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बड़े दिनों के बाद.....

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

थोड़ी सी व्यस्तता के चलते लिख नहीं पा रहा था। डा.रूपेश की साइट आयुषवेद हैक हो गयी ये देख कर गुस्सा आया कि ऐसे भी कमीने लोग हैं जो इस तरह के उपक्रमों पर हमला करते हैं। डा.साहब को चाहिये कि बेलापुर के साइबर पुलिस सेल में जाकर उन मोटे हो रहे पुलिस वालों से कुछ मेहनत करवाएं जो मुफ़्त की पगार लेकर इंटरनेट पर न जाने क्या क्या देखते बैठे रहते हैं। दूसरी बात एक और सामने आयी है कि अब लोग पोस्ट्स पर टिप्पणियां देने में हिचकिचाते हैं खास तौर पर जब कोई विवादित पोस्ट हो। अरे भड़ासियों ये भड़ास है यहा विवाद न सुलझेंगे तो कहां सुलझेंगे? प्रवीण जी ने जमाने बाद एक पोस्ट लिखी है वो भी अपनी दुकान के एडवर्टाइजमेंट के लिये कि आप जाकर इनके ब्लाग के सदस्य बन जाएं इन्होंने लिंक के ऊपर जो हाइपर करा है वह इनके ब्लाग की सदस्यता की लिंक है। जैसे ही आप इस लिंक को क्लिक करेंगे इनके ब्लाग के सदस्य बन जाएंगे। प्रवीण जी शायद भड़ास से जिस किसी भी स्वार्थ के कारण जुड़े हैं पर ये नहीं जानते कि ब्लागिंग ही क्या भड़ास पर तो वर्चुलल स्पेस के साथ साथ फिजिकल स्पेस की भी सारी समस्याओं पर मदद करी जाती है। सुमन जी कस कर लिख रहे हैं साधुवाद। अनूप मंडल जी की नयी पोस्ट सचमुच माइंडब्लोइंग है।
आशा है दीवाली सही गुजरी होगी,बच्चे वगैरह पटाखों से जले न होंगे, महीने का बजट न लड़खड़ाया होगा। जेब में माल है तो हर रात दीवाली हो और हर दिन ईद......।
जय जय भड़ास

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मैं शरीर से हिजड़ा और आप आत्मा से हिजड़े हैं

शनिवार, 9 मई 2009

आज दो दिन पहले आप लोग के ब्लोग पर मैंने अपने भाई डा।रूपेश के कहने पर मेम्बर बन कर एक पोस्ट लिखा था । इस पोस्ट को लेकर कुछ लोग को प्राब्लम होने लगा कि ये मनीषा कौन है ? मेरी हिन्दी तो ऐसी है कि जितना भीख मांगते समय आशीर्वाद देने या फिर गालियां देने को काम आती है पर डा.भाई ने बताया कि अपना ब्लोग बनाना और उस पर लिखने के लिये अच्छा भाषा जानना चाहिए । मेरी भाषा मलयालम है और मैं मराठी ,इंग्लिश,तेलुगु,तमिळ बोल लेती हुं । आप लोग का लिखा हुआ मेरे को ज्यादा समझ में नहीं आता आर्थिक ,अस्तित्व,मसिजीवी या शुचितावादी का क्या अर्थ होता है ? हमारी प्राब्लम तो जिंदगी को आसान तरीके से जीना है जैसे राशन कार्ड,ड्राइविंग लाइसेंस,मोबाइल के लिए सिम कार्ड के वास्ते फोटो लगा हुआ आइडेंटिटी प्रूफ़ जैसे कि पैन कार्ड वगैरह अभी आप लोग बताओ किधर से लाएं ये सब ? उंगलियां दरद करने लगती हैं टाइप करने में लेकिन ऐसा लगता था कि इंटरनेट पर ब्लोग पर लिखने से प्राब्लम साल्व होगा पर इस खुशी में हम सब लोग ये भूल गए कि इधर भी तो वो ही लोग हैं जो ट्रेन में,सरकारी आफिसों में मिलते हैं । अभी हिन्दी टाइप करना आता है तो इन्हीं उंगलियों से इतना गंदा गंदा गाली भी टाइप कर सकती हूं कि मेरे और मेरे भाई के बारे में बकवास करने वाले लोग को वापिस मां के पेट में घुस कर मुंह छुपाना पड़ जायेगा लेकिन मुझे इतना तो अकल मेरे भाई ने दिया कि ऐसा लोग के मुंह नहीं लगना चाहिये ,हम लोग तो शरीर से हिजड़े हैं पर ये तो आत्मा से हिजड़े हैं इस वास्ते मैं इन आत्मा से हिजड़े लोग को गाली भी देकर इनका भाव नहीं बढ़ाना चाहती हूं अगर भड़ास पर मेरे होने से आप लोग को दिक्कत है तो भड़ास पर मैं पोस्ट भेजना बंद कर देती हुं ताकि लोगों को मेरे होने से अड़चन न हो क्योंकि हमे तो मुंबई में सार्वजनिक टायलेट तक में इसी प्राब्लम का सामना करना पड़ता है कि जेन्ट्स टायलेट में जाओ तो आदमी लोग झांक कर देखना चाहते कि हमारे नीचे के अंग कैसे हैं और लेडीज टायलेट में जाओ तो औरतें झगड़ा करती हैं । बस यही हमारी दिक्कते हैं जो हमें जिंदगी ठीक से नहीं जीने देतीं और हम अलग से हैं । अभी उंगलियां अकड़्ने लगी हैं मैं इतना लिख भी नहीं पाती पर आप लोग के दुख ने ताकत दिया लिखने का । अभी जब तक आप लोग नहीं बोलेंगे मैं भड़ास पर नहीं लिखूंगी ।



नमस्ते

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पत्रकार मनीषा पांडेय,मैं अर्धसत्य नामक ब्लाग की माडरेटर मनीषा नारायण हूं (अतीत के पन्ने से.....)

शुक्रवार, 8 मई 2009



"ब्लागर और पत्रकार मनीषा पांडेय ने वेबदुनिया डाट काम को टाटा बायबाय कह दिया है। उन्होंने दैनिक भास्कर से खुद को जोड़ लिया है। वे भोपाल में अपना नया काम एक अप्रैल को संभाल लेंगी। मनीषा चर्चित ब्लाग बेदखल की डायरी की माडरेटर हैं। उन्होंने वेब दुनिया में हिंदी ब्लागिंग को लेकर काफी कुछ काम किया है। मनीषा की नई नौकरी पर भड़ास की तरफ से ढेरों शुभकामनाएं।"



आज कई दिन बाद जबसे यशवंत दादा वापिस गये हैं तबसे अब तक मैं अपने भाई डा।रूपेश के घर आने का समय नहीं निकाल पायी थी। आज मीडिया रिलेटेड इन्फ़ार्मेशन वाली पट्टी पर इस खबर को देख कर एक बार फिर से मन में कुछ टीस सी उभर आयी। मुझे याद है कि मेरे और मनीषा पांडेय के नाम एक जैसे होने के कारण कितना विवाद हुआ था। यशवंत दादा ने बिना शर्त माफ़ी मांगी, मैंने भी भाई के कहने पर इससे माफ़ी मांगी कि आपको मेरा नाम मनीषा होने पर दुःख हुआ इसके लिये माफ़ करें, इस लड़की ने मेरे भाई को फोन करके कानूनी तिकड़मों की धमकी दी लेकिन भाई ने इसे अपने ही अंदाज़ में हंस कर सहन कर लिया। मैं भी उस घटना को भूलने की कोशिश कर ही रही थी कि एक बार फिर इसका नाम भड़ास पर दिखा तो लगा कि किसी ने ज़ख्म में उंगली डाल कर कुरेद दिया हो। हिन्दी के लिये बहुत कुछ किया होगा इस लड़की ने पर इसने एक बार भी यह नहीं माना आज तक कि जो कुछ भी इसने किया था वो एक गलतफहमी के चलते हुआ या इसने जो लोगों का दिल दुखाया उसके लिये इसे जरा भी शर्मिंदगी हुई है। मन में पीड़ा एक बार फिर से उभर आयी है कि इस लड़की को एकबार तो कम से कम कह दूं कि तुमने जो किया था वो गलत और पीड़ादायक था,तुम्हारे साथ लोगों की सहानुभूति इसलिये चिपक जाती है क्योंकि तुम एक स्त्री हो और मेरा तिरस्कार इस लिये कर दिया जाता रहा है क्योंकि मैं एक लैंगिक विकलांग हूं,हिजड़ा हूं। मुझे घिन आती है तुम्हारे जैसी सोच से चाहे तुम कितने भी बड़े सामाजिक कद के क्यों न हो तुम्हारी सोच का बौनापन हम सबने देखा है, अगर सचमुच पत्रकारिता करती हो या सुलझी सोच का एक अंश भी है आत्मा के किसी कोने में आज भी जीवित तो मुझसे आकर मिलो और एहसास करो अपनी गलती का।


जय भड़ास



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लैंगिक विकलांग लोगों को काम दिया लेकिन..... ( अतीत के पन्ने से......)

बुधवार, 6 मई 2009

अभी आप लोग सब खूब अच्छे मूड में रह कर कोई होली का बात कर रहा है और कोई पुराने दोस्त लोगों कि पर हम लोग की तो समस्याएं ही खत्म नहीं होती हैं । NGO चलाने वाले लोग खूब दिखावा करते हैं कि उन्होंने हमारे जैसे लैंगिक विकलांग लोगों को काम दिया लेकिन इस आड़ में वो लोग फ़ारेन फ़ंड्स और डोनेशन की मलाई छानते हैं । हम लोग महीना हर तक रेडलाइट एरिया में जा-जाकर कंडोम बांटते हैं ,ब्लड सैंपल कलेक्ट करने में हैल्प करते हैं और महीने के आखिर में ढ़ाई-तीन हजार रुपए पकड़ा देते हैं ये कह कर कि ये पगार नहीं बल्कि मानधन है । सब शोषण करते हैं तो ये भी कर रहे हैं ये मौका क्यों छोड़ेंगे लेकिन एक बात कि अगर वेश्याएं,भिखारी,हिजड़े समाप्त हो जाएं तो ये सारे NGO च्लाने वाले भीख मांगने लगेंगे । मैं चंद्रभूषण भाई और यशवंत सर को थैंक्स कहना चाहती हूं जिन्होंने डा।रूपेश भाई से बात करके हमारी तकलीफ़ को समझा ।



नमस्ते ,जय भड़ास

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क्या स्वास्थ्य मंत्री रामदौस समलैंगिक है????????? ( अतीत के पन्ने से....)

शुक्रवार, 1 मई 2009

जब भी देखा कि यदि कुछ ऐसा है जो कि हमारी देशज सभ्यता के विरुद्ध है या कुदरती नियमों के खिलाफ़ है तो मन करता है कि उसे रोक कर बचाने का प्रयत्न करूं नैतिकता और लोगों के स्वास्थ्य को क्योंकि मैं एक टीचर होने की जिम्मेदारी को भलीभांति समझती हूं। आज जब स्वास्थ्य मंत्री रामदौस(ये आदमी अगर अपना नाम रामदास रखता तो लोगों को इसका नाम लेने में अड़चन न होती) का बयान देखा कि जनाब चाहते हैं कि इस देश में समलैंगिक यौन संबंधों को कानूनी जामा पहना कर जायज़ बना दिया जाए। किसी बात की वकालत अचानक कोई भारतीय राजनेता करने लगे तो उसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि मंत्री महोदय को या तो इस बकवास को करने के लिए पेट भर पैसा मिला है या फिर दूसरा कारण कि हो सकता है कि रामदौस खुद निजी तौर पर या तो आदमियों से मराते होंगे या आदमियों की मारने में विशेष दिलचस्पी रखते होंगे(क्या मारना और क्या मरवाना बताया जा रहा है ये भड़ास के मंच पर स्पष्टीकरण करना बचपना होगा क्योंकि भड़ासी भी किन्ही अलग अर्थों में कई बार कुछ कमीनों की कसकर मार चुके हैं)। हरामियों की एक N.G.O. जिसका नाम है नाज़ फाउंडेशन, उसने एक पिटीशन कोर्ट में दाखिल कर रखी है कि इस देश में कानून की किताब से धारा ३७७ के उन हिस्सों को पूर्णतया समाप्त कर दिया जाए जिसमें औरतों को औरतों की चाटना और चूसना, आदमियों का आदमियों से मरवाना,शरीर के हर छेद को पेलमपेल के लिये इस्तेमाल करना या कुत्तों, गदहों, धोड़ों या ऐसे ही अन्य जानवरों को आदमियों द्वारा ठोका जाना या औरतों द्वारा ठुकवाया जाना अपराध माना जाता है। आज ये सुअर और नाज़ फाउंडेशन के हरामी ये चाहते हैं और कल इनकी याचिका होगी कि मैं अपनी मां या बहन या बेटी के ठोकना चाहता हूं मेहरबानी करके कोर्ट उसे जायज़ करार कर दे ताकि हम खुलेआम ऐसा कर सकें। बजरंग दल से लेकर सिमी जैसे हिंदू और मुस्लिम उग्र विचारधारा के हिमायती चूतिये इधर-उधर बेसिर पैर की बातों पर फ़साद करते फिरते हैं तो क्या ये साले अंधे हैं कि इनकी सभ्यता और शरीयत की पिछाड़ी में मंत्री रामदौस और नाज़ फाउंडेशन कैसा कसकर बिना तेल लगाए डंडा घुसा रहे हैं? मुझे तो शक है कि इन संगठनों के नेता भी उल्टी साइकलें हैं जो खुद को पीछे से चलवाते हैं वरना क्यों इस बात पर चूं तक नहीं करते?अगर आप इन तथ्यों को और अधिक गहराई से समझना चाहें तो मनीषा दीदी के ब्लाग पर पड़ी पोस्ट कुदरत मानवजाति को नष्ट कर रही है पढ़िये। यदि नए भड़ासियों को इस बात को कहने के लिये इस्तेमाल करी गयी भदेस भाषा पर आपत्ति हो तो मुझे बताएं कि इस नीचपन का मुझ जैसी नक़ाब पहनने वाली औरत कैसे विरोध करे जब कोई साथ न दे?

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बाबूजी रास्ता बताइये..........

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009


आदरणीय बाबू जी शायद सोच रहे होंगे कि मनीषा बहुत व्यस्त हो गयी है तो इन दोनो भाई-बहन ने नववर्ष की शुभेच्छा दी और न ही पोंगल की शुभकामनाएं। सच तो यह है कि हम दोनो आजकल पागल की तरह से सूचना प्राप्ति के अधिकार का प्रयोग कर समाज और देश / राज्य में लैंगिक विकलांगों की स्थिति जानने के लिये लगे थे। जरा आप सब जानिए कि क्या हुआ जब सूचना प्राप्ति कि अधिकार का आवेदन पत्र विधिवत भर कर उस पर १० रु. का रेवेन्यू स्टैम्प लगा कर मैं भाई के साथ नगर परिषद कार्यालय गई तो चूंकि यहां अधिकतर क्लर्क भाईसाहब डा.रूपेश को एक सताने वाले कायदा-पंडित के रूप में पहचानते हैं जिसकी वजह से उनके प्रति एक पूर्वाग्रह बना रखा है सबने कि ज्यादा से ज्यादा चक्कर लगवाएं ऐसा उन सबका प्रयास रहता है। जैसे ही आवेदन पत्र देखा तो चार पांच क्लर्क एकत्र हो गए और पहले आपस में सलाह -मशविरा करा फिर भाईसाहब से बोले कि ये एप्लीकेशन में सवाल पूंछा गया है हम उत्तर नहीं बल्कि सूचनाएं उपलब्ध करा सकते हैं जो कि पत्र-प्रपत्रों या अन्य किसी रूप में रेकार्ड में मौजूद हों इसलिये ये एप्लीकेशन स्वीकारी नहीं जा सकती तो भाई अड़ गए कि इस एप्लीकेशन पर आप जो कारण बता रहे हैं वह लिखते हुए अस्वीकार करने की टीप लिख दीजिए ताकि हम वापस चले जाएं। एक बार फिर हुज्जत शुरू हो गयी.....। होते होते बात यहां तक पहुंच गयी कि एक क्लर्क ने कह दिया कि मैडम मनीषा नारायण पहले तो आप किसी प्रमाण से ये सिद्ध करिये कि आप भारतीय नागरिक हैं तब आपको ये अधिकार बनता है कि आप कोई सवाल हमसे कर सकती हैं ऐसा हो सकता है कि आप बांग्लादेशी घुसपैठिया हों जो कि बिना किसी अधिकार के भारत में रह रहा हो क्यों न पुलिस बुलाया जाए और इस बात को आगे बढ़ाया जाए। अब हम दोनो मुख्याधिकारी जी के पास गये तो उन्होंने सारी बात सुनी हमें चाय पिलायी और अपनी भारी असर्मथता जताते हुए बोले कि मैं एक बात अनआफ़िशियली डा.साहब से कहना चाहता हूं इसे अन्यथा न लें कि ये वही देश है जहां कागजों पर मरे हुए घोषित कर दिये लोग बरसों बरस आफ़िसों के चक्कर लगाते रहते हैं और एक दिन सचमुच मर जाते हैं। उन्होंने हमसे बहुत सम्मान से व्यवहार करा लेकिन ये भी बताया कि यदि आपकी नागरिकता पर सवाल करा गया है तो यह मामला ये क्लर्क लोग बात बढ़ने पर स्थानीय राजनेताओं के पास ले जाते हैं फिर आप तमाम तरह से स्टेट की मशीनरी का दुरुपयोग करके सतायी जाएंगी।
कई बातें स्पष्ट होने के बाद हम दोनो वापस आ गए है लेकिन अब विचार कर रहे हैं कि आगे क्या रणनीति हो साथ ही बाबूजी श्री जे.सी.फिलिप जी और आप सभी जनों से निवेदन है कि यदि कोई विशेष सुझाव हो तो अवश्य बताएं।

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आयुर्वेद के क्षेत्र में गधे पंजीरी खा रहे हैं...

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

आज अभी हाल ही में मैंने जैसे ही घर में प्रवेश करा तो पाया कि भाई किसी से फोन पर बात कर रहे हैं और उनकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही है। मैंने भाई के लिये चाय बनायी और वार्तालाप समाप्त होने पर जानना चाहा कि क्या बात है तब उन्होंने बताया कि वे अपने गुरू प्रातःस्मरणीय डा.देशबंधु बाजपेयी से बात कर रहे थे और उस तात्कालिक दुःख का कारण था कि डा.बाजपेयी ने चर्चा के दौरान ये बताया कि उन्हें अपनी बेटी के विवाह के लिये बैंक से कर्ज लेना पड़ा जिसे अब वे धीरे-धीरे चुका रहे हैं। डा.बाजपेयी वो व्यक्ति हैं जिन्होंने आयुर्वेद के क्षेत्र में एक ऐसा अविष्कार करा है जिसे इलैक्ट्रो त्रिदोषग्राम(E.T.G.) कहते हैं। इसका उपयोग करने से शरीर के कफ़-पित्त-वात की स्थिति के साथ ही सप्त धातुओं के स्थिति का पेपर एविडेन्स मिल जाता है जैसे कि ई.सी.जी. में होता है लेकिन यह अविष्कार लालफ़ीताशाही का शिकार होकर सरकारी नीतियों की गलियों में भटक रहा है और सच्चे आयुर्वेद के चिकित्सक इसके इस्तेमाल से वंचित हैं। आयुर्वेद की संस्था "आयुश" के लोगों ने डा.बाजपेयी को एक प्रमाणपत्र दिया है जो कि ये दर्शाता है कि आयुश के लोग दिमागी दिवालिये हो चुके हैं उल्लू के पट्ठे सूरज को दिया दिखा कर उसकी रोशनी में इजाफ़ा कर रहे हैं। जबकि सच तो ये है कि अगर ये लोग चाहें तो एक साथ किसी भी सरकार पर दबाव बना सकते हैं लेकिन शायद ये खुद नहीं चाहते कि डा.बाजपेयी का अविष्कार प्रकाश में आये वरना देश ही नहीं पूरी दुनिया में उन्हें चिकित्सक पूजने लगेंगे और इन चिरकुट राजनीति करने वाले छ्द्मचिकित्सकों को कौन पूछेगा। डा.बाजपेयी इस उम्र में भीड़ भरी बसों में धक्के खाते फिर रहे हैं और ये आयुर्वेद की किताबों में रेंगने वाले कीड़े खुद को जानकार बताते मजे कर रहे हैं। डा.बाजपेयी इनके किसी भी सम्मान से बहुत आगे जा चुके संत हैं। इन बुद्धुओं के साथ बैठना डा.बाजपेयी की करुणा है वरना क्या वे इनसे प्रमाणपत्र मांगने जाते हैं कि मुझे संम्मानित करो। लेकिन ये तो समय का प्रभाव है कि डा.बाजपेयी को ये लोग सम्मानित करें जैसे कि नीर-क्षीर विवेकी हंस को बगुले अपनी सभा में पंखों की सफेदी के लिये प्रमाणपत्र दें....गधे पंजीरी खा रहे हैं भाई।
जय जय भड़ास

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आया...आया....गुरुभाई........ पंगा लेना ना प्यारे






















गुरूभाई यानि हमारे प्यारे गुरुदत्त तिवारी जी जो अब तक मुंबई में "बिजनेस स्टैन्डर्ड" दैनिक समाचार पत्र में शोभायमान थे भोपाल जाने की तैयारी में हैं। जाने से पहले तो कम से कम एक बार मिल लो ऐसी विनती घिघिया कर करी तो गुरूभाई को मुझ पर दया आ गयी और कल आ ही गये प्रभु दर्शन देने। गुरूभाई एकदम सीधे आदमी हैं यानि कि कोई लाग-लपेट नहीं जो बात जैसी है उसे वैसा ही देखते हैं पूर्वाग्रहों का चश्मा प्रयोग नहीं करते। अब एक जैसे लोगों के मिलने पर जो बाते होती थी वही हुई, मुखौटों को प्रयोग करने वालों के ऊपर गुरूभाई अगर चाहें तो एक मोटी सी किताब लिख सकते हैं। रोटी बनाई और शिमला मिर्च की सब्जी खाई और खूब गपियाए, इस बीच में रजनीश भाई, मुनव्वर आपा और कृष्णा शर्मा जी से भी गपिया लिया गया। सुबह जब मैं उन्हें स्टेशन भेजने गया तो आदत के मुताबिक पनवेल से वाशी तक साथ गया। वाशी में गुरूभाई बस के इंतजार में खड़े तो एक सयाना कंडक्टर आकर उन्हें टिकट थमा गया.....एक घंटा हो गया बस थी कि आने का नाम ही न ले। भाई परेशान...दुविधा में कि अगर टैक्सी से निकले तो तुरंत अगर बस आ गयी तो अपना ही पोपट हो जाएगा। इसी बीच भिखारी बच्चों ने भी दो राउंड लगा लिये अपने धंधे के(दर असल तीन लेकिन तीसरे बच्चे का पहले वालों से टाई-अप नहीं था वो अलग कंपनी से था)। एक बस आयी तो कंडक्टर ने साफ़ कह दिया कि पहले लिया टिकट नहीं चलेगा। गुरूभाई ने तत्काल(डेढ़ घंटे बाद) निर्णय लिया और टिकट फाड़ते हुए बस में अपने पत्रकार मन पर विजय प्राप्त करके खिड़की की सीट पकड़ ली, अब ये बस साली चलने का नाम ले... चली...चली....छह सात मीटर फिर रुक गयी। गुरूभाई विदाई के पोज़ में हाथ हिला-हिला कर मन ही मन शायद गरिया रहे होंगे कि किस पनौती का सुबह मुंह देख लिया दिन की शुरूआत ही खराब हो गई(भाई ने मेरा ही मुंह देखा होगा अपना तो देखने से रहे क्योंकि साथ में तो मैं ही था)। हम दोनो ने उसी जगह चाय चूसी और उस दिन को याद करा जब भाई रजनीश झा मुंबई से दिल्ली वापिस जा रहे थे। गुरूभाई से बहुत कुछ सीखा जाना समझा। भाई भड़ासियों इसी तरह आते रहना ताकि जीवन में रंग महसूस होते रहें। आप लोग देख सकते हैं कि गुरूभाई ने विदाई के कितने सारे पोज़ दिये तब कहीं जाकर बस चली। हम सब भाई की भोपाली पारी की सफलता की कामना करते हैं। मनीषा दीदी ने न मिल पाने का अफ़सोस करा और भाई,भाभी और बचऊ को प्यार बोला है।

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