कुछ तो सोचो
शनिवार, 13 जून 2009
दबा के कब्र मे, सब चल दिए ! दुआ, ना सलाम !
ज़रा सी देर मे, क्या हो गया जमाने को !
अपनी भड़ास को सीधे ही अपने ई-मेल द्वारा इस पते पर भेजिये bharhaas.bhadas@blogger.com
भड़ासी अपने चिट्ठों को यहां भड़ास के अपने एग्रीगेटर पर सूचीबद्ध करें अपने चिट्ठे का URL सीधे ही हरे रंग के प्लस(+)के चिन्ह पर क्लिक करके जोड़िये
दबा के कब्र मे, सब चल दिए ! दुआ, ना सलाम !
ज़रा सी देर मे, क्या हो गया जमाने को !
आदतन एक दिन "राम" शब्द सर्च इंजन में टाइप करके एक ब्लाग पर गया तो मैंने वहां एक टिप्पणी करी और उससे निकल कर एक और पाखंडी का चेहरा सामने आया जो भड़ास मंच पर आप सबकी नजर है। चित्र इसलिये ले लिए हैं ताकि आप सबको वहां जाना न पड़े।लेकिन अगर फिर भी आप जाना चाहें तो लीजिए लिंक प्रस्तुत है-
https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5799893798490696697&postID=5700027950689371873
हिंदी ब्लाग जगत के महाविद्वान सुरेश चिपलूणकर ने मेरे बारे में साइबर जगत में एक उनके निजी अनुभव का सच रखा है जिसे मैं पूरे सम्मान से भड़ास पर स्वीकार रहा हूं। इन तस्वीरों पर नजर डालिये।
ये लिखते हैं कि डा.रूपेश ब्लागर हो गया क्या? अरे ये २०-२० रुपए में खार, चौपाटी पर.... समझ गए न। मेरे बारे में बता रहे हैं कि मैं कहीं भी कपड़े उतारने लगता हूं। ये बात इन्होने सच लिखी मैं कहीं भी किसी के भी कपड़े उतारने लगता हूं लेकिन शर्त ये है कि वो पक्का पाखंडी होना चाहिए। ज्यादा बड़े हरामियों से २० रुपए जैसा शुल्क भी नहीं लेता उन्हें कहीं भी नंगा कर देता हूं चाहे वह किसी भी जगह पर सुअरपन कर रहे हों खार हो चौपाटी हो या उनका मौहल्ला हो या उनका घर , एक बात और जो सुरेश चिपलूणकर को पता नहीं है कि कपड़े उतारने के बाद नंगा करके भी भड़ासियों को संतोष नहीं होता तो उन हरामियों की चमड़ी भी उतार कर देखते हैं कि इन सुअरों की शराफ़त की खाल का खोल कितना मोटा है।
राजसिंह ने जिस तरह सम्मान से इस टिप्पणी को सजा रखा है उससे पता चलता है कि सुरेश चिपलूणकर उसे जो समझा रहा है वो भी उसी जमात का है जिसे कपड़े उतरवा कर प्रदर्शन करने का शौक है तो जैसा कि सुरेश ने तुम्हे बताया न कि मुझे कपडे़ उतारना अच्छा लगता है और जैसे सुरेश के उतारे थे जब वह, गिरीश बिल्लौरे और आशीष महर्षि वगैरह भड़ास से दुम दबा कर भागे थे ; तब ही अगर अपने जैसा बना पाता तो आज उसे ये दिन न देखने पड़ते।
अबे फटहे, शब्द प्रपंची! चिरकुट !! बौद्धिकता का जो तू गोबर हग कर सोचता है कि शराफ़त का खोल ओढ़े बैठा रहेगा और लोग तेरे नंगेपन को देख न पाएंगे तो देख अब मुझ पैदायशी नंगे बंदे के कपड़े उतारने की पसंद........ कैसे तुझे नंगा करके कपड़ों के साथ खाल उतारता हूं। राजसिंह! बेल्हामाई का पानी और प्रतापगढ़ की मिट्टी का लोहा मेरे खून में सफ़ेद रक्तकण बढ़ने नहीं देते। मेरा नाम: डा.रूपेश श्रीवास्तव, मेरा काम: कपड़े उतारना(भड़ास पर उनके जो शराफ़त का मुखौटा लगा कर "राम-रहीम" की आड़ में अपने कुकर्मों की दुर्गंध छिपा रहे हैं) , जिला-प्रतापगढ़, तहसील-पट्टी,पोस्ट-मुजाही बाजार, ग्राम-भुसहर। ध्यान रहे कि भड़ास हमारे लिये वेबपेज नहीं जीवन शैली है हम इसे आफ़लाइन भी जीते हैं। जिसे आजमाना हो तो जरूर बताए और सामने आए ताकि पता चले कि किसमें कितनी नंगई है और कौन मादरजात कपड़े पहन कर पैदा हुआ था।
जय जय भड़ास
अभी कुछ दिन पहले की ही बात है। पर्यावरण दिवस बड़े धूम-धाम के साथ मनाया गया। आप मुगालते में मत रहिये की इन गोष्ठियों और सभाओं से पर्यावरण को बचा लिया जाएगा। देश-विदेश के वातानुकूलित कमरों में इम्पोर्टेड फर्निचेर पर विराजमान होकर तथा कथित पर्यावरण प्रेमियों ने हरियाली को बचने की वकालत बांच डाली। आप सबको तो पता ही है की कथनी और करनी में उतना ही अन्तर है जितना पड़ोसी मुल्क की बातो में । इन मह्शयों को सब पता है की जिस इम्पोर्टेड फर्नीचर पर इन्होने अपने नकली शरीर को टिकाया हुआ है वह लकड़ी भी हरे जंगलों को काटकर ही लायी जाती है। खैर छोडिये जनाब ! ये दुनिया ही एक दिखावटी सब्जबाग के सिवा कुछ भी नही है। यहाँ जो दीखता है वाही बिकता है वाली कहावत फिट बैठती है। इधर ये नुमैन्दे पर्यावरण-वर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग -शर्मिंग पर भासन भिड़ा रहे उधर पुरी दुनिया पानी -पानी हुए जा रही है..अपने यहाँ तो कितनों ने पानी के लिए बाकायदा कत्ल तक कर डाला है । मगर इनको कौन समझाए ये तो बिसलेरी से कम कुछ गटकने को तैयार ही नही हैं। चलिए महाराज अभी अभी ख़बर मिली है की भगवान भास्कर जो की फ्री में पुरी दुनिया को उर्जा उडेले जा रहे हैं ने एक विज्ञापन निकला है । उन्होंने कहा है की अब रौशनी पर भी टैक्स लगेगा । जब तक लोग बकाया राशिः का भुगतान नही करेंगे तब तक सवेरा नही होगा। अब क्या था कोट-पैंट और ताई लगाये महापुरुषों ने फिर से बड़े बड़े होटलों में चर्चाएं सुरु कर दी । करोडो रुपये तो यु ही फूंक दिए गए सिर्फ़ योजनायें बनने में ..और नतीजा क्या निकला एकदम सिफर ! फिर वाही पुरानी परम्परा ही हमारे कम आई। कुछ बुजुर्गों और अच्छी महिलाओं ने भगवन सूर्य की उपासना की और उन्हें प्रसन्न करके टैक्स माफ़ करवा लिया ।
कहने का मतलब सिर्फ़ इतना है की सबसे पहले अपनी अन्तर-आत्मा में ईमानदारी से झांकना चाहिए। क्योंकि होता क्या है की हम करने कुछ जाते है और हमारे मन कुछ और ही चल रहा होता है। इससे अपना भला तो किया जा सकता है लेकिन इसकी कीमत औरों को चुकानी पड़ती है।
प्रिय मनोज द्विवेदी जी ,
लोकसंघर्ष हमारी पत्रिका का नाम है । यह पत्रिका त्रैमासिक उत्तर प्रदेश के जनपद बाराबंकी से प्रकाशित होती है । पत्रिका के सम्बन्ध में आए हुए ईमेल को देखने के लिए हम लोगो ने इन्टरनेट लगवाया और फिर अचानक एक दिन क्रिएट अ ब्लॉग पर माउस पहुँच गया और एक ब्लॉग लोकसंघर्ष के नाम से हम लोगो ने बना डाला और फिर कुछ दिन बाद कवितायेँ, लेख व लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित होने वाली सामग्री को भी पोस्ट के रूप में लोकसंघर्ष ब्लॉग पर प्रकाशित करना शुरू कर दिया । शुरुवाती दौर में उड़न तश्तरी ,श्यामल सुमन , डॉक्टर कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ,परमजीत बाली , अलबेला खत्री .कॉम आदि बहुत सारे टिप्पणीकारों ने अत्याधिक उत्साह बढाया और फिर इन लोगो की टिप्पणीयां आनी बंद हो गई , उसका मुख्य कारण लोकसंघर्ष ब्लॉग पर प्रकाशित आलेख हो सकते है । डॉक्टर रूपेश श्रीवास्तव , काशिफ आरिफ , कनिष्का कश्यप ने टेलीफोन से भी उत्साह बढाया । लोकसंघर्ष में डॉक्टर व अधिवक्ता मुख्य रूप से जुड़े हुए है । लोकसंघर्ष पत्रिका व लोकसंघर्ष ब्लॉग जनसंघर्ष को समर्पित है । हम लोग मुख्यता किसान समस्याओ के समाधान के लिए संघर्षरत रहते है । हम लोगो के हिस्से में कुछ बड़ी सफलताएं भी आई है जिसमें प्रमुख है किसानो की उपजाऊ जमीन का राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहण किया गया था जिसके ख़िलाफ़ तीन साल लगातार हम लोगो ने आन्दोलन चलाकर किसानो की जमीन का अधिग्रहण नही होने दिया । बाराबंकी सुगर फैक्ट्री जब बंद हुई तब गन्ना किसानो का 3 कारोंड़ 66 लाख बकाया था जिसको आन्दोलन के जरिये हम लोगो ने किसानो का भुगतान कराया । समय -समय पर विभिन्न समस्याओ पर हम लोग आन्दोलन चला कर समस्याओ के समाधान के लिए प्रयासरत रहते है । अमिताभ बच्चन व अमर सिंह ने हमारे जनपद के ही दौलतपुर गाव में फ्रोड करके जमीन हासिल की थी लेकिन जनता लिखा पढ़ी के कारण इन लोगो का फ्रोड हमारे जनपद में नही चल पाया है । हमारे जनपद में पुलिस द्वारा एनकाउन्टर नही होते है क्योंकि 99.9 % एनकाउन्टर फर्जी होते है कई बार एनकाउन्टर करने वाले पुलिस वाले जेल जा चुके है । किसान कर्जो व उत्पीडन के मामलो में जिला अधिकारी से लेकर लेखपाल तक निलंबित हो चुके है ।
हम लोगो के समूह के लोग कोई एन॰ज़ी॰ओ नही चलाते है । सरकार या किसी देशी-विदेशी संगठन से कोई मद्दद नही लेते है । जनता की समस्याओ का समाधान जनसंघर्ष से ही हो सकता है । हम लोग शब्दों के सौदागर नही है । जो कुछ भी है सीधा -सीधा है । ब्लॉग और टिप्पणी या इस सम्बन्ध में हम लोगो की जानकारी लगभग शून्य सी है ।हम लोग अपनी बात को ज्यादा से ज्यादा लोगो के सामने रखना चाहते है इसीलिए लोकसंघर्ष पत्रिका अव्यवसायिक तरीके से प्रकाशित कर रहे है ।हमारी पत्रिका में एडमिरल विष्णु भागवत , श्री सुभाष गताडे ,अनिल चमडिया ,मुद्राराक्षस ,निलोफर भागवत ,राकेश ,शकील सिद्दकी , सलीम अख्तर सिद्दकी ,डॉक्टर रूप रेखा वर्मा ,एस.आर दारापुरी ,तारिख खान ,अनिल राजिमवाले ,सीमा आजाद, महंत विनयदास तथा अंतर्राष्ट्रीय सुप्रसिद्ध लेखक नोम चोमेस्की के लेख प्रकाशित हो चुके है और भविष्य में भी प्रकाशित होते रहेंगे ।
श्रीमान जी आप के बहुमूल्य सुझावों की मुझे हमेशा आवश्यकता रहेगी । मुझे आशा ही नही पूर्ण विश्वाश है की आप लोगो का मार्गदर्शन मुझे प्राप्त होता रहेगा ।
सादर,
रणधीर सिंह 'सुमन'
प्रबंध संपादक
लोकसंघर्ष पत्रिका
निराधार सपने टूटे,
क्रंदन शेष रहा मन का ।
भ्रमता जीव ,नियति रूठी,
परिचय पाषाण ह्रदय का॥
लज्जित हो मेरी लघुता ,
कोई नरेश बन जाए।
अधखुली पलक पंकज में,
जगती का भेद छिपाए॥
आशा की ज्योति सजाये ,
है दीप शिखा जलने को।
लौ में आकर्षण संचित
है शलभ मौन जलने को॥
-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

=>अब्बू, देख लो भारत को । ये हमसे आजकल सीधे मुंह बात नहीं कर रहा है ।

=>बाप पादै न जाने, पूत शंख बजावै ।
मित्रों, दो दिन पूर्व दिलजले अमेरिकी विदेश उप मंत्री (श्री)(हालांकि ‘श्री’ लगाने जैसा काम तो कतई नहीं किया है इन्होंने) विलियम बर्न्स दिल्ली तशरीफ लाये । काहे को लाये ? इसलिए लाये क्योंकि अमेरिका की नाजायज़ गोद ली हुई औलाद नापाकिस्तान अचानक बिलख बिलख कर रोने लगी कि बापू मैं तो चांद खिलौना लूंगा । तो दिलजले विलियम बर्न्स ने दिल्ली में आते ही बेसुरा राग अलापा कि भारत को पाकिस्तान के साथ बिना शर्त वार्ता शुरू कर देनी चाहिए जो कि मुंबई हमले के बाद से रूकी हुई है ।
भारत का कहना है कि नापाकिस्तान पहले मुंबई हमले के कुसूरवारों के खिलाफ सख्ती से पेश आये और सीमा पार से भारत विराधी आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाये तभी बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ेगा । अभी हाल ही में लाहौर हाईकोर्ट ने मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को बाईज्ज़त रिहा कर दिया क्योंकि नापाकिस्तान सरकार ने उसके खिलाफ कोई सबूत अदालत में पेश नहीं किया था ।
ओबामा के राष्ट्रपति बनते ही अचानक अमेरिका क्यों हमारी विदेशनीति में हस्तक्षेप करने लगा ? क्यों अचानक पिछले एक महीने से वह सी.टी.बी.टी. का बेसुरा राग हमें जबरदस्ती सुना रहा है । अबे दहिजरा के नाती, पहले तुम ही क्यूं नहीं कर देते सी.टी.बी.टी. पर दस्तखत और जिस नापाक की इतनी शिफारिश कर रहे हो, अरबों डालर की भीख उसको हर साल देते हो, उसी से काहे नही सी.टी.बी.टी. पर दस्तखत करवा लेते । मित्रों, न्यूक्यिर डील के वक्त जो सबसे बड़ी शंका जाहिर की थी विपक्ष ने वो यह थी कि भारत देश की विदेश नीति को अमेरिका भविष्य में प्रभावित कर सकता है । अभी अप्रैल में वाशिंगटन से बयान आया था कि न्यूक्लियर डील भारत को सी.टी.बी.टी. की तरफ धकलेने के लिए बढाया गया पहला कदम है । मुबंई हमला भारत पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमलों में गिना जाता है । इसके जख्म अभी भरे नहीं हैं । नापाकिस्तान गुनाहगारों के खिलाफ कोई कार्यवाही करता दिख भी नहीं रहा ऊपर से ये हजरत तशरीफ ले आये हमको सुभाषित सुनाने कि पड़ोसी से अमन चैन बनाये रखना चाहिए । ये बात हमको अच्छी तरह से मालूम है बेटा दिलजले विलियम बर्न्स । जब भारत में स्वर्णयुग चल रहा था तब यूरोप और अमेरिकावासी केले के छिलकों से चड्ढी पहनना सीख रहे थे । ये अमृतवाणी हमको मत सुनाओ । दस हजार साल से अमृतवाणी सुनाने का ही कारोबार चल रहा है भारत देश में । बेटा हमारा ही एक्सपोर्ट किया हुआ माल तुम हमीं को थमा रहे हो । ईस्ट इंडिया कम्पनी के पाकेट बुक ऐडिशन, आये हो तो थोड़ी ठंडी लस्सी वगैरह पियो और वापस निकल लो अमेरिका । अब भारतवासियों की याद्दाश्त इतनी भी गई गुजरी नहीं है कि वो तुम्हारी मंशा न समझ सकें ।
मित्रों, दिलजले बर्न्स की इस यात्रा से यह बात तो शीशे की तरह साफ हो गई कि अमेरिका अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकता है । ये सब कहने की बात है कि अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के साथ अपने रिश्ते मजबूत करना चाहता है । अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए वह अभी भी अपने पागल हो चुके कुत्ते को गोली नहीं मारना चाहता । हमको अपनी लड़ाई खुद लड़नी चाहिए और अपनी शक्ति और पुरूषार्थ पर पूरा भरोसा होना चाहिए । घर में घुस कर काट खा रहे किसी पागल कुत्ते को गोली मारने के लिए हम कब तक बाहरी मदद की आस में बैठे रहेंगे । यहां तो वह कुत्ता भी उसी दारोगा का है जिसके थाने में आप एफ.आई.आर. दर्ज कराते फिर रहे हैं कि उई मां ! फिर काट लिया साले कुकुर ने ।
मित्रों, ये तो मैंने उस ससुरे दिलजले बर्न्स पर निकाली अपने दिल की भड़ास, अब एक मजेदार खबर सुनिये चीन के बारे में । अभी हाल ही में नाइजीरिया में चीन की बनी नकली दवाएं पकड़ी गईं और उन दवाओं पर ‘मेड इन इंडिया’ का लेबल लगा हुआ था । वाह रे मेरा शातिर पड़ोसी । अबे, अपनी घटिया टेक्नोलाजी के अपयश का ठीकरा हमारे सिर पर क्यूं फोड़ रहे हो । लेबल ही लगाना था तो पाकिस्तान का लगा देते । लगे हाथ बेचारे नापाकिस्तान को ये क्रेडिट तो मिल जाता कि उसके यहां भी दवायें बनाई जाती हैं, वरना दुनिया तो यही जानती है कि इनका सिधा-पिसान अमेरिका की ड्योढ़ी से ही निकलता है ।
आत्मन अनूप मंडल से करबद्ध निवेदन है कि अमित जी ने आपके समक्ष जो बातें रखी हैं उन्हें व्यवहारिक तरीके से यदि सामने लायी जाएं तो ये एक अत्युत्तम विकल्प है। आप इस बात का स्पष्टीकरण अवश्य करें कि आपने जिन शब्दों के आपत्तिजनक अर्थ बताए हैं उनका आधार कौन सा शब्दकोश है और किसने लिखा व कहां से प्रकाशित हुआ है। यदि आपके अनुसार जैन फेरबदल करवाने में माहिर हैं और शब्दकोशों के शब्दों में हेराफेरी कर देते हैं तो इस बारे में ठोस प्रमाण भड़ास के मंच पर लाइये ताकि आपकी बात की पुष्टि हो सके। भाषा व उसके व्याकरण में उलझ कर मुख्य मुद्दा जिसमें कहा गया था कि जैन राक्षस होते हैं वो तो कहीं गुम होता प्रतीत हो रहा है। मेहरबानी करके सभी बातों को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करें। ये अवश्य ध्यान रखिये के आपकी लिखी हुई कोई भी बात भड़ास के वैश्विक मंच के द्वारा पूरी दुनिया में पहुंच जाती है यदि कहीं भी कोई ढीलापन रहा तो विमर्श लड़खड़ा जाता है। निजी तौर पर मैं मानता हूं कि दैवीय और राक्षसी प्रव्रत्ति का मिश्रण ही तो है मनुष्य। अब आप क्या बताना चाहते हैं, क्या राक्षस कोई विशेष प्रजाति है अथवा दुष्ट सोच के मानव? यदि दुष्ट मानव ही दानव या राक्षस हैं तो ये सिर्फ़ जैन ही क्या हर समुदाय में मिल जाएंगे बल्कि ज्यादातर तो इन्ही की भरमार है। शायद मेरे भीतर भी कहीं न कहीं एक राक्षस खामोश बैठा रहता है जो पता नहीं कब किन परिस्थितियों में बाहर निकल आएगा। आप दोनों के स्पष्ट आलेखों का इंतजार है मात्र शब्द-प्रपंच से बचें।
जय जय भड़ास
सोनी जी आप के द्वारा लिखा गया बंधुत्व की भावना से भरा लेख पढ़ा और मई फिर से अनूप मंडल के कुतर्को का जवाब देने के लिए तयार हो गया ,
सबसे पहले यदि अनूप मंडल मन की कषाय को छोड़ कर निर्मलता पूर्वक यहाँ मंच पर धर्म जैसे संवदेनशील मुदे पर बात करे तो कोई भी सहर्ष तयार हो जायगा /
पहली बात अनूप मंडल कहता है ये धातु क्या होता है ?
अनूप मंडल यदि हिंदी भाषा या संस्कृत भाषा को जानता है तो उन्हें व्याकरण शब्द जरूर पता होगा /
यदि नहीं पता तो किर्पया पहले भाषा को पढ़ ले /
जब कोई भाषा साहित्य की समृद्धि से जगमगाने लगती है, तब उसके व्याकरण की जरूरत पड़ती है/
इस व्याकरण के लिए पदों को ("मध्यस्तोऽवक्रम्य") बीच से तोड़ तोड़कर प्रकृति प्रत्यय आदि का भेद किया-व्याकरण बनाया गया /
इसी परकार भाषा विज्ञानं सब्द शास्त्र है /
व्याकरण तथा भाषाविज्ञान दो शब्दशास्त्र हैं; दोनों का कार्यक्षेत्र भिन्न-भिन्न है;
पर एक दूसरे के दोनों सहयोगी हैं। व्याकरण पदप्रयोग मात्र पर विचार करता है;
जब कि भाषाविज्ञान "पद" के मूल रूप (धातु तथा प्रातिपदिक) की उत्पत्ति व्युत्पत्ति या विकास की पद्धति बतलाता है।
व्याकरण यह बतलाएगा कि (निषेध के पर्य्युदास रूप मे ), "न" (नञ्) का रूप (संस्कृत में) "अ" या "अन्" हो जाता है।
अब सोनी जी एक शब्द जिन का मतलब बताने के लिए मुझे पूरा व्याकरण इन को बताना पड़ेगा /
क्योकि मुझे उम्मीद है की अगली पोस्ट मे अनूप मंडल लिखेगा
ये भाषा विज्ञानं क्या है? ,
ये पद पर्योग क्या है ? ,
ये उत्पति व्युत्पति क्या है ? ये परुदास क्या है ?
अब ये अनूप मंडल व्यथ की बात करते है की आप अपने भगवन की तस्वीर भेजिए /
कितनी बचकानी बात है /
सिर्फ किसी स्थापित मूल्यों को तोड़ मरोड़ कर उन से उन का श्पष्टिकरण मांगना बेव्खुफी नहीं तो क्या है / ---------------------------------------------------------------------------------------------------- बङे से बङा शहर जैन वंश को बणीयो के नाम से ही संबोधित करते है शायद आप
यह कहेगे कि हम बनिये नही है
बनिया अक्षर का असली अर्थ बिगङी औलाद से है जो अर्थ
ङिक्सनरी से नही मिलता है सौदागर का अर्थ होता है जो पुरूष माँ के घर मे
चोरी करता है वह सौदागर के नाम से जाना जाता है महाजन का अर्थ होता है
माँ के साथ बेटा, पति की तरह वर्ताव करके औलाद पैदा करे- उस औलाद को
महाजन वंश कहाँ गया है अमीत.....
------------------------------------------------------------------------------------------------------
अब इस परकार का लेख जो ये महोदय लिख रहे है ,
वो बाते किस dictionary से उन होने ये शब्दार्थ लिए है /
सिर्फ उन की इन जातीय मानसिकता के चलते मैंने उन से बात न करना ही उचित समझा / क्यों की मे अनूप मंडल के स्तर तक गिर कर नहीं लिख सकता था /
मानना पड़ेगा इन धंधेबाजों को....सारे के सारे बस इसी फ़िराक में बैठे रहते हैं कि कब साइबर स्पेस में इन्हें मौका मिले और ये अपना पेल दें। अब आप सब देखिए कि भड़ास पर सदस्यता लेने के कारण अनेक लोगों को बहुत मानसिक यातना सहनी पड़ी जिस कारण संचालकों ने कई सक्रिय और वरिष्ठ भड़ासियों से सलाह करके भड़ास पर लोकतंत्र की गरिमा बनाए रखते हुए सदस्यता का झंझट ही खत्म कर दिया। अब कोई भी अपने ई-मेल खाते से सीधे ही भड़ास पर पोस्ट भेज सकता है। इस सुविधा का लाभ उठाने के लिये "धंधेबाज कीड़े" भी भड़ास में रेंगने लगे। पहले हमने ऐसी व्यवस्था करी थी कि पोस्ट सीधे ही प्रकाशित हो जाती लेकिन इन कीड़ों की गंदगी से बचाव के लिये पोस्ट को ड्राफ़्ट में लेना पड़ रहा है ताकि देख समझ कर प्रकाशन करा जाए और आप व्यर्थ के साइबर कूड़े-करकट से बचे रहें। भड़ास का दर्शन और परंपरा आपके, समाज के, देश के और विश्व के मानसिक आरोग्य के लिए रचनात्मक विचारों की उल्टियों को उगलने के साथ अनवरत जारी रहेगी।
जय जय भड़ास
(प्रस्तुत है एक नमूना जिस तरह के सैकड़ों मेल भड़ास के संचालकों को मिलते हैं और उन्हें छान कर आप तक लाने में कितना श्रम है आप समझ सकते हैं)
Dear Friend,
Good day.
How is family and business doing today? I hope fine.
Please may I crave your indulgence to solicit your co- operation in a business opportunity? This is a proposal in context but actually an appeal soliciting for your unreserved assistance in consummating an urgent transaction with me and my two other partners. I want you to help us receive a profiling amount in an excess, for mutual benefit investment in your country.We need your business experience and connections to invest this funds in your country.
As soon as you reply to this message notifying your interest, I will be sending you the full details about myself and the funds.
Thank you
Read more...अमित भाई,आप कुछ विचित्र सा बर्ताव करने लगे हैं इस बात पर आश्चर्य हो रहा है। रही बात अनूप मंडल के लोगों की तो वे तथ्य और तर्कपूर्ण बात यदि न करें तो उन्हें सहज ही नकार देना सही होगा। आपको याद होगा कि इसी मंच पर भाई रजनीश झा और डा.रूपेश श्रीवास्तव जैसी शख्सियतों पर मुस्लिम तुष्टिकरण और माफ़िया डान दाउद इव्राहिम से पैसा आने तक का इल्जाम लगाया गया था लेकिन ये दोनो इतने सच्चे हैं कि इन आरोपों से जरा भी विचलित नहीं हुए बल्कि विमर्श का रास्ता खुला रखा और उसका परिणाम ये हुआ कि प्रशांत नाम का वो अशांत व्यक्ति स्वयं ही भड़ास से भाग गया सदस्यता छोड़ कर जबकि ये दोनो माडरेटर चाहते तो मात्र माउस के एक क्लिक से उसकी सदस्यता समाप्त कर देते। लोकतंत्र का सही मतलब ही यही है कि विमर्श का मार्ग बंद न हो। मेरा आपसे यही निवेदन है कि आप विचलित न हों और न ही अनूप मंडल के लोगों को मौका दें कि वे आप पर कोई अनर्गल शब्द प्रहार करें। अफ़सोस तो इस बात का है कि महावीर सेमलानी जी भड़ास से असमय चल बसे। यदि महावीर सेमलानी जैसे विद्वान होते तो शायद ये स्थिति न होती क्योंकि आपने तो शुरूआत में ही अत्यंत विनम्रता से कहा था कि आप धर्म जैसे गूढ़ विषय के विद्वान नहीं हैं। मैं एक बार फिर महावीर सेमलानी जी से निवेदन करता हूं कि वे इस विमर्श में भड़ास की सदस्यता लिये बिना ही समस्या को सुलझाएं।
जय जय भड़ास
अनूप मंडल के मानसिक रोगी दोस्तों ( माफ़ करना मैंने आप को दोस्त कहा क्योकि आप सभी लोग किसी भी जैन को अपना भाई न मानाने की कसम खा कर बैठे है ) आप के द्वारा लिखे गए को पढने के बाद पता चालक की क्यों इस समाज मे बुद्धिमान लोग कह गए है की दुश्मनी किसी बुद्धिमान के साथ कर लो पर दोस्ती कभी किसी मुर्ख या पागल से मत करना / मैंने आप से दोस्ती करने की गलती की है , पर मै अब उस गलती को सुधारता हु , ओर अब से आप को दोस्त , मित्र , के संबोधन से नहीं संबोधित करुगा / आप की मन स्थिति बिलकुल उस मानसिक विभ्रम के रोगी की तरह है जो अपने मन स्थल से उठने वाले अजीबोगरीब विचारो से परेशान रहता है , आप जिस किसी भी इश्वर को मानते है वो आप को सध्बुधि दे साथ मे इतना सामर्थ्य भी दे की आप इस देश के सभी धर्मो का आदर कर सके न की खुद अपने आप को सर्वश्रेस्ट मान ले / मै तो समझा था की आप विचारविमर्श करने के लिए आये है परन्तु आप जैसे मूढ़मति मंडल को सिर्फ अनसुना कर के भोकने ( सज्जन किर्पया इस शब्द पर ध्यान ना दे )के लिए छोड़ देना चाहए /
अहिंसा को पर्योग करने के बाद राष्ट्र पिता महत्मा घंडी ने भारत को आजाद कराया / आपका जैसा व्यक्ति या मंडल अब राष्ट्र पिता शम्भोधन मे सारे पिता का जिन (जीन ) ढूढ़ लेगा ये मुझे आशा है ............:)
इधर कुछ व्यक्तिगत व्यस्तता के चलते मैं भड़ास से थोड़ा दूर रहा हूँ..कुछ लिखने के लिए समय नही मिल पा रहा था। हाँ दोस्त के लैपटॉप से पढने का क्रम नही टूटा पिछले कई दिनों से मैं जब भी यहाँ आता हूँ। तो लोक संघर्ष ही छाया रहता हैं कभी कवितायेँ और कभी लेख। सुमन जी सैकड़ों पोस्टें शायद अब तक आ चुकी हैं..लेकिन मैं ये समझाने में असमर्थ रहा हूँ की आखिर ये लोक संघर्ष चीज़ क्या है? क्योंकि ये सब्द ही अपने आप में इतना भारीभरकम हैं की इसका वजन सह पाना कमजोरों के वश की बात नही है..कृपया मुझे इन लोक संघर्ष के लोक के लिए संघर्ष की कुछ सत्य गतिविधियों से अवगत कराने की कृपा करें ..क्या ये वाकई में लोक यानि जन यानि आम आदमी के किसी सामूहिक संघर्ष की मुहीम है या फिर शब्दों के चोंचले में छिपा व्यक्तिगत उपलब्धि का छलावा भर! मेरी बात को अन्यथा न लें , क्योंकि ये सिर्फ़ मेरी व्यक्तिगत जिज्ञासा भर है और कुछ नही..हा इस लोक संघर्ष की परिभाषा से मुझे अवगत कराने की चेष्टा जरुर करिए..हो सकता है की मानसिक छतिपूर्ति आपके उत्तर से हो जाए ..अंत में किसी भी ठेस लगने वाली बात के लिए छमा प्रार्थी हूँ॥ एक बच्चे की जिज्ञासा ग़लत भी हो सकती है ..लेकिन उसे समझकर उसका भ्रम दूर किया जा सकता है। इसी आशा के साथ इंतजार में आपका सहयोगी ......भड़ास दर्शन का आज्ञाकारी बालक
जय भड़ास जय जय भड़ास
© भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८
Back to TOP