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अमित जैन और प्रवीण शाह क्यों नहीं चाहते कि डॉ.रूपेश जी की माताजी की हत्या का रहस्य खुले?

बुधवार, 13 जुलाई 2011

आज इतने दिन हो गये इस प्रकरण को घटित हुए लेकिन आज तक प्रवीण शाह और अमित जैन ने किसी भी प्रकार से ये नहीं चाहा कि आदरणीय डॉ.साहब की माताजी की जिस तरह क्रूरता से हत्या कर दी गयी उसका रहस्य खुले। हम कई लोगों ने जब भी इस विषय पर चर्चा करी तो इन दोनो ने कभी अमित की पत्नी को बीच में लाकर खड़ा कर दिया जबकि प्रवीण शाह ने वो तस्वीर देखी तक नहीं है लेकिन चूँकि विषयान्तर करना है तो इस तरह की हरकत जरूरी हो जाती है कि कुछ अलग कर दिया जाए ताकि मुद्दा भटक सके। ये दोनो धूर्त कभी ब्लॉगर के मेन्टेनेन्स का रोना रोते रहे कि दो पोस्ट संचालकों ने हटा दी हैं प्रवीण शाह ने तो ये तक लिखा कि डॉ.रूपेश ने अपने कमेंट में ये बात स्वीकारी है और उस कमेंट की लिंक भी दी लेकिन जब उस लिंक को देखा तो इसकी मक्कारी तुरंत सामने आ गयी क्योंकि डॉ.साहब ने ऐसा कुछ नहीं लिखा था जो ये बता रहा था। इन दोनो महामक्कारों ने स्क्रीनशॉट्स के भी ट्रिक अपना कर सबको भ्रमित करना चाहा जिसकी पोल हमारी प्यारी बड़ी बहन मनीषा नारायण ने खोल कर रख दी तो भी बेशर्म प्रवीण शाह और अमित जैन नहीं माने कि ये चालाकी भड़ासी समझ चुके हैं और दूसरी बातों में उलझाए रहे। खुद डॉ.रूपेश जी ने कई बार इन दोनो धूर्तों से सीधे कहा कि तुम दोनो बताओ कि वीडियो की जाँच किस प्रकार करोगे तो इस बात पर ये चुप्पी साध जाते हैं। डॉ.साहब ने तो इन दोनो को मुंबई आने जाने का विमान का किराया, रहने का खर्च, इनकी फीस तक देने का वायदा इसी मंच पर लिख कर किया है तो ये दोनो मुँहचोर क्यों नहीं आ जाते अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिये? ये कहेंगे कि इनके पास समय नहीं है ये व्यस्त हैं वगैरह वगैरह... तो फिर अपने किसी प्रतिनिधि को जो मुंबई में रहता हो उसे ही भेज दें ये भी कहा है लेकिन ये दुष्ट नहीं चाहते कि माताजी की हत्या का रहस्य खुले इसलिये कुछ न कुछ कपट करते रहते हैं। मैं अब तक नहीं समझ पाया कि ये दोनो ऐसा क्यों नहीं चाहते कि इस विषय पर कुछ बात आगे बढ़े ताकि माताजी की हत्या का रहस्य खुल सके।
जय जय भड़ास

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जब मुझ हिजड़े ने आपकी चिरकुट सी ट्रिक का भंडाफोड़ कर दिया है तो हमारे बड़े भाईसाहब और मुनव्वर आपा वगैरह किस स्तर की बुद्धि रखते हैं

गुरुवार, 19 मई 2011

अमित जैन भाई, बड़े खुशी से मैं आपकी इच्छा पूरी कर रही हूं लेकिन इतना बताना चाहती हूं कि ये सचमुच बच्चों के खेल जैसा ही है लेकिन अब आप और प्रवीण शाह भाई मेरे ऊपर ही सारे इल्ज़ाम मत लगा देना कि ये सब मैं कर रही हूं। मैंने तो बस इस बचकानी ट्रिक का खुलासा कर दिया है साथ ही हृदय से धन्यवाद हमारे बड़े भाईसाहब डा.रूपेश श्रीवास्तव जी का जिन्होंने हमें इस लायक बना दिया।
ये दोनो स्क्रीन शाट एक ही तारीख के लिये गये हैं जिन्हें कि प्रवीण शाह जी ने प्रस्तुत करा था मैंने इनकी ट्रिक का खुलासा करके आपकी इच्छानुसार आपके नाम में बदलाव कर दिया है साथ ही तमाम पोस्ट आपके द्वारा ही लिखी दर्शाई जा रही हैं। कैसा लगा ये छोटा सा नमूना?
पूरी उम्मीद है कि आपको मेरे इस खुलासे से संतुष्टि हो गयी होगी।
अब इन सब चिरकुट बातों से ऊपर उठ कर जरा आप और प्रवीण शाह भाई ये बताइये कि आप दोनो विद्वान साइंस और तर्कशास्त्र के पक्षधर माताजी की हत्या के संबंध में चल रहे तंत्र के बुरे प्रयोग के बड़े भाईसाहब डा.रूपेश जी के द्वारा बनाए वीडियो और उस पूरे प्रकरण की जांच कैसे कराने वाले हैं या बस झूठ है अंधविश्वास है चालाकी है धोखा है यही दोहराते रहेंगे। कम से कम इतना हमने करा तो अब आप लोग भी कुछ करिये ये प्रमाणित करने के लिये कि आप लोग बड़ी साइंटिफ़िक सोच रखते हैं और बाकी सारे भड़ासी दकियानूसी और अंधविश्वासी हैं। पूरा विश्वास है कि जब मुझ हिजड़े ने आपकी चिरकुट सी ट्रिक का भंडाफोड़ कर दिया है तो हमारे बड़े भाईसाहब और मुनव्वर आपा वगैरह किस स्तर की बुद्धि रखते हैं वो साइंटिफ़िक माइंड हैं या अंधविश्वासी???
जय जय भड़ास

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प्रकाश गोविन्द जी केश लुंचन(ऊपर और नीचे का) कराने से पोस्ट करने तक का वीडियो बनवा लीजियेगा

शनिवार, 19 मार्च 2011

साइंस के फ़रोग़ के लिये तंत्र-मंत्र जैसे गूढ और रहस्यमय विषय पर सहकार्य करने के लिये आर्थिक और शारीरिक तौर पर आदरणीय प्रकाश गोविन्द जी व प्रवीण शाह जी प्रस्तुत हुए हैं ये बेहद खुशी की बात है। एक समय था जब कि दूरश्रवण और दूरदर्शन पर चर्चा करना भी कुछ ऐसा ही विषय रहा होगा लेकिन जब ये बातें सिद्धांतों से गुजर कर तर्क और तथ्य की कसौटी पर होकर अनुभव में दर्ज हो गयी तो साइंस में शुमार होने लगीं। अब भले ही किसी को टीवी बनाना न आता हो लेकिन चलाना आता है क्योंकि वह साइंस है ठीक वैसे ही एक समय तक वनस्पतियों आदि की जानकारी खास वर्ग तक ही सीमित थी जिसके आधार पर वे बीमारियों को दूर कर चमत्कारिक प्रभाव सा पैदा करके पूजे जाते थे। काल क्रम में जैसे जैसे डा।रूपेश श्रीवास्तव जैसे लोग ईश्वर की कृपा से आते गए वे परिस्थितियों से जूझ कर तमाम रहस्यों को खोल कर साइंस में दर्ज करा कर आम आदमी के लिये जीवन आसान करते गए।
अब जबकि तंत्र-मंत्र की बात चल रही है तो कुछ लोग जिसे अंधविश्वास या बकवास कह कर दरकिनार कर रहे हैं असल में शोध की किसी भी संभावना को सिरे से नकार रहे हैं इसी संदर्भ में मुनव्वर आपा ने होम्योपैथी का जिक्र करा था जो कि भाई प्रवीण शाह जी को गवारा नहीं हुआ वे पपीता पकड़ कर बैठे हैं जबकि बात पपीते की नहीं एक पूरे प्रकरण में ये एक घटना है जिसे किसी शोध के लिये शुरूआत बनाया जा सकता है।
प्रकाश गोविन्द जी ने अपने दिल के बड़प्पन का परिचय देते हुए जो रकम देने की बात कही है वो मानवता के ऊपर उपकार रहेगा। एक निवेदन कि जब वे ऊपर(और नीचे) के बाल इस बात से संबंधित शोध के लिये भेजें तो कृपया डा।रूपेश श्रीवास्तव की तरह ही इस बात का "अनकट" वीडियो बना कर डाकखाने में पोस्ट करने तक लिफ़ाफ़ाबंद करने आदि को चित्रित करें ताकि यह एक वीडियो प्रमाण रहे वरना बात आयी गयी हो जाएगी कि कौन सा बाल ऊपर का था और कौन सा बगल या नीचे का था या प्रकाश गोविन्द जी का है भी या किसी और का........ कृपया इस बात का ध्यान रखें प्रकाश जी साइंटिफ़िक अंदाज में तर्क और तथ्य को पुष्ट करते हुए हम इस विषय पर आगे बढ़ेंगे तो बेहतर रहेगा। शीघ्रता करें और वीडियो स्पष्ट हो ये ध्यान रखें धन संबंधी बात आगे के चरण में ले जाते हैं।
जय जय भड़ास

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प्रवीण शाह और प्रकाश गोविन्द बताएं कि पपीते में से कुछ निकलने का संदर्भ तंत्र-मंत्र के अस्तित्त्व को नकारने के लिये काफ़ी है???

प्रवीण शाह पुरजोर लगे हुए हैं कि ये सिद्ध कर सकें कि तंत्र-मंत्र का कोई अस्तित्व नहीं है। इनका इस तरह से प्रतिक्रिया करना काफ़ी कुछ बता देता है दर असल बात ही यही है कि अनूप मंडल के अनुसार(जब ये मुझे ही अनूप मंडल लिख चुका है तो मेरा हक बनता है कि मैं सत्य की इस बात में तर्कऔर तथ्यों के साथ रहने वाले का साथ दूं) हर राक्षस इस प्रयास में लगा रहता है कि वह अपनी करतूतों पर पर्दा डाले रहे और सामने इन बातों को झुठला सके। इनके अनुसार आदरणीय डा।रूपेश जी तो उस मनोस्थिति में नहीं थे कि चीजों या तान्त्रिक की करतूत को समग्रता से देख पाते साथ ही साथ पूरी प्रक्रिया के दौरान मौजूद अन्य लोग भी इनके अनुसार असंयत रहे होंगे। साइंस की आड़ में खड़े होकर वकालत करने वाले इस "शाह" ने ये नहीं कहा कि मूवी कैमरा भी माताजी की बीमारी से बौखला गया था और सूक्ष्मदर्शी यंत्र का लेंस भी बीमार माता जी के कारण धुंधला हो गया था जो कि पहले से कटे पपीते के ’कट’ को देख न पाया क्योंकि सारे के सारे लोग मूर्ख और दृष्टिदोष से ग्रस्त हैं। TSALIM नामक जिस संस्था का ये जिक्र कर रहे हैं असल में वो किन साइंटिस्टों की जमात है ये भी आप देख लीजियेगा(ये एक अत्यंत ही धूर्त किस्म का मायावी है इस लिये अपने जैसे ही कपटियों को आगे कर रहा है) इनके बारे में क्या कहा जाए कि अरविन्द मिश्रा मछलियों के विभाग में नौकरी करते करते महिला ब्लागर डा।दिव्या श्रीवास्तव को कटही कुतिया जैसा संबोधन दे चुका है,जाकिर अली ’रजनीश’ वो है जिसे असंबद्ध लिंक देकर टिप्पणी देने का बाजारी हुनर आता है,एक है तो सांपों के बारे में इंटरनेट से उठा कर हिंदी में लिखती है..... कितना बड़ा दल सुझाया इसने जो कि तमाम गुणों से सम्पन्न है। इस प्रवीण शाह में एक बात जो कि आप सबको लगता है कि ये अधीरता के चलते करता है असल में इन राक्षसों की कुटिलता रहती है शब्दो को मरोड़ना-तोड़ना ताकि लोग भ्रमित हो सकें जैसे कि आप TSALIM तलाश कर परेशान हो जाएं जबकि ये जमात TSALIIM नाम से है।
एक बात और देखिये कि ये कितना कुटिल है कि अपने को मरने के लिये आगे करने की बहादुरी जता कर ये उस तांत्रिक को ही बुरा सिद्ध करने की भ्रमित करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है जिसने कि उस तंत्र कुकर्म की काट करी थी। हम इसके चुनौती भरे अंदाज को समझ रहे हैं ताकि ये खुद को पाक-साफ़ सिद्ध कर सके दूसरी बात देखिये कि अब अमित जैन सामने नहीं आ रहा है। मुंबई का कौन ब्लागर इस बात के लिये सामने आएगा उसका नाम ये दे ताकि वो भी आकर इस पूरे प्रकरण को झूठ सिद्ध करने के लिये जान लगा कर कोशिश करे। अपने बाल देने की बात कर के खुद को ऐसा जता रहा है कि ये बहुत ही साइंटिफ़िक विचारों का है तो इस कुटिल ने ये नहीं लिखा कि बालों से क्या-क्या हो सकता है, जिन किन्हीं ब्लागर बंधु-भगिनियो को बाल वाला चैलेंज मंजूर हो वे मेहरबानी करके पहले राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त करने वाले होम्योपैथ डा.बंधु साहनी की खोज को देख लें उसके बाद इस धूर्त के कहने पर आगे आएं।
ये जिस साइंस की बात करता है वो तो आजतक "स्वमूत्र चिकित्सा" के बारे में कोई राय कायम नहीं कर पाया तो तंत्र-मंत्र जैसी गहरी बात के बारे में अभी शैशव अवस्था के कारण क्या बता पाएगा। TSALIIM का कठमुल्ला तबका येनकेन प्रकारेण साइंस की आड़ में इस्लामिक सोच को सबके भीतर घुसाने में भी जुटा है ये विषय वैसे तो अलग है लेकिन मजारों और दरगाहों की तारीफ़ें भी इसी समूह द्वारा लिखी जा रही हैं इन जगहों पर कौन सी साइंस है ये कोई इस राक्षस से पूछे। वैसे इस दुकान से जुड़े लोग एन।जी।ओ। लाबी के वो लोग हैं जिन्हें किसी भी तरह जुगाड़ बना कर सरकारी भ्रष्टाचार से बहती कालेधन की गंगा में डुबकी मारनी होती है
सूफ़ी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह बन रही है मिसाल

काले साए : आत्‍माएं, टोने-टोटके और काला जादू ... Kaale Saye, Aatmayen, Tone-Totke aur Kala जादू

इस आलेख का लेखक डा।यतीश अग्रवाल(जैसा कि बताया गया है कि अब जैन अग्रवाल, अगरवाल, अग्गरवाल आदि सरनेम लिखने लगे हैं) भी जैन हो सकता है। प्रकाश गोविन्द जी अपने नीचे के बालों के कटवाने(उखड़वाने) से लेकर लिफ़ाफ़े में भर कर पता लिखने और डाक के डिब्बे में डालने तक का वीडियो बनवाएंगे इस बात का पूरा यकीन है लेकिन अगर बालों में मिलावट करी गयी तो इसे डी एन ए परीक्षण से जांचा जाएगा इस बात को इसी क्रम में रखा जाए।
जय जय भड़ास

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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी की माता जी की रहस्यमय हत्या पर एक बुजुर्ग भड़ासी का शक-शुबहा

बुधवार, 12 जनवरी 2011

इस रहस्यमय नृशंस हत्या के खुलासे की पहली कड़ी- भाग १

जिन्हें ये हत्या मात्र मनगढंत कहानी लग रही है वे इस दूसरी कड़ी को भी पढ़ें- भाग-२

डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 3
डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 4

डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 5

अब जबकि तकनीकी तौर पर इस बात को समझ लिया गया कि इन पपीते के फलों में तंत्र-मंत्र की सामग्री बाहर से नहीं घुसाई गयी है तो अब आगे क्या करा जाए। ये विचार-विमर्श चल ही रहा था तो उस सिर फाड़ देने वाले दुर्गंधित माहौल में अचानक हमारे वरिष्ठ बुज़ुर्ग भड़ासी जनाब मोहम्मद उमर रफ़ाई प्रकट हुए। ये सब तमाशा देखने के बाद उन्होंने भी इस बात को सबसे पहले तो सिरे से खारिज़ कर दिया कि ये सब बस हाथ की सफ़ाई है एक ट्रिक मात्र है। जनाब रफ़ाई साहब ने अपनी लगभग पिचहत्तर साल की उम्र में काफ़ी दुनिया देख ली है और न जाने कितने इस तरह के जादू दिखाने वालों से दो चार हो चुके हैं। उन्होंने भी अपनी गिद्ध जैसी आँखों से हर सामान को बहुत बारीकी से देखा। बाल की खाल निकालने के लिये सुन्नी इस्लामिक महफ़िलों में "बम" के नाम से कुख्यात जनाब रफ़ाई ने सारी सामग्री को देखा उसके बाद हम सबने अपने साइबर फ़ॉरेन्सिक एक्सपर्ट दोस्त की सलाह से अपनायी गयी उस कम्प्यूटर तकनीक को भी उन्हें दिखाया। चूंकि वे खुद भी एक पढ़े लिखे कॉन्वेन्ट शिक्षित व्यक्ति और एक टैक्निकल सोच वाले व्यक्ति हैं और खुद भी ब्लॉगिंग करा करते हैं तो तमाम बारीकियाँ जानते समझते हैं। सब कुछ देखने के बाद वे भी करीब एक घंटे तक माथे पर उंगली रखे सब देखते विचारते रहे लेकिन कुछ भी समझ पाने में असमर्थ रहने के बाद वे भी इस बात को मानने के लिये मजबूर हो गये कि ये कोई ट्रिक नहीं है बल्कि हकीकत है कि ये सारा सामान पपीतों के भीतर से ही निकला है।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 4

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

इस रहस्यमय नृशंस हत्या के खुलासे की पहली कड़ी- भाग १

जिन्हें ये हत्या मात्र मनगढंत कहानी लग रही है वे इस दूसरी कड़ी को भी पढ़ें- भाग-२

डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 3
गत पोस्ट से आगे......
तांत्रिक के कई बार मना करने पर भी कि आप खुले हाथों से इस मारण कर्म की सामग्री को न छुएं अन्यथा इसका आपको गम्भीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है, हमारे अवतार स्वरूप डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी एक एक वस्तु को कैमरे के सामने रखते दिखाते जा रहे थे। इसके बाद जब उस तांत्रिक ने सब निकालने के बाद देवी के बनाए हुए विग्रह के सामने हवन करा और शेष हवन सामग्री को छोड़ते हुए कहा कि आप सभी लोग क्रमशः अग्नि में हव्य डालते हुए सामग्री समाप्त कर दें। देवी के विग्रह के पास रखे हुए फल मेवा आदि को प्रसाद के रूप में अगले दिन बाँटने की हिदायत देकर तांत्रिक चला गया लेकिन जाते जाते ये कह गया कि देखिये मैंने आपके कहने पर जो भी हो सकता था करा लेकिन माताजी के लिये करे गये मारण कर्म में निर्धारित मुद्दत समाप्त हो चुकी है। अब जब बाकी लोग सन्नाटे में थे तो हमारे डॉ.साहब ने मुनव्वर आपा को कैमरा पकड़ा कर बाल्टी में भरे सामान को दोबारा एक-एक करके निकालना शुरू कर दिया और साड़ी के उस टुकड़े को पूरा खोल डाला जो कि पपीते में से निकला था उसकी लम्बाई लगभग डेढ़ मीटर के आसपास थी ब्लाउज की आस्तीनें जो लिपटी हुई रखी थी वो भी खोल डाली। पपीते के उन काटे हुए टुकड़ों को हर तरह से मैग्नीफ़ाइंग लेंस से भी देखा कि कहीं ये टुकड़े पहले काट कर चिपकाए हुए तो नहीं थे। बहरहाल जब उन्होंने नग्न आँखों और लेंस से देखने पर भी कुछ न पाया तो दोबारा सब समेट कर उसी बाल्टी में भर दिया।
इसी बीच जब डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी के बड़े भाईसाहब ने उस सभी तांत्रिक सामग्री की बाल्टी को बाहर ले जा कर फेंकने के लिये उठाया तो अचानक झटके से छोड़ दिया और पलट कर पीछे देखा क्योंकि उन्हें लगा कि किसी ने उनकी कमर पर एक जोर से लात मारी हो। जब वहाँ मौजूद लोगों नें पूछा कि क्या हुआ तो उन्होंने बताया कि ऐसा लगा कि किसी ने कमर पर लात मारी और आश्चर्य कि देखने पर बाकायदा उनकी कमर पर जूते के सोल का निशान छपा हुआ था जिसकी तस्वीर डॉ.साहब ने तुरंत ली और भाईसाहब व अन्य किसी को भी उन वस्तुओं को हाथ लगाने से मना कर दिया। स्वयं डॉ.साहब उस बाल्टी को लेजाकर कूड़े के ढेर पर दूर जाकर फेंक कर आए। घर में डर, आश्चर्य, इस बात की खुशी के शायद समस्या हल हो गयी है ये सारे भाव तैर रहे थे।
शेष जल्द ही आगे की सच्चाई.......
लेकिन देखिए कि सच्चाई सामने आने से राक्षसों में डर छा गया है इसलिये वे हमें इस बात से हटाने के लिये कभी उल्टी सीधी पोस्ट लिखते हैं और कभी ऊटपटाँग कमेंट्स करते हैं यानि हम सही दिशा में इन दुष्टों को पकड़ रहे हैं।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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क्या सचमुच भड़ास के संचालक भाई रजनीश झा का भड़ास से उच्चाटन हो गया है??

बुधवार, 15 दिसंबर 2010



कुछ दिन पहले मैं भाई रजनीश झा के संबंध में लिखा था कि वे भड़ास से काफ़ी समय से गायब हैं आखिर हुआ क्या जबकि उनके निजी ब्लागों अनकही और आर्यावर्त आदि पर बराबर वे लिख रहे हैं। इस पर भी उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी यानि कि शायद वे भड़ास पर विजिट भी नहीं कर रहे हैं। यदि विजिट कर रहे भी हैं तो उनका मन अब इस तरफ से हट चुका है। अनूप मंडल के अनुसार ये तंत्र-मंत्र के अनुसार उच्चाटन का प्रयोग का असर है जिसके कारण भाई रजनीश झा जैसा तेज-तर्रार भड़ासी भड़ास के मंच से हट गया हो। डा।रूपेश श्रीवास्तव जी की माता जी की रहस्यमय हत्या के बाद अनूप मंडल के लोगों ने जो लिखा और अब भाई रजनीश झा जी का भड़ास से इस तरह विमुख हो जाना घोर आश्चर्य का विषय है। ये तो एक जादू ही है कि भड़ास की बुनियाद से जुड़ा व्यक्ति ही भड़ास से विमुख हो जाए। लेकिन इस सब के लिये जो भी जिम्मेदार है वो सावधान हो जाए क्योंकि अब तो भड़ासियों का उगालदान उस पर खाली होने वाला है। ईश्वर भाई रजनीश झा जी को स्वस्थ व प्रसन्न रखे और मायाजाल से तत्काल बाहर निकाले ऐसी प्रार्थना है।
जय जय भड़ास

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डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग ३

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

इस रहस्यमय नृशंस हत्या के खुलासे की पहली कड़ी
जिन्हें ये हत्या मात्र मनगढंत कहानी लग रही है वे इस दूसरी कड़ी को भी पढ़ें
अब आगे.....
बड़े भाईसाहब ने जब उन लटकाए हुए पपीतों को तांत्रिक के कहने पर उतार कर उसे दिया तो बताया कि इन पपीतों का भार अधिक लग रहा है। तांत्रिक ने पूजा आदि का विग्रह सजा कर हल्दी के चूर्ण से एक वृत्ताकार मंडल बनाया जिसमें रख कर उसने पपीतों पर बंधा लाल कपड़ा खोला और एक एक करके उन्हें घर के चाकू से ही काटा। पपीते काटने पर बीजों के अलावा क्या निकलेगा ये तो उम्मीद ही न थी लेकिन जब पहले पपीते में से साड़ी का एक तिहाई टुकड़ा, करीब दो सौ ग्राम सूखी लाल मिर्चें आदि जैसी सामग्री निकली तो सभी लोग भौचक्के रह गये जबकि खुद डा.रूपेश श्रीवास्तव क्लोज-अप मैजिक यानि नजदीक से दिखाए जाने वाली जादुई ट्रिक्स के बारे में काफ़ी कुछ जानते हैं, नारियल मे से देवी मां का वस्त्र, समूचा अंडा आदि निकाल लेने जैसी ट्रिक्स वे स्वयं बहुत सफ़ाई से कर लेते हैं क्योंकि वे बहुत दिनों तक अंधश्रद्धा निर्मूलन के लिये काम करते रहे हैं। इसलिये जाहिर सी बात है कि उनके आगे कोई हाथचालाकी करना तो लगभग असंभव है। सबसे बड़ी बात है कि इस पूरी घटना को वे स्वयं इन बातों पर सहज विश्वास न होने के कारण कैमरे में बिना रुके कैद करते जा रहे थे जिसकी बिना किसी कट के पूरी लगभग पौने घंटे की वीडियो उनके पास मौजूद है जिसे हम सभी अनूप मंडल के लोगों ने पच्चीसों बार संदेह करते हुए देखा है कि शायद कुछ पकड़ में आ जाए। दूसरा पपीता तांत्रिक ने काटा तो उसमें से बकरे की घुटनों से काटी हुई चार टांगें, दो अंडे, दो शंख जिनके मुंह बालों के गुच्छे से बंद करे गए थे,ब्लाउज की दो काटी हुई आस्तीनें, अगरबत्तियां आदि सामग्री निकली। डा.साहब और बहन भारती जी के अनुसार इस पूरे काम के दौरान कमरे में ऐसी गंध विद्यमान थी जैसे कि मांस के जलने पर आती है जिसके कारण उन्हें भयंकर उल्टी सी आ रही थी। तीसरा पपीता काटने पर उसमें से कुछ हड्डियां, दो लाल कपड़े और लकड़ी से बनाई गुडियानुमा आकृतियां, दो नींबू जिनमें कि पचास साठ आलपिनें चुभोई हुई थी आदि निकली। तांत्रिक इस सारे सामान को बिछाए हुए पुराने अखबार पर आक(मदार) के पत्तों से पकड़-पकड़ कर रखता जा रहा था और उसके बार बार मना करते रहने के बावजूद हमारे डा.रूपेश जी उस सामान को एक एक उठा कर अपने कैमरे के लैंस के बिलकुल पास लाकर दिखा रहे थे ताकि सब देख सकें कि क्या सामान है।
शेष आगे लिखेंगे ये सत्य आपके सामने अवश्य लाया जाएगा................
इस पूरी घटना के विस्तार से लिखने के पीछे एक महत्तम कारण है कि महाशय तारकेश्वर गिरी जी जैसे लोगों का ये भ्रम दूर करा जा सके कि आंखे और बुद्धि उनके अलावा अन्य लोगों के पास भी हैं। अनूप मंडल और भड़ास परिवार ने आजतक जो भी करा और कहा है वह आधारहीन,तथ्यहीन व तर्कहीन नहीं रहा है। यदि किसी भी स्वयंभू विद्वान या बुद्धिमान में सत्य को स्वीकारने का साहस है तो भड़ास के मंच पर आकर इस विषय पर विमर्श करे कि जादू-टोना है या नहीं।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग २

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

पिछले आलेख से आगे की रहस्यमय हक़ीकत पढ़िये जो स्वयं भड़ास के संचालक डॉ.रूपेश श्रीवास्तव पर बीती है .........
तांत्रिक ने कहा कि तीन पपीते ले आइये जिनका वज़न चार किलो के आसपास हो यानि कि पर्याप्त बड़े हों। जाहिर सी बात है कि इतने बड़े पपीते सामान्यतः नहीं मिलते लेकिन हमारे महाभड़ासी डॉक्टर साहब के क्या कहने वाशी नई मुंबई के फल बाजार में जाकर कम से कम पच्चीस ट्रक छान मारे और तीन की बजाए छह पपीते लाकर रख दिये। अब उस तांत्रिक ने कहा कि आप पपीते लेकर मेरे घर आ जाइये मुझे उन फलों पर कुछ मंत्र पढ़ने हैं। दिन में साढ़े ग्यारह बजे से लेकर शाम साढ़े पाँच बजे तक पपीते उस तांत्रिक के घर रखे रहे। डॉ.रूपेश जी स्वयं अपने बड़े भाईसाहब के साथ इस काम में पूरे समय साथ रहे। शाम को पपीते लेने जाने पर डॉ.रूपेश ने आशंका व्यक्त करी कि भाई हो सकता है कि उसने कुछ कलाकारी कर के फलों के अंदर कुछ घुसा दिया हो लेकिन जब वे उसके घर पहुंचे तो उन्होंने पाया कि जिस तरह वे पपीते रखे छोड़ आए थे वे फल उसी तरह रखे थे लेकिन पपीते लेकर आते समय कहा कि इनका दोबारा वजन करा लेते हैं क्योंकि हर पपीते का वजन तो हमें पता ही है। भाई साहब ने कहा कि अगर इन फलों को काट कर इनमें कुछ घुसाया गया होता तो दोबारा चिपका देने पर हाथ में लेने पर ही वजन में अंतर महसूस होता चलकर इन्हें घर में टाँगते हैं व्यर्थ संदेह करके तौलने में समय मत नष्ट करो। ये भी सही था कि हमारे हाथ इतना अंतर तो महसूस कर ही सकते हैं। घर लाकर एक आलमारी में पपीते कहे अनुसार लटका दिये। और तीसरे दिन शनिवार को उस बंदे ने आकर ये कह कर उन पपीतों को काटा कि जो भी किया-कराया होगा वह इन फलों में देवी माँ की शक्ति से आ जाएगा। तीन चार पढ़े-लिखे लोग जिनमें कि बहन भारती सक्सेना, वरिष्ठ भड़ासिन बहन मुनव्वर सुल्ताना जी, बड़े भाई श्री भूपेश श्रीवास्तव और स्वयं डॉ.रूपेश अपना कैमरा लिये मौजूद थे। तांत्रिक ने कहा कि देखिए माँ की प्राणरक्षा के विषय में जो कर रहा हूं उसका फलदायी होना भगवान के हाथ है क्योंकि करे हुए मारण तंत्र की मुद्दत छह माह की थी जो कि कोजागिरी पूर्णिमा को समाप्त हो चुकी है अब सब कुछ ईश्वर के हाथ है। उसने पूजा-पाठ करते हुए तीनों पपीते भाईसाहब को लाने के लिये कहे जिन्हें भाईसाहब ने जब उतारा तो बताया कि इनका भार तो अधिक महसूस हो रहा है.............
आगे जानिए कि क्या हुआ इस पूरी प्रक्रिया में जो राक्षसी कर्म थी
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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