अनुज भाई की कविता और डा.रूपेश की ठिठोली
सोमवार, 23 फ़रवरी 2009
मेरे भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव का एक पुराना चित्र
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मेरे भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव का एक पुराना चित्र
आज ही नहीं हमेशा से भड़ास का मूल दर्शन रहा है खुल कर लिखना और दिखना, सियार की तरह से हरकतें करना कभी भी भड़ासियों के स्वभाव में नहीं रहा है। किसी से प्रेम करा तो खुल कर दिल खोल कर और अगर किसी का मुखौटा नोचने का कार्यक्रम हुआ तो पुरजोर पेला गया। मैं निजी तौर पर भड़ास को मात्र वेबपेज पर दिखावे के लिये नहीं बल्कि जिंदगी में भी जीता हूं और इसके लिये हर कीमत चुकाने को तैयार रहता हूं जान देने की भी बारी एक या दो बार नहीं कई बार आ चुकी है पर हम उन फट्टुओं की जमात के नहीं कि जरा सा नुकसान हुआ तो आदर्श बदल कर सामने आ गये। मैं लीचड़पन का हमेशा धुरविरोधी रहा हूं। बेनामी कमेंट करके भड़ास को धमकाने का प्रयास करने वाले तुम्हें मेरा घर पता है और मुझे तुम्हारा अगर कलम छोड़ कर हाथ पैर से बात करने का इरादा हो तो हम इस बात के लिये भी पीछे नहीं हटेंगे क्योंकि हमारी रगों में शराब नहीं बहती है खून है और वो भी लाल रंग का....... ब्लड रिपोर्ट भेजूं क्या? जब माता-पिता ने नाम दिया है तो उसके साथ सामने आना अब तक न सीख पाए तो भड़ास से क्या टकराओगे??????
जय जय भड़ास
घबराए हुए, बौखलाए हुए से निर्णयों से खुद ही परेशान हैं हमारे यशवंत दादा......। पता नहीं बाजार की भीड़ में हमारा भड़ासी भाई कहां खो गया है, उलझा हुआ है धनिया की जगह घोड़े की लीद के पैकेट बना कर बेचने के चक्कर में हर दिन....। कितने अच्छॆ और सुख के दिन थे उनके जब वे आराम से शाम को थोड़े से सुरूर में आकर डा.रूपेश श्रीवास्तव को फोन करते थे और सुख-दुःख बांटते थे, गाने सुनाते थे, रोते थे, हंसते थे.......। दूसरे दिन डा.साहब हम सब को बताते थे कि यशवंत दादा का फोन आया था और कितनी मजेदार बाते करते हैं कितने भावुक हैं वगैरह...वगैरह। व्यापारी होना किधर बुरा है लेकिन लोगों की भावनाओं को दुकान में सजा देना और हर भावना को रुपये में तब्दील करने की सोच ने पता नहीं कहां से हमारे प्यारे भाई के दिल में घर कर लिया है और भड़ास बन गया भड़ास4मीडिया...... लेकिन यकीन है हम सब को कि एक दिन हमारे भाई को जैसे आज सिर्फ़ दिखावे के तौर पर गलती का एहसास हो रहा है वो सच में होगा और वो हम सबके लिये रोएंगे और हम सब सारे वैचारिक मतभेद भूल कर उन्हें गले लगा लेंगे लेकिन क्या प्यार धागा तोड़ कर जो वो जोड़ना चाहेंगे उसमें गांठ नहीं रह जाएगी। डा.रूपेश श्रीवास्तव हमेशा कहते हैं कि यदि सामाजिक जीवन में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कुछ है तो वो है यशवंत दादा से मुलाकात.........। लेकिन अब सब बदल गया है भड़ास का दर्शन विवादित हो गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि डा.रूपेश श्रीवास्तव ही गलत आदमी से मिले रहे हों असली चेहरा अब सामने आया है पता नही क्या सच है और किसका असली चेहरा क्या है.... मेरा असली चेहरा तो मुझे उस आइने में देखने को मिला जिसे आप सब डा.रूपेश श्रीवास्तव के रूप में जानते हैं। और कितनी गलतियां करके हम सबका दिल दुखाओगे.......? आयुषवेद के नाम का आधार याद है न?? या ये भी भुला दिया?????????
जय जय भड़ास
© भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८
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