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एक्ष्पेक्ततिओन्स, ग्रेअटर थे दिस्प्पोइन्त्मेन्त्स….. इसका अर्थ आपको नहीं पता होगा लेकिन हम और डॉ.दिव्या श्रीवास्तव जानते हैं

शुक्रवार, 30 मार्च 2012


कल बहुत दिनों बहुत दिनों के बाद भड़ास पर आया तो देखा कि डॉ.रूपेश श्रीवास्तव बहन डॉ.दिव्या श्रीवास्तव की रिश्ते के चलते चोटी खींच रहे हैं। हमारे गुरूजी में एक बात है कि वे चोटी भी खींचते हैं तो इसी मंच पर न कि चुप्पे चुप्पे फोन या ई-मेल से, इसका कारण सीधा सा यही है कि वे एकदम पारदर्शी हैं। मैं खूब समझता हूँ डॉ.दिव्या जी के स्वभाव को कि वे गुरूजी की बात से चिढ़ गयी होंगी लेकिन दिव्या जी इस बात को कभी समझ नहीं पाएंगी कि जीवन की इसी पारदर्शी शैली के चलते मनीषा नारायण, आएशा धनानी, मुनव्वर आपा, स्वयं मैं और न जाने कितने ऐसे लोग हैं जो इनसे रिश्ते में जुड़ गये हैं। गुरूजी ने जो भी बताया जताया दिखाया सिखाया है उसके लिये धन्यवाद शब्द बौना है लेकिन दिव्या के ऊपर तो दया आ ही रही है। यदि वो अपने दंभ के खोल से बाहर आ पातीं तो कम से कम पाबला जैसे दुष्टों से बचतीं और एलियन भाषा(एक्ष्पेक्ततिओन्स, ग्रेअटर थे दिस्प्पोइन्त्मेन्त्स) की बजाए हिंदी की सेवा कर पातीं या अंग्रेजी में न लिखना पड़ता यानि कुल जमा ये कि ब्लॉगिंग ठीक से कर पातीं।

जय जय भड़ास

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प्रसिद्धि की भूख, विकृत कामोन्माद, पोर्न ब्लॉग की शुरुआत जैसे कई कारण हो सकते हैं इन हरकतों के पीछे

सोमवार, 7 नवंबर 2011

जब देश दुनिया में लोग अण्णा हजारे और उनकी टीम के बारे में लिख रहे हैं तो भड़ास पर उनके बारे में लगभग न के बराबर बात हो ये भड़ासियों का स्वभाव है। भड़ास पर आज काफ़ी समय के बाद आने पर पता चला कि एक बार फिर किसी मुखौटाधारी के पीछे पड़ कर उसकी मिट्टी पलीद करी जा रही है। मेरा क्षेत्र तो कानून का है लेकिन फिर भी जब प्रकाशित ताजा तरीन आलेख को देखा तो मन करा कि जिसकी चर्चा है उसके ब्लॉग पर जाकर देखूं कि आखिर वो कौन है। वहाँ जाकर जो देखा तो नजारा किसी सॉफ़्टपोर्न के कंटेंट जैसा है, ब्लॉगर द्वारा दी हुए कमेंट ऑप्शन में डॉ.रूपेश जी को खूब गालियाँ लिखी गयी हैं। लेखन शैली के बारे में जरूर कुछ कहना चाहूंगा। जब मैं छात्रावास में था तो मेरे कमरे के साथी कुछ पतली पतली किताबें लुकाछिपा कर पढ़ा करते थे मुझे याद है एक बार मैंने जब देखना चाहा कि आखिर उसमें क्या है तो पता चला कि वह विकृत तरीके से लिखी गयी यौनौत्तेजक कथाओं का तानाबाना था। इसके बाद ब्लू फिल्मों का जो दौर शुरू हुआ तो उसने इन किताबों को छोटे शहरों और गाँवों की तरफ धकेल दिया। इस लेखन शैली से पता चलता है कि उक्त ब्लॉगर किसी छोटे शहर या गाँव का रहने वाला है जो शायद प्रसिद्धि की भूख के कारण अपने ब्लॉग का ट्रैफ़िक बढ़ाने के लिये ऐसा कर रहा है अथवा ये भी हो सकता है कि वह मनोरोगी हो या फिर हो सकता है कि वह किसी पोर्न ब्लॉग की शुरूआत के लिये माहौल बना रहा है।
सब तरह के लोग ब्लॉगिंग में आ गए हैं जब अण्णा हजारे ब्लॉगिंग का सहारा ले सकते हैं तो फिर ये क्यों नहीं । इसने भड़ास के आईकॉन डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी के नाम के सहारे प्रसिद्धि की जो मुहिम शुरू करी है देखते हैं कितनी कामयाब होती है। मेरे अनुसार इन्हें इनके हाल पर छोड़ देना सही है और जब सामने आ जाएं तो फिर जैसे भड़ासी परम्परा अनुसार ऑफ़लाइन भड़ास निकालना चाहें निकाल लीजियेगा।
जय जय भड़ास

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जैन राक्षसों ने मानवों की समय के साथ भूलने की प्रवृत्ति का भरपूर लाभ उठाया है।

रविवार, 6 नवंबर 2011


राक्षसकुल के लोग इस बात को पीढ़ी दर पीढ़ी अनुभवों से खूब भली प्रकार से समझ गए हैं कि जैसे जैसे कालक्रम आगे बढ़ता है मानव पुरानी कई बातों को भूलते जाते हैं। पुरानी पीढ़ी अपनी नयी पीढ़ी को कई बातों को बताती है लेकिन भूल जाने की प्रवृत्ति के चलते उसमें कुछेक सर्वथा भिन्न बातें हर पीढ़ी में जुड़ती जाती हैं। उसका सीधा उदाहरण "जैन रामायण" है जो कि राक्षसों ने लिखी है क्योंकि वे जान चुके हैं कि उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी महाराज राम व उनसे जुड़े लोगों की कथाओं में इतने भ्रम पैदा कर दिये हैं कि लोग उनके कुत्सित मनोरथ को समझ ही न पाएंगे। आप खुद ही देखिये कि आजतक जैन रामायण पर किसी ने सवाल नहीं उठाया कि जैनियों को रामायण लिखने की कौन सी जरूरत आ पड़ी? क्यों इन लोगों ने "जैन कुरआन" नहीं लिखी, ये जानते हैं कि जो अहिंसा का धीमा जहर ये मानवों को दे रहे हैं उससे सबसे अधिक हिंदुओं को प्रभावित करा जा सकता है मुस्लिमों को नहीं वरना ये तत्काल ही मार कर वापिस नर्क में खदेड़ दिये जाएंगे जिधर के ये रहने वाले हैं।
प्रवीण शाह(जैन) और अमित जैन भी इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाने की कोशिश में लगे रहते हैं कि लोग उनकी नीच और कुत्सित बातों और आरोपों को भूल जाएं तब ये दोबारा प्रेम,करुणा,अहिंसा,शराफ़त का मुखौटा लगा कर भड़ास पर आ जाएं और हेराफ़ेरियाँ करते रहें। प्रवीण शाह ने जो भी करा है वो सब हमारे पास सुरक्षित है, अमित जैन जो जो हरकतें करता है हम उसे सुरक्षित रखते हैं ताकि आने वाले लोगों को आवश्यकता पड़ने पर बता सकें कि ये शरीफ़ लोग असल मे कितने नीच और पैशाचिक स्वभाव के हैं।
आजकल एक नया मुखौटा भड़ास पर दिख रहा है उसका उद्देश्य भी हम समझ रहे हैं वो अपनी निकृष्ट बातों में उलझा कर हमें ठीक उसी तरह मूल विषयों से भटकाने की कोशिश में लगा रहता है जैसे कि पहले करते रहे हैं।
न अमित जैन माफ़ी माँगेगा
न प्रवीण शाह(जैन)परम आदरणीय अवतार स्वरूप  डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी पर लगाए झूठे आरोपों की पोल खुलने पर लज्जित होगा ।
न ही किलर झपाटा के मुखौटे से लिखने वाला राक्षस अपनी कुत्सित हरकतें बंद करेगा।
न ही भड़ास के दूसरे संचालक भाई रजनीश के.झा अब भड़ास पर सक्रिय रह पाएंगे क्योंकि उन्हें इस अंदाज में उलझा लिया होगा कि वे अब भड़ास पर नहीं दिखते ये राक्षस ऐसा कर सकते हैं।
इसके बावजूद इनसे डरने की जरूरत नहीं है बल्कि इनका मुकाबला करने की आवश्यकता है अहिंसा के मीठे जहर से बचते हुए भगवान कृष्ण के उपदेशानुसार ।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास  

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प्रवीण शाह और अमित जैन से थोड़ी भौं-भौं और थोड़ी ढेंचू-ढेंचू

गुरुवार, 5 मई 2011

प्रवीण शाह और अमित जैन से थोड़ी भौं-भौं और थोड़ी ढेंचू-ढेंचू कर रहा हूँ पूरी उम्मीद है कि समझ सकेंगे
प्रवीण शाह से
प्रवीण शाह जी आप सेना में ग्यारह साल पहले मेजर थे ये अच्छी बात प्रतीत हुई। आपकी शिक्षा के बारे में मार्कशीट आदि की बात नहीं करते हुए बस इतना तो बता दीजिये कि किस बटालियन में थे अब क्या घबराना या छिपना जब तक फौज में थे तब तक प्रतिबंध रहा होगा पहचान सहित आइये न, मैं जल्द ही डॉ.रूपेश जी से मिलने उनके घर जाने वाला हूँ?अब तक भड़ास के सदस्य बने या नहीं?क्या वजह है जो स्वयं कह कर भी खुद को प्रकरण से मुक्त नहीं कर पा रहे हैं??
आपके तर्कों से कोई इन्कार नहीं है लेकिन बस इतना बताइये कि यदि आप तर्क की बात कर रहे हैं कि जो आप मानते हैं वही आपके लिये सत्य होता है या जो सत्य होता
है उसे आप मानते हैं या जो भी बात तर्क से प्रमाणित हो जाए उसे आप सत्य मानते हैं या आपकी सोच में कोई सत्य सृष्टि में ऐसा नहीं है जो तर्कबाह्य हो??
अब अमित जैन से जरा बात हो जाए.....
अमित जैन तुमने मुझे विद्वता का ढोंग करने वाला बताते हुए लिखा है कि मैं टांग उठा कर मूत्रविसर्जन करता हूँ तो बस इतना बता दो कि तुम किस आसन या मुद्रा में मूतते हो? या संजय कटारनवरे की बात पढ़ते ही अपने आप बिना किसी तैयारी के पतलून में ही छूट जाती है और तुम्हें टाँग उठाने का मौका ही नहीं मिल पाता?मैंने कब इन्कार करा कि ठीकरा मेरे सिर मत फोड़ो?जब भड़ास मे मंच पर आया हूँ तो सिर माथे को इतना मजबूत तो रखना ही चाहिए कि ठीकरे ही नहीं बल्कि तुम जैसे धूर्त यदि मक्कारी का पहाड़ भी मेरे सिर पर पटक दें तो सिर सच्चाई अच्छाई के पक्ष में तना रहे। तुम कार्टून बनाओ और प्रवीण शाह तुम्हारी प्रशंसा करें तो पता चलता है कि दोनो कितने तार्किक और निष्पक्ष हो ये तो दुनिया देख रही है।
दीदे फाड़ कर देख सकते हो अमित कि तुम खुद ही डॉ.रूपेश श्रीवास्तव के साथ सभी को अंधविश्वासी भी जता रहे हो और फिर थूक कर चाट भी रहे हो कि मैंने नहीं कहा, ये तुम्हारी फ़ितरत है और भ्रमित करने की ट्रिक भी।
तुम शोध किसे कहते हो घटना का वीडियो बनाना उसका यथा संभव तरीके से परीक्षण करना क्या तुम्हें शोध प्रक्रिया न लग कर ऐसा लगता है कि डॉ.रूपेश झक्की और सनकी हैं जो अपने चूतियापे के चलते ये सब कर रहे थे और अभी भी लगे हुए हैं?तुमने अब तक कार्टून बना कर बस अंधविश्वास शब्द की माला फेरने के अलावा क्या करा है? डॉ.साहब ने जो लिखा है तुमने उस पर कोई कार्टून नहीं बनाया क्या उनकी बातों में तुम्हें सत्यता प्रतीत होती है??
जय जय भड़ास
संजय कटारनवरे
मुंबई

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डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 4

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

इस रहस्यमय नृशंस हत्या के खुलासे की पहली कड़ी- भाग १

जिन्हें ये हत्या मात्र मनगढंत कहानी लग रही है वे इस दूसरी कड़ी को भी पढ़ें- भाग-२

डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग 3
गत पोस्ट से आगे......
तांत्रिक के कई बार मना करने पर भी कि आप खुले हाथों से इस मारण कर्म की सामग्री को न छुएं अन्यथा इसका आपको गम्भीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है, हमारे अवतार स्वरूप डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी एक एक वस्तु को कैमरे के सामने रखते दिखाते जा रहे थे। इसके बाद जब उस तांत्रिक ने सब निकालने के बाद देवी के बनाए हुए विग्रह के सामने हवन करा और शेष हवन सामग्री को छोड़ते हुए कहा कि आप सभी लोग क्रमशः अग्नि में हव्य डालते हुए सामग्री समाप्त कर दें। देवी के विग्रह के पास रखे हुए फल मेवा आदि को प्रसाद के रूप में अगले दिन बाँटने की हिदायत देकर तांत्रिक चला गया लेकिन जाते जाते ये कह गया कि देखिये मैंने आपके कहने पर जो भी हो सकता था करा लेकिन माताजी के लिये करे गये मारण कर्म में निर्धारित मुद्दत समाप्त हो चुकी है। अब जब बाकी लोग सन्नाटे में थे तो हमारे डॉ.साहब ने मुनव्वर आपा को कैमरा पकड़ा कर बाल्टी में भरे सामान को दोबारा एक-एक करके निकालना शुरू कर दिया और साड़ी के उस टुकड़े को पूरा खोल डाला जो कि पपीते में से निकला था उसकी लम्बाई लगभग डेढ़ मीटर के आसपास थी ब्लाउज की आस्तीनें जो लिपटी हुई रखी थी वो भी खोल डाली। पपीते के उन काटे हुए टुकड़ों को हर तरह से मैग्नीफ़ाइंग लेंस से भी देखा कि कहीं ये टुकड़े पहले काट कर चिपकाए हुए तो नहीं थे। बहरहाल जब उन्होंने नग्न आँखों और लेंस से देखने पर भी कुछ न पाया तो दोबारा सब समेट कर उसी बाल्टी में भर दिया।
इसी बीच जब डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी के बड़े भाईसाहब ने उस सभी तांत्रिक सामग्री की बाल्टी को बाहर ले जा कर फेंकने के लिये उठाया तो अचानक झटके से छोड़ दिया और पलट कर पीछे देखा क्योंकि उन्हें लगा कि किसी ने उनकी कमर पर एक जोर से लात मारी हो। जब वहाँ मौजूद लोगों नें पूछा कि क्या हुआ तो उन्होंने बताया कि ऐसा लगा कि किसी ने कमर पर लात मारी और आश्चर्य कि देखने पर बाकायदा उनकी कमर पर जूते के सोल का निशान छपा हुआ था जिसकी तस्वीर डॉ.साहब ने तुरंत ली और भाईसाहब व अन्य किसी को भी उन वस्तुओं को हाथ लगाने से मना कर दिया। स्वयं डॉ.साहब उस बाल्टी को लेजाकर कूड़े के ढेर पर दूर जाकर फेंक कर आए। घर में डर, आश्चर्य, इस बात की खुशी के शायद समस्या हल हो गयी है ये सारे भाव तैर रहे थे।
शेष जल्द ही आगे की सच्चाई.......
लेकिन देखिए कि सच्चाई सामने आने से राक्षसों में डर छा गया है इसलिये वे हमें इस बात से हटाने के लिये कभी उल्टी सीधी पोस्ट लिखते हैं और कभी ऊटपटाँग कमेंट्स करते हैं यानि हम सही दिशा में इन दुष्टों को पकड़ रहे हैं।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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अनूप मंडल जी डॉ.रूपेश श्रीवास्तव की स्वर्गीय माताजी की हत्या के प्रकरण को आगे बढ़ाएं

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

आप सब जब इस बात को जानते हैं कि आपके विरोधी किस तरह की चालाकियाँ करके आपके सच और ईमान से डिगाने की कोशिश करते हैं तो फ़िर आप उनकी बातों में क्यों उलझ पड़े? आप सब लोग इतनी रहस्यमय बात को सामने ला रहे हैं इस के लिये मैं निजी तौर पर आपका आभारी हूँ। माताजी की मृत्यु नैसर्गिक न होकर एक रहस्यमय तरीके से करी गयी हत्या है इस राज़ को पूरी तरह से सामने लाइये किसी की बात में मत फंसिये। मैं चाहता हूँ कि डॉ.साहब मेहरबानी करके इस प्रकरण से संबंधित फोटोग्राफ़्स और वीडियोज़ को मुझे भी भेज दें। डॉ.रूपेश के भड़ासी व्यक्तित्व का मैं कायल हूँ वे ही ऐसा कर सकते हैं।
अनूप मंडल की जय
जय जय भड़ास

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राक्षस हरसंभव कोशिश में हैं कि डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी की माँ की हत्या का रहस्य न खुले

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

जब से अनूप मंडल ने हमारे अवतार स्वरूप परम आदरणीय भड़ास के संचालक डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी की माताजी की तंत्र-मंत्र द्वारा करी रहस्यमय हत्या का रहस्य खोलना शुरू करा तबसे सारे राक्षसों के कान खड़े हो गये। अब राक्षसों की कोशिश है कि वे किसी भी तरह से इ प्रकरण को भटका कर दबा दें और लोग इसे भूल जाएं इसके लिये भड़ास पर ही सक्रिय एक राक्षस कैसे कैसे प्रयास कर रहा है ये हम आप सबके सामने ला रहे हैं। जरा गौर से देखें कभी ये "ताऊ" नाम के ब्लॉगर के नाम से कमेंट कर के भाई दीनबंधु जी को भ्रमित करने की कोशिश करता है और कभी संचालक जी को भ्रमित करने की नाकामयाब कोशिश कर रहा है। राक्षसों तुम पहचाने जा चुके हो अब तुम्हारी खैर नहीं।
जय भड़ास
जय जय भड़ास

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लीजिये मैं भी हो आया यमराज के पास......

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010


अभी यमराज जी के ब्लॉग पर गया था तो पाया कि बदस्तूर स्पेलिंग मिस्टेक करे चले जा रहे हैं और गूगल का एडसेंस नहीं लगाया है क्योंकि हिंदी में शायद अब तक ये अनुमेय नहीं है। बहरहाल यम अंकल कमेंट मॉडरेशन लगा दें इससे पहले जितने कमेंट कर सकते हो कर लो भड़ासियों। मैं भी एक कमेंट करने के साथ उनकी भी पोस्ट लेकर चित्र के रूप में आया हूँ। मैं तो नतमस्तक हूँ मुनव्वर आपा और हमारे डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी के आगे जिनसे सीधे यमराज मुखातिब हैं।
जय जय भड़ास

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यमराज ने भड़ास पर सिद्ध कर दिया कि मुस्लिम,ईसाई,जैन,बौद्ध आदि धर्म झूठ के पुलिंदे हैं हिंदू धर्म ही सच्चा है

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

मृत्यु के अधिष्ठाता देवता यमराज कुछ दिनों से भड़ास पर पधार रहे हैं ये देख कर अच्छा लगा कि कम से कम यमराज ने अपने होने की बात से एक सच की किरण हम मूढ़ भड़ासियों की तरफ चमका दी कि दीदे फाड़ कर देखो जैसे मैं मृत्यु का देवता हूं हिंदू धर्म शास्त्र में वर्णित कथाओं में वर्णित अन्य देवता भी हैं जिनका अस्तित्त्व मात्र मेरे होने से ही सिद्ध हो रहा है। यमराज जी आप की बहन यमुना जी में भी प्रदूषण बढ़ रहा है क्या आप इसके प्रति चिंतित नहीं है या सिर्फ़ डॉ.रूपेश श्रीवास्तव के कूड़ा भरे दिमाग का कचरा साफ़ करने के लिये आपको हिंदी में ब्लॉगिंग शुरू करनी पड़ी। मैं डॉ.रूपेश श्रीवास्तव और अनूप मंडल के लोगों का हृदय से आभारी हूं कि उन्होंने ऐसी परिस्थिति उपजा दी कि आखिरकार देवी देवताओं(हिंदू धर्म में अवतारवाद और देवी-देवताओं को मानने वाला फिर्क़ा ही सही सिद्ध हुआ, ईश्वर को निराकार प्रकाश स्वरूप मानने वाले हिंदू भी मूरख सिद्ध हुए बाकी मुस्लिम, जैन, क्रिश्चियन आदि तो बहुत दूर से ही परम मूरख सिद्ध कर दिये यमराज जी ने हिंदी में ब्लॉगिंग करके) को इस मामले में उतर कर आना पड़ा।
वैसे एक बात और कहनी है यमराज जी कि अगली पोस्ट लिखियेगा तो जरा अपने सहकर्मी चित्रगुप्त जी से भड़ासियों के पाप-पुण्य का हिसाब-किताब पूछ कर बता दीजियेगा ताकि हम अभी से दिमागी तौर पर तैयार हो सके कि हमें कितने लाख साल तक नर्क में बिताना पड़ेगा आपको दुखी करने के बदले में क्योंकि अब तो भड़ास पर आपको आना पड़ेगा हम तो आपकी नई शुरू करी दुकान पर जाने से रहे आप तो जानते है कि जब आप आकर प्राण निकाल कर घसीटते हुए ले जाते हैं तब भी हमारे जैसे ढीठ भड़ासी हाथ छुड़ा कर भाग आते होंगे और आपको उनके पीछे भैंसा लेकर वापिस आना पड़ता होगा।
आप हिंदी लिखने में वर्तनी की गलतियाँ(स्पेलिंग मिस्टेक) थोक भाव में करते हैं क्योंकि आप देवता लोग तो संस्कृत में ब्लॉगिंग करते होंगे।
जय जय भड़ास

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यमराज ने भड़ास पर सिद्ध कर दिया कि मुस्लिम,ईसाई,जैन,बौद्ध आदि धर्म झूठ के पुलिंदे हैं हिंदू धर्म ही सच्चा है

मृत्यु के अधिष्ठाता देवता यमराज कुछ दिनों से भड़ास पर पधार रहे हैं ये देख कर अच्छा लगा कि कम से कम यमराज ने अपने होने की बात से एक सच की किरण हम मूढ़ भड़ासियों की तरफ चमका दी कि दीदे फाड़ कर देखो जैसे मैं मृत्यु का देवता हूं हिंदू धर्म शास्त्र में वर्णित कथाओं में वर्णित अन्य देवता भी हैं जिनका अस्तित्त्व मात्र मेरे होने से ही सिद्ध हो रहा है। यमराज जी आप की बहन यमुना जी में भी प्रदूषण बढ़ रहा है क्या आप इसके प्रति चिंतित नहीं है या सिर्फ़ डॉ.रूपेश श्रीवास्तव के कूड़ा भरे दिमाग का कचरा साफ़ करने के लिये आपको हिंदी में ब्लॉगिंग शुरू करनी पड़ी। मैं डॉ.रूपेश श्रीवास्तव और अनूप मंडल के लोगों का हृदय से आभारी हूं कि उन्होंने ऐसी परिस्थिति उपजा दी कि आखिरकार देवी देवताओं(हिंदू धर्म में अवतारवाद और देवी-देवताओं को मानने वाला फिर्क़ा ही सही सिद्ध हुआ, ईश्वर को निराकार प्रकाश स्वरूप मानने वाले हिंदू भी मूरख सिद्ध हुए बाकी मुस्लिम, जैन, क्रिश्चियन आदि तो बहुत दूर से ही परम मूरख सिद्ध कर दिये यमराज जी ने हिंदी में ब्लॉगिंग करके) को इस मामले में उतर कर आना पड़ा।
वैसे एक बात और कहनी है यमराज जी कि अगली पोस्ट लिखियेगा तो जरा अपने सहकर्मी चित्रगुप्त जी से भड़ासियों के पाप-पुण्य का हिसाब-किताब पूछ कर बता दीजियेगा ताकि हम अभी से दिमागी तौर पर तैयार हो सके कि हमें कितने लाख साल तक नर्क में बिताना पड़ेगा आपको दुखी करने के बदले में क्योंकि अब तो भड़ास पर आपको आना पड़ेगा हम तो आपकी नई शुरू करी दुकान पर जाने से रहे आप तो जानते है कि जब आप आकर प्राण निकाल कर घसीटते हुए ले जाते हैं तब भी हमारे जैसे ढीठ भड़ासी हाथ छुड़ा कर भाग आते होंगे और आपको उनके पीछे भैंसा लेकर वापिस आना पड़ता होगा।
आप हिंदी लिखने में वर्तनी की गलतियाँ(स्पेलिंग मिस्टेक) थोक भाव में करते हैं क्योंकि आप देवता लोग तो संस्कृत में ब्लॉगिंग करते होंगे।
जय जय भड़ास

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डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग ३

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

इस रहस्यमय नृशंस हत्या के खुलासे की पहली कड़ी
जिन्हें ये हत्या मात्र मनगढंत कहानी लग रही है वे इस दूसरी कड़ी को भी पढ़ें
अब आगे.....
बड़े भाईसाहब ने जब उन लटकाए हुए पपीतों को तांत्रिक के कहने पर उतार कर उसे दिया तो बताया कि इन पपीतों का भार अधिक लग रहा है। तांत्रिक ने पूजा आदि का विग्रह सजा कर हल्दी के चूर्ण से एक वृत्ताकार मंडल बनाया जिसमें रख कर उसने पपीतों पर बंधा लाल कपड़ा खोला और एक एक करके उन्हें घर के चाकू से ही काटा। पपीते काटने पर बीजों के अलावा क्या निकलेगा ये तो उम्मीद ही न थी लेकिन जब पहले पपीते में से साड़ी का एक तिहाई टुकड़ा, करीब दो सौ ग्राम सूखी लाल मिर्चें आदि जैसी सामग्री निकली तो सभी लोग भौचक्के रह गये जबकि खुद डा.रूपेश श्रीवास्तव क्लोज-अप मैजिक यानि नजदीक से दिखाए जाने वाली जादुई ट्रिक्स के बारे में काफ़ी कुछ जानते हैं, नारियल मे से देवी मां का वस्त्र, समूचा अंडा आदि निकाल लेने जैसी ट्रिक्स वे स्वयं बहुत सफ़ाई से कर लेते हैं क्योंकि वे बहुत दिनों तक अंधश्रद्धा निर्मूलन के लिये काम करते रहे हैं। इसलिये जाहिर सी बात है कि उनके आगे कोई हाथचालाकी करना तो लगभग असंभव है। सबसे बड़ी बात है कि इस पूरी घटना को वे स्वयं इन बातों पर सहज विश्वास न होने के कारण कैमरे में बिना रुके कैद करते जा रहे थे जिसकी बिना किसी कट के पूरी लगभग पौने घंटे की वीडियो उनके पास मौजूद है जिसे हम सभी अनूप मंडल के लोगों ने पच्चीसों बार संदेह करते हुए देखा है कि शायद कुछ पकड़ में आ जाए। दूसरा पपीता तांत्रिक ने काटा तो उसमें से बकरे की घुटनों से काटी हुई चार टांगें, दो अंडे, दो शंख जिनके मुंह बालों के गुच्छे से बंद करे गए थे,ब्लाउज की दो काटी हुई आस्तीनें, अगरबत्तियां आदि सामग्री निकली। डा.साहब और बहन भारती जी के अनुसार इस पूरे काम के दौरान कमरे में ऐसी गंध विद्यमान थी जैसे कि मांस के जलने पर आती है जिसके कारण उन्हें भयंकर उल्टी सी आ रही थी। तीसरा पपीता काटने पर उसमें से कुछ हड्डियां, दो लाल कपड़े और लकड़ी से बनाई गुडियानुमा आकृतियां, दो नींबू जिनमें कि पचास साठ आलपिनें चुभोई हुई थी आदि निकली। तांत्रिक इस सारे सामान को बिछाए हुए पुराने अखबार पर आक(मदार) के पत्तों से पकड़-पकड़ कर रखता जा रहा था और उसके बार बार मना करते रहने के बावजूद हमारे डा.रूपेश जी उस सामान को एक एक उठा कर अपने कैमरे के लैंस के बिलकुल पास लाकर दिखा रहे थे ताकि सब देख सकें कि क्या सामान है।
शेष आगे लिखेंगे ये सत्य आपके सामने अवश्य लाया जाएगा................
इस पूरी घटना के विस्तार से लिखने के पीछे एक महत्तम कारण है कि महाशय तारकेश्वर गिरी जी जैसे लोगों का ये भ्रम दूर करा जा सके कि आंखे और बुद्धि उनके अलावा अन्य लोगों के पास भी हैं। अनूप मंडल और भड़ास परिवार ने आजतक जो भी करा और कहा है वह आधारहीन,तथ्यहीन व तर्कहीन नहीं रहा है। यदि किसी भी स्वयंभू विद्वान या बुद्धिमान में सत्य को स्वीकारने का साहस है तो भड़ास के मंच पर आकर इस विषय पर विमर्श करे कि जादू-टोना है या नहीं।
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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डा.रूपेश जी की माता जी की मृत्यु नैसर्गिक नहीं बल्कि अत्यंत क्रूर हत्या थी- भाग २

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

पिछले आलेख से आगे की रहस्यमय हक़ीकत पढ़िये जो स्वयं भड़ास के संचालक डॉ.रूपेश श्रीवास्तव पर बीती है .........
तांत्रिक ने कहा कि तीन पपीते ले आइये जिनका वज़न चार किलो के आसपास हो यानि कि पर्याप्त बड़े हों। जाहिर सी बात है कि इतने बड़े पपीते सामान्यतः नहीं मिलते लेकिन हमारे महाभड़ासी डॉक्टर साहब के क्या कहने वाशी नई मुंबई के फल बाजार में जाकर कम से कम पच्चीस ट्रक छान मारे और तीन की बजाए छह पपीते लाकर रख दिये। अब उस तांत्रिक ने कहा कि आप पपीते लेकर मेरे घर आ जाइये मुझे उन फलों पर कुछ मंत्र पढ़ने हैं। दिन में साढ़े ग्यारह बजे से लेकर शाम साढ़े पाँच बजे तक पपीते उस तांत्रिक के घर रखे रहे। डॉ.रूपेश जी स्वयं अपने बड़े भाईसाहब के साथ इस काम में पूरे समय साथ रहे। शाम को पपीते लेने जाने पर डॉ.रूपेश ने आशंका व्यक्त करी कि भाई हो सकता है कि उसने कुछ कलाकारी कर के फलों के अंदर कुछ घुसा दिया हो लेकिन जब वे उसके घर पहुंचे तो उन्होंने पाया कि जिस तरह वे पपीते रखे छोड़ आए थे वे फल उसी तरह रखे थे लेकिन पपीते लेकर आते समय कहा कि इनका दोबारा वजन करा लेते हैं क्योंकि हर पपीते का वजन तो हमें पता ही है। भाई साहब ने कहा कि अगर इन फलों को काट कर इनमें कुछ घुसाया गया होता तो दोबारा चिपका देने पर हाथ में लेने पर ही वजन में अंतर महसूस होता चलकर इन्हें घर में टाँगते हैं व्यर्थ संदेह करके तौलने में समय मत नष्ट करो। ये भी सही था कि हमारे हाथ इतना अंतर तो महसूस कर ही सकते हैं। घर लाकर एक आलमारी में पपीते कहे अनुसार लटका दिये। और तीसरे दिन शनिवार को उस बंदे ने आकर ये कह कर उन पपीतों को काटा कि जो भी किया-कराया होगा वह इन फलों में देवी माँ की शक्ति से आ जाएगा। तीन चार पढ़े-लिखे लोग जिनमें कि बहन भारती सक्सेना, वरिष्ठ भड़ासिन बहन मुनव्वर सुल्ताना जी, बड़े भाई श्री भूपेश श्रीवास्तव और स्वयं डॉ.रूपेश अपना कैमरा लिये मौजूद थे। तांत्रिक ने कहा कि देखिए माँ की प्राणरक्षा के विषय में जो कर रहा हूं उसका फलदायी होना भगवान के हाथ है क्योंकि करे हुए मारण तंत्र की मुद्दत छह माह की थी जो कि कोजागिरी पूर्णिमा को समाप्त हो चुकी है अब सब कुछ ईश्वर के हाथ है। उसने पूजा-पाठ करते हुए तीनों पपीते भाईसाहब को लाने के लिये कहे जिन्हें भाईसाहब ने जब उतारा तो बताया कि इनका भार तो अधिक महसूस हो रहा है.............
आगे जानिए कि क्या हुआ इस पूरी प्रक्रिया में जो राक्षसी कर्म थी
जय नकलंक देव
जय जय भड़ास

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माता जी की मृत्यु के बाद सिर्फ़ भड़ास-भड़ास ही लिखने का दिल कर रहा है

रविवार, 21 नवंबर 2010

मुंबई के तमाम भड़ासी मेरी माताजी की मृत्यु के बाद और उससे पहले से ही मेरे साथ ऑफ़लाइन रह कर मुझ दो हाथ वाले प्राणी का माताजी की तीमारदारी में सहयोग कर रहे थे। माँ तकरीबन दो माह से बिस्तर पर ही थीं। मन को संतोष देने के लिये कह सकते हैं कि उम्र हो गयी थी तो एक न एक दिन जाना ही था लेकिन मन पर एक बोझ है जो भड़ास के अलावा किधर निकाला जा सकता है। भाई अजय मोहन से लेकर मुनव्वर सुल्ताना आपा तक सभी तो जानते हैं। बुज़ुर्ग सहयोगी जनाब मुहम्मद उमर रफ़ाई साहब से लेकर बादशाह बासित सभी तो अपने अपने स्तर पर लगे हुए थे कि किस तरह माताजी के लिये कुछ कर सकें। बादशाह बासित ने जहाँ अपने सारे दोस्तों को sms करे कि मेरी नानी जी के स्वास्थ्य के लिये प्रेयर करिये वहीं रफ़ाई साहब ने आब-ए-ज़मज़म से लेकर तस्बीह तक हाथ में लेकर न जाने क्या क्या जाप कर डाले। मुंबई जैसे बड़े शहर के तमाम नामचीन अस्पताल और उनकी रिपोर्ट्स लगातार कराए जाते रहे पैथोलॉजिकल टैस्ट्स एक दिन २९ अक्टूबर शाम ६:५० पर सब थम गया। माता जी की साँसों की डोर टूट गयी। माताजी की मृत्यु का कारण आज तक हमारी समझ में न आया क्योंकि उन्हें तो बस बुखार ही रहा करता था जिसे हम लोग किसी भी तरह से नियंत्रित करने का प्रयास करते रहते और वो था कि पागल साँड की तरह मेडिकल साइंस को धकियाता रहता था जैसे ही दवा देते साला 99 से बढ़ कर दस मिनट में 104 तक चला जाता और माँ बेसुध रहती, हम सब पागल की तरह ठंडे पानी की पट्टियां रखते पंद्रह बीस घंटे बिता देते तब कहीं जाकर हौले हौले बुखार नीचे आता और माँ धीमी आवाज़ में आँखें खोल कर पानी माँगती जिसे हम लोग बड़ी सफलता की तरह देखते दो चम्मच पानी हलक से नीचे उतर जाता तो बड़ी बात रहती इस बीच में हम सब इस जुगाड़ में रहते कि कुछ जूस आदि पिला दिया जाए।
बस्स्स्स्स्स...........
बस्स्स्स्स्स....
दिमाग खराब नहीं हुआ है मेरा कि ये सारी रामकहानी लिखूं । बात तो अभी आगे है जो कि लिखना शुरू करना है।
निवेदन है कि बिना जानकारी और पुख्ता सबूत के इस अनुभव में कोई न कूदे। मैं अपनी बातो के साथ समय समय पर प्रमाण के तौर पर चित्र वीडियो आदि रखता चलूंगा।
अनूप मंडल के विद्वानों से निवेदन है जैनों को कुछ समय के लिये छोड़ कर आप इस मामले में अपनी राय अवश्य रखियेगा।

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मीडिया क्लब ऑफ़ इंडिया एण्टी-मुस्लिम अमेरिकी एजेन्ट है

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

किसी भी पढ़ने वाले के लिये ये एक बड़ा झटका हो सकता है कि गंवार भड़ासी गली मौहल्ले की चिरकुट बातें छोड़ कर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बातें कब से उगलने लगे लेकिन आपका सामना जितने बड़े मक्कार और धूर्तों से होता जाता है आप उनसे लड़ते लड़ते उनके विरोध के स्तर तक बढ़ ही जाते हैं। अब हमारा सामना हुआ ऐसे लोगों से जो कि चाहते हैं कि हर विकासशील देश में अस्थिरता बनी रहे चाहे वह किसी भी बात को अपने औजार की तरह प्रयोग करें धर्म, राजनीति, सामाजिक व्यवहार.....। इस तरह के विचार को केन्द्र में लेकर काम करने वाले लोग जब इंटरनेट पर एकत्र हो जाते हैं तो मीडिया क्लब ऑफ़ इंडिया जैसे मुखौटाधारी संगठन बना कर खुद को पेश करते हैं जिसमें वे अपने जैसे कुछ धूर्त मीडिया कर्मी, छद्म समाजसेवक, विचारक-चिंतक आदि को साथ लेकर चलते हैं। मीडिया क्लब ऑफ़ इंडिया की केन्द्रीय सोच पूरी तरह से मुसलमानों के विरोध में है यह तो इनको देखने से पता चलता है कि ये धार्मिक आस्था को हथियार बना कर किस तरह से कार्य कर रहे हैं, कृष्ण जन्माष्टमी पर बैनर पर राधा-कृष्ण का चित्र और फिर उसके बाद गणेश चतुर्थी के चलते गणपति का चित्र लेकिन इसी बीच में ईद भी आयी परन्तु संचालकों ने झूठी शुभेच्छाएं तक न दीं। दावा करा जाता है कि अमुक साइट पर इतने हजार या इतने लाख सदस्य हैं तो इन दावों की बात ऐसी है कि मास्टरमाइंड एक और उसके इर्दगिर्द दो चार विश्वासपात्र बाकी सब पिछलग्गू होते हैं जिन्हें अपनी तस्वीर छपी देखने में ही आनंद आता रहता है। इस साइट पर एक फ़र्जी प्रोफ़ाइल है "दीपा बिस्वास" जो कि अमेरिका द्वारा बाकायदा सेट लगाकर प्रोफ़ेशनल कलाकारों द्वारा अभिनीत करके बनाए गये उन वीडियोज तक आपको पहुंचाने का काम करता है जो ये सिद्ध करने के लिये चित्रित करे जाते हैं कि मुसलमान अत्यंत क्रूर होते हैं। इस तरह के वीडियोज़ की हकीकत ये रहती है कि यू-ट्यूब, ट्रुथ टीवी आदि पर हिंसा,बलात्कार,बाल यौन उत्पीड़न आदि अपलोड न करे जाने की शर्त के बावजूद भी इस तरह के वीडियो रहते हैं और संचालन/प्रबंधन इन्हें बराबर बनाए रखता है जैसे बंदियों के सिर काटने आदि के वीडियो फ़ुटेज। कहा जाता है कि जिस मंच की लड़ाई हो उसी पर लड़ी जाए लेकिन जब मंच का संचालन ही आपके विरुद्ध हो और लोकतांत्रिक सोच न रखता हो तो हाल भड़ासियों जैसा होता है कि इन महामक्कारों ने मुझे यानि भड़ास के संचालकों में से एक को पहले मेरे लेखन को देखते हुए हजार बार आमंत्रित करा कि मैं सदस्यता ले लूँ जब मैंने सदस्यता लेकर लिखना शुरू करा और इन धूर्तों की पोलें खोलना शुरू करी तो इन्होंने बिना किसी चर्चा के मेरी सदस्यता मेरे आई.पी.पते के आधार पर ही रद्द कर दी। ये बात अलग है कि इन अमेरिका का मूत्र प्राशन करने वाले लोगों को नहीं पता कि मैं कौन हूँ, डॉ.रूपेश श्रीवास्तव कब किस कम्प्यूटर से निकल कर इनकी बैंड बजा देगा इन्हें नहीं मालुम कि भड़ासियों की वजह से मेरे हजारों हाथ हैं। मैं प्रतिज्ञाबद्ध हूँ कि दीपा बिस्वास और उस जैसों की आड़ में भारत में साम्प्रदायिक वैमनस्य का पोषण करने वाले इन दुष्टों से लड़ता रहूंगा। मुझे उन गधे किस्म के मुस्लिम लोगों से कुछ नहीं कहना जो मीडिया क्लब ऑफ़ इंडिया के सदस्य हैं क्योंकि वे भारतीयता और लोकतंत्र को समझ ही नहीं सकते।
जय जय भड़ास

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मीडिया क्लब ने डॉ.रूपेश श्रीवास्तव को प्रतिबंधित करके अविवेक का परिचय दिया है।

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

मीडिया क्लब के कुलदीप श्रीवास्तव के बार बार निमंत्रण भेजे जाने पर डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी ने सदस्यता स्वीकार ली और जब लिखना शुरू करा तो जो बनावटी और ढकोसलेबाज लोग वहाँ मौजूद थे उनमें खलबली मच गयी। सच तो ये है कि कुलदीप श्रीवास्तव भी एक कुपत्रकार ही सिद्ध हुए जो शायद डॉ.रूपेश श्रीवास्तव से ये पूछ बैठे कि आप पत्रकारिता और ब्लॉग लेखन में कैसे और कब आ गये। कुलदीप ने भड़ास की क्षमता को इतना कम आँक लिया कि ये सोच बैठे कि मीडिया क्लब जैसी धंधेवाली वेबसाइट पर प्रतिबंधित कर देने से महाभड़ासी डॉ.रूपेश श्रीवास्तव को रत्ती भर भी अंतर पड़ेगा। ये तुम्हारा अविवेक और अलोकताँत्रिक स्वभाव ही है जो कि तुम बिना किसी चर्चा के किसी को भी प्रतिबंधित कर देते हो। तुम लोग अव्वल दर्जे के मूर्ख हो इसलिये कि तुमने सिर्फ़ उनके कम्प्यूटर के आई.पी.एड्रेस से बैन लगा कर ये सोच लिया कि उनके विचार रुक जाएंगे। दुष्ट बालक बुद्धियों तुम्हें ये नहीं पता कि ब्लॉगवाणी नामका एग्रीगेटर जिसे सब ब्लॉगर तेलमालिश करते थे उसने डॉ.रूपेश के आयुषवेद ब्लॉग और भड़ास को प्रतिबंधित कर दिया तो भी उनका क्या बिगड़ गया उल्टा ब्लॉगवाणी के ही बुरे दिन आ गये थे। वो विचार हैं व्यक्ति नहीं कि तुम उन्हें रोक लोगे। वो एक जगह नहीं हजार जगह से चाहें तो तुम्हारी दुकान पर आकर तुम्हारे गुड़ की जगह गू और धनिया की जगह घोड़े की लीद बेचने की नीति का बनियापा दुनिया के सामने ला सकते हैं लेकिन हम सब जानते हैं कि भड़ास ही काफ़ी है। तुम्हारे गैर सरकारी संगठन चलाने वाले धूर्त सहयोगी हों या फिर पत्रकारिता के कलंक सबकी रुलाई रोके नहीं रुक रही थी जब भड़ास का लावा तुम्हारे मंच पर बहने लगा, सियार और लोमड़ चिल्ला चिल्ला कर भागने लगे और भड़ासी पर प्रतिबंध लगा दिया। हम तुम्हारे अविवेकी और अलोकताँत्रिक निर्णय की निन्दा करते हैं, थू... है तुम और तुम्हारी नीतियों पर। दया आती है उन भोले लोगों पर जो तुम्हारे पाखंड में फँस कर तुम्हें बहुत उदार लोकताँत्रिक मंच मान रहे हैं।
जय जय भड़ास

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श्रीमती आशा जोगलेकर जी ! बौद्धिकता और प्रमाद में क्या अंतर होता है ये आपको पता है??

गुरुवार, 13 मई 2010

श्रीमती आशा जोगलेकर जी ने कितने भरोसे कह दिया कि न तो डॉ.रूपेश श्रीवास्तव का मुंबई से कोई संबंध है और न ही उनका कोई अपना हादसे का शिकार हुआ है, न ही वे आक्रमणकारी का अर्थ समझते हैं.....
विद्वता,बौद्धिकता और प्रमाद में क्या अंतर होता है ये आपको पता है मोहतरमा?आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि मुनव्वर सुल्ताना आपा, हमारे बड़े भाई और गुरू डॉ.रूपेश श्रीवास्तव,फ़रहीन नाज़, भाई अजयमोहन,भाई दीनबंधु,भाई हरभूषण सिंह जैसे तमाम भड़ासी मुंबई में ही रहते हैं। आपने कैसे कह दिया कि हमने किसी अपने को इस हादसे में नहीं खोया था क्या दिव्य दृष्टि संपन्नता के चलते ऐसी सिद्धि है आपको?? क्या आप न्यायपालिका की लाचारी पर करे डॉ.रूपेश के इस गहरे व्यंग को समझने की अक्ल नहीं रखती हैं या दो लाइन देख कर टिप्पणी कर देने की आदत आपको भी है???क्या आपको इस आलिख में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाईसाहब अजमल कसाब का पक्ष ले रहे है?? उन्होंने एक विमर्श रखा है लेकिन आप बौद्धिक लोग हैं हम जैसे गंवारों की बात कैसे समझ पाएंगे। जब ये आक्रमण हुआ था उस समय हमारे डॉ.रूपेश श्रीवास्तव सी एस टी रेल्वे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नं.13 पर बने चालकों के केबिन में अपने चालक दोस्तों के साथ बैठे थे और क्या हुआ था उन्होंने खुद उस सब को झेला है आपकी तरह विदेश में बैठ कर हम टीका टिप्पणी नहीं करते हैं,आप अभी डॉ.रूपेश श्रीवास्तव के व्यक्तित्व के बारे में कुछ जान ही नहीं सकी हैं इसलिये ऐसा लिख रही हैं लेकिन इसमें आपका दोष नहीं है आप इतनी दूर जो हैं यदि पास होतीं तो जान सकती कि वो क्या शख्सियत हैं।
जय जय भड़ास

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परम फ़ादरणीय गौरव महाजन जी -७

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

अब पिताजी से उनकी रोटी देने वाली भाषा में मुखातिब होकर बतिया लूँ
Respected father as you wrote that education and intelligence both are different things but do you really know intelligence and intellect are also different? Education is only a process that results to convert a person in a civic citizen, it simply does not belong to knowledge it only has the base of collective information.
शायद पिताजी मेरी टूटीफ़ूटी बात को समझ सकें क्योंकि मैं जानता हूँ कि मातापिता अपने बच्चों की तोतली जुबान में कहे टूटे फ़ूटे अस्पष्ट शब्दों को भी आसानी से समझ लेते हैं उसका बस एक ही कारण है कि वे माता पिता हैं और जब आदरणीय गौरव "महा"जन मेरे पिता हैं तो भला मेरी बात क्यों न समझेंगे जो कि मैंने अपनी टूटीफ़ूटी अंग्रेजी में लिखी है। हो सकता है कि पिताजी ये कहें कि ये मेरे धंधे की जुबान है मैं अपने पुत्र के साथ धंधा नहीं कर रहा इसलिये मैने इसे पढ़ना और समझना जरूरी नहीं समझा। पिताजी ने मुझ असामाजिक पुत्र के बारे में जानने के चक्कर में मेरा प्रोफ़ाइल वगैरह देख डाला होगा जिससे उन्हें पता चल रहा है कि समाचार,कविताएं और बकवास आदि मेरे कीड़ेनुमा लिजलिजे कीड़त्व से जुड़े हैं हो सकता है कि मेरी कविता "क्योंकि मैं हिजड़ा हूँ" भी पढ़ आए होंगे इसी लिये मुझे अपनी औकात न दिखाने के लिये हिदायत दे रहे हैं। बड़े ही सामाजिक हैं हमारे पलायनवादी पिताश्री।
जय जय भड़ास

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परम फ़ादरणीय गौरव महाजन जी - ४

दूसरा उदाहरण वंदनीय महान पिता श्री देते हैं भूतपूर्व राष्ट्रपति कलाम का जिन्होंने खुद को मिसाइल मैन कहलवाने में कभी कोई आपत्ति न करी लेकिन उनकी महानता ये कि जितने भी न्यायिक केस राष्ट्रपति के पास विचार के लिए लंबित थे उनकी तरफ अपने पूरे कार्यकाल में एक सेकंड भी न दिया, जस्टिस आनंद सिंह से मुलाकात के विषय में तो सोचने में भी शायद उन्हें बुखार आ जाता था, अब ये बात दीगर है कि हमारे आदरणीय पिताश्री को जस्टिस आनंद सिंह के बारे में पता ही न हो इनके इस भूतपूर्व राष्ट्रपति आदर्श ने देश की सामरिक शक्ति तो बढ़ा दी लेकिन कभी इस दिशा में न सोचा कि जिस देश में लोग अब तक रोटी के सवाल से जूझ रहे हैं वहाँ मिसाइल ज्यादा जरूरी है या अन्य मुद्दे अधिक वरीयता से विचारणीय हैं? जस्टिस आनंद सिंह के बारे में पिता श्री नहीं जानते हैं इसका कारण शायद ये हो सकता है कि ये एक सामाजिक सोच के महान व्यक्ति हैं इसी लिये इन्होंने स्पष्ट लिखा है कि मैं अपनी खोखली काग़जी डिग्रियों की बात न करूं क्योंकि बहुत संभव हो कि M.D. और Ph.D. करे लोग तो इनका शौचालय साफ़ करते होंगे और टट्टी साफ़ करते ऐसी न जाने कितनी कागजी डिग्रियाँ इधर उधर लेकर फेंक देते होंगे।
जय जय भड़ास

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परम फ़ादरणीय गौरव महाजन जी - ३

पूज्य गौरव "महा"जन भाट, चारण, मौकापरस्त, नचनिया शिरोमणि अमिताभ बच्चन से कितना प्रभावित हैं ये बता रहे हैं इन्हें इस बात में कुछ गलत नहीं दिखता कि वो अपनी बहू के साथ कूल्हे मटकाने वाला कभी बाल ठाकरे जैसे धूर्त राजनेता के पैर चाटता है कभी अमर सिंह के साथ गलबहियाँ करता है कभी मुलायम सिंह को अपने पिता तुल्य बता कर उसकी परिवारवादी समाजवादी पार्टी का अत्यंत बेशर्मी से टीवी पर विज्ञापन करता है लेकिन वह अंग्रेजी और हिंदी दोनो जानता है तो उसका सारा व्यक्तित्व महान हो जाता है, शायद आदरणीय धर्मपिता श्री का ये महान आदर्श अभिनेता इतना महान है कि हमारे देश में जहाँ लाखों लोगों को पीने का पानी आसानी से नसीब नहीं होता ये पैसे लेकर विज्ञापन में कुछ भी कहने वाला लालची लोभी कहता है कि प्यास लगने पर ये किसी नामी गिरामी बहुराष्ट्रीय कंपनी का बनाया सॉफ़्टड्रिंक पीता है। शायद अपने इस भाट चारण नौटंकीबाज अभिनेता से प्रेरित होकर पूज्य पिता श्री भी प्यास लगने पर वही सॉफ़्टड्रिंक पीते होंगे।
जय जय भड़ास

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परम फ़ादरणीय गौरव महाजन जी - २

बात भाषा की निकली तो मैंने भी भड़ासी आदत के अनुसार बिना रुके फटे में टाँग डाल दी और बज़ पर बजाना शुरू कर दिया तो पिताजी गौरव महाजन अवतरित हुए और अपनी महायोग्यता का विराट परिचय देते हुए अपने इस क्षुद्र तुच्छ गलीज़ और नालायक धर्म पुत्र को डपटते हुए बताते हैं कि वे मुझ जन्मजात नंगे को सभा में सभ्यता की पतलून पहनाएंगे। मैंने उनसे ये जानना चाहा है कि यदि अंग्रेजी ने रोटी रोजगार दे दिया तो उसका गुणगान करने लगे वैसे ही क्या यदि धर्म और राष्ट्र की बात आएगी तो किसी अन्य धर्म या राष्ट्र का भी महिमा मंडन करने लगेंगे जैसे कि यदि इस्लाम बेहतर नौकरी दे दे(वैसे ऐसा होता नहीं है)तो मुसलमान बन जाएंगे और सहर्ष इस्लाम स्वीकार लेंगे? इस पर उन्होंने अपनी बंदूक कि अमिताभ बच्चन और भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ.कलाम के कंधे पर रख दिया साथ ही मुझे लताड़ा कि मैं अंग्रेजी नहीं जानता हूँ और निहायत ही असामाजिक किस्म का बंदा हूँ एक कट्टर सोच रखता हूँ तो मैं बीमार मानसिकता का प्राणी हुआ।
जय जय भड़ास

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  © भड़ास भड़ासीजन के द्वारा जय जय भड़ास२००८

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