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अचानक किसी बेनामी को बूढी माई की चिंता होने लगी

बुधवार, 15 जून 2011


अचानक किसी बेनामी को बूढी माई की चिंता होने लगी और मुझे सलाह दी जा रही है | बेटा / बेटी जब तुममें इतना साहस नहीं है की तुम अपनी पहचान के साथ पधार सको तो क्या उम्मीद करी जा सकती है हो सकता है की तुम ही वो नीच औलाद हो जो आठ महीने बाद अपनी माँ की तस्वीर भड़ास पर देख कर अब ये जानना चाहता है की वो जीवित है या मर गयी | अरे तुम मुझे बता रहे हो की मैं रेलवे या पुलिस को सूचना दे सकता था लेकिन उसकी जगह कलम घसीट रहा हूँ | मैं क्या हूँ और क्या करता हूँ क्या कर सकता हूँ ये अगर जानना है तो अपनी पहचान बता दो और मुंबई कर देख लो पता चल जायेगा की आजकल की महानगर की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में मुंबई में रह कर मैं जो कर रहा हूँ उसे लोग चूतियापा क्यों कहते हैं समझ में जाएगा | अरे हाँ यदि एक हालिया चूतियापे का ताज़ा नमूना देखना है तो हमारी वरिष्ठ भड़ासी बहन मुनव्वर सुल्ताना के ब्लॉग "लंतरानी" पर देख लो लेकिन तुम्हारी परेशानी है की तुम उर्दू नहीं पढ़ पाओगे की मैंने कई दिन से एक व्यस्त इलाके में सड़ती हुयी एक अनजान इंसान की लाश के लिए पुलिस को सिर्फ बुलाया बल्कि धंधे पर भी लगाया | कई घंटे लगे और पुलिस स्टेशन भी कई बार जाना हुआ लेकिन तुम्हे इससे क्या जिसकी अपनी पहचान तक बताने में फट रही है
अरे गधे! कितने रेलवे के अधिकारी और पुलिस वाले मुंबई में ऐसे लोगों की देखरेख कर रहे हैं जो इन माई की करने लगते तेरे जैसे सभ्य सब लोग नहीं रह गए जो मुँह छिपा कर सभ्यता का पाठ पढ़ाएं। हम सब तो असभ्य हैं लेकिन जो करते हैं सबके सामने चाहे तेरी मरम्मत या मजलूमों से प्यार....
जय जय भड़ास

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कोल्हापुर में पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र में टीवी नहीं होगा शायद.....

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

कोल्हापुर में पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र में प्रशिक्षु लड़कियों के साथ जो हुआ वह एकदम गलत हुआ। इतनी सारी लड़कियों के गर्भवती होने की बात से क्या प्रमाणित होता है? बस एक बात कि प्रशिक्षु लड़कियां और जिन्होंने ये सु(अर)कर्म करा है वे पदों पर रहने योग्य नहीं हैं। इसलिये नहीं कि छोरियां गर्भवती हो गयीं बल्कि इसलिये कि टीवी पर दिन भर में "गलती" हो जाने के बाद के मामले के बार में सैकड़ों बार बहत्तर घंटों के भीतर ले ली जाने वाली गोली और वो फ़ुग्गे जो कि कभी कभी बड़ों की गलती से बच्चों के हाथ में आ जाते हैं किस काम के हैं? ये गलत बात है कि इन प्रशिक्षार्थियों और उनके प्रशिक्षकों को इतनी सी बातों की जानकारी नहीं है। खामखां ही इतना नाटक हो गया न अगर टीवी देखा होता तो ऐसी गलती नहीं होती। सभी भड़ासियों को चाहिये कि यदि इस तरह के लोग मिलें तो उन्हें टीवी देखने की सलाह दे दें। कई बार तो ऐसा भी हो जाता है कि जब तक चल रहा है तो चल रहा है लेकिन जब पकड़ गए तो घटना को बलात्कार कह दिया जाता है और बेचारा मर्द फंस जाता है अब मर्दानगी इस तरह के लिये नहीं तो भला किस काम आएगी।
धिक धिक धिक धिक्कार है
जय जय भड़ास

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प्रिय भड़ासियों! भड़ास पर प्रतिबंध की हार्दिक शुभेच्छाएं

सोमवार, 27 जुलाई 2009

प्रिय भड़ासियों! धूर्त लोगों ने आजकल ये दस्तूर बना लिया है कि जो सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस कर रहा है उसको खामोश करने का हर संभव प्रयास करो। यदि उनका कमीनापन कहीं भी जगजाहिर करा जाए तो उसे किसी भी तरह मिटा दो चाहे सत्य बताने वाले को ही खत्म करना पड़े। भड़ास ने भी बहुत बुरे समय को झेला है, तिरस्कार और बहिष्कार से हमें रोकने की कोशिश करी गयी हैं लेकिन "कुछ तो जरूर बात है कि हस्ती नहीं मिटती सदियों से रहा है दुश्मन दौर-ए-जहां हमारा" ये तो हमारे लिये नयी ऊर्जा का कार्य करता है। हमारे लिये भड़ास मात्र इंटरनेट पर एक ब्लाग नहीं बल्कि जीवनशैली है। हमने इस पर तमाम मुखौटाधारियों के असली चेहरे उजागर लोकतांत्रिक तरीके से करे और जिसके बदले में हमें मारपीट,धमकियां,पुलिस लाक अप की सैर तक झेलना पड़ा पर हम भला क्यों बदलने चले... सबकुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी सच है दुनिया वालों की हम हैं अनाड़ी..... ये गाना गुनगुनाते पुलिस वालों से भी पूछते रहे कि भाई क्या तुम जानते हो कि धर्मवीर कमीशन की रिपोर्ट किस संबंध में है। पुलिस वालों के कहने पर उन्हे बताया कि भाई लोगों ये कमीशन पुलिस की स्थिति की समीक्षा करके सुझाव देने के विषय में था और अब सुप्रीम कोर्ट के साथ ही भारत सरकार(ये आज तक न समझ आया कि कौन और क्या है?) उस आयोग की रिपोर्ट में कही गयी बातों को मानने में भयभीत है या राम जाने क्या बात है। बेचारे खाकी मामू-मुमानी जो थोड़ी देर पहले तक गरिया रहे थे चुपचाप भड़ास सुन रहे थे फिर अचानक पता चला कि हमें डरा-धमका कर छोड़ देने की बात थी मामला नहीं बनाना था सो बस इतनी खुराक हमारे लिये काफ़ी थी। हम चले भड़ास की आग लिये घर को वापस और बेचारे वो पुलिस वाले जो मुझे कल तक लतिया धमका रहे थे पछता रहे थे कि उनसे पाप हो गया एक गलत सिस्टम को मजबूरी लाचारी में फंसे होने के कारण। हमारे ऊपर इस तरह के प्रतिबंध लगाने का प्रयास जारी रहेगा लेकिन हम जुबान से नहीं दिल से बोलते हैं भड़ास धक-धक में धड़क रही है, शरीर मर सकता है विचार और जीवन शैली नहीं सो हम अजर-अमर हैं।
जय जय भड़ास

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जागो, देशवासियों, जागो!

बुधवार, 6 मई 2009

रूपेशजी, आज फिर कमेन्ट बॉक्स नही खुल रहा...!
आपकी टिप्पणी पढ़के मेरा हौसला बुलंद हुआ। इन मुद्दोंपे गहरायीसे चर्चा करके, एक ऐसी योजना बनानी चाहिए, जिसे हम कार्यान्वित कर सकें। घिसेपिटे कानों के बारेमे जनजागृती बेहद ज़रूरी है।
लोगोंको न्यायव्यवस्था और पुलिस इनका कार्य क्षेत्र और उसकी विरोधाभासी कार्य जान लेना अत्यन्त आवश्यक है। वरना हम एक blame गेम जारी रखेंगे...कुछेक को लगेगा कहीँ पे पुलिस ज़िम्मेदार है, कुछेक को लगेगा, राजनेता...

जबकि, अब सारी ज़िम्मेदारी जनताकी है। पिछले २९ सालोंसे उच्च तम न्यायलय का अवमान होता रहा है..इतनाही , उस commissionke बाद और कई commissions बैठे ...जो सब कुडेमे पोहोंचाये गए....
पिछले बम धमकोंके बाद सरकारने पुलिस force का आधुनिकीकरण करनेके लिए भारी बजेट डिक्लेयर किया...पुलिस का बजेट देशके अन्य बजेट्स के बनिस्बत ५९ वे क्रमांक पे था...और असलियत मे आर्मीका कई गुना बढ़ा और पुलिस का कम हुआ...जबकि देशकी आज़ादी के बाद आर्मी के बनिस्बत पुलिस वालोंके शहीद होनेकी संख्या १० गुआसे अधिक है।
पुलिस कर्मचारीको दरमाह रु.४,०००/- तनख्वाह है। अन्य कोई सुविधा नही। महानगर पालिका के स्वीपर को रु.१२,०००/- तनख्वाह है...
याद आ रहा है, कवि प्रदीप का लिखा, और गाया,वो अजरामर गीत:" हम लाये हैं तूफानसे कश्ती निकालके, इस देशको रखना मेरे बच्चों संभाल के...भटका न दे कोई तुम्हें धोकेमे डालके"।
वैसे तो सम्पूर्ण गीत ,उसकी हरेक पंक्ती आजतक उतनीही मायने रखती है, बल्कि, कई गुना ज़्यादा रखती है....
" बारूदके एक ढेर पे बैठी है ये दुनियाँ, ऎटम बमोंके ज़ोरपे ऐठी है ये दुनियाँ...".....
हम हमारा तिरंगा अवमानित होनेसे नही बचायेंगे तो और कौन???

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गज़ब कानून २

सोमवार, 4 मई 2009

गज़ब कानून...! २

गज़ब कानून..


जारी है, श्री शेखावत, भारत के माजी उपराष्ट्रपती के द्वारा दिए गए भाषण का उर्वरित अंश:
श्री शेखावतजी ने सभागृह मे प्रश्न उपस्थित किया," ऐसे हालातों मे पुलिसवालों ने क्या करना चाहिए ? कानून तो बदलेगा नही...कमसे कम आजतक तो बदला नही ! ना आशा नज़र आ रही है ! क़ानूनी ज़िम्मेदारियों के तहत, पुलिस, वकील, न्यायव्यवस्था, तथा कारागृह, इनके पृथक, पृथक उत्तरदायित्व हैं।

"अपनी तफ़तीश पूरी करनेके लिए, पुलिस को अधिकसे अधिक छ: महीनोका कालावधी दिया जाता है। उस कालावाधीमे अपनी सारी कारवाई पूरी करके, उन्हें न्यायालय मे अपनी रिपोर्ट पेश करनेकी ताक़ीद दी जाती है। किंतु, न्यायलय पे केस शुरू या ख़त्म करनेकी कोई समय मर्यादा नही, कोई पाबंदी नही ! "

शेखावतजीने ऐलानिया कहा," पुलिस तक़रीबन सभी केस इस समय मर्यादा के पूर्व पेश करती है!"( याद रहे, कि ये भारत के उपराष्ट्रपती के उदगार हैं, जो ज़ाहिरन उस वक्त पुलिस मेहेकमेमे नही थे....तो उनका कुछ भी निजी उद्दिष्ट नही था...नाही ऐसा कुछ उनपे आरोप लग सकता है!)
"अन्यथा, उनपे विभागीय कारवाई ही नही, खुलेआम न्यायलय तथा अखबारों मे फटकार दी जाती है, बेईज्ज़ती की जाती है!! और जनता फिर एकबार पुलिस की नाकामीको लेके चर्चे करती है, पुलिसकोही आरोपी के छूट जानेके लिए ज़िम्मेदार ठहराती है। लेकिन न्यायलय के ऊपर कुछभी छींटा कशी करनेकी, किसीकी हिम्मत नही होती। जनताको न्यायलय के अवमान के तहत कारवाई होनेका ज़बरदस्त डर लगता है ! खौफ रहता है ! "
तत्कालीन उप राष्ट्रपती महोदयने उम्मीद दर्शायी," शायद आजके चर्चा सत्र के बाद कोई राह मिल जाए !"
लेकिन उस चर्चा सत्रको तबसे आजतक ७ साल हो गए, कुछभी कानूनी बदलाव नही हुए।

उस चर्चा सत्र के समापन के समय श्री लालकृष्ण अडवानी जी मौजूद थे। ( केन्द्रीय गृहमंत्री के हैसियतसे पुलिस महेकमा ,गृहमंत्रालय के तहेत आता है , इस बातको सभी जानतें हैं)।
समारोप के समय, श्री अडवाणीजी से, (जो लोह्पुरुष कहलाते हैं ), भरी सभामे इस मुतल्लक सवाल भी पूछा गया। ना उन्ह्नों ने कोई जवाब दिया ना उनके पास कोई जवाब था।
बता दूँ, के ये चर्चा सत्र, नेशनल पुलिस commission के तहेत ( 1981 ) , जिसमे डॉ. धरमवीर ,ICS , ने , पुलिस reforms के लिए , अत्यन्त उपयुक्त सुझाव दिए थे, जिन्हें तुंरत लागू करनेका भारत के अत्युच्च न्यायलय का आदेश था, उनपे बेहेस करनेके लिए...उसपे चर्चा करनेके लिए आयोजित किया गया था। आजभी वही घिसेपिटे क़ानून लागू हैं।
उन सुझावों के बाद और पहलेसे ना जाने कितने अफीम गांजा के तस्कर, ऐसे कानूनों का फायदा उठाते हुए छूट गए...ना जाने कितने आतंकवादी बारूद और हथियार लाते रहे, कानून के हथ्थेसे छूटते गए, कितने बेगुनाह मारे गए, कितनेही पुलिसवाले मारे गए.....और कितने मारे जायेंगे, येभी नही पता।
ये तो तकरीबन १५० साल पुराने कानूनों मेसे एक उदाहरण हुआ। ऐसे कई कानून हैं, जिनके बारेमे भारत की जनता जानती ही नही।
मुम्बई मे हुए ,सन २००८, नवम्बर के बम धमाकों के बाद, २/३ पहले एक ख़बर पढी कि अब e-कोर्ट की स्थापना की जा रही है। वरना, हिन्दुस्तान तक चाँद पे पोहोंच गया, लेकिन किसी आतंक वादीके मौजूदगी की ख़बर लखनऊ पुलिस गर पुणे पुलिस को फैक्स द्वारा भेजती, तो न्यायलय उसे ग्राह्य नही मानता ...ISIका एजंट पुणे पुलिसको छोड़ देनेकी ताकीद न्यायलय ने की ! वो तो लखनऊसे हस्त लिखित मेसेज आनेतक, पुणे पुलिस ने उसपे सख्त नज़र रखी और फिर उस एजंट को धर दबोचा।
सम्पूर्ण

1 comments:

दास कबीर said...

हमारी न्यायव्यवस्था निरंकुश छुट्टे सांड़ की माफिक हो गई है, कार्यपालिका या विधायिका पर तो अंकुश है पर न्यायपालिका पर नहीं. कार्यपालिका और विधायिका के भ्रष्टाचार पर हम उंगली उठा सकते हैं लेकिन न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर न्यायालय की अवमानना हो जाती है

मुझे तो आश्चर्य है कि शेखावत एसा कहने की हिम्मत
कैसे कर पाये? न्यायालय के गलत कामों पर कोई भी कहीं भी बहस नहीं हो सकती

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश का बेटा उसी न्यायाधीश के घर से अपनी रीयल एस्टेट कंपनी चलाता है और वह न्यायाधीश बेटे को फायदा पहुंचाने के लिये दिल्ली में सीलिंग का कहर बरपा डालता है, अनेकों प्रभावित लोग आत्महत्या कर लेते हैं, उस न्यायाधीश के बेटे को आर्थिक फायदा होता है लेकिन कोई उस न्यायाधीश के खिलाफ कुछ भी कह नहीं सकता

मिड डे ने इस पर एक रिपोर्ट छापी थी, जिस पर उसके पत्रकार जेल भेज दिये गये और अभी भी न्यायालय की अवमानना का मामला भुगत रहे हैं,

डॉ. धरमवीर ICS , ने पुलिस रिफार्म्स के लिए क्या सुझाव दिये थे? क्या आप इस पर एक पोस्ट लिख सकते हैं?

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कहाँ हैं?

रविवार, 3 मई 2009

अपनी आखरी पोस्ट मे एक और बात का विमोचन करना भूल गयी...याद तब आयी जब, गुमशुदा बच्चों की तस्वीरें फिर एकबार दिखीं...इन गुमशुदा बच्चों के परिवार वालोंको उनकी वापसीका इंतज़ार नही होगा? लेकिन क्या कर सकते हैं? हमारे "शांतिप्रिय" देशमे मतदान कितने राज्यों मे "शांती" से होता है? गर होता तो, इतने सारे पुलिस कर्मियों की इलेक्शन ड्यूटी क्यों लगती?

हमारी इस अभूत पूर्व लोकशाहीमे मतदान बिना किसी अवांछित घटनाके हों, इसलिए पुलिस खाता दिनरात लगा हुआ है...लोगों से गाली खाता हुआ, कि, ये राजनेताओं की चमचागिरी है...खैर, राजनेताओं की सुरक्षाका इख्तियार पुलिसने ख़ुद होके नही लिया...ये क़ानूनी प्रावधान है...

लेकिन सोचें, ज़रा कि, जहाँ, इन गुमशुदा बच्चों को ढूँढ नेके लिए पर्याप्त मात्रा मे पुलिस नही है, वहाँ के मतदाता अपना कर्तव्य ना निभाके छुट्टी मनाने चले जाते हैं...! ऊपरसे पुलिसके लिए अपशब्द होते हैं...अपने गिरेबान मे झाँकने की कोई तकलीफ लेगा? क्या ये संदेश हर जगह फैलाया जा सकता है?

क्या पुलिसवालों को तीज त्यौहार मनानेकी इच्छा नही होती? क्या उनके बाल बच्चे नही होते? और गर भ्रष्टाचार के इनपे आरोप हैं,तो इनका क्रमांक भ्रष्टाचारीमे कितवां आता है, ये बात किसीको पता है? पता है,कि, प्रथम क्रमांक पे कौन है? पता है,कि, देशकी आज़ादीसे लेके अबतक, देशकी सेनाके ब-निस्बत, १० गुनासे अधिक, पुलिस करमी मारे गए हैं?
क्या फायदा हुआ इस पुलिस फोर्स की दिन रातकी मेहनतका जब हमारे मतदाता ही पलायन कर गए?

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सतीश देवाडिगा की तरह रफ़ीउद्दीन भी लापता एक जैसी मानसिक हालत है

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

रफ़ीउद्दीन

ये बच्चा भी दिनांक 29/03/2009 नई मुंबई,तुर्भे स्टोर्स से लापता है, उम्र बाइस साल और कद 5' फ़ुट2''इंच है, रंग गोरा है। शर्ट और लुंगी पहने हुए है मानसिक हालत एक छोटे बच्चे की तरह है। पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने पर जो होता है वही हो रहा है। जब भड़ास परिवार ने पुलिस से इस विषय पर जानना चाहा कि क्या प्रयास करे गये हैं तो एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर आफ़ द रिकार्ड बताया कि देखिये वैसे भी पुलिस बल की भारी कमी है और जो है तो वह चुनावी माहौल में बंदोबस्त में लगा है तो किसके पास समय है कि इस तरह के कामों में कूदे..... अपराधी किस्म के नेताओं की सभा में सुरक्षा में ही सारी पुलिस लगी रहती है। पर धन्य हैं हमारी शमा दीदी, जिनके प्रयासों से सतीश देवाडिगा के बारे में "आल कन्सर्न मैसेज" सभी जगहों पर भेजा जा चुका है अब देखें आगे क्या होता है। ईश्वर से प्रार्थना करिये कि ऐसे सभी बच्चे सुरक्षित हों व जल्द ही अपने परिवार से मिल जाएं।
संपर्क करें-
9833443772, 9892897804, ९९२०११४४८४

जय जय भड़ास

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सड़क दुर्घटनायें - पुलिस भी कम दोषी नहीं

सोमवार, 19 जनवरी 2009

रोज़ सुबह अखवार उठाओ तो दो चार सड़क दुर्घटनाओं की खबर तो अपने सहारनपुर के पृष्ठ पर ही पढ़ने को मिल जाती हैं।  कुछ दुर्घटनाओं का कारण कोहरा होता है पर अधिकांश दुर्घटनाओं के पीछे चालक की लापरवाही या तकनीकी खराबी बताई जाती है। आश्चर्य तो ये है कि इसके बावजूद भी हमारे यातायात नियंत्रक ऊंघते रहते हैं।

 

मैं अपने शहर में ही देखूं तो मैंने यही पाया है कि यातायात सुरक्षा के नाम पर महज खानापूर्ति की जाती है।  लाईसेंस चेक कर लो, इंश्योरेंस चेक कर लो, हेल्मेट चेक कर लो और बस कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है।  बहुत कुछ करने की इच्छा हुई तो यातायात सप्ताह मना लो। बच्चों से निबंध लिखवाओ, किसी हिंदी के अध्यापक से उन निबंधों को जंचवाओ,  फिर एक दिन बच्चों और बड़ों को सामने बैठा कर भाषण पेलो, विजेताओं को इनाम दे दो, अखवार नवीसों को बढ़िया सा नाश्ता करवा दो, फोटो खिंचवाओ, अपनी वाह वाही करवाओ और फिर उन निबंधों को कूड़े के डब्बे में सरका दो।  उन निबंधों में बच्चों ने क्या सुझाव दिये ये पढ़ने की न तो कोई जरूरत समझी जाती है और न ही उन पर अमल करने की चेष्टा होती है।  पुलिस अधिकारी मानते हैं कि वे खुद इतने ज्ञानवान हैं कि उनको किसी सुझाव की जरूरत नहीं है।  वह तो सिर्फ बच्चों को ज्ञान बांटने के लिये ये सब किया करते हैं।

  

 

किसी तेज़ गति वाहन का कभी चालान किया गया हो, ड्राइविंग करते हुए किसी वाहनचालक को मोबाइल पर बात करते हुए देख कर रोका गया हो, जुर्माना किया गया हो, स्कूटर, मोटरसाइकिल पर तीन, चार सवारियां लाद कर चलने पर किसी का चालान काटा गया हो, किसी ओवरलोडेड ट्रक या बस का चालान कटा हो, ऐसा मैने तो कभी देखा नहीं। रेलवे क्रॉसिंग पर बंद फाटक के नीचे से दुपहिया, तिपहिया वाहन निकाले जाते हैं, रोज़ सड़कों पर जानबूझ कर जाम लगाये जाते हैं। कोई पुलिसकर्मी इनको कभी रोकता, पकड़ता दिखाई नहीं देता।  हां, वाहन चालकों से अवैध वसूली करते पुलिस कर्मियों को रोज़ाना हर चौराहे पर देखा जा सकता है।


 

कभी किसी बड़े मामले में पुलिस सक्रिय हो भी जाये तो मामला कचहरी में जाकर दो तीन दशकों के लिये लटक जाता है।  अखवारों में इतने अपराधों की खबरें छपती हैं, कभी किसी अपराधी को सज़ा मिली ऐसी खबर पढ़ने को मन तरस जाता है।

 

हर कोई जानता है कि हमारे देश में वाहन चालक का लाइसेंस रिश्वत और दलालों की कृपा से घर बैठे बैठे बन कर आ जाता है।  गाड़ी की फिटनेस के लिये आर.टी.ओ. कार्यालय में रिश्वत देना पर्याप्त होता है - ऐसे में वाहन चालक का लाईसेंस या फिट्नेस चेक करने से क्या दुर्घटनायें कम हो जायेंगी?  क्या इन कागज़ों को चेक करना मात्र औपचारिकता नहीं है?  क्या भीड़ में, जाम की स्थिति में हैल्मेट दुर्घटना कराएगा या दुर्घटना से सुरक्षा करेगा? क्या पुलिस अधिकारी स्वयं को धोखा नहीं दे रहे हैं?  जो वो कर सकते हैं वह तो करते नहीं। तेज़ गति वाहनचालक को पकड़ सकते हैं, कभी नहीं पकड़ते।  गर्दन में मोबाइल दबा कर बतियाते मोटर साईकिल, स्कूटर, कार चलाते व्यक्तियों का मोबाइल जब्त कर सकते हैं पर नहीं करते।  ओवरलोड  वाहनों को सआ दे सकते हैं पर उनसे रिश्वत ले कर उनको छोड़ देते हैं।  लाइन तोड़ कर आगे निकल जाने की कुचेष्टा में दिन रात सड़कों पर जाम जैसी स्थिति बनी रहती है।  ऐसे लोगों पर दंडात्मक कार्यवाही हो सकती है, पर नहीं होती।  फिर दुर्घटनाओं को लेकर घड़ियाली आंसू बहाने और कर्तव्य परायणता का, जनहित का ढोंग किस लिये?

सुशान्त सिंहल     

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