डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी की माता जी की रहस्यमय हत्या पर एक बुजुर्ग भड़ासी का शक-शुबहा
बुधवार, 12 जनवरी 2011
इस रहस्यमय नृशंस हत्या के खुलासे की पहली कड़ी- भाग १
जिन्हें ये हत्या मात्र मनगढंत कहानी लग रही है वे इस दूसरी कड़ी को भी पढ़ें- भाग-२
डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 3डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 4
डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 5
अब जबकि तकनीकी तौर पर इस बात को समझ लिया गया कि इन पपीते के फलों में तंत्र-मंत्र की सामग्री बाहर से नहीं घुसाई गयी है तो अब आगे क्या करा जाए। ये विचार-विमर्श चल ही रहा था तो उस सिर फाड़ देने वाले दुर्गंधित माहौल में अचानक हमारे वरिष्ठ बुज़ुर्ग भड़ासी जनाब मोहम्मद उमर रफ़ाई प्रकट हुए। ये सब तमाशा देखने के बाद उन्होंने भी इस बात को सबसे पहले तो सिरे से खारिज़ कर दिया कि ये सब बस हाथ की सफ़ाई है एक ट्रिक मात्र है। जनाब रफ़ाई साहब ने अपनी लगभग पिचहत्तर साल की उम्र में काफ़ी दुनिया देख ली है और न जाने कितने इस तरह के जादू दिखाने वालों से दो चार हो चुके हैं। उन्होंने भी अपनी गिद्ध जैसी आँखों से हर सामान को बहुत बारीकी से देखा। बाल की खाल निकालने के लिये सुन्नी इस्लामिक महफ़िलों में "बम" के नाम से कुख्यात जनाब रफ़ाई ने सारी सामग्री को देखा उसके बाद हम सबने अपने साइबर फ़ॉरेन्सिक एक्सपर्ट दोस्त की सलाह से अपनायी गयी उस कम्प्यूटर तकनीक को भी उन्हें दिखाया। चूंकि वे खुद भी एक पढ़े लिखे कॉन्वेन्ट शिक्षित व्यक्ति और एक टैक्निकल सोच वाले व्यक्ति हैं और खुद भी ब्लॉगिंग करा करते हैं तो तमाम बारीकियाँ जानते समझते हैं। सब कुछ देखने के बाद वे भी करीब एक घंटे तक माथे पर उंगली रखे सब देखते विचारते रहे लेकिन कुछ भी समझ पाने में असमर्थ रहने के बाद वे भी इस बात को मानने के लिये मजबूर हो गये कि ये कोई ट्रिक नहीं है बल्कि हकीकत है कि ये सारा सामान पपीतों के भीतर से ही निकला है।जय जय भड़ास Read more...

अब सब ठीक है क्योंकि अपने सारे अपराधों की सजाएं काट कर अब सामान्य नागरिक की हैसियत से रह रहे हैं। अंकल के नाम से लोकप्रिय X-man ने जिस पुलिस को बरसों-बरस छकाया था अब उसी मुंबई पुलिस के लोकल इन्फ़ार्मेशन नेटवर्क के अत्यंत विश्वसनीय व प्रमुख व्यक्ति हैं
इस मुलाकात में आ जुड़े मुंबई के चेंबूर इलाके के पुराने दादा "उमर भाई" यानि हमारे भड़ासी साथी जनाब मोहम्मद उमर रफ़ाई .......,कान्वेन्ट शिक्षा से पढ़े हुए पूना के रहने वाले उमर भाई जब मुंबई आए तो परिस्थितियों ने उन्हें बना दिया "भाई", आज भी इनका बसाया हुआ ’भाई-भाई नगर’ एकता का प्रतीक है जो हर हाल में उमर भाई की बड़ी गहरी सोच का जीता-जागता सबूत है लगभग सात सौ घर, बाजार, मंदिर,मस्जिद-मदरसा,चर्च,श्मशान भूमि,पोस्ट आफ़िस....... ये सब इन्होंने बसा-बना दिया था अपनी तलवार और कलम की ताकत से....... उस जमाने में जब महाराष्ट्र की राजनीति के बड़े नाम माने जाने वाले नारायण राणे इनके पास मदद के लिये सुबह-शाम चक्कर मारते थे.....
दोनो बूढ़े शेर अलग अलग सोच रखने वाले लेकिन दोनो क्रान्तिकारी सोच के धनी.......अभी तो बहस चल रही है पुरानी बातों के आइने में आज के प्रसंग लगा कर..... एक दूसरे से खिंचे हुए से..... लेकिन भड़ास के मंच पर दोनो एक हैं....... अस्तित्त्वहीन माने गए ये भारी-भरकम वजूद......।
करीब आए...लेकिन अभी भी पुराने तेवर.......
आयी मुस्कुराहट चेहरों पर साथ में हैं वरिष्ठ भड़ासिन मुनव्वर सुल्ताना यानि हम सब की मुनव्वर आपा...