान लोकपाल-लोकपाल की आड़ में दूसरे ऐसे बिलों से हटाना चाहते हैं जिनकी अंग्रेजियत कांग्रेस की नस नस में समाई है। एक है साम्प्रदायिक हिंसा से संबंधित विधेयक जिससे अण्णा हजारे को कोई लेना देना नहीं है और दूसरा है जजों के उत्तरदायित्त्व से संबंधित विधेयक जिस पर बोलने की दम किसी में है नहीं। ये सारा का सारा नाटक कांग्रेस के पाले बंदर हजारे और तनखैय्या मदारी सुअरविन्द केजरीवाल के द्वारा चलाया जा रहा है ताकि लोकपाल की नौटंकी की आड़ में ये दोनो कानून कब लागू हो जाएं किसी को खबर भी न हो और रही बात मीडिया की तो वो तो सिर्फ़ वही बोलता है जो उसके आका फरमाते हैं। जनता एक बार फिर से मूर्ख बन रही है।
जय जय भड़ास
मेरे ख्यालात मेरे ही हैं मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूँ
मंगलवार, 6 दिसंबर 2011
मेरे ख्यालात मेरे ही हैं मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूँ मजबूरी में ये वीडियो देना पड़ रहा है।















