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अनुज भाई की कविता और डा.रूपेश की ठिठोली

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

मेरे भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव का एक पुराना चित्र

अनुज भाई कोई शक नहीं है कि काफ़ियाबंदी या तुकबंदी में लय,गति,वेग और प्रवाह है लेकिन डाक्टर साहब की तो आदत है यारों से ठिठोली करने की सो उन्होंने कविता में भड़ास का दर्शन जोड़ दिया जोकि अधिकांश मध्यमवर्गीय जनों का दर्द है। डा.रूपेश स्वयं एक संवेदनशील कवि हैं ये आपको आगे पता चलता जाएगा, वे बहुत कुछ लिख चुके हैं भड़ास के मूल दर्शन के सर्जक हैं। उन्होंने एक कविता लैंगिक विकलांगों के अंतर्मन की पीड़ा को व्यक्त करते हुए लिखी है जो कि तमाम मंचों और पत्रिकाओं पर सराही गयी है.... नाम है...."क्योंकि मैं हिजड़ा हूं"। वे दूसरों की पीड़ा को जिस शिद्दत से महसूस करते हैं उसके लिये उन जैसा ही दिल चाहिये। उनका कार्यक्षेत्र झोपड़पट्टी और रेडलाईट एरियाज़ हैं जिनमें वे अपने ऐश्वर्य भरे जीवन को छोड़ कर सबकी पीड़ाए बांटते विचरते हैं। इस पर उन्हें शुरुआती दौर में तमाम सामाजिक और पारिवारिक बहिष्कार का सामना भी करना पड़ा, कुरीतियों और बुराइयों से संघर्ष करते कई बार उन पर जानलेवा हमले हुए लेकिन वे इसे अपने कार्य का प्रतिफ़ल समझ कर स्वीकारते हैं। आयुर्वेद विषय में उच्च शिक्षित हैं M.D., Ph.D. हैं, खुद जड़ी-बूटियां उगाते हैं आयुषवेद परिवार के कुटुंब प्रमुख हैं, अकेले रहते हैं और उनकी जीवन शैली के बारे में तो मै स्वयं, भाई रजनीश के.झा और मुंबई के अधिकांश ब्लागर जानते हैं कि कैसे पीड़ाए बांटने में सबसे आगे खड़े रहते हैं और कब आपका दर्द लेकर मुस्कराते हुए अगले दर्दी के पास चले गये आप मंत्रमुग्ध से समझ ही नहीं पाते। हम लोगों ने इन्हें करीब से देखा है इसीलिये ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि अगले जन्म में यदि विधान ऐसा होता हो तो इन्हें मेरा बेटा बनाकर पैदा करना। जरा से फक्कड़ और मस्तमौला टाइप के हैं इनकी गम्भीरता भी मुसकराहट के पीछे छिप जाती है इसलिये कई बार लोग इनके बारे में भ्रमित हो जाते हैं। भड़ास इनके लिये मात्र एक वेबपेज नहीं बल्कि जीवनशैली है। लिखते समझते हुए आगे बढते चलेंगे ...
जय जय भड़ास

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बेनामी कमेंट करने वालों को ललकार रहा है भड़ास..

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

आज ही नहीं हमेशा से भड़ास का मूल दर्शन रहा है खुल कर लिखना और दिखना, सियार की तरह से हरकतें करना कभी भी भड़ासियों के स्वभाव में नहीं रहा है। किसी से प्रेम करा तो खुल कर दिल खोल कर और अगर किसी का मुखौटा नोचने का कार्यक्रम हुआ तो पुरजोर पेला गया। मैं निजी तौर पर भड़ास को मात्र वेबपेज पर दिखावे के लिये नहीं बल्कि जिंदगी में भी जीता हूं और इसके लिये हर कीमत चुकाने को तैयार रहता हूं जान देने की भी बारी एक या दो बार नहीं कई बार आ चुकी है पर हम उन फट्टुओं की जमात के नहीं कि जरा सा नुकसान हुआ तो आदर्श बदल कर सामने आ गये। मैं लीचड़पन का हमेशा धुरविरोधी रहा हूं। बेनामी कमेंट करके भड़ास को धमकाने का प्रयास करने वाले तुम्हें मेरा घर पता है और मुझे तुम्हारा अगर कलम छोड़ कर हाथ पैर से बात करने का इरादा हो तो हम इस बात के लिये भी पीछे नहीं हटेंगे क्योंकि हमारी रगों में शराब नहीं बहती है खून है और वो भी लाल रंग का....... ब्लड रिपोर्ट भेजूं क्या? जब माता-पिता ने नाम दिया है तो उसके साथ सामने आना अब तक न सीख पाए तो भड़ास से क्या टकराओगे??????
जय जय भड़ास

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डा.रूपेश श्रीवास्तव ने कहा था सबसे बड़ी उपलब्धि कुछ है वो है यशवंत दादा से मुलाकात.....

मंगलवार, 6 जनवरी 2009






घबराए हुए, बौखलाए हुए से निर्णयों से खुद ही परेशान हैं हमारे यशवंत दादा......। पता नहीं बाजार की भीड़ में हमारा भड़ासी भाई कहां खो गया है, उलझा हुआ है धनिया की जगह घोड़े की लीद के पैकेट बना कर बेचने के चक्कर में हर दिन....। कितने अच्छॆ और सुख के दिन थे उनके जब वे आराम से शाम को थोड़े से सुरूर में आकर डा.रूपेश श्रीवास्तव को फोन करते थे और सुख-दुःख बांटते थे, गाने सुनाते थे, रोते थे, हंसते थे.......। दूसरे दिन डा.साहब हम सब को बताते थे कि यशवंत दादा का फोन आया था और कितनी मजेदार बाते करते हैं कितने भावुक हैं वगैरह...वगैरह। व्यापारी होना किधर बुरा है लेकिन लोगों की भावनाओं को दुकान में सजा देना और हर भावना को रुपये में तब्दील करने की सोच ने पता नहीं कहां से हमारे प्यारे भाई के दिल में घर कर लिया है और भड़ास बन गया भड़ास4मीडिया...... लेकिन यकीन है हम सब को कि एक दिन हमारे भाई को जैसे आज सिर्फ़ दिखावे के तौर पर गलती का एहसास हो रहा है वो सच में होगा और वो हम सबके लिये रोएंगे और हम सब सारे वैचारिक मतभेद भूल कर उन्हें गले लगा लेंगे लेकिन क्या प्यार धागा तोड़ कर जो वो जोड़ना चाहेंगे उसमें गांठ नहीं रह जाएगी। डा.रूपेश श्रीवास्तव हमेशा कहते हैं कि यदि सामाजिक जीवन में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कुछ है तो वो है यशवंत दादा से मुलाकात.........। लेकिन अब सब बदल गया है भड़ास का दर्शन विवादित हो गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि डा.रूपेश श्रीवास्तव ही गलत आदमी से मिले रहे हों असली चेहरा अब सामने आया है पता नही क्या सच है और किसका असली चेहरा क्या है.... मेरा असली चेहरा तो मुझे उस आइने में देखने को मिला जिसे आप सब डा.रूपेश श्रीवास्तव के रूप में जानते हैं। और कितनी गलतियां करके हम सबका दिल दुखाओगे.......? आयुषवेद के नाम का आधार याद है न?? या ये भी भुला दिया?????????



जय जय भड़ास

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