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अब तो पेट्रोल मूतो भड़ासियों........ फिर कीमत बढ़ गयी है

शनिवार, 26 जून 2010

भड़ासियों पर आरोप है कि अपनी अजीबोगरीब सोच और गंवारू अंदाज के कारण बात बात पर आग लगा कर बैठ जाते हैं। इस आरोप से कभी किसी भड़ासी ने इन्कार नहीं करा कि आपस में ही जूतम पैजार कर लेते हैं, लतिया देते हैं एक दूसरे को, गरिया देते हैं लेकिन ये वही हम लोग हैं जो इस देश की बुनियाद में अपना श्रम लेकर खेतों की मेड़ पर बैठे हैं बीड़ी सुलगा कर अपने फेफड़े कैंसर पैदा करने वाले धुंए से भरते हुए; मिलों में पसीने की गंगा बहाते हुए, अखबारों के लिये कलम रगड़ते और रात रात भर कम्प्यूटर पर आंख फोड़ने वाले हम वो लोग जो अपने देहातों से निकल कर बड़ी कार्पोरेट कंपनियों में अपनी बुद्धि को निचोड़ कर लालाओं के खजाने भर रहे हैं। एक बार दोबारा तुम्हें साइकिल से अपने आफ़िस जाना होगा वो मोटर साइकिल खड़ी रहेगी तुम्हारे किराए के घर में जिसे तुमने बैंक से कर्ज लेकर खरीदा है और हर महीने जिस कर्ज की किश्त भरते हो। कम से कम अब तो पेट्रोल मूतो और आग लगाओ इन वजहों पर जिनसे ये नीच और बेशर्म सरकार रोज मंहगाई बढ़ा रही है। जिस मंहगाई को मुद्दा बना कर दूसरी राजनैतिक पार्टियां अपना चना-चबैना भुना रही हैं लेकिन सिर्फ़ नौटंकी ही रहती है। मूतो भाई पेट्रोल मूतो.......
जय जय भड़ास

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कुछ महीने न लिख कर क्या देख सकी वो बताना है

बुधवार, 20 जनवरी 2010

पिछले कुछ महीनों से सक्रिय लेखन बंद कर के एक प्रयोग करके देख रही थी। इस प्रयोग में मैने ब्लागिंग के बाद में मैंने जो नजरिया पाया था उस नई नजर से दुनिया को देख कर समझने की कोशिश कर रही थी कि शायद कुछ बदलाव आया होगा लेकिन कुछ बदला ही नहीं है बस ये है कि कुछ लोग मुझे पहचानने लगे हैं, इस नयी पहचान के चलते जो सामाजिक कद हासिल हुआ है उसमे पत्रकार बंधुओं को लगने लगा है कि मैं भी घटनाओं पर अपनी राय दूं। अभी जब कुछ समय पहले समलैंगिकता वाले मामले में कानूनी उठापटक चल रही थी तो कई लोगों ने मेरी राय जानना चाहा कि मैं इस बारे में क्या विचार करती हूं। मैंने एक बात देखी कि हर जगह पूंजी का जोर है पैसे की ताकत से सारे काम सिद्ध हो रहे हैं। हमारी न्याय व्यवस्था और न्याय प्रणाली के साथ साथ ही मैंने न्याय का पालन कराने वाली संस्थाओं को भी नये नजरिये से देखने का प्रयास करा लेकिन कुछ भी बदलाव नहीं है। बाबू जी डा. जे.सी.फिलिप सही कहते हैं कि हमारा मसला तो सामाजिक मसला है और सामाजिक बदलावों की गति बहुत धीमी होती है इसलिये फिलहाल कुछ अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। लैंगिक विकलांगता के मुद्दे को दरकिनार करके धनी और कुटिल लोगों ने खुद ही एक लैंगिक अल्पसंख्यक वर्ग रच डाला जिसे उन्होंने "LGBT समूह" नाम दे डाला और गुदा मैथुन से लेकर मुख मैथुन तक को अपनी निजी काम-वरीयताओं में गिना कर कानूनी नौटंकी करके भारतीय सभ्यता के मुंह पर कालिख पोत दी पर हमारे माननीय न्यायाधीश तर्कों के आगे घुटने टेके रहे। आश्चर्य होता है जब न्यायाधीश अपने निजी विवेक का जरा भी प्रयोग नहीं करते। आजकल मेरा रुझान ’विधि के शासन’(Rule of law) की तरफ है जिसे एक आम नागरिक होने की हैसियत से जानने का प्रयत्न कर रही हूं। काफ़ी दिनों बाद लिख रही हूं तो विचारों का तारतम्य आसानी से नहीं बन पा रहा है। मुझे पता है कि जो भड़ास इतने दिनों से दम साध कर रोके हुए थी अब उबल-उबल कर बाहर आएगी। इस बीच मैं अपने बड़े भाई और गुरुदेव डा.श्री रूपेश श्रीवास्तव जी के सम्पर्क में रही, लंतरानी समूह की संचालिका और भड़ास की संरक्षिका मेरी बड़ी बहन मुनव्वर(सुल्ताना)आपा के जुड़ाव में भी लगातार हूं इसलिये कुछ अविस्मरणीय पल तस्वीरों के रूप में कैद हो सके जो आप सबके साथ बांटना है।
जय जय भड़ास

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हैती में आया महाभूकम्प अमेरिकन राक्षसों का प्रयोग है

बुधवार, 13 जनवरी 2010

हैती में आया महाभयंकर भूकम्प वहां की आबादी के बड़े हिस्से को लील गया है। आप सब जानते हैं कि भूकम्प के क्या कारण साइंस न बता रखे हैं। कैरिबियन द्वीपों की भौगोलिक स्थिति अमेरिका के लिये अपने अतिगोपनीय सैनिक उपक्रम यानि कि "हार्प"(HARP - high frequency active auto role research program) के प्रयोग को आजमाने के लिये एकदम सही है। फिर उसके बाद इस एशियाई खंडों पर आजमाया जाएगा। हार्प संसार का सबसे बड़ा आयनोस्फ़ेयर हीटर कहा जाता है। यह अलास्का से ४५० किलोमीटर दूर स्थापित करा गया है और इसके एक भाग में कार्य करने वाले अधिकारी को पता नहीं होता कि वह जो कार्य कर रहा है वह दूसरे खंड के किस काम आने वाला है यानि कि अत्यंत गोपनीय तरीका अमेरिकन सेना का। इस प्रयोगशाला द्वारा अंतरिक्ष में आयनोस्फ़ेयर को प्रभावित करने वाली सैकड़ों किलोमीटर की ऊंचाई तक हाई फ़्रिक्वेंसी रेडियो तरंगें छोड़ी जा सकती हैं। इस प्रकार धरती के मनचाहे स्थान के वातावरण में इच्छित परिवर्तन के साथ ही वहां के निवासियों के दिमाग को विचलित करने, समुद्री तूफ़ान उठाने, प्रचंड बारिश लाने, भूकम्प लाने, बाढ़ लाने जैसे अति भयानक कार्य करे जा सकते हैं जो कि देखने में कुदरती लगते हैं।
अत्यंत संताप की स्थिति है हैती में हमारे लाखों मानव विश्व बंधु इन दुष्ट राक्षसों के प्रयोग का शिकार हो गए हैं। अब दिखावे के लिये ये राक्षस सहायता का नाटक भी करने लगेंगे। किसी भी मानवीय ताकत को इस तरह से पंगु बना देने की राक्षसी शक्ति अब खुल कर सामने आ रही है। अब अमेरिकन कूटनीति के तहत सेना, बम , विमान, पनडुब्बी आदि की जरूरत नहीं रहेगी युद्ध में इन सब को इस्तेमाल नहीं करना है बल्कि इस तरह से किसी भी देश की कमर तोड़ देना है ताकि वह सदा सदा के लिये इन राक्षसों के साम्राज्य (जयति जिन शासनम) के आधीन हो जाए।
इस दुःख भरे खोजपूर्ण आलेख में दी गयी जानकारियां हमने जिन पुस्तकों से जुटाई हैं वे हैं -----
१) ’हार्प’ द अल्टीमेट वेपन औफ़ द कौन्सिपिरेसी : जैसी स्मिथ
२) अनलेस द पीस कम्स : गौर्डन जे।एफ़। मैक्डोनाल्ड
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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राक्षसों ने ब्लागरों को लपेटा अपने मायाजाल में, मुंबई ब्लागर मीट

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

अनेक लोग सहमत रहे हमारी बातों से और अनेक बार हमने इस बात के सबूत भी दिये कि जैन राक्षस किस तरह से लोगों को मीठा बोल कर और घुलमिल कर अपने जाल में फंसाए रहते हैं ताकि कोई इनकी हकीकत न जान पाए। इसका ताजा उदाहरण रहा मुंबई में हाल ही में हुई ब्लागर मीट जिसे कि सारी मुंबई छोड़ कर एक जैन मंदिर में करा लिया गया। ये है महावीर सेमलानी के भोलेपन का जादू। अब भला कोई हमारी बात पर क्यों यकीन करेगा आसानी से कि ये शख्स कितना कुटिल है।
एक बात ये राक्षस भी समझ गये होंगे कि हमारे अवतार स्वरूप डा.रूपेश श्रीवास्तव पर कोई जादू नहीं चलता है । ये बात तुम लोगों के लिये एक चेतावनी भी है कि अब तुम डा.रूपेश श्रीवास्तव जी के तेज से स्वयं ही नष्ट हो जाओगे।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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सचमुच डा.रूपेश श्रीवास्तव आतंकवादी ही तो हैं

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

अभी दो दिन पहले की बात है कि भाई राममिलन जी का फोन आता है ये बताने के लिये कि उनके कार्यालय में संपादक जी को किसी ने मुंबई से फोन करा था कि डा.रूपेश श्रीवास्तव और मुनव्वर सुल्ताना के संबंध आतंकवादियों से हैं। भाई राममिलन ने ये सब बताया और कहा कि वो शख्स बता रहा था कि जनवरी में आप लोगों पर मुकदमा चलने वाला है। राममिलन और संपादक अग्रवाल जी शुभचिंतक होने के नाते परेशान होना सहज स्वाभाविक है। अग्रवाल जी तो डा.रूपेश श्रीवास्तव को निजी तौर पर जानते नहीं है तो मैं अपने कोश से इनके कुछ फोटोग्राफ़्स आप लोगों के सामने ला रही हूं जिनसे सिद्ध हो जाएगा कि ये इंसान आज के दौर का कितना बड़ा आतंकवादी है
भाई हरभूषण सिंह अंधेरी(मुंबई का एक उपनगर) में अपने घर में अकेले बुखार से तप रहे थे तो ये हज़रत जाकर उन्हें अपने घर उठा लाते हैं और एक सप्ताह उनकी सेवा करते हैं, ये आतंकवाद नहीं तो क्या है?
पूर्व जीवन में अपराधी रहे "एक्स मैन" के नाम से जाने वाले सज्जन जब गम्भीर जख्मी हुए तो जनाब जुट गये खिदमत में और टूटी पसलियों से लेकर घुटने तक को मात्र ढाई माह में सही कर दिया। ये है आतंकवाद।
घुटनों से लेकर पैर के पंजे तक का परीक्षण करते हुए डा.रूपेश श्रीवास्तव
पसलियों के दर्द और कंधे के डिसलोकेशन को समझते एहसास करते हुए डा.रूपेश श्रीवास्तव
दूसरे के दर्द को अपना मान लेना तो बस ये ही कर सकते हैं आतंकवादी डा.रूपेश श्रीवास्तव
जल्द ही पट्टी और प्लास्टर हटा दूंगा ये आश्वासन देते हमारे आतंकवादी गुरू डा.रूपेश श्रीवास्तव
ये रही इंसान की बात..... अब देखिये इस आतंकवादी का पशु-पक्षियो के प्रति प्रेम का नमूना। चित्र में डा.रूपेश श्रीवास्तव एक जख्मी उल्लू के बच्चे को ड्रापर से लिक्विड फूड दे रहे हैं
बासित मेरा छोटा भाई और मेरी माताजी मुनव्वर आपा के नाम से प्रसिद्ध इस चित्र में आपको दिख रहे हैं। बादशाह बासित डर रहे थे उस पक्षी को छूने में तो डा.रूपेश श्रीवास्तव ने उस डर को दूर कराअब हमारा "व्हिसिल" नाम का प्यारा उल्लू का बच्चा बादशाह बासित के हाथ में है जो कि उसके उपचार में डा.रूपेश श्रीवास्तव की सहायता कर रहे हैं।
डा.रूपेश श्रीवास्तव के प्रेम और बादशाह बासित के मदद करने के जज़्बे को आप सब इस चित्र में देख सकते हैं
इस पूरे काम में पूर्ण मनोयोग से जुटे डा.रूपेश श्रीवास्तव और बादशाह बासित के साथ में हैं मुनव्वर आपा (मेरी माताजी)जो कि इस आतंकवादी की अजीब शख्सियत को प्रशंसा भरी निगाहों से निहार रही हैं।
लीजिये टूटे हुए डैने और पैर पर पट्टी-प्लास्टर हो गया।
आप देख रहे हैं चित्रों की जुबानी मैंने इस व्यक्ति के बारे में आपको जो बताना चाहा। बारिश में नाले में गिरे कुत्ते के बच्चे से लेकर कौव्वे द्वारा जख्मी करे कछुए के बच्चे को जो आदमी घर ले आता है उसके बारे में शब्दों में कैसे लिखा जाए।
ये शख्स आतंकवादी है और इसका आतंक है उन लोगों में जो मजलूमों को सताते हैं, जो गलत धंधे करते हैं उनके लिये ये शख्स आतंक है। इसकी सच्चाई और ईमानदारी का आतंक है आसपास के बुरे लोगों में। कई बार मैंने खुद देखा है कि किसी बेगाने के हक़ की लड़ाई में जिस कदर ये इन्वाल्व हो जाते हैं वह तो एक "आतंकवादी" और एक्स्ट्रीमिस्ट ही कर सकता है। हिंदी ब्लाग जगत के लोग भी अब कुछ कुछ इनके स्वभाव से परिचित हो चले हैं।
सचमुच आज की दुनिया में ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है। इन पर बिना कोई मुकदमा चलाए सरेआम फांसी दे देनी चाहिये क्योंकि ये तो अजमल कसाब से भी ज्यादा खतरनाक हैं।
जय जय भड़ास

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भड़ास बनाम भड़ास blog -तीसरा भाग

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

यशवंत सिंह शराब के शौकीन, चरित्र के लिबलिबे, मुखौटे के मजबूत और दूसरी तरफ उन्हें उनकी सारी खा़मियों के साथ स्वीकार कर चुके डा.रूपेश श्रीवास्तव; अब तक यशवंत सिंह ने अपने अनुभवों से जो सीखा था वो ये था कि जो मिले उसे इस्तेमाल कर लो उससे जितना फायदा हो सके उठा लो क्योंकि पता नहीं कब साथ छूट जाए। डा.रूपेश श्रीवास्तव और यशवंत सिंह के व्यक्तित्त्व आपस में घर्षण कर रहे थे एक दूसरे को खुद जैसा बना पाने के लिये। इसी बीच भड़ास पर गूगल की तरफ से एडसेंस लगाया गया यानि कि आय का एक बहुत छोटा सा स्रोत भड़ास पर जोड़ा गया। डा.रूपेश श्रीवास्तव व सभी भड़ासियों ने सहर्ष इस बात का स्वागत करा। डा.रूपेश श्रीवास्तव जो कि यशवंत सिंह की तरफ से अब तक दुनिया को भड़ास के दूसरे माडरेटर बताए जा रहे थे, उन्होंने अपने स्वाभाव के अनुसार एक सुझाव दिया कि भड़ास से जुड़े भड़ासी हिंदी की गांव-देहात की पट्टी पर रहने वाले लोग हैं जो कि पचास-साठ रुपए प्रति घंटे खर्च करके भड़ास पर पोस्ट लिखा करते हैं इसलिये भड़ास पर होने वाली आय को इन भड़ासियों में उनकी सक्रियता के आधार पर वितरित कर दिया जाए; भड़ास किसी एक का न रह कर इन सभी का समेकित प्रयास है। बस यहां से यशवंत सिंह के कान खड़े हो गये कि ये आदमी पैसे का लोभी नहीं है इसके रहते वो अपने बाजारी सपने पूरे नहीं कर सकते। आप सबको बताती चलूं कि यशवंत सिंह ने डा.रूपेश श्रीवास्तव को कभी भड़ास का माडरेटर बनाया ही नहीं था वो बस उनका नाम इस्तेमाल कर रहे थे।
इसी कशमकश के बीच यशवंत सिंह ने अपने बाजारू लालागिरी के स्वभाव के चलते भड़ास की दिन दूनी रात चौगुनी होती प्रसिद्धि के टके कराने के लिए "भड़ास4मीडिया" नाम का एक पोर्टल शुरू करा।
आगे जारी........
इस भड़ास का प्रथम भाग पढ़िये
दूसरा भाग पढ़िये
जय जय भड़ास

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बगा़वतें जन्मती हैं इंसानी शक्ल में तब कहीं एक रजनीश पैदा होता है

रविवार, 29 नवंबर 2009

जन्मदिन की हार्दिक भड़ाभड़ भड़ासी शुभकामना
भड़ास के संचालक भाई रजनीश झा
सड़ी गली परंपराओं की दुर्गंध जब इतनी अधिक हो जाए कि सहना मुश्किल हो तब प्रतिक्रिया से एक सुगंध का कतरा उपजता है। वो कतरा अपनी फितरत से बढ़ता जाता है और दुर्गंध के बराबर सीधा खड़ा रह कर बुराइयों को नकारा कर देता है। साहस चाहिये इस काम के लिये जो कि वो लेकर पैदा होगा है। भाई रजनीश झा की शख्सियत के बारे में जितना लिखा जाए कम है। भड़ास पर कमान सम्हाले रहना ताकत की बात है जो कि भाई रजनीश जैसे लोग ही कर सकते हैं। जिस दिन भड़ास की हत्या यशवंत सिंह ने कर दी थी और भड़ास की आत्मा उस ताबूत में तड़प रही थी तब मैंने भड़ासी धर्म का निर्वाह करते हुए भड़ास की मूल आत्मा चुरा ली। यशवंत सिंह ने मुर्दा ताबूत में सजा रखा था और फूल माला चढ़ा कर उसकी नुमाइश लगा ली। मुर्दे की प्रदर्शनी का धंधा उस धंधेबाज ने लगा लिया। मैं अकेला भड़ास की आत्मा को अपने अस्तित्त्व पर चढ़ाए भटकता रहा कई दिनों तक फिर एक दिन फैसला लिया कि भड़ास को दुबारा जन्म दिया जाए। इस प्रसव में दाई का काम करा हमारे बाग़ी भाई रजनीश के.झा ने। भड़ास दुबारा पैदा हुआ और हमारे प्यार से पोषित होकर युवा हो गया, अब भड़ास अजर-अमर है। इस शक्ति का श्रेय है भाई रजनीश को जिनका आज जन्मदिन है। एक बात तो स्पष्ट हो गयी है कि भड़ास के साथ ही हम दोनो भी अब अमर हो गये हैं। भाई रजनीश को जन्मदिन की हार्दिक शुभेच्छा।
जन्मदिन पर किसी की ले ली जाए तो भड़ासी जन्मदिन पूरा हो।
जय जय भड़ास

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कथाकार निरुपमा सेवती का निधन.

रविवार, 3 मई 2009

वरिष्ठ कथाकार और साहित्यकार सुश्री निरुपमा सेवती जी का शुक्रवार को मुम्बई में निधन हो गया। वो पिछले एक हप्ते से बीमार थीं। सारिका , निहारिका, कल्पना इत्यादि साहित्यिक पत्रिका की वो नियमित लेखिका थीं।


निरुपमा जी का निधन हिन्दी कथा लेखन में एक रिक्ती ले कर आया है।


भड़ास परिवार निरुपमा जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता है और शोक की इस घड़ी में परिवार को संवेदना देता है।

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विष्णु प्रभाकर: हिन्दी का एक और बडगद धराशायी.

रविवार, 12 अप्रैल 2009

हिन्दी के वयोवृद्ध गाँधीवादी साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का शुक्रवार रात को निधन हो गया। वे 96 वर्ष के थे। पिछले कुछ दिनों से वे बीमार चल रहे थे। उनको पिछले दिनों महाराजा अग्रसेन अस्पताल में साँस लेने में तकलीफ के कारण भर्ती कराया गया था। करीब दो सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद कल रात पौने एक बजे उन्होंने अंतिम साँसें लीं। विष्णु प्रभाकर का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा क्योंकि उन्होंने मृत्यु के बाद अपना शरीर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को दान करने का फ़ैसला किया था।


उन्हें उनके उपन्यास अर्धनारीश्वर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उनका लेखन देशभक्ति, राष्ट्रीयता और समाज के उत्थान के लिए जाना जाता था। उनकी प्रमुख कृतियों में 'ढलती रात', 'स्वप्नमयी', 'संघर्ष के बाद' और 'आवारा मसीहा' शामिल हैं. इनमें से 'आवारा मसीहा' प्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार शरतचंद्र चटर्जी की जीवनी है जिसे अब तक की तीन सर्वश्रेष्ठ हिंदी जीवनी में एक माना जाता है.
प्रभाकर को पद्म विभूषण के साथ ही हिन्दी अकादमी पुरस्कार, शलाका सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार, शरत पुरस्कार आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में अर्द्धनारीश्वर, धरती अभी घूम रही, डॉक्टर, सत्ता के आर-पार, मेरे श्रेष्ठ रंग, आवारा मसीहा, शरतचन्द्र चटर्जी की जीवनी, सरदार शहीद भगत सिंह, ज्योतिपुंज हिमालय शामिल हैं।
भड़ास परिवार हिन्दी पुत्र के निधन पर शोक में है और प्रभाकर जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
जय जय भड़ास
फोटो साभार : नभाटा

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  © भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८

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