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जो हिंदू हैं कृपया इसे न पढ़े क्योंकि उन्हें नष्ट होने का दुःख होगा

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

हाल ही में देश की जनगणना गयी जिसमें धर्म हिंदू,मुसलमान,ईसाई,बौद्ध और जैन प्रमुखता से नामांकित करे गए थे। जैनों ने खुद को हिंदुओं से अलग जता-बता दिया अब इस आधार पर राजनैतिक समीकरण तय होंगे। जैन अल्पसंख्यकों में बताए गए। बिल्कुल साफ़ है कि ये हिंदू नहीं हैं ये अल्पसंख्यकों को भारत सरकार द्वारा दिये जाने वाले सारे फ़ायदों को चुपचाप चूसते हैं लेकिन जब कहीं कोई इस तरह की परेशानी आती है कि इनकी अकूत सम्पत्ति पर जांच आदि करने की बात हो तो ये हिंदू बन जाते हैं और हिंदुओं को लड़ा देते हैं भोले हिंदू इन राक्षसों की लड़ाई लड़ने लगते हैं। "नवभारत टाइम्स" मुंबई में प्रकाशित इस खबर को देखिए..........
महानगर पालिका ने आदेश करे और जैनों ने हिंदुओं को भरमा दिया। ये राक्षस अपनी अकूत संपत्ति को बैंको में अधिकतर जमा नहीं करते इनका सारा लेनदेन इनके मंदिरों में छोटी-छोटी पर्चियों के माध्यम से होता है कदाचित ये बात किसी समझदार अधिकारी की नजर में आ गयी होगी लेकिन अब उसे झुकना पड़ेगा क्योंकि इन राक्षसों ने अपनी लड़ाई के लिये हिंदुओं की बलि चढ़ाने का माहौल बना दिया है।
हिंदू यदि अभी भी इन राक्षसों से सावधान न हुए तो एक दिन ये "जयति जिन शासनम" का नारा लगाने वाले, जिनों, नंगों के उपासक पूरी धरती के अर्थतंत्र पर काबिज होकर अपना राक्षसी शासन कायम कर लेंगे। ये ही हैं वे राक्षस जो कि मुस्लिमों में भी घुसे हुए हैं आप देख सकते हैं मुसलिमों में एक खास फ़िरके को जो कि सिर्फ़ व्यापार करता है और हर मुस्लिम जानता है कि वे कितने बेमुरव्वत होते हैं। अभी भी जाग जाओ हिंदुओ-मुसलमानों वरना आपस में लड़ कर खत्म हो जाओगे।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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जनगणना में रणधीर सिंह सुमन जैसे लाखों कम्युनिस्टों ने क्या धर्म लिखवाया है???

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

आप सबको ऐसा क्यों लगता है कि रणधीर सिंह सुमन से कम्युनिज्म पर, गुफ़रान सिद्दिकी से इस्लाम पर और जैनों से उनकी इंसान या राक्षस होने के बारे में सवाल करने का हक़ सिर्फ़ संजय कटारनवरे या अनूप मंडल को ही है। अरे भड़ासी भाईयों बहनों मेरे मन में तो ये सवाल अनूप मंडल की लेखनी के प्रभाव से उपजा है कि देश में जनगणना के फ़ार्म में धर्म का भी कालम है जिसमें कि हिंदू, मुस्लिम,सिख,ईसाई और जैन धर्मों के लिये अंक दिये हैं बाकी यदि आप बौद्ध, पारसी आदि हैं तो आप धर्म का नाम लिखवाइये। अब सवाल ये उठता है कि कम्युनिस्ट चाहे वे मार्क्सवादी हों लेनिनवादी हों या फिर माओवादी क्या इस जनगणना का बहिष्कार करेंगे या फ़ार्म पर अपना धर्म "इंसानियत" लिखवाएंगे(जो कि उनमें दिखावे भर की भी शेष नहीं रह गयी है बस मजदूरों के हक़ की बात करके खुद ही सारा खून चूस लेते हैं)
देश के सारे कम्युनिस्टों और उनकी पार्टियों से ये सवाल है, हम जानते हैं कि जो मुंहचोर हैं वे इस सवाल पर भी चुप्पी साध कर अपनी अपनी अम्मा से बाप का धर्म पूछने का बहाना करके भाग जाएंगे।
जय जय भड़ास

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पैसा मिले तो ये दलाल किस्म के लोग रंडियों का भी विज्ञापन लगा कर एडवर्टाइज़ कर सकते हैं

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

अभी कुछ दिन पहले मुंबई में एक गैर सरकारी संस्था जो मुस्लिम हितों का गाना गाते हुए प्रोफ़ेशनल मुस्लिमों की तरक्की की कोशिश में जुटी है उसने शिक्षा के क्षेत्र में धंधे की अधिक संभावनाएं देखते हुए एक फ़ेस्टिवल का आयोजन करा। कैरियर फ़ेस्टिवल2011 के नाम से तमाम मुसलमान व्यवसायी जुटा लिये गये दुकानें बाँट दी गयी, नोट छप गए इस पूरे कार्यक्रम को आर्थिक सहयोग देने वाली एक कंपनी थी जो कि सोने में इन्वेस्ट कराती है लेन-देन का काम करती है कुल मिला कर है बैंकिंग का धंधा लेकिन भारत सरकार को बेवकूफ़ बनाने का काम कर रही है(जो कि पहले से ही धूर्तों के हा में है)।
बच्चों के अच्छे भविष्य के नाम पर कैरियर-कैरियर का बाजा बजा कर इन लोगों ने अंजुमन इस्लाम,मुंबई द्वारा संचालित एक कॉलेज में ग्राउंड ले लिया, हॉल ले लिया लेकिन जब साइबर स्पेस में इनके मीडिया पार्टनर पर नज़र पड़ी तो देखा कि इनके मीडिया पार्टनर तो बिलकुल इनकी ही सोच के चुने हैं, इस वेबसाइट ने कुछ दिन तक इनका डाकटिकट के आकार का विज्ञापन लगा कर रखा लेकिन उससे बीस गुना बड़ा विज्ञापन इस वेबसाइट पर ऐसी वेबसाइट का लगा हुआ है जो कि जीवन में अकेली औरतों के द्वारा जीवन में रंग भरने और जोश जगाने का काम करती है जिसे आप चित्र में देख सकते हैं। पैसा मिले तो ये दलाल किस्म के लोग रंडियों का भी विज्ञापन लगा कर एडवर्टाइज़ कर सकते हैं।
सही है भाई क्या मुस्लिम प्रोफ़ेशनल्स औरतों के धंधे में नहीं हो सकते। अब अगर ये मुस्लिम प्रोफ़ेशनल्स मुनव्वर आपा की उर्दू वेबसाइट लंतरानी पर अपना विज्ञापन देते और उन्हें मीडिया पार्टनर बनाते तो गलत हो जाता आखिर "इनका इस्लाम" औरतों को बाहर आने की तक अनुमति नहीं देता और एक बात और कि विज्ञापन मुफ़्त में होता जिसमें ये मलाई नहीं खा पाते ;)
जय जय भड़ास

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धन्यवाद अमित जैन मानव-दानव विमर्श में तुम सही रास्ते पर आ रहे हो

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

हम सभी अनूप मंडल के सदस्य हृदय से भड़ास के मंच की पवित्रता और संचालकों को प्रणाम करते है। हम सब इतने समय से सतत प्रयास रत थे लेकिन कोई मार्ग नहीं बन रहा था कि हम किसी जैन को सीधे विमर्श में आमने सामने ला सकें। भड़ास ने वो मार्ग खोल दिया और अमित जैन के रूप में एक विचारवान जैन सामने आ गया। अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुसार उन्होंने पहले तो चिढ़ कर गाली-गलौज करी हमें तमाम उपमाओं से संबोधित करके अपनी कुंठा निकाली और फिर वही करा जो कि ये लोग सदियों से करते आ रहे हैं लेकिन सामने नहीं आ रहा था। इससे पहले तुमने अपनी राक्षसी प्रवृत्ति के चलते इस्लाम पर भी कीचड़ उछालने की कुचेष्टा करी है।
आप सब ने देखा कि जब हमने सत्यार्थ प्रकाश (स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित आर्य समाज का एक आदरणीय गृन्थ) का जिक्र करा तो अमित बौखला गये क्योंकि इससे पहले वे जानना चाहते थे कि किस जगह उन्हें सीधे "राक्षस" सिद्ध करा गया है। जब सत्यार्थ प्रकाश सामने लाकर उन्हें बताया कि आप साहस करके स्वामी दयानंद सरस्वती जी को भी चूतिया, गधा और कुत्ते का पिल्ला आदि कहने की हिम्मत करो तो उन्होंने तत्काल हिंदुओं की नस को पकड़ कर संग लेने की पलटी मार ली कि देखो देखो भाइयों स्वामी दयानंद ने तो पुराणों को भी गलत और बकवास बताया है। वेदों के बाद जब राक्षसों ने जान लिया कि मनुष्य अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिये अपने धर्मगृन्थों को ही आधार बनाते हैं तो ये राक्षस इस क्षेत्र में ऋषियों के वेष में भी घुस गए और मनुष्यों के आदरणीय देवी-देवताओं,पूर्वजों आदि के नाम पर ऐसे ऐसे मनगढ़ंत किस्से लिख कर प्रचारित कर दिये कि खुद देवताओं के वंशज मनुष्य भ्रमित होकर रह गए । अमित जैन ने तो मात्र एक ही पुराण की बात का जिक्र करा है हम कहते हैं कि आप शिवपुराण से लेकर विष्णुपुराण तक और लिंग पुराण से लेकर देवी पुराण तक उठा लीजिए सभी में ऐसी बेसिर-पैर की बातें मिलेंगी कि आप असहज हो जाएंगे लेकिन चूंकि आपके देवी-देवताओं के नाम से लिखी बातें हैं तो आप उन्हें तार्किक तौर पर स्वीकार न कर पाने पर भी श्रद्धावश माने रहते हैं लेकिन इसके चलते धर्म का स्वरूप विकृत होता चला गया।
सोचने की बात है कि वेदों को मानने वाले आर्यों में से विष्णु,शिव,राम,कृष्ण आदि की मूर्तियां पूजने वाले हिंदू कैसे उपज गये?? अवतारवाद का सिद्धांत कैसे समाज में प्रक्षेपित कर दिया गया?? निराकार प्रकाशस्वरूप बृह्म को मानने वाले(मुस्लिम भी नूररूपी एक अल्लाह को ही मानता है ये ध्यान दें जो कि क्रिस्तान भी मानते हैं यानि शुरूआती दौर में ये एक मत ही रहे हैं किन्तु बाद में इनमें भेद उपजाए गये हैं जो कि सप्रयास करे गए) थे।राक्षस सदा से ही स्वर्गरूपी धरती माता पर कब्जा करने को लालायित रहे हैं जिसके लिये ये इस तरह के जतन करते रहे हैं। इनकी माया समझ पाना इतना आसान होता तो आज हमें इतनी जद्दोजहद न करनी पड़ती।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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मामा से शादी करते हैं,उसके बेटे से शादी करते हैं और फिर भी हिंदू ही हैं

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

मेरे घर में एक काम वाली बाई आती है जो कि राजपूत बंजारी है। यही बाई हमारे डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी के घर भी झाड़ू-पोछे के लिये जाया करती है। एक दिन उसके साथ एक और महिला आयी जिसके संग एक छोटी बच्ची थी तो मेरी पत्नी ने पूछा कि बाई ये कौन है तो उसने कहा कि मेरी बहन है। बतिआते हुए काम करने की आदत में उसने बताया कि इसकी शादी मामा से हुई है। पहले तो हमें कुछ समझ में ही न आया जब मेरी पत्नी ने भी स्त्रियोचित तरीके से उससे पंचायत करना शुरू करा तो उसने बताया कि इसकी नानी इसकी सगी सास है यानि कि हमारी माँ के सगे छोटे भाई यानि हमारे मामा से इसकी शादी हुई है। ये सब सुन कर दिमाग घूमने लगा क्योंकि हम इस संबंध की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। कुछ लोगों से ऐसे रिवाजों के बारे में जानना चाहा तो पता चला कि मेरे आंध्रप्रदेश के एक मित्र के.यशवंत की पत्नी उसकी सगी छोटी मौसी है और महाराष्ट्र में तो मामा के लड़के से शादी सामान्य रिवाज है। ये सारे के सारे लोग हिंदू हैं। अब मुझे कोई ये समझाए कि क्या ये शादियाँ कानूनन जायज़ हैं हिंदू विवाह कानून के नियमानुसार? लोग सिर्फ़ मुस्लिमों को ही बोला करते हैं कि वे लोग रिश्तेदारी में ही शादियाँ करते हैं लेकिन इन हिंदुओं का क्या करा जाए???
जय जय भड़ास

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पत्रकारिता के विराट विवेक को संकुचित और कुंठित करने का गहरा षडयंत्र

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

इस छठवें W के कारण पत्रकारिता जिस तरह संकुचित होगी आप अंदाज भी नहीं लगा सकते। क्षेत्रीयता के आधार पर बने समाचार पत्र पहले ही स्थानिक भाषा बोल कर क्षेत्रवासियो की हितचिंता जता बता रहे हैं। स्थानीयता में पहले प्रदेश इसके बाद जिला और इसके बाद कस्बा और गली मोहल्ले तक में पत्रकारिता को संकुचित कर राष्ट्रीय सोच का गला घोंट दिया है। यह मात्र एक षडयंत्र नहीं तो और क्या है कि आपको पता ही न चले कि राष्ट्रीय स्तर पर क्या हो रहा है अपने आसपास की खबरें पढ़ कर ही आप खुश होते रहें कि कमाल की सक्रिय पत्रकारिता है। जरा इसका नमूना देखिये-- महाराष्ट्र टाइम्स, गुजरात समाचार, वाशी टाइम्स, पनवेल टाइम्स, खारघर टाइम्स, कल्याण टाइम्स, कुर्ला टाइम्स, तो इसी तर्ज पर गली-मोहल्ला छाप पत्रकारिता कुछ ऐसी होगी :- मलाहन टोला न्यूज़, सिमरिया चौराहा समाचार, दैनिक परांठेवाली गली खबर, बल्लीमारान-24 आदि आदि। यदि यही सिमटाव क्षेत्रीयता के आधार से होता हुआ जातीयता पर आ जाए तो कुछ अंदाज है कि क्या होगा लीजिये नमूने प्रस्तुत हैं- दलित टाइम्स, ब्राह्मण समाचार, दैनिक मोची टाइम्स, सांध्य भंगी खबर, शुक्ला टाइम्स, चमार समाचार, बनिया टाइम्स, दैनिक दुबे-चौबे, कायस्थ समाचार....... जैसा कि आपके सामने एक महाभयंकर उदाहरण है जैन टीवी का, क्या इसी तर्ज पर हिन्दू टीवी और मुस्लिम टीवी न बन जाएगा??? इसका क्या परिणाम होगा?? ये फूट डालो और राज करो की डलहौजी की दुष्टता पूर्ण नीति पत्रकारिता के विराट विवेक और मानवीयता का संकुचन कर रही है। अपने फ़ायदे के लिये रद्दी खरीदने से लेकर अखबार प्रकाशित करने वाले लालाजी अत्यंत कुटिलता से पत्रकारिता में पत्रकार व संपादक की नीर-क्षीर विवेकी सोच को इस छठवें डब्ल्यू की आड़ में कुंठित करके पत्रकार के स्थान पर क्लर्क और संपादक के स्थान पर मैनेजर सजाए दे रहे हैं। कुल मिला कर यह है बाजारवाद और पत्रकारिता का समीकरण।
जय जय भड़ास

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हम (अतीत के पन्ने से...........)

सोमवार, 11 मई 2009





दो अक्षर के बिना हम पुरे नही हो सकते, मैं (I) और (U)। और ये दो ही हमारे में भारतीयता का एहसास करते हैं।



जय हिंद



जय भारत।

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महिलाओं को गाली दे कर इस गाली की अपनी निजी परिभाषा देना..

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

आत्मन प्रशांत जी आप अभी भी तमाम सवालों के जवाब से बच कर यदि ये चाहते हैं कि मात्र आप मेरे ऊपर आरोप लगा कर कुछ अपने जैसी सोच वाले लोगों को अपने ब्लाग successbt.blogspot.com की तरफ़ आकर्षित कर लेंगे तो सीधी बात करने में कैसा घबराना? मुस्लिमों का विरोध मुझे दोगला कहना या महिलाओं को छिनाल कह कर इस गाली की अपनी निजी परिभाषा देना वगैरह.... इतना दिखावा करने की जरूरत नहीं है लेकिन कुछ लोग आपको जान सकें कि आप बहुत बड़े हिंदूवादी हैं इसलिये आपने ये सब करा मुझे कोई परेशानी नहीं है। लेकिन अगर सचमुच आप वैचारिक षंढ नहीं है तो तमाम लोगों के सवालों के क्रमबद्ध उत्तर क्यों नहीं देते जैसे कि भाई हरभूषण से लेकर अजय मोहन जी तक ने आपसे तमाम सवाल करें हैं चलिये अगर मैं मान लूं कि सारे मुस्लिम आतंकवादी होते हैं और कल इस्लाम कबूल कर लूं तो क्या ये तमगा आप कल ही मेरे गले में लटका देंगे या इंतजार करेंगे कि मैं कहीं बम फ़ेंकूं तब आतंकी कहेंगे? इस बात का उत्तर जरूर दीजियेगा। आपने छिनाल शब्द का अर्थ किस शब्दकोश से निकाला है या आप खुद शब्दों के नये अर्थ अपने हिसाब से लिख रहे हैं आशा है जल्दी ही आप अपना शब्दकोश तैयार कर लेंगे? प्रशांत बाबू आपका परिचय भड़ास से नया ही है वरना आप भाषा के संबंध में खुद समझ जाते कि हम सब उत्तर देना बखूबी जानते हैं आपने किस जगह पढ़ा था कि कर्ण ने भगवान को बाध्य करा था चक्र उठाने के लिये? इससे आपकी जानकारियों का तो पता चल ही जाता है कि आप भारतीय सभ्यता के कितने बड़े जानकार हैं अब मुझे भी संदेह हो रहा है कि आप या तो कहीं से इस दुराग्रह के लिये आर्थिक तौर पर समर्थित हैं या फिर मात्र प्रसिद्धि हासिल करने का एक सस्ता सा टोटका अपना रहे हैं। मैं आपकी पिछली पोस्ट में से वह शब्द हटा रहा हूं। अब हर पोस्ट में से गालियां ठीक वैसे ही निकाल दिया करूंगा जैसे कि किसी पित्त के रोगी को मसालेदार खाने से परहेज करना चाहिये तो ये आपके लिये पथ्य होगा, ये मेरा उत्तरदायित्त्व है। आप अपने निजी ब्लाग जिसे अब तक कोई नहीं जानता था जिसका कि आपने अब प्रचार करना शुरू करा है successbt.blogspot.com तो उस पर आप जितना चाहें गालियां लिखिये किसी को भला क्या आपत्ति होगी? ये तो एक चौपाल की तरह है जहां यदि आप अपशब्दों का प्रयोग करते हैं तो तत्काल आपको वहां से पिछाड़ी पर लतिया कर चलता कर दिया जाता है आप तो मेरी ही तरह ग्रामीण परिवेश से जुड़े हैं तो भली प्रकार जानते होंगे। आप मेरा "दोगलापन" भी अपने शब्दकोश के अनुसार स्पष्ट कर दें क्योंकि मुझे तो पता है कि दोगला शब्द "वर्ण संकर" के लिये प्रयुक्त होता है शायद आप के शब्दकोश में आपने नया अर्थ लिखा होगा कि दोगला यानि कि डा.रूपेश श्रीवास्तव,सहिष्णु,सहनशील,तुष्टीकारक इत्यादि...। बस इतना तो बताइये कि खुद को इतना बड़ा मानने के भ्रम में हो कि फांसी पर चढ़ा दो जैसी बातें लिखते हो तो क्या लगता है कोई फासी पर चढ़ा देगा, अरे मेरे भाई! उसके लिये बहुत बड़ा अपराध करना पड़ता है जो आपमें साहस नहीं है। अपना पता देने तक में तो सौ बहाने बना चुके हो,गाली लिख कर भी मुंहजोरी कर रहे हो लेकिन सजा के लिये तैयार नहीं हो बस इस लिये कि साहस नहीं है और खुद को कर्ण और भगत सिंह न जाने क्या क्या खुद ही गाल बजाए पड़े हो। देश में मौजूद सारी समस्याओं और देश ही क्या आपके खुद के क्षेत्र की सारी समस्याओं से बड़ी बात अगर आपको यह ही लगती है तो यही सही उन्हें आप इस ब्लाग पर लिखिये और गालियां व निजी दुराग्रह अपने ब्लाग पर लिखें किसी को कोई समस्या नहीं है। ध्यान रखना कि भड़ासी मुखौटे नोचने की मुहिम में हैं अगर आपने जल्द ही ये देशभक्ति के दिखावे का मुखौटा न उतारा तो फिर इस मुहिम में आपका भी मुखौटा उतारा जाएगा जैसे कि यशवंत सिंह और संजय सेन का उतारा जा रहा है। आप शायद सचमुच किसी भ्रम में हैं कि हम लोग लीचड़ होने की हद तक शरीफ़ हैं .... ये आपकी भूल हैं समय रहते सुधार लें वरना जिस सायबर कैफ़े से काम कर रहे हैं उसे ट्रेस करके आपका पता लगाने में कितनी देर लगती है फिर आराम से अदालत में अपने इस चिरकुट अपराध के लिये फांसी की सजा मांग लेना जज से; ठीक है न क्योंकि हम तो फांसी देने या सजा देने के लिये हैं ही नहीं। जिस मंच पर खड़े हो उसी पर आयोजकों को गाली दे रहे हो ये सिर्फ़ यहीं हो सकता है वरना पहले भी आपको बताया है न किसी ने कि बस एक क्लिक पर आप सायबर स्पेस में गायब हो जाते हैं फिर बांसगांव में किसी गली में खड़े रह कर डा.रूपेश को गालियां देते भी रहो तो कोई नहीं सुनेगा लेकिन अगर भड़ास पर दोगे तो कुछ लोग आपको जानने लगेंगे इसलिये एक सलाह है कि बेकार का ड्रामा बंद करो और मुझे ही गालियां लिखना शुरू करो काफ़ी प्रसिद्धि मिल जाएगी फिर जब लोग जानने लगें तो अपने ब्लाग पर स्वतंत्र लिखने लगना और भड़ास से अपनी सदस्यता समाप्त कर लेना।
जय जय भड़ास

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नफ़रत बनाम प्रेम : भड़ास की गांधीगिरी

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

भाईसाहब,हम सब चूतिया की सुपरलेटिव डिग्री के लोग है इसी लिये तो भड़ासी हैं यानि कि "चूतियेस्ट".... हमारी हड्डियां कैल्शियम फ़ास्फ़ेट से नहीं बल्कि ’चूतियम सल्फ़ेट’ नामक विचित्र रसायनिक पदार्थ से बनी हैं,हम सब इतने बड़े ढक्कन हैं कि हम इंसानियत की बात करते हैं हिंदू-मुस्लिम-सिख-इसाई जैसी महान बातें नहीं कर पाते लेकिन फिर भी अगर आप भड़ासियों का नामांकन बुकर एवार्ड के लिये करा रहे हैं तो इस फ़ेहरिस्त में सबसे पहले शामिल करिये भड़ास के दोनो माडरेटर्स श्री रजनीश के.झा और डा.रूपेश श्रीवास्तव को क्योंकि ये ही वो लोग हैं जो हम जैसे मुस्लिमों को इस मंच पर सम्मान सहित जोड़े हैं,अब तक आप भाई दीनबंधु और भाई अजय मोहन जी का नामांकन करवा चुके हैं कहीं ऐसा न हो कि आपके अलावा सब भड़ासी बकर-बकर बुकर-बुकर करते रहें और आप नामांकन ही कराते रह जाएं।
जल्दी सिख,इसाई,बौद्ध,जैन,पारसी जनों का भी विरोध करना शुरू करिये ताकि हमारे पास बुकर एवार्ड के लिए पर्याप्त मसाला एकत्र हो जाए वरना सिर्फ़ हिंदू-मुस्लिम की बात करने से शायद न मिल पाया तो समस्या हो जाएगी और मन में कसक रह जाएगी कि इतने धर्म हैं अगर कोशिश करते तो दस-बारह तो बुकर एवार्ड मिल ही जाते।
यदि आपके मन में सचमुच इतनी नफ़रत है तो क्या आपने देखा नहीं कि भड़ास के मंच पर तो कई मुस्लिम मौजूद हैं तो आप इस मंच से क्यों कर जुड़े हैं शायद ये आप भी नहीं जान सके हैं लेकिन सच तो ये है कि आप अपनी नफरत को खुद समझ नहीं पाएं हैं कि क्या सलीम, सुल्तान, सुलेमान जैसे नाम हो जाने से अगर कोई मुसलमान हो जाता है ये तो मात्र आपके पूर्वाग्रह हैं जो आपको बाध्य करते हैं ऐसा सोच पाने के लिये.......। आपकी सोच को अभी और विकसित होने की आवश्यकता है आप जितना नफ़रत की बात करेंगे हम भड़ासी उसे प्रेम में बदलने की कोशिश करेंगे और ईश्वर करे कि एक दिन हम कामयाब हो जाएं।
जय जय भड़ास

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हिंदी ब्लागिंग ने दिया हिजड़ा होने का दंड/भड़ास से लैंगिक विकलांग मनीषा नारायण सहित तीन की सदस्यता समाप्त

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008


वैसे भी मैंने जीवन में इतने दुःख तकलीफ़ और तिरस्कार को भोग लिया है कि अब तो यदि कुछ भी ऐसा हो तो कोई आश्चर्य नहीं होता लेकिन अब भी कहीं मन में कुछ मानवीय कमजोरियां शेष हैं जिनके कारण मैं कुछ स्थायी धारणाएं बना लेती हूं किसी भी व्यक्ति के बारे में, मुझे याद आते है वो दिन जब लगभग साल भर पहले मुझे भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव अपने घर लेकर आये थे किस तरह हाथ पकड़ कर कंम्प्यूटर पर जबरदस्ती बैठाया था मैं डर रही थी कि कहीं कुछ खराब न हो जाए। हिंदी कम आती थी बस कामचलाऊ या फिर हिंदी में दी जाने वाली गन्दी गन्दी गालियां। भाई ने टाइप करना सिखाया तो अजीब लगा कि अंग्रेजी के की-बोर्ड से हिंदी और तेलुगू व तमिल कैसे टाइप हो रहा है। एक उंगली से टाइप करी पोस्ट शायद भड़ास पर अभी भी अगर माडरेटर भाई ने हटा न दी हों तो पड़ी होगी, एक कुछ लाइन की पोस्ट टाइप करने में ही हाथ दर्द करने लगा था। लिखना सीखा, हिंदी सीखी लेकिन मौका परस्ती न सीख पायी। एक पत्रकार और ब्लागर मनीषा पाण्डेय के नाम से समानता होने के कारण भड़ास पर बड़ा विवाद हुआ जिसमें कि तमाम हिंदी के ब्लागर उस लड़की की वकालत और भड़ास की लानत-मलानत करने आगे आ गये। मैंने सब के सहयोग से अपना वजूद सिद्ध कर पाया। मैं लिखती रही, "अर्धसत्य" (http://adhasach.blogspot.com/) बनाया भाई साहब ने सहयोग करा। कुछ दिन पहले की बात है कि जब भड़ास के मंच पर एक सज्जन(?) ने डा.रूपेश श्रीवास्तव पर एक पोस्ट के रूप में निजी शाब्दिक प्रहार करा कि वे आदर्शवाद की अफ़ीम के नशे में हैं वगैरह...वगैरह। मैंने, भाईसाहब, मुनव्वर सुल्ताना(इन्हे तो भड़ास माता कह कर नवाजा जाता था) ने इसके विरोध में अपनी शैली में लिखा। अचानक इसका परिणाम जो हुआ वह अनपेक्षित था कि भड़ास पर से मेरी, मुनव्वर सुल्ताना और मोहम्मद उमर रफ़ाई की सदस्यता को बिना किसी संवाद या सूचना अथवा आरोप के बड़ी खामोशी से समाप्त कर दिया गया। इससे एक बात सीखने को मिली कि लोकतांत्रिक बातें कुछ अलग और व्यवहार में अलग होती हैं। माडरेटर जो चाहे कर सकता है इसमें लोकतंत्र कहां से आ गया, उनका जब तक मन करा उन्होंने वर्चुअली हमारा अस्तित्त्व जीवित रखा जब चाहा समाप्त कर दिया। मुझे अगर हिजड़ा होने की सजा दी गयी है तो मुनव्वर सुल्ताना और मोहम्मद उमर रफ़ाई को क्या मुस्लिम होने की सजा दी गयी है? यदि इस संबंध में भड़ास के ’एकमात्र माडरेटर’ कुछ भी कहते हैं तो वो मात्र बौद्धिकता जिमनास्टिक होगी क्योंकि बुद्धिमान लोगों के पास अपनी हर बात के लिये स्पष्टीकरण रेडीमेड रखा होता है बिलकुल ’एंटीसिपेटरी’..... वैसे तो चुप्पी साध लेना सबसे बड़ा उत्तर होता है बुद्धिमानों की तरफ से । आज मैं एक बात स्पष्ट रूप से कह रही हूं कि सच तो ये है कि न तो मुनव्वर सुल्ताना का वर्चुअली कोई अस्तित्त्व है और न ही मोहम्मद उमर रफ़ाई के साथ ही मनीषा नारायण का बल्कि ये सब तो फिजिकली अस्तित्त्व में हैं और वर्चुअली अस्तित्त्वहीन और न ही इनकी कोई सोच है अतः इन्हें किसी मंच से हटा देना इनकी हत्या तो नहीं है। मुझे और मेरे भाई को अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है शायद हो सकता है कि आने वाले समय में हम सब भी बुद्धिमान हो सकें और हिंदी ब्लागिंग के अनुकूल दिमाग और दिल रख सकें।
आदतन ही सही लिखूंगी जरूर
जय जय भड़ास

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अगर हिंदू पशुबलि दे तो कानूनन जुर्म और मुस्लिम क़ुर्बानी दे तो??????

सोमवार, 8 दिसंबर 2008




इस बात से बहुत से लोगों को मेरी दिमागी हालत पर संदेह होने लगेगा, कुछ लोग इसे हिंदू-मुस्लिम मुद्दे से जोड़ कर देखने लगेंगे। सबकी अपनी सोच है तो उसमें मैं अपनी सोच क्यों थोपूं....। आज बकरीद है और आप यकीन मानें कि लाखों जानवर आज कुर्बानी के नाम पर मार दिये जाएंगे। कहानी है कि एक इंसान को अल्लाह ने उसकी सबसे प्रिय वस्तु अल्लाह को देने के लिये कही और जब उस इंसान ने एक-एक करके सब प्यारी चीजें दे डाली और अल्लाह मांगता ही रहा तो अंततः उसने अपने बुढ़ापे की उम्र में पैदा हुए बेटे को ही अल्लाह को समर्पित करने के लिये ही कुर्बान करने के लिये उस बच्चे को जिबह करने के लिए जैसे ही अपनी आंखों पर पट्टी बांध कर छुरी चलायी तो कहानी कहती है कि उस बच्चे की जगह एक दुंबा(बकरा) आ गया और इस तरह वह इंसान अल्लाह के द्वारा ली जा रही आस्था की परीक्षा में सफल रहा। अरे मुसलमानों अगर इतने ही बड़े परंपरावादी हो तो अपने बच्चों को काटो न देखो कि तुम्हारी आस्था कितनी सच्ची है कि अल्लाह बच्चे की जगह बकरा रखता है या नहीं????
क्या ऐसी ही हजारों कहानियां हिंदू धर्म को मानने वाले वो लोग नहीं सुना सकते जो कि कालीमाता या कालभैरव वगैरह जैसे देवी देवताओं के मंदिर में पशुबलि देते हैं??????? आज जब देश में कानून बन गया है कि पशुबलि कानूनन जुर्म है तो फिर क्या आपको सीधे ही यह नहीं दिखता कि हमारे कानून बनाने वाले लोग भी कितने कांईया और धूर्त किस्म के रहे होंगे जिन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों में से मुस्लिमों को उनकी परंपराओं के आधार पर तुष्टिकरण के लिये अनेक जगहों पर इस तरह के दांवपेंच रखे हैं वैसे तो मुस्लिम पर्सनल ला ही मौजूद है लेकिन फिर राष्ट्रीय नागरिकता के आधार पर समानता किधर रह गई? महाराष्ट्र में बाबा साहब अंबेडकर को संविधान का निर्माता कहा जाता है क्या किसी भी बेवकूफ़ ने इस बात पर अंबेडकर महाशय से कोई सवाल नहीं करा होगा या वे खुद भी ऐसी ही सोच से सहमत थे???? मैं इन सवालों से सभी को कटघरे में खड़ा कर रही हूं यदि साहस है तो जिरह करें।
ये सुधार और बराबर नागरिक समानता कानूनी धरातल पर यदि चाहिये तो ये सब बंद करना होगा और संविधान में आमूल-चूल परिवर्तन करने होंगे। पशुओं को हिंदुस्तान ही नहीं सभी मुल्कों में धन माना गया है हिंदी में तो एक प्यारा सा शब्द भी है "पशुधन" जिसमें कि गोधन,गजधन,बाजीधन(बाजी घोड़े को कहा जाता है) शामिल हैं तो इसमें बकरे या दुधारू बकरियां कैसे शामिल नहीं हैं। पशु अत्याचार निषेध अधिनियम बना कर रखा है कि कुत्ते को डंडा मारा तो तीन माह की सजा, गधे पर अधिक बोझा लाद दिया तो सजा है लेकिन अगर बकरे को मार कर उसकी बोटी-बोटी खा गये तो कोई बात नहीं ये तो परंपरा है इसमें कानून क्या कर सकता है??? हास्यास्पद बात है ऐसे कानून की हिमायत करने वालों को तनिक भी लज्जा नहीं है कि इसमें सुधार की जरूरत है अब हिंदुस्तान को आदिम सोच से बाहर आना होगा।

जय जय भड़ास

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