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बस दिल्ली का समाचार है

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

सबसे पहले हम पहुँचे।
हो करके बेदम पहुँचे।
हर चैनल में होड़ मची है,
दिखलाने को गम पहुँचे।

सब कहने का अधिकार है।
चौथा-खम्भा क्यूँ बीमार है।
गाँव में बेबस लोग तड़पते,
बस दिल्ली का समाचार है।

समाचार हालात बताते।
लोगों के जज्बात बताते।
अंधकार में चकाचौंध है,
दिन को भी वे रात बताते।

चौथा - खम्भा दर्पण है।
प्रायः त्याग-समर्पण है।
भटके हैं कुछ लोग यही तो,
सुमन-भाव का अर्पण है।

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खबरों की अब यही खबर है

रविवार, 15 अप्रैल 2012

देश की हालत बुरी अगर है
संसद की भी कहाँ नजर है
सूर्खी में प्रायोजित घटना
खबरों की अब यही खबर है

खुली आँख से सपना देखो
कौन जगत में अपना देखो
पहले तोप मुक़ाबिल था, अब
अखबारों का छपना देखो

चौबीस घंटे समाचार क्यों
सुनते उसको बार बार क्यों
इस पूँजी, व्यापार खेल में
सोच मीडिया है बीमार क्यों

समाचार में गाना सुन ले
नित पाखण्ड तराना सुन ले
ज्योतिष, तंत्र-मंत्र के संग में
भ्रषटाचार पुराना सुन ले

समाचार, व्यापार बने ना
कहीं झूठ आधार बने ना
सुमन सम्भालो मर्यादा को
नूतन दावेदार बने ना

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सुमन अंत में सो जाए

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

कैसा उनका प्यार देख ले
आँगन में दीवार देख ले
दे बेहतर तकरीर प्यार पर
फिर उनका तकरार देख ले

दीप जलाते आँगन में
मगर अंधेरा है मन में
है आसान उन्हीं का जीवन
प्यार खोज ले सौतन में

अब के बच्चे आगे हैं
रीति-रिवाज से भागे हैं
संस्कार ही मानवता के
प्राण-सूत्र के धागे हैं

सुन्दर मन काया सुन्दर
ये दुनिया, माया सुन्दर
सभी मसीहा खोज रहे हैं
बस उनकी छाया सुन्दर

मन बच्चों सा हो जाए
सभी बुराई खो जाए
गुजरे जीवन इस प्रवाह में
सुमन अंत में सो जाए

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चेतना

कहीं बस्ती गरीबों की कहीं धनवान बसते हैं
सभी मजहब के मिलजुल के यहाँ इन्सान बसते हैं
भला नफरत की चिन्गारी कहाँ से आ टपकती है,
जहाँ पर राम बसते हैं वहीं रहमान बसते हैं

करे ईमान की बातें बहुत नादान होता है
मिले प्रायः उसे आदर बहुत बेईमान होता है
यही क्या कम है अचरज कि अभीतक तंत्र जिन्दा है,
बुजुर्गों के विचारों का बहुत अपमान होता है

सभी कहते भला जिसको बहुत सहता है बेचारा
दया का भाव गर दिल में तो कहलाता है बेचारा
है शोहरत आज उसकी जो नियम को तोड़ के चलते,
नियम पे चलने वाला क्यों बना रहता है बेचारा

अलग रंगों की ये दुनिया बहुत न्यारी सी लगती है
बसी जो आँख में सूरत बहुत प्यारी सी लगती है
अलग होते सुमन लेकिन सभी का एक उपवन है,
कई मजहब की ये दुनिया अलग क्यारी सी लगती है

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अखबारों का छपना देखा

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

मुस्कानों में बात कहो
चाहे दिन या रात कहो
चाल चलो शतरंजी ऐसी
शह दे कर के मात कहो

जो कहते हैं राम नहीं
उनको समझो काम नहीं
याद कहाँ भूखे लोगों को
उनका कोई नाम नहीं

अखबारों का छपना देखा
लगा भयानक सपना देखा
कितना खोजा भीड़ में जाकर
मगर कोई न अपना देखा

मिलते हैं भगवान् नहीं
आज नेक सुलतान नहीं
बाहर की बातों को छोडो
मैं खुद भी इंसान नहीं

अनबन से क्या मिलता है
जीवन व्यर्थ में हिलता है
भूलो दुख और खुशी समेटो
सुमन खुशी से खिलता है

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भाई से प्रतिघात करो

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

मजबूरी का नाम न लो
मजबूरों से काम न लो
वक्त का पहिया घूम रहा है
व्यर्थ कोई इल्जाम न लो

धर्म, जगत - श्रृंगार है
पर कुछ का व्यापार है
धर्म सामने पर पीछे में
मचा हुआ व्यभिचार है

क्या जीना आसान है
नीति नियम भगवान है
न्याय कहाँ नैसर्गिक मिलता
भ्रष्टों का उत्थान है

रामायण की बात करो
भाई से प्रतिघात करो
टूट रहे हैं रिश्ते सारे
कारण भी तो ज्ञात करो

सुमन सभी संजोगी हैं
कहते मगर वियोगी हैं
हृदय-भाव की गहराई में
घने स्वार्थ के रोगी हैं

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मुक्तक

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

मुझसे कोई दूर है, ना पास है,
बस इक टूटी हुई सी आस है.
चल पड़ा हूँ अजनबी रास्ते पर
न जाने मुझे किसकी तलाश है.

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